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पैसा इंसान को जरूर उपर ले जाता हैंइंसान पैसे को कभी ऊपर नही ले जा सकता
11/03/2022

पैसा इंसान को जरूर उपर ले जाता हैं

इंसान पैसे को कभी ऊपर नही ले जा सकता

 #ब्राह्मण_वर्ण--(कुलीन है तो अवश्य ध्यान दे)श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे ब्राह्मणस्य प्रकीर्त्तिते।एकया रहित: काणो द्वाभ्याम...
01/09/2021

#ब्राह्मण_वर्ण--(कुलीन है तो अवश्य ध्यान दे)

श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे ब्राह्मणस्य प्रकीर्त्तिते।
एकया रहित: काणो द्वाभ्यामंध उदाहृत:॥ (हारीत)

हिंदू समाज में ब्राह्मणों का स्थान सबसे ऊँचा माना जाता है। यद्यपि संन्यासियों की प्रतिष्ठा सबसे बढ़ी-चढ़ी है तथापि हिंदूशास्त्रों के अनुसार दंड कोषाय, वस्त्रदि धारणपूर्वक संन्यास का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही है, न कि इतर वर्णों को भी। अत: संन्यासियों की प्रतिष्ठा भी प्रकारांतर से ब्राह्मणों की ही प्रतिष्ठा समझी जानी चाहिए। अब विचारना यह है कि यह प्रतिष्ठा क्यों हुई, हिंदू समाज के ऊपर ब्राह्मणों की इतनी धाक क्यों जम गई, कि आज इस गए-गुजरे जमाने में भी ब्राह्मणों के नाम पर कट मरनेवाले लाखों मनुष्य पाए जाते हैं, ब्राह्मण नाममात्र से ही लोगों की श्रद्धासरित क्यों उमड़ पड़ती है, लोग डर के मारे काँप क्यों उठते हैं, तथा प्रतिदिन उनके खिलाने और पिलाने और देने-लेने में आज भी लाखों रुपए क्यों खर्च किए जाते हैं, जब कि अर्थाभाव के ही कारण सभी देशहित के कार्य रुके पड़े हैं - सार्वजनिक कार्यों के लिए देश के सच्चे नेताओं को दर-दर की खाक छाननी पड़ रही है! क्या कारण है कि संप्रति समाज पर ब्राह्मणों की इस सत्ता के लाखों विरोधियों के रहते हुए भी जनता की भक्‍ति अनेक अंशों में ज्यों की त्यों अटूट बनी हुई है। न केवल हिंदू जनता ने ही, वरन यजुर्वेद ने भी इनको सबसे ऊँची गद्दी दी है, क्योंकि विराट भगवान के मुख का स्थान ब्राह्मणों को दिया है। जैसा कि :

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्य: कृत:।
उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्‍भयां शूद्रो अजायत॥

'विराट् भगवान के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ, अथवा मुख स्थानीय हुआ, क्षत्रिय बाहु से या बाहुस्थानीय, वैश्य जंघा से अथवा जंघा स्थानीय और शूद्र पाँव से अथवा पाँवस्थानीय' (यजु. 32/12)। इसी प्रकार जब यजुर्वेद के ही 22वें अध्याय के 22वें मन्त्र में आशीर्वाद या प्रार्थना आई है तो सबसे प्रथम 'आ ब्रह्मन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्' द्वारा ब्रह्मतेजो युक्‍त ब्राह्मणों के ही हिंदू समाज में उत्पन्न होने की प्रार्थना की गई है, बाद को क्षत्रियादि की। इसी तरह 'पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसव: समिंधंतां पुनर्ब्रह्मणो वसुनीथ यज्ञै:' (यजु. 12/44) इत्यादि में भी आदित्य आदि देवताओं के बाद ब्राह्मणों का ही नाम लिया गया है। भगवान मनु भी लिखते हैं कि :

विधाता शासिता वक्‍ता मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥

*🙏!! Զเधे Զเधे !! 🙏🏼*        *ज़िन्दगी की असली खूबसूरती ये नहीं कि आप कितने खुश हैं, जिंदगी की असली खूबसूरती तो ये है कि ...
28/08/2021

*🙏!! Զเधे Զเधे !! 🙏🏼*

*ज़िन्दगी की असली खूबसूरती ये नहीं कि आप कितने खुश हैं, जिंदगी की असली खूबसूरती तो ये है कि दूसरे आप से कितने खुश हैं...*

*कमाई की परिभायषा सिर्फ धन से ही तय नहीं होती, तजुर्बा, रिश्ते, प्रेम, सम्मान और सबक सब कमाई के ही रूप हैं...!!*

*शुभ रात्री*🙏🙏

*हालात सिखाते है,बातें सुनना और सहना !!**वरना हर शक्स फितरत से बादशाह  ही होता है !!**अंधेरे मे जब हम दीया हाथ मे लेकर च...
27/08/2021

*हालात सिखाते है,बातें सुनना और सहना !!*

*वरना हर शक्स फितरत से बादशाह ही होता है !!*

*अंधेरे मे जब हम दीया हाथ मे लेकर चलते है तो हमे यह भ्रम रहता है कि हम दीये को लेकर चल रहे है....*
*जबकि सच्चाई एकदम उल्टी है दीया हमे लेकर चल रहा होता है ।*

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