Adhyatmik Gyan Arjan

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04/04/2021
27/10/2020

भूखे कृष्ण।

दुर्वासा ऋषि बहुत क्रोधी थे। एक बार वे दुर्योधन के यहां पधारे। ऋषि के साथ उनके दस हजार शिष्य भी थे। दुर्योधन ने उनकी सेवा की क्योकि उसे डर था कहीं क्रोधी ऋषि शाप न दे दें। सेवा भक्ति से ऋषि बहुत खुश हुए। दुर्योधन से कोई मनचाहा वर माँगने को कहा।

दुसरो को दुखी देख कर ही दुर्जनों को सुख मिलता हैं। दुर्योधन बड़ा ईर्ष्यालु और दुष्ट था। उसने सोचा दुर्वासा ऐसे ही वन में पांडवों के आश्रम में जाँय। पांडव इन्हें भोजन दे नहीं पाएंगे। तब क्रोधी ऋषि अवश्य शाप देंगे। पाण्डवों का नाश हो जाएगा। इसलिए उसनें वर में अपने लिये कुछ नहीं माँगा। दुर्वासा से हाथ जोड़कर दुर्योधन बोला-’ऋषिवर! आपने जैसे मुझ पर कृपा की हैं, ऐसे ही जंगल में मेरे भाई पाण्डवों के यहां जाकर उन्हें भी सेवा करने का मौका दें।

दुर्वासा वनवासी पाण्डवों के आश्रम में पहुंचे। युधिष्ठिर ने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने के लिए आसान दिया। लेकिन दुर्वासा ऋषि बोलें-’हम स्नान करके अभी आते हैं, तब तक भोजन तैयार रहे, सभी भूखे हैं।’ इतना कहकर अपने दस हजार शिष्यों के साथ वे नदी की और चले गए।

पाण्डव चिन्तित हो उठे। सूर्यदेव ने युधिष्टिर को एक अक्षयपात्र दिया था। द्रौपदी उससे प्रतिदिन चाहें जितने लोगों को भोजन खिला सकती थी, लेकिन पात्र एक बार माँज-धोकर रख देने के बाद, फिर अगले दिन तक उसमे से कुछ नहीं निकल सकता था। द्रौपदी उस दिन बर्तन को माँज-धोकर कर रख चुकी थी। बेचारी द्रौपदी शाप के भय से काँप उठी। उसे कुछ न सुझा। भगवान कृष्ण को याद किया। मन-ही-मन प्राथना की,’भगवान! आज लाज रक्खो।’

भक्तों की पुकार पर भगवान दौड़ें आते हैं। सामने कृष्ण आते दिखाई पड़े। वे आते ही बोले-’बहिन द्रौपदी! बहुत भूक लगी हैं। कुछ खाने को दो।’

बेचारी द्रौपदी रो पड़ी। सिसकती हुई बोली-’हे भगवान ये कैसी परीक्षा हैं! अक्षयपात्र तो मैंने धोकर रख दिया हैं।’

‘जरा पात्र लाओ तो’ - श्रीकृष्ण जी बोले। द्रौपदी बर्तन लायी। श्रीकृष्ण ने उसमे हाथ डाला। कहीं एक चावल उनकी ऊँगली में लगा, उसे वे प्रेम से खा गए और डकार लगाई। भगवान की भूख मिट गयी, फिर संसार में कौन भूखा रह सकता हैं!

दुर्वासा का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण भीम से बोले-’जाओ ऋषि और उनके शिष्यों को भोजन के लिए बुला लाओ।’ पाण्डव हैरान थे। द्रौपदी परेशान थी कि अब क्या होगा ?

उधर भीमसेन नदी पर पहुंचे। वहां देखते हैं कि दुर्वासा और उनके शिष्य नदी के किनारे जहाँ-तहाँ लेटे पड़े हैं। सभी के पेट फुले हैं और उन्हें डकारे आ रहीं हैं। भीम को देखते ही दुर्वासा बोले- ‘हम सभी का पेट भर गया हैं। अब तो उठा ही नहीं जाता। युधिष्ठिर से कहना, हमें क्षमा करें। उनका कल्याण होगा।’

सारा संसार ईश्वर में समाया हैं। भगवान ने चावल का एक कण खाया। उधर ऋषि और उनके शिष्यों की भूख मिट गयी। पाण्डवों की लाज बच गई।

