30/03/2026
कुछ दिन पहले काउंसलिंग के दौरान एक पेरेंट अपने बेटे को लेकर मेरे पास आए। उनका बेटा घर बैठकर NEET की ऑनलाइन तैयारी कर रहा था। वह किसी ऑनलाइन कोचिंग से पढ़ता था और नियमित टेