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राजस्थानी को उसका हक कब मिलेगा ?- भरत ओला राजस्थान की धरती ने केवल वीरों और संतों को ही जन्म नहीं दिया बल्कि इसने भारत क...
16/07/2026

राजस्थानी को उसका हक कब मिलेगा ?
- भरत ओला
राजस्थान की धरती ने केवल वीरों और संतों को ही जन्म नहीं दिया बल्कि इसने भारत की सबसे समृद्ध लोकभाषाओं में से एक राजस्थानी भाषा को भी जन्म दिया है। यह वही भाषा है जिसमें डिंगल और पिंगल काव्य परंपरा ने भारतीय साहित्य को अमूल्य धरोहरें दीं । जिसमें चारणों ,भाटों और जैन मुनियों ने इतिहास और उसकी संस्कृति .को शब्दों में संजोया । जिसमें लोकदेवताओं की गाथाएं गूंजीं और जिसमें आज भी राजस्थान की आत्मा बोलती है लेकिन विडंबना यह है कि अपनी ही धरती पर यह भाषा आज अपने अस्तित्व और अधिकार के लिए संघर्ष कर रही है।
आज एक समाचार प्रकाशित हुआ कि राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के निर्देशों के बाद प्रदेश के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित करने की तैयारी शुरू हो गई है। अपनी मातृभाषा के प्रति उनका यह लगाव और प्रतिबद्धता सराहनीय है। हर व्यक्ति और हर समाज को अपनी भाषा के संरक्षण और संवर्धन का अधिकार है। महाराष्ट्र अपनी भाषा के लिए सजग है और उसके प्रतिनिधि अपनी भाषा के विकास के लिए सक्रिय हैं, यह अच्छी बात है लेकिन इसी समाचार ने राजस्थान के लोगों के मन में एक स्वाभाविक और पीड़ादायक प्रश्न भी खड़ा कर दिया है कि क्या राजस्थान की अपनी मातृभाषा राजस्थानी को भी कभी ऐसा सम्मान मिलेगा ?
आज स्थिति यह है कि राजस्थान के अधिकांश विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के स्वतंत्र विभाग तक नहीं हैं। केवल कुछ विश्वविद्यालयों में ही राजस्थानी अध्ययन की सीमित व्यवस्था है। प्रदेश के करोड़ों लोगों की मातृभाषा होने के बावजूद राजस्थानी को वह संस्थागत समर्थन नहीं मिल पाया है , जिसकी वह हकदार है।
प्रश्न यह नहीं है कि मराठी पढ़ाई जाए या नहीं। भारत की प्रत्येक भाषा सम्मान की अधिकारी है। प्रश्न यह है कि राजस्थानी की उपेक्षा क्यों? क्या यह उचित है कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में पहले अन्य भाषाओं के अध्ययन केंद्र खुलें और राजस्थान की अपनी भाषा अब भी मान्यता और विभागों के लिए संघर्ष करती रहे?
यदि महाराष्ट्र का राज्यपाल राजस्थान में मराठी अध्ययन केंद्रों की वकालत कर सकता है, तो क्या राजस्थान के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को राजस्थानी के लिए आवाज नहीं उठानी चाहिए? क्या कभी पंजाब के राज्यपाल और राजस्थान के वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया पंजाब के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी अध्ययन केंद्र खोलने की मांग कर सकते हैं? यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति से नहीं वरन पूरे राजनीतिक नेतृत्व से है।
राजस्थानी कोई बोली नहीं है। यह एक समृद्ध और विकसित भाषा है । जिसका हजार वर्षों से अधिक पुराना साहित्यिक इतिहास है। ढोला-मारू, वीर सतसई, वेलि कृष्ण रुक्मणी री, पृथ्वीराज रासो जैसी अमूल्य कृतियां इसकी साहित्यिक परंपरा की साक्षी हैं। हिंदी भाषा का महल राजस्थानी साहित्य की नींव पर ही खड़ा है । राजस्थानी साहित्य की समृद्धि को देश और दुनिया के भाषाविद् स्वीकार कर चुके हैं। यही कारण है कि देश की सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादेमी ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दे रखी है और इस भाषा में प्रतिवर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं।
राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए दशकों से संघर्ष चलता रहा है। इसी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय 3 मार्च 2003 को लिखा गया, जब अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष भरत ओला के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा के सामने विशाल धरना और प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस जनदबाव और आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा ने 25 अगस्त 2003 को सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वह प्रस्ताव केंद्र सरकार की फाइलों में धूल फांक रहा है। यह केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता की उपेक्षा भी है।
स्थिति और भी विडंबनापूर्ण तब हो जाती है जब न्यायपालिका के निर्णयों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिए जाने के बावजूद राजस्थान में राजस्थानी को विद्यालयी शिक्षा में व्यापक रूप से लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती। दुनिया भर के शोध बताते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, अभिव्यक्ति और सीखने की क्षमता अधिक विकसित होती है। फिर भी राजस्थान का बच्चा अपनी ही मातृभाषा में पढ़ने के अधिकार से वंचित है।
राजस्थान के राजनेताओं और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, इतिहास और पहचान की वाहक भी होती है। हमारे राजनेताओं को इस बात को समझाना पड़ेगा कि जिस समाज की भाषा कमजोर होती है, उसकी सांस्कृतिक जड़ें भी कमजोर होने लगती हैं।
मैं पुरजोर शब्दों में कहना चाहूंगा कि राजस्थान के प्रत्येक विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा के स्वतंत्र विभाग स्थापित किए जाएं। राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र खोले जाएं। विद्यालय स्तर पर राजस्थानी को नियमित विषय के रूप में लागू किया जाए। संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को शामिल करने के लिए राजस्थान सरकार और प्रदेश के सभी सांसद एकजुट होकर केंद्र पर दबाव बनाएं। भाषा के संरक्षण को राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रश्न माना जाए।
हमारे राजनेताओं को इस बात को समझाना पड़ेगा कि राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों, महलों और रेगिस्तान से नहीं है। राजस्थान की असली पहचान उसकी भाषा, उसकी लोककथाएं, उसके गीत, उसकी गाथाएं ,उसका साहित्य और उसकी बोलियां हैं। यदि राजस्थानी भाषा कमजोर पड़ती है तो राजस्थान की आत्मा का एक हिस्सा भी कमजोर पड़ जाएगा।
महाराष्ट्र अपनी भाषा के लिए सजग है । पंजाब अपनी भाषा के लिए प्रतिबद्ध है । तमिलनाडु अपनी भाषा के लिए संघर्ष करता है । बंगाल अपनी भाषा पर गर्व करता है। अब समय आ गया है कि राजस्थान भी अपनी भाषा के सम्मान और अधिकार के लिए उसी दृढ़ता के साथ खड़ा हो। क्योंकि प्रश्न केवल भाषा का नहीं है । प्रश्न राजस्थान की अस्मिता का है। जब महाराष्ट्र की भाषा राजस्थान में पढ़ाई जा सकती है तो राजस्थान की भाषा राजस्थान में सम्मानपूर्वक क्यों नहीं पढ़ाई जा सकती?
यह प्रश्न आज हर राजस्थानी के मन में है और इसका उत्तर इतिहास भी मांगेगा और आने वाली पीढ़ियां भी अगर वक्त राजस्थानी को उसका वाजिब हक नहीं मिला राजस्थान को बहुत पछताना पड़ेगा।
37 , सेक्टर 5 , नोहर (राजस्थान )

केसरी चंद मालू - राजस्थानी गीत - संगीत और संस्कृति की धड़कन - भरत ओला कुछ व्यक्तित्व केवल अपने कामों से नहीं वरन अपने व्...
14/07/2026

केसरी चंद मालू - राजस्थानी गीत - संगीत और संस्कृति की धड़कन
- भरत ओला
कुछ व्यक्तित्व केवल अपने कामों से नहीं वरन अपने व्यवहार, आत्मीयता और मनुष्यता से लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। उनके जाने के बाद केवल एक व्यक्ति नहीं जाता वरन स्मृतियों, संबंधों और संवेदनाओं का एक पूरा संसार हमारे भीतर रिक्त हो जाता है। राजस्थान के उद्योगपति, वीणा कैसेट्स के संस्थापक, लोक-संगीत के संरक्षक और राजस्थानी संस्कृति के सच्चे साधक श्री केशरीचंद मालू के निधन का समाचार मेरे लिए ऐसा ही एक व्यक्तिगत और अविश्वसनीय आघात लेकर आया है।
मेरी उनसे पहली मुलाकात आज से कोई 20 वर्ष पहले हुई थी। यह मुलाकात सामान्य परिचय भर तक सीमित नहीं थी बल्कि एक ऐसे संबंध की शुरुआत थी, जो समय के साथ आत्मीयता की गहराइयों तक पहुंच गयी थी । राजस्थानी भाषा की मान्यता के मुद्दे पर हमारी चिंताएं और प्रतिबद्धताएं समान थीं। इसी साझा सरोकार ने हमारे बीच एक आत्मिक जुड़ाव पैदा किया। धीरे-धीरे यह जुड़ाव मित्रता में बदल गया। यद्यपि वे मुझसे लगभग अठारह वर्ष बड़े थे परंतु कभी यह उम्र का अंतर हमारे संबंधों के बीच नहीं आया। उनमें एक साथ बुजुर्ग का स्नेह, बड़े भाई का अपनापन और मित्र का विश्वास था।
जयपुर जाना होता तो हल्दिया हाउस में उनसे मुलाकात लगभग तय होती थी। उन मुलाकातों में औपचारिकता का कोई स्थान नहीं होता था। बातचीत राजस्थानी भाषा, साहित्य, संगीत, संस्कृति और समाज के अनेक मुद्दों पर होती लेकिन हर मुलाकात का सबसे बड़ा आकर्षण उनका आत्मीय व्यवहार होता था। उनकी आवभगत, उनकी सहजता और उनकी सहृदयता का हर मिलने वाला व्यक्ति कायल हो जाता था। वे केवल लोगों से मिलते नहीं थे बल्कि उन्हें अपना बना लेते थे।
केशरीचंद मालू की वास्तविक पहचान राजस्थानी लोक-संस्कृति के उस प्रहरी के रूप में बनी, जिसने लोकगीतों को घर और गांव से निकालकर देश-दुनिया तक पहुंचाने का कार्य किया। जिस समय लोक-संगीत आधुनिक मनोरंजन की चकाचौंध में अपनी जगह बचाने के संघर्ष में था, उस समय वीणा कैसेट्स ने उसे नया जीवन, नई पहचान और नया मंच प्रदान किया। राजस्थान के लोकगीत ,गायक, और लोक कलाकार उनके प्रयासों के कारण व्यापक पहचान प्राप्त कर सके।
उन्होंने केवल गीतों का व्यवसाय नहीं किया बल्कि लोक-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का एक सांस्कृतिक अभियान चलाया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजस्थान के लोक , भक्ति और सांस्कृतिक संगीत को देश-विदेश तक पहुंचाने में उनका योगदान ऐतिहासिक महत्व का है। वे उन विरले लोगों में थे जिन्होंने संस्कृति को बाजार की वस्तु नहीं बल्कि समाज की आत्मा माना।
आज उनके जाने से राजस्थानी संगीत और संस्कृति जगत में जो रिक्तता उत्पन्न हुई है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा लेकिन मेरे लिए यह क्षति केवल सांस्कृतिक या सामाजिक नहीं बल्कि अत्यंत व्यक्तिगत है। मुझे लगता है कि मैंने एक आत्मीय बुजुर्ग, एक मार्गदर्शक बड़े भाई और एक बेहतरीन मित्र को खो दिया है।
मालू जी ! आपके जाने को स्वीकार करना कठिन है। स्मृतियों में आज भी आपकी वही मुस्कान, वही अपनापन और वही स्नेहिल स्वर गूंज रहे हैं। आपसे हुई अनगिनत मुलाकातें, आपकी प्रेरणादायी बातें और आपका स्नेह जीवन भर मेरे साथ रहेंगे।
अलविदा तो क्या कहें, मालू जी! क्योंकि कुछ लोग विदा नहीं होते, वे अपने कामों और अपने प्रेम के कारण हमेशा हमारे बीच बने रहते हैं। आप भी राजस्थानी गीत-संगीत की हर धुन में, लोक संस्कृति की हर गूंज में और राजस्थानी भाषा के हर संघर्ष में धड़कते रहेंगे।
आपका जाना एक युग का अवसान है लेकिन आपकी स्मृति और आपका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
श्रद्धासुमन!
विनम्र श्रद्धांजलि!
भरत ओला

#सुजानगढ़ #केसीमालू #श्रद्धांजलि

मासिक पत्रिका 'भटनेर पोस्ट' के स्थाई कॉलम 'तरकश' में इस बार पढ़ें एक नया व्यंग्य । शुक्रिया संपादक भाई गोपाल झा ।रुपया, ...
13/07/2026

मासिक पत्रिका 'भटनेर पोस्ट' के स्थाई कॉलम 'तरकश' में इस बार पढ़ें एक नया व्यंग्य । शुक्रिया संपादक भाई गोपाल झा ।

रुपया, राष्ट्रवाद और आर्थिक मौनासन का स्वर्णयुग
- भरत ओला
एक समय था जब रुपया गिरता था तो देश की आत्मा कांप उठती थी। टीवी चैनलों पर ऐसी चीख पुकार मचती थी , जैसे रुपया नहीं, लोकतंत्र की अंतिम सांस टूट गई हो। उन दिनों एक तेजस्वी, ओजस्वी, राष्ट्रवादी, मुद्रा संवेदनशील नेता थे। रुपया पांच पैसे भी गिर जाए तो वे मंच पर ऐसे तड़प उठते थे , जैसे किसी ने देश की गुल्लक तोड़ दी हो।
वे गरजते थे ,“प्रधानमंत्री कमजोर हैं क्या? रुपया इतनी तेजी से क्यों गिर रहा है?”
उस समय अर्थशास्त्र बड़ा सरल था। रुपया गिरा मतलब सरकार निकम्मी । डॉलर बढ़ा मतलब प्रधानमंत्री कमजोर । पेट्रोल महंगा मतलब राष्ट्र संकट में ।
देश को समझाया गया था कि रिज़र्व बैंक नहीं, सीधे प्रधानमंत्री अपनी जेब में रुपया पकड़कर बैठे हैं और हाथ ढीला पड़ गया है।
फिर समय बदला। नेता बदल गए। और इसके साथ ही अर्थशास्त्र बदल गया। अर्थशास्त्री को गर्तशास्त्री घोषित कर दिया गया । पुरानी किताबें रद्दी में बेच दी गईं और नई पुस्तक आई । जिसमें साफ लिखा था ,“रुपये का गिरना दरअसल भारत का उठना है।” लोगों की स्मृति पर पौंछा फेर दिया गया ।
अब रुपया गिरता है तो सरकार नहीं गिरती, केवल टीवी एंकरों की भाषा बदल जाती है। पहले वे चिल्लाते थे ,
“देश जानना चाहता है कि रुपया क्यों गिर रहा है?”
अब वे गर्दन हल्की तिरछी करके, होठों पर सरकारी मुस्कान चिपकाकर कहते हैं ,“वैश्विक तरलता दबाव के परिप्रेक्ष्य में भारतीय मुद्रा ने एक सामयिक तकनीकी समायोजन किया है।”
वाह! क्या गजब है । गरीब आदमी इसे महंगाई कहता है। अर्थशास्त्री इसे अवमूल्यन कहते हैं। भक्त इसे विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया बताते हैं। सुनकर लगता है रुपया गिरा नहीं है । मयूरासन कर रहा है। डॉलर के चरण स्पर्श करके भारतीय संस्कृति का प्रचार कर रहा है। अब देश में एक नया दर्शन चल रहा है । मंहगाई बढ़ी मतलब आत्मनिर्भरता आई । बेरोजगारी बढ़ी मतलब युवा उद्यमी बनें । जनता भूखी सोई मतलब उपवास से आत्मशुद्धि हुई । रुपया गिरा मतलब भारत वैश्विक शक्ति बना । वाह भई वाह ! इस दर्शन में हर समस्या उपलब्धि है और हर गिरावट ऐतिहासिक छलांग।
अब देश में दो समानांतर सत्य चलते हैं। पहला सत्य बाजार वाला। जहां गृहिणी आटे दाल का भाव देखकर तय करती है कि इस महीने दूध कितना आएगा और सब्जी कितनी ।
दूसरा सत्य टीवी वाला। जहां भारत पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है, चीन कांप रहा है, पाकिस्तान मर चुका है और अमेरिका भारत से जल रहा है।
जनता दिनभर पहले सत्य में पिसती है और रात को दूसरे सत्य में सो जाती है। लोकतंत्र भी कितना विकसित हो गया है। पहले सरकार से सवाल पूछे जाते थे। अब सवाल पूछने वाले से सवाल पूछा जाता है।