05/06/2020

इस दुनिया में हर जीव को किसी न किसी रूप में परेशानी होती ही है।
जिस प्रकार सुख और दुःख एक-दूसरे के संपूरक होते है, इसमें से एक के नहीं रहने पर दूसरे के अस्तित्व नहीं रह सकता।
गौ माता को ही क्यों नहीं देखते उन्हें सदा बांध कर रखा जाता है, किसी समय में वे देवताओं के लिए भी पूज्य होती थीं, पर आज मानव इतना स्वार्थी बनते जा रहे हैं कि जो
गौ दूध देना बंद कर देती हैं, उन्हें या तो बेच देते हैं या ऐसे ही छोड़ देते हैं। यह सब कालान्तर के प्रभाव से होता है, जिसे हम सत्य युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलयुग के नाम से जानते हैं।
कलयुग तो कलह और परेशानी का
युग है, इसमें अधिकतर लोग स्वार्थी होते हैं, सब अपने बारे में सोचते हैं, दूसरे के बारे में कोई नहीं सोचते।
जहां स्वार्थ होता है, वहां सुख और आनन्द नहीं पाया जाता, इसमें जरा भी संशय की बात नहीं है।

कमल के पुष्प को ही देखिए, जल में रह कर भी वे जल से सदा पृथक् ही रहता है।

ठीक इसी प्रकार आप कलयुग में रहकर भी कलयुग के प्रभाव से बचे रह सकते हैं।

परेशानी से बचने का सरल उपाय है-अभ्यास।

Adhyatmik Gyan Arjan 14/05/2020

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धन्यवाद।

Adhyatmik Gyan Arjan श्री गणेश बीज मंत्र, ऊँ गं गणपतये नमः।। एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।। महाकर्णाय वि.....

21/04/2020

यह पूरे विश्व के लिए निंदा की
विषय हैं।

महाराष्ट्र के पालघर में सौ लोगों के बीच एक निर्दोष भक्त की हत्या पूरे विश्व के लिए निंदनीय है, एक भक्त अपने कर्तव्यों के पालन हेतु गुजरात के एक संत के अन्तियोष्टि संस्कार के लिए जा रहे थे, वह तो अपने कर्तव्यों के पालन हेतु जा रहे थे, हम मानते है की हमारे भारत में अभी लॉक डाउन लागू है, उसका पालन करना अनिवार्य है, इसलिए भारत के हर व्यक्ति को इस नियम का पालन करना अति आवश्यक है। ताकि इससे कोरोना जैसी महामारी से समाज की रक्षा हो सके।

जिस तरह मनुष्य को भोजन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार यदि मनुष्य संस्कार विहीन हो जाए तो इससे धर्म की क्षति होती हैं। कल्पवृक्ष गिरी महाराज जी, सुशील गिरी महाराज जी, और उनके ड्राइवर ने लॉक डाउन के नियम को तोड़ कर कानून के दृष्टि में दोषी बन गए, जिससे कानून इनको इस दोष के अनुसार सजा दे सकते थे। यदि हम धर्म की दृष्टि से देखे तो वह अपने कर्तव्यों के पालन करते हुए, अपने धर्म के पालन कर रहे थे।

यहां पर कल्पना करने की आवश्यकता है कि आप यदि कल्पवृक्ष गिरी या सुशील गिरी या उनके ड्राइवर के स्थान पर निर्दोष हो और एक भीड़ भ्रम या संदेह में आकर लाठी बरसाने लगे और मार दे, तो यह दृश्य कितने भयानक और पापपूर्ण होंगे इसकी कल्पना आप अच्छी प्रकार से कर सकते हैं। ये एक सामूहिक अपराध है, इस समूह में प्रशासन के पुलिस/सैनिक भी मौजूद रहकर अपने कर्तव्यों के पालन न करते हुए उस पापी समूह के साथ दे रहे थे, इसलिए इस कांड में हत्या करने वाले समूह के साथ पुलिस भी अपराधी है।

