❤️नया गीत❤️
गीत इक संवेदना है,
भावना ; अभिव्यंजना है,
कुंठितों के कंठ यह सब गा न पायेंगे !
प्रेम के विज्ञान से अनभिज्ञ मनबढ़
छू न सकते हैं सुकोमल गीत का गढ़
क्योंकि इनको ढूँढ़ना है व्यंजना से
बस धुँधलके चित्र का चारित्र बढ़ - बढ़
भावना के धाम तक ये आ न पायेंगे !
पीर के हर आंकलन पर हँस रहे हैं
अश्रु के भी संचयन पर हँस रहे हैं
कह रहे ये गीत का मर्मज्ञ ख़ुद को
किन्तु रस के आचमन पर हँस रहे हैं
वस्तुतः इक बूँद भी ये पा न पायेंगे!
शब्द मेरे और है हर वाक्य मेरा
इसलिए तुम लिख न सकते भाग्य मेरा
क्यों टटोले जा रहे हो पंक्तियों में,
अंश मेरा और हर इक भाज्य मेरा
ख़ैर ! ईश्वर भी तुम्हें समझा न पायेंगे!
©️Mr. Dwivedi
यह गीत “the so called कवि/कवयित्री” के चरण “कमल” में समर्पित कर रही हूँ जो मेरा “फ़लाना” गीत “ढिमकाना” पर लिखा बता रहे/रही थे/थीं तो पहली बात मैं ये बता दूँ कि आप सर्वप्रथम यहीं ग़लत हैं। दूसरी बात आपको गीत के व्याकरण को देखना चाहिए, गीत की व्यंजना की समीक्षा करनी चाहिए न कि ये बेकार की बातें लोगों से करनी चाहिए।
ख़ैर ! आप क्या व्याकरण की बात करेंगे आप तो “उ” की मात्रा को भी दो गिन लेते हैं 😂😂😂
किसी के विषय में कोई राय बनाने से बेहतर है कि आप अपना काम करें इस से आप और आपकी कविता दोनों का उद्धार होगा। जय जय हिंदी जय माँ भारती ❤️
mr._mdwivedi
#motivation #update think �
जो लोग समय का मोल समझते हैं,
समय उन्हें अनमोल बना देता है..! 😉
29/03/2022
17/03/2022
🙏🙏
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