अगर आप पूछ लें , “भाई साहब ! रुपया इतना क्यों गिर गया?”
तो उत्तर तीन चरणों में मिलता है। पहला राष्ट्रवादी उत्तर ,“क्या आप पाकिस्तान जाना चाहते हैं?”
दूसरा ऐतिहासिक उत्तर , “नेहरू ने जो किया था, उसका हिसाब तो देना पड़ेगा।”
और तीसरा आध्यात्मिक उत्तर ,“रुपया माया है। असली भारत आत्मा है, और आत्मा कभी नहीं गिरती।”
इन तीनों उत्तरों के बाद आदमी अपना प्रश्न ही भूल जाता है। और यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता है। सरकार की रणनीति भी अद्भुत है। जब भी रुपया गिरे , हिंदू मुस्लिम उठा दो। जब भी महंगाई बढ़े . पाकिस्तान को धमका दो और जब बेरोजगारी दिखे , चंद्रयान उड़ा दो।
यह तकनीक बड़ी अद्भुत है । इसका नाम है ,“राष्ट्रवादी ध्यान भटकाव प्रणाली।”इसमें जनता का ध्यान इतनी कुशलता से भटकाया जाता है कि जनता स्वयं भटकने में गर्व अनुभव करने लगती है। अब स्थिति यह है कि रुपया रोज गिरता है और सरकार रोज उठ खड़ी होती है। इतनी सहनशील सरकार इतिहास में नहीं हुई।
रुपया गिर रहा है, नौकरियां गायब हैं, महंगाई बेलगाम है मगर राष्ट्रवाद का तापमान स्थिर है ,बल्कि शिखर पर है।
देश में अब दो चीजें कभी नहीं गिरतीं । पहली - भक्तों का विश्वास और दूसरी सत्ता का आत्मविश्वास । हरिशंकर परसाई आज होते तो शायद लिखते ,
“यह वह देश है जहां रुपया गिरता है और जनता तालियां बजाती है। वजह यह नहीं कि जनता मूर्ख है।
वजह यह है कि तालियां बजाना अब देशभक्ति की अनिवार्य योग्यता है।”
स्वदेशी भारत के मंच पर शानदार दृश्य दिखाया जा रहा है। मंच पर सरकार खड़ी है , जो कहती है, “सब ठीक है।”
दर्शक दीर्घा में जनता बैठी है , और अंदर ही अंदर फुसफुसा रही है, “ नहीं नहीं । सब कुछ भी ठीक नहीं है।”
मगर दोनों के बीच एक विशाल परदा टंगा है। उस परदे का नाम है राष्ट्रवाद। परदे के इस तरफ महंगाई है, बेरोजगारी है, गिरता रुपया है, टूटती बचत है। परदे के उस तरफ विश्वगुरु है, अखंड भारत है, सोने की चिड़िया है और अमृतकाल है।
रंगमंच के इधर उधर खड़े सिपाहसालार ,एंकर, भक्त, आईटी सेल और प्रवक्ता घड़ी घड़ी चिल्लाते रहते हैं ,“परदे के पीछे मत झांको। यह राष्ट्रद्रोह है।”
सबसे अद्भुत परिवर्तन तो उस नेता में आया है ,जो कभी रुपये के गिरने पर कविता लिखता था । आज उसी रुपये की गिरावट पर मौन साधे बैठा है। लगता है प्रधानमंत्री कार्यालय में कोई विशेष योगासन सिखाया जाता है ,जिसका नाम है आर्थिक मौनासन ।
इस आसन में मंहगाई दिखाई नहीं देती । बेरोजगारी सुनाई नहीं देती । गिरता रुपया महसूस नहीं होता
और राष्ट्रवाद इतना ऊंचा उठ जाता है कि आदमी अपनी खाली जेब को भी राष्ट्रीय उपलब्धि समझने लगता है।
37 , सेक्टर 5 , नोहर ( राज. )