यदि किसी राज्य के सैनिक अपराध करें तो उस राज्य के राजा भी दोषी होते है, ठीक इसी प्रकार महाराष्ट्र के प्रशासन के उच्चतम अधिकारी भी कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी और उनके ड्राइवर की हत्या के दोषी धर्म की दृष्टि से हो जाते है, क्योंकि राजा का कर्तव्य होता है कि अपने राज्य में न्याय व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए राजा अपने सैनिक को राज्य के कोने-कोने में रह कर न्याय व्यवस्था रखने के आदेश देते है। सैनिक यदि राजा के आज्ञा का पालन न करें तो यह राजा की असमर्थता है।

जो समाज सत्य, धर्म और न्याय के पालन नहीं करते उस समाज के पतन होने में देर नहीं लगते। इन सबका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत है, जिनमें सौ करवों के सर्वनाश हुआ था।

आपका इस विषय पर क्या विचार हैं? कमेंट में अवश्य बताइए!

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Photos from Adhyatmik Gyan Arjan's post 18/04/2020

उत्तिष्ठ युद्धस्व भारत!

कुरुक्षेत्र का मैदान, कौरव-पाण्डवों की सेनायें आमने-सामने लड़ने के लिये तैयार खड़ी थीं। अर्जुन के रथ के सारथी श्रीकृष्ण थे। उन्होंने अर्जुन के रथ को ठीक पाण्डवों और कौरवों की सेना के बीच लाकर खड़ा कर दिया। अर्जुन ने देखा सामने एक ओर उसके गुरु आचार्य द्रोण हैं, जिन्होंने उसे बाण चलाना सिखाया, मामा शल्य हैं, भाई कर्ण हैं। अनेक मित्र हैं। सगे संबंधी हैं। सभी विपक्ष में खड़े हैं। इन सबका वध करना हैं। अर्जुन की आँखें भर आई। इन सब पर बाण चलाने की बात सोचकर वह काँप गया।

श्रीकृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। अर्जुन शोक-मग्न था। पूछने पर बोला- ‘भगवन्! मैं भिक्षा माँगकर पेट पाल लूँगा। लेकिन अपने पितामह, गुरु और सगे-संबंधियों को मारकर राज्य नहीं चाहता, मैं लडूँगा नहीं। ऐसा कहकर अर्जुन ने धनुष-बाण रथ पर रख दिया। वह रथ के पिछले भाग में सिर झुकाकर बैठ गया।

श्रीकृष्ण ने कहा- ‘अर्जुन, कायरता मत करो। युद्ध के बीच ये मोह कैसा! न तुम किसी को मार सकते हो। न कोई मर सकता हैं। जैसे आदमी पुराने कपड़े फेंक कर नये कपड़े पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। आत्मा अमर है। उसे शस्त्र काट नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, न जल भिगो सकता है और न वायु सूखा सकती है।

क्षत्रिय जिस हेतु जन्म लेता हैं, वह अवसर आ गया है। उठो, और युद्ध करो। आज युद्ध ही तुम्हारा धर्म है। अगर युद्ध करते-करते तुम वीरगति पा गये तो स्वर्ग पाओगे और यदि जीत गये तो पृथ्वी का राज पाओगे। दोनों प्रकार से तुम्हारा हित हैं।’

इस प्रकार श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन का मोह दूर किया। उन्हें कर्म-योग का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण भगवान का वह उपदेश विश्वविख्यात है। श्रीमद्भगवद्गीता श्रीकृष्ण भगवान के उसी उपदेश का ग्रंथ है। यह संसार का सर्वोत्तम ग्रंथ हैं।

अर्जुन युद्ध के लिये तैयार हो गये।

17/04/2020

शांति दूत श्रीकृष्ण।

युद्ध की तैयारी पूरी हो गयी। दोनों की सेनाएँ तैयार थी। लेकिन लड़ाई का फल बुरा होता हैं। इसलिए कुछ लोग कौरव-पाण्डवों में मेल-मिलाप करने की कोशिश कर रहे थे। कौरवों को समझाने के लिये राजा विराट ने अपने पुरोहित को भेजा। किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। संजय धृतराष्ट्र के मंत्री थे। वे पाण्डवों को समझाने के लिए आये।

युधिष्ठिर ने संजय का प्रेम से स्वागत किया और कहा- ‘मैं युद्ध नहीं चाहता। मैं तो दोनों परिवारों की सुख-शांति चाहता हूँ। हमने बहुत कष्ट झेले हैं। फिर भी हमें अपना राज्य वापस मिल जाए, तो हम सब भूल जाएंगे। हम पाँच भाई हैं। कम-से-कम पाँच गाँव ही दे दें। हम उसी से संतोष कर लेंगे। फिर जैसी दुर्योधन की इच्छा! हम शांति के लिए भी तैयार हैं और युद्ध के लिए भी।

