16/07/2026
राजस्थानी को उसका हक कब मिलेगा ?
- भरत ओला
राजस्थान की धरती ने केवल वीरों और संतों को ही जन्म नहीं दिया बल्कि इसने भारत की सबसे समृद्ध लोकभाषाओं में से एक राजस्थानी भाषा को भी जन्म दिया है। यह वही भाषा है जिसमें डिंगल और पिंगल काव्य परंपरा ने भारतीय साहित्य को अमूल्य धरोहरें दीं । जिसमें चारणों ,भाटों और जैन मुनियों ने इतिहास और उसकी संस्कृति .को शब्दों में संजोया । जिसमें लोकदेवताओं की गाथाएं गूंजीं और जिसमें आज भी राजस्थान की आत्मा बोलती है लेकिन विडंबना यह है कि अपनी ही धरती पर यह भाषा आज अपने अस्तित्व और अधिकार के लिए संघर्ष कर रही है।
आज एक समाचार प्रकाशित हुआ कि राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के निर्देशों के बाद प्रदेश के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित करने की तैयारी शुरू हो गई है। अपनी मातृभाषा के प्रति उनका यह लगाव और प्रतिबद्धता सराहनीय है। हर व्यक्ति और हर समाज को अपनी भाषा के संरक्षण और संवर्धन का अधिकार है। महाराष्ट्र अपनी भाषा के लिए सजग है और उसके प्रतिनिधि अपनी भाषा के विकास के लिए सक्रिय हैं, यह अच्छी बात है लेकिन इसी समाचार ने राजस्थान के लोगों के मन में एक स्वाभाविक और पीड़ादायक प्रश्न भी खड़ा कर दिया है कि क्या राजस्थान की अपनी मातृभाषा राजस्थानी को भी कभी ऐसा सम्मान मिलेगा ?
आज स्थिति यह है कि राजस्थान के अधिकांश विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के स्वतंत्र विभाग तक नहीं हैं। केवल कुछ विश्वविद्यालयों में ही राजस्थानी अध्ययन की सीमित व्यवस्था है। प्रदेश के करोड़ों लोगों की मातृभाषा होने के बावजूद राजस्थानी को वह संस्थागत समर्थन नहीं मिल पाया है , जिसकी वह हकदार है।
प्रश्न यह नहीं है कि मराठी पढ़ाई जाए या नहीं। भारत की प्रत्येक भाषा सम्मान की अधिकारी है। प्रश्न यह है कि राजस्थानी की उपेक्षा क्यों? क्या यह उचित है कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में पहले अन्य भाषाओं के अध्ययन केंद्र खुलें और राजस्थान की अपनी भाषा अब भी मान्यता और विभागों के लिए संघर्ष करती रहे?
यदि महाराष्ट्र का राज्यपाल राजस्थान में मराठी अध्ययन केंद्रों की वकालत कर सकता है, तो क्या राजस्थान के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को राजस्थानी के लिए आवाज नहीं उठानी चाहिए? क्या कभी पंजाब के राज्यपाल और राजस्थान के वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया पंजाब के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी अध्ययन केंद्र खोलने की मांग कर सकते हैं? यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति से नहीं वरन पूरे राजनीतिक नेतृत्व से है।
राजस्थानी कोई बोली नहीं है। यह एक समृद्ध और विकसित भाषा है । जिसका हजार वर्षों से अधिक पुराना साहित्यिक इतिहास है। ढोला-मारू, वीर सतसई, वेलि कृष्ण रुक्मणी री, पृथ्वीराज रासो जैसी अमूल्य कृतियां इसकी साहित्यिक परंपरा की साक्षी हैं। हिंदी भाषा का महल राजस्थानी साहित्य की नींव पर ही खड़ा है । राजस्थानी साहित्य की समृद्धि को देश और दुनिया के भाषाविद् स्वीकार कर चुके हैं। यही कारण है कि देश की सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादेमी ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दे रखी है और इस भाषा में प्रतिवर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं।
राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए दशकों से संघर्ष चलता रहा है। इसी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय 3 मार्च 2003 को लिखा गया, जब अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष भरत ओला के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा के सामने विशाल धरना और प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस जनदबाव और आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा ने 25 अगस्त 2003 को सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वह प्रस्ताव केंद्र सरकार की फाइलों में धूल फांक रहा है। यह केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता की उपेक्षा भी है।
स्थिति और भी विडंबनापूर्ण तब हो जाती है जब न्यायपालिका के निर्णयों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिए जाने के बावजूद राजस्थान में राजस्थानी को विद्यालयी शिक्षा में व्यापक रूप से लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती। दुनिया भर के शोध बताते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, अभिव्यक्ति और सीखने की क्षमता अधिक विकसित होती है। फिर भी राजस्थान का बच्चा अपनी ही मातृभाषा में पढ़ने के अधिकार से वंचित है।
राजस्थान के राजनेताओं और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, इतिहास और पहचान की वाहक भी होती है। हमारे राजनेताओं को इस बात को समझाना पड़ेगा कि जिस समाज की भाषा कमजोर होती है, उसकी सांस्कृतिक जड़ें भी कमजोर होने लगती हैं।
मैं पुरजोर शब्दों में कहना चाहूंगा कि राजस्थान के प्रत्येक विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा के स्वतंत्र विभाग स्थापित किए जाएं। राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र खोले जाएं। विद्यालय स्तर पर राजस्थानी को नियमित विषय के रूप में लागू किया जाए। संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को शामिल करने के लिए राजस्थान सरकार और प्रदेश के सभी सांसद एकजुट होकर केंद्र पर दबाव बनाएं। भाषा के संरक्षण को राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रश्न माना जाए।
हमारे राजनेताओं को इस बात को समझाना पड़ेगा कि राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों, महलों और रेगिस्तान से नहीं है। राजस्थान की असली पहचान उसकी भाषा, उसकी लोककथाएं, उसके गीत, उसकी गाथाएं ,उसका साहित्य और उसकी बोलियां हैं। यदि राजस्थानी भाषा कमजोर पड़ती है तो राजस्थान की आत्मा का एक हिस्सा भी कमजोर पड़ जाएगा।
महाराष्ट्र अपनी भाषा के लिए सजग है । पंजाब अपनी भाषा के लिए प्रतिबद्ध है । तमिलनाडु अपनी भाषा के लिए संघर्ष करता है । बंगाल अपनी भाषा पर गर्व करता है। अब समय आ गया है कि राजस्थान भी अपनी भाषा के सम्मान और अधिकार के लिए उसी दृढ़ता के साथ खड़ा हो। क्योंकि प्रश्न केवल भाषा का नहीं है । प्रश्न राजस्थान की अस्मिता का है। जब महाराष्ट्र की भाषा राजस्थान में पढ़ाई जा सकती है तो राजस्थान की भाषा राजस्थान में सम्मानपूर्वक क्यों नहीं पढ़ाई जा सकती?
यह प्रश्न आज हर राजस्थानी के मन में है और इसका उत्तर इतिहास भी मांगेगा और आने वाली पीढ़ियां भी अगर वक्त राजस्थानी को उसका वाजिब हक नहीं मिला राजस्थान को बहुत पछताना पड़ेगा।
37 , सेक्टर 5 , नोहर (राजस्थान )