11/07/2026

"रंग उजास " में बच्चों , अभिभावकों और अतिथियों ने भरा रंग

यह दिल्ली नहीं हिसार है जनाब ! है ना कमाल की बात । फिर भी शासन - प्रशासन मौन है । आपके यहां एयर क्वालिटी कैसी है ? जरा ब...
03/07/2026

यह दिल्ली नहीं हिसार है जनाब ! है ना कमाल की बात । फिर भी शासन - प्रशासन मौन है । आपके यहां एयर क्वालिटी कैसी है ? जरा बताइएगा

22/06/2026

उजास स्पेशल अकादमी के रंग - उजास में अमायरा ने बनाई यह पेटिंग । क्या कहेंगे आप ?

19/06/2026

🥰❤️

हिंदी मासिक , भटनेर पोस्ट , जून 2026 , सं. गोपाल झा , कॉलम - नश्तर पधारो म्हारै नरक भरत ओळा आजकल दुनिया में एक नया विभाग...
15/06/2026

हिंदी मासिक , भटनेर पोस्ट , जून 2026 , सं. गोपाल झा , कॉलम - नश्तर

पधारो म्हारै नरक
भरत ओळा
आजकल दुनिया में एक नया विभाग खुल गया है - नरक प्रमाणन विभाग। पहले यह काम धर्म और कल्पनाओं तक सीमित था, अब यह सीधे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के हाथ में आ गया है । अब कोई भी खामखां उठता है , माइक संभालता है और किसी भी देश पर मुहर लगा देता है - यह नरक है । इस विभाग के सक्रिय निरीक्षकों में अमेरिकन सांड का नाम भी सुना गया है ।
उन्होंने दूर बैठकर , बिना कहीं आए गए , बिना धूल खाए , बिना पसीना बहाए एक भरे - पूरे देश को नरक घोषित कर दिया । यह सुनकर मेरे गांव की चौपाल में हल्की हंसी भी गूंजी और थोड़ी चिंता भी हुई ।
मेरे गांव के रामभगत ताऊ ने हुक्का खींचते हुए कहा ,“ मैं तो सोच रहा था कि हम स्वर्ग में हैं । मुझे तो आज पता चला कि हम नरक में रह रहे हैं । “
सच भी है हमारे यहां तो बहू बेटे बुजुर्गों की सेवा कर नरक भोग रहे हैं । मरने पर बारह दिन बैठना ,फिर महीने का घड़ा , फिर छमाही और साल में एक बार पुण्यतिथि का झंझट और । सुना है अमेरिकी स्वर्ग में यह लफड़ा नहीं होता । कोई मरे कोई जिए किसी को क्या मतलब ? बस तुम तो स्वर्ग का आनंद लूटो । रामभगत ताऊ को तो आज एक नौजवान ने खाट के पैंताने बैठकर बताया , “ ताऊ ! अमेरिकी स्वर्ग बड़ा मजेदार है । वहां यह भी पता नहीं चलता कि किसकी मां कहां बैठी है और बाप कौन से स्वर्ग में आनंद लूट रहा है । न मां बाप को बेटों से मतलब , न बेटों को मां बाप से । सब अपनी - अपनी खाल में मस्त । अमेरिकन स्वर्ग में चहुंओर मस्ती ही मस्ती है । “
सच भी है अब जरा हमारे इस नरक का हाल देखिए , तीन - तीन पीढ़ी साथ पड़ी है । कहीं जाओ तो बूढ़े खसूठ को पूछ कर जाओ । हर वक्त बुजुर्गों की मान मर्यादा सर पर उठाए फिरो । फिर भी सोच रहे हैं आजादी है । ओळो ने पक्की - पकाई फसल को मिट्टी मैं मिला दिया , बावजूद इसके होळी पर डफ की थाप पर धमाल गाते हुए नाच रहे हैं । पड़दादे के लिए काळा अक्षर भैंस बराबर है लेकिन पोते की अंगुली पकड़े स्कूल की तरफ जा रहे हैं । बाप खेतों की धूल फांक रहा है लेकिन बेटे ने प्रतियोगी परीक्षा के लिए गोडी लगा रखी है । उधर खाली वक्त में चबूतरे पर चौपड़ - ताश खेल रहे बुजुर्ग राजनीति का पंजा लड़ा रहे हैं । समझ में नहीं आ रहा कि यह कैसा नरक है । अगर यह सब नरक है , तो मानना पड़ेगा कि यह बड़ा जीवंत और संगठित नरक है । यहां लोग लाइन में भी लगते हैं और मौका मिले तो लाइन तोड़ भी देते हैं । सच में पूरा लोकतांत्रिक नरक है । देखिए न शादी में पूरा गांव एक हो जाता है और चुनाव के वक़्त कई भागों में बंट जाता है और नतीजों के बाद फिर वहीं गुवाड़ में एक साथ बैठकर हंसी - ठट्ठा करने लगता है ।
दिन भर खेत कमाने के बाद रात को जमा - जागरण भी कर लेते हैं । बीच - बीच में कोई पढ़ा - लिखा लड़का बुद्ध , महावीर , नानक , रविदास का संदेश भी सुना जाता है । हथाई करते लोग कहते हैं ,“ पहले चाय पी ले भाया ! फिर आत्मा - परमात्मा समझ लेंगे।”
खामखां ने इसे देखा नहीं अगर देखता तो उसे बड़ी कोफ्त होती , “ यह कैसा नरक है , जो उसकी बात को हंसी में उड़ा रहा है ।”
सच भी है , जिस खामखां को यह आदत हो कि उनकी बात ही अंतिम सत्य मानी जाए । उसे तकलीफ होनी तो स्वाभाविक है । वे सोचते होंगे ,“ यह कैसी जगह है , जहां लोग हमारी बात ही नहीं सुनते ? जब हमने कह दिया कि यह नरक है तो मान लो । हम कोई ऐरे गैरे नत्थू खैरे तो हैं नहीं , खामखां हैं । कुछ सोचकर ही कहा होगा ,” नरक ! ”
बुजुर्गों ने ठीक कहा है कि दरअसल समस्या जगह की नहीं , नजर की होती है । जिसे हर तरफ अव्यवस्था दिखती है , वह व्यवस्था को भी शंका की नजर से देखता है । जिसे जटिलता से डर लगता है , वह हर विविधता को गड़बड़ी मान लेता है । उपनिषद ने बहुत पहले कह दिया था ,“ अपने को जानो ! ” बुद्ध ने कह दिया , “ अप्प दीपो भव ! “
लेकिन जो खामखां खुद को नहीं समझ पाया , वह दुनिया को क्या समझेगा ? वह तो बस नाम रखेगा , “ नरक ! ”
राजस्थानी में एक कहावत है , “ मेरी मारेड़ी तेरवैं पताळ । “ अब जो बिना इस नरक की तरफ आए , बिना समझे , बिना जाने फैसला सुना दे , उसके लिए “नरक” शब्द सबसे आसान हथियार है । मुझे तो लगता है कि अब पर्यटन विभाग को नया नारा दे देना चाहिए - “ पधारो म्हारै नरक ।” यहां आपको सब मिलेगा , संस्कृति , संघर्ष , मेहनत , हंसी, बहस और ऊपर से आत्मसम्मान मुफ्त।
और हां, यहां एक खास सुविधा भी है ,आप चाहें जितना बुरा कह लें पर रामभगत ताऊ आपको चाय पिलाकर ही विदा करेंगे ।
तो स्वर्ग के उस खामखां को हम इतना ही कहना चाहेंगे कि नरक जमीन में नहीं होता बल्कि नजर में होता है लेकिन खामखां को यह बात समझ में नहीं आएगी । समझने में मेहनत लगती है और नरक कहने में न टका लगता है न पैसा । पब्लिसिटी मुफ्त में मिलती है । वैसे अगर यह बात समझ में आ जाए तो बहुत से विवाद अपने आप खत्म हो जाए लेकिन विवाद खत्म होने का मतलब है चौधर खत्म होना और चौधर कोई भी खामखां खत्म होते नहीं देखना चाहता ।
अंत में बस इतना ही कहना चाहेंगे , “ तुम्हारा स्वर्ग तुम्हें मुबारक हो ! हम तो हमारे नरक में ही खुश हैं । कभी समय मिले तो आओ , पधारो म्हारै नरक !
37, सेक्टर 5 , नोहर ,जिला हनुमानगढ़ ( राजस्थान )
335523

15/06/2026

जब डॉ.मनोज टेलर ने दिव्यांग बच्चों का पेंटिंग्स कैंप रखने का सुझाव दिया था तो मैंने शंका प्रकट करते हुए उनसे पूछा था कि क्या हमारे दिव्यांग बच्चे पेंटिंग बना पाएंगे ? तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहा था , बिल्कुल ! आप देखिएगा , वे कितनी सुंदर पेंटिंग बनाएंगे । मुझे विश्वास नहीं था लेकिन डॉ. मनोज टेलर का हुनर देखिए कि उन्होंने इसे सच साबित कर दिखाया । है ना कमाल की बात । अद्भुत । शुक्रिया डॉ. मनोज जी !

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