संजय ने हस्तिनापुर पहुँच कर दुर्योधन को बहुत समझाया। लेकिन वह कहाँ मानने वाला था! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण किसी की भी बात का उस पर प्रभाव नहीं पड़ा।

अंत में स्वयं श्रीकृष्ण ने एक बार जाकर दुर्योधन को समझाने का निश्चय किया। वे शांति दूत बन कर हस्तिनापुर गए। दुर्योधन ने उनके स्वागत की खूब तैयारी करायी। वह सोचता था कि इस स्वागत-सत्कार से श्रीकृष्ण खुश होकर उसकी ओर मिल जाएंगे। उसने भोजन के लिए सुंदर व्यंजन बनवाये थे। विश्राम के लिए अच्छा प्रबंध किया था।

श्रीकृष्ण दुर्योधन की सभा में गये। से सभी ने उठ कर उनका स्वागत किया। बैठने के लिए उच्च स्थान दिया। श्रीकृष्ण ने कौरवों को शांति के लिए समझाया। धृतराष्ट्र से उन्होंने कहा- ‘पाण्डवों ने शर्त पूरी कर दी है। उन्होंने वनवास के बारह वर्ष भी काट लिये हैं। उन्होंने अज्ञातवास का साल भी पूरा कर लिया हैं। अब उनका राज्य उन्हें मिलना चाहिए।’

लेकिन दुर्योधन ने राज्य लौटाने से साफ इनकार कर दिया। उसने कहा- ‘पाण्डवों को आधा राज्य मिला था। किन्तु वे चौपड़ खेलने आये। फिर स्वयं ही उसे गवा बैठे। अब उसे लौटने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।’

दुर्योधन को गांधारी ने प्यार से समझाया। धृतराष्ट्र ने भी समझाते हुए कहा- ‘बेटे! लड़ाई ठीक नहीं हैं। सुलह कर लो। पाण्डव सिर्फ पाँच गाँव ही पाकर संतुष्ट हो जायेंगे। उसे देकर उनसे संधि कर लो।’

पिता की बात दुर्योधन को बहुत बुरी लगी। वह झुँझलाकर बोला- ‘पाँच गाँव किया, मैं तो सुई की नोंक भर भूमि भी उन्हें नहीं दूँगा। अब इसका फैसला युद्धभूमि में ही होगा।

इतना कहकर दुर्योधन सभा से बाहर चला गया। उसके भाई भी पीछे-पीछे उठकर चले गये।

श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र से कहा- ‘राजन! पाण्डव शांति के लिए भी तैयार हैं और युद्ध के लिए भी। यदि दुर्योधन युद्ध ही चाहता है तो वही होगा।’

इतना कहकर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से लौट आये।
अब युद्ध होना निश्चय हो गया।

16/04/2020

श्रीकृष्ण सारथी बने।

पाण्डवों का वनवास पूरा हो गया। अब कौरव और पाण्डव दोनों युद्ध की तैयारी करने लगे। दूसरे राजाओं को अपने-अपने पक्ष में मिलने के लिए निकल पड़े। अर्जुन श्रीकृष्ण के पास द्वारिका पहुँचे उधर दुर्योधन भी द्वारिका के लिए चल पड़ा। संयोग की बात हैं, दोनों एक साथ द्वारिका पहुँचे। उस समय श्रीकृष्ण शयनकक्ष में विश्राम कर रहे थे। दोनों श्रीकृष्ण के संबंधी थे। इसलिए बेहिचक शयनकक्ष तक चलते चले गए। दुर्योधन आगे था। अर्जुन पीछे। श्रीकृष्ण सो रहे थे। दुर्योधन जाकर उनके सिरहाने बैठ गया-गर्व से। अर्जुन पैताने ही हाथ जोड़ कर खड़ा रहा-विनम्रता से।

श्रीकृष्ण जी की नींद खुली। सामने अर्जुन को खड़े देखा। उसका कुशल क्षेम पूछा। पीछे घूमे तो दुर्योधन बैठा दिखा। उसका भी स्वागत किया। दोनों से पूछा, ‘कहो कैसे आना हुआ?’

दुर्योधन पहले से ही जल्दी बोल उठा- ‘हमारे पाण्डवों के बीच युद्ध छिड़ने वाला हैं। हम दोनों पर आपका एक सा प्रेम हैं। लेकिन मैं आपकी सेवा में पहले आया हूँ। इसलिए इस युद्ध में आप मेरी सहायता करें।’

श्रीकृष्ण बोले- ‘दुर्योधन, हो सकता हैं, आप पहले आये हो किन्तु मेरी भेंट तो पहले अर्जुन से ही हुई हैं। वैसे, मैं दोनों की मदद करूँगा। एक ओर मेरी ‘नारायणी’ सेना होगी, दूसरी ओर मैं अकेला रहूंगा। लेकिन लड़ूंगा नहीं। युद्ध में हथियार नहीं उठाऊँगा। अर्जुन अब पहले तुम बोलो, क्या लेना पसंद करोगे?’

अर्जुन ने कहा- ‘भगवन्! आप अस्त्र उठाये, न उठाये। लड़े या न लड़े, मैं तो आपको ही चाहता हूँ।

दुर्योधन खुश हो गया। निहत्थे श्रीकृष्ण को लेकर वह क्या करेगा! उनकी सेना लेना ही पसंद था। दोनो अपने-अपने बांट को अच्छा समझ रहे थे।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- ‘मैं युद्ध में तुम्हारा रथ हांकूँगा।’

इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने।

15/04/2020

युधिष्ठिर की परीक्षा।

पाण्डवों के आश्रम के पास एक तपस्वी की कुटी थी। कुटी में उनकी अरणी और मथानी लटक रही थी। मथानी को अरणी पर रगड़ कर आग जलाई जाती थी। एक हिरण की सींग में वह अटक गई। हिरण उसे जंगल में ले भगा। तपस्वी ने युधिष्ठिर के पास गुहार की तो पाण्डव उसकी खोज में दौड़ पड़े। दौड़ते-दौड़ते दूर घने जंगलों में निकल गए, थक गए, उन्हें प्यास लगी। नकुल जल के लिए गए।

पास ही तालाब था। नकुल पानी पीने लगे। तभी एक यक्ष ने कहा- ‘तालाब मेरा हैं। पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, तब जल पियो।’ नकुल ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। पानी पीने लगे। जल पीते ही मूर्छित होकर गिर पड़े। बहुत देर हुई, तो नकुल की खोज में सहदेव निकल गए। उनकी भी वही गति हुई। फिर अर्जुन और भीम गए। वे भी तालाब के किनारे मूर्छित होकर गिर पड़े। अन्त में युधिष्ठिर गए।

युधिष्ठिर से भी यक्ष बोला- ‘पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, तब तालाब से जल पियो। मैंने ही तुम्हारे भाइयों को मारा हैं। तुम मुझे ठीक उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हारी भी यही गति होगी।’ युधिष्ठिर उत्तर देने के लिए तैयार हो गए। यक्ष और युधिष्ठिर में अनेक प्रश्नोत्तर हुए। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

यक्ष - पृथ्वी से बाद क्या हैं?
युधिष्ठिर - माता!
यक्ष- आकाश से भी ऊंचा कौन हैं?
युधिष्ठिर - पिता!
यक्ष- विदेश में साथी कौन होता हैं?
युधिष्ठिर- विद्या!
यक्ष- पाप की जड़ क्या हैं?
युधिष्ठिर- क्रोध!
यक्ष- किस चीज को खो देने से आदमी धनी बनता हैं?
युधिष्ठिर- लालच।
यक्ष- सबसे बाद आश्चर्य क्या हैं?
युधिष्ठिर- आदमी रोज अनेकों को मरते देखता हैं, फिर भी वह सोचता हैं कि हम अमर रहेंगे, यही सबसे बाद आश्चर्य हैं।

युधिष्ठिर ने सुंदर उत्तर दिये। यक्ष प्रसन्न हो गया। बोले- ‘मैं तुम्हारे किसी एक भाई को जीवित कर सकता हूँ। बोलो, किसे जीवित करूँ ? अर्जुन को या भीम को या भीम को?’

युधिष्ठिर ने कहा- ‘अर्जुन-भीम को नहीं। नकुल को जीवित दीजिए। कुंती का एक पुत्र मैं जीवित हूँ। माता माद्री का भी एक पुत्र जी उठे।’ धन्य हैं युधिष्ठिर की न्याय प्रियता।

इस उत्तर से यक्ष बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सभी भाइयों को जीवित कर दिया। वह धर्म था। युधिष्ठिर की परीक्षा ले रहा था। उसने मुनि की अरणी और मथानी भी लाकर युधिष्ठिर को दे दी।

14/04/2020

भूखे कृष्ण।

दुर्वासा ऋषि बहुत क्रोधी थे। एक बार वे दुर्योधन के यहां पधारे। ऋषि के साथ उनके दस हजार शिष्य भी थे। दुर्योधन ने उनकी सेवा की क्योंकि उसे डर था कहीं क्रोधी ऋषि शाप न दे दें। सेवा भक्ति से ऋषि बहुत खुश हुए। दुर्योधन से कोई मनचाहा वर माँगने को कहा।

दूसरों को दुखी देख कर ही दुर्जनों को सुख मिलता हैं। दुर्योधन बड़ा ईर्ष्यालु और दुष्ट था। उसने सोचा दुर्वासा ऐसे ही वन में पांडवों के आश्रम में जाँय। पांडव इन्हें भोजन दे नहीं पाएंगे। तब क्रोधी ऋषि अवश्य शाप देंगे। पाण्डवों का नाश हो जाएगा। इसलिए उसनें वर में अपने लिये कुछ नहीं माँगा। दुर्वासा से हाथ जोड़कर दुर्योधन बोला- ’ऋषिवर! आपने जैसे मुझ पर कृपा की हैं, ऐसे ही जंगल में मेरे भाई पाण्डवों के यहां जाकर उन्हें भी सेवा करने का मौका दें।

दुर्वासा वनवासी पाण्डवों के आश्रम में पहुंचे। युधिष्ठिर ने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने के लिए आसान दिया। लेकिन दुर्वासा ऋषि बोलें-’हम स्नान करके अभी आते हैं, तब तक भोजन तैयार रहे, सभी भूखे हैं।’ इतना कहकर अपने दस हजार शिष्यों के साथ वे नदी की और चले गए।

पाण्डव चिन्तित हो उठे। सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को एक अक्षय पात्र दिया था। द्रौपदी उससे प्रतिदिन चाहें जितने लोगों को भोजन खिला सकती थी, लेकिन पात्र एक बार माँज-धोकर रख देने के बाद, फिर अगले दिन तक उसमें से कुछ नहीं निकल सकता था। द्रौपदी उस दिन बर्तन को माँज-धोकर कर रख चुकी थी। बेचारी द्रौपदी शाप के भय से काँप उठी। उसे कुछ न सुझा। भगवान कृष्ण को याद किया। मन-ही-मन प्राथना की,’भगवान! आज लाज रक्खो।’

भक्तों की पुकार पर भगवान दौड़ें आते हैं। सामने कृष्ण आते दिखाई पड़े। वे आते ही बोले-’बहिन द्रौपदी! बहुत भूख लगी हैं। कुछ खाने को दो।’

बेचारी द्रौपदी रो पड़ी। सिसकती हुई बोली-’हे भगवान ये कैसी परीक्षा हैं! अक्षय पात्र तो मैंने धोकर रख दिया हैं।’

‘जरा पात्र लाओ तो’ - श्रीकृष्ण जी बोले। द्रौपदी बर्तन लायी। श्रीकृष्ण ने उसमें हाथ डाला। कहीं एक चावल उनकी उँगली में लगा, उसे वे प्रेम से खा गए और डकार लगाई। भगवान की भूख मिट गयी, फिर संसार में कौन भूखा रह सकता हैं!

दुर्वासा का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण भीम से बोले-’जाओ ऋषि और उनके शिष्यों को भोजन के लिए बुला लाओ।’ पाण्डव हैरान थे। द्रौपदी परेशान थी कि अब क्या होगा ?

उधर भीमसेन नदी पर पहुंचे। वहां देखते हैं कि दुर्वासा और उनके शिष्य नदी के किनारे जहाँ-तहाँ लेटे पड़े हैं। सभी के पेट फुले हैं और उन्हें डकारे आ रहीं हैं। भीम को देखते ही दुर्वासा बोले- ‘हम सभी का पेट भर गया हैं। अब तो उठा ही नहीं जाता। युधिष्ठिर से कहना, हमें क्षमा करें। उनका कल्याण होगा।’

सारा संसार ईश्वर में समाया हैं। भगवान ने चावल का एक कण खाया। उधर ऋषि और उनके शिष्यों की भूख मिट गयी। पाण्डवों की लाज बच गई।

13/04/2020

वयं पंचाधिकम् शतम्।

संस्कृत एक सूक्ति हैं;-
असम्भवम् हेम मृगस्य जन्म,
तथापि रामो लुलुभे मृगस्य।
प्रायः समापन्न विपत्तिकाले,
धियोपि पुंसां मालिनी भवन्ति।
सोने का हिरण होना असंभव हैं। फिर भी श्री राम जी सुनहले मृग पर ललचा गए। सच हैं, विपत्ति आने पर आदमी की बुद्धि मंद हो जाती हैं।
यही दशा धर्मराज युधिष्ठिर की भी हुई। दुर्योधन ने उन्हें दोबारा चौपड़ खेलने के लिए बुलावा भेजा। किन्तु वे दुर्भाग्य के कारण उसे ‘न’ नहीं कर सके। हस्तिनापुर में फिर चौपड़ की बाजी जम गयी।
इस बार खेल की शर्त विचित्र थी। हारने वाला अपने भाइयों सहित बारह वर्ष जंगल में रहे। उसके बाद एक वर्ष अज्ञातवास में बिताये। यदि उस अवधि में उनका पता लग जाए तो फिर से सभी को बारह वर्ष का वनवास भोगना होगा। पांडवों का दुर्भाग्य था। वे फिर हर गए। शर्त के अनुसार पांचों भाई, माता कुंती और द्रौपदी के साथ वन चले गए।
पांडव वनवास में दुःख भोग रहे थे। लेकिन दुर्योधन का मन अभी भरा नहीं था। वह अपनी आंखों से पांडवों को तकलीफ झेलते देखना चाहता था। इसलिये पशुओं की गिनती करने के बहाने वह द्वैतवन चल पड़ा। उसके भाई तथा कर्ण आदि भी साथ थे।
दुर्योधन झगड़ालू तो था ही, जंगल में किसी बात पर गंधर्वराज चित्रसेन से उसकी कहा-सुनी हो गई। देखते-देखते दोनों की सेनाओं में युद्ध छिड़ गया। दुर्योधन की सेना मार खाकर भाग खड़ी हुई। कर्ण भी युद्ध में टिक न सका। अकेला दुर्योधन लड़ता रहा, अंत में वह भी हार गया। चित्रसेन ने उसे रस्सी में बांधकर रथ में डाल दिया।
दुर्योधन के हारे सेना हुए, सैनिक जान बचा कर पांडवों के पास पहुंचे। ‘बचाओ-बचाओ’ की पुकार करने लगे। दुर्योधन के बंदी होने का समाचार बताया। सुनकर भीम बहुत खुश हुए। बोले-’गंधर्वराज को बधाई। उन्होंने तो वही किया जो हमें करना चाहिए था।
युधिष्ठिर को भीम की बात बुरी लगी। उसे झिड़कते हुए बोले- भीमसेन! दुर्योधन के बन्दी होने पर सौ भाई कौरव और पांच हम, एक दूसरे से निपट लेंगे। लेकिन किसी तीसरे से युद्ध होने पर हम और कौरव अलग-अलग नहीं हैं। बल्कि एक सौ पांच हैं- ‘वयं पंचाधिकम् शतम्।
फिर तो पांडवों ने दुर्योधन की भागती सेना को धैर्य दिया। गंधर्वराज पर धावा बोल दिया। पांडवों को देखकर गंधर्वराज शांत हो गए। युधिष्ठिर से हाथ जोड़कर बोले- ‘धर्मराज, मैंने तो दुष्ट कौरवों को सीख देने के लिए ऐसा किया था। आप नहीं चाहते तो मैं दुर्योधन को मुक्त किये देता हूँ।
बंधन से छूटकर दुर्योधन अपना-सा मुंह लेकर हस्तिनापुर लौट गया। सच हैं, घमंडी का सिर हमेशा नीचा होता हैं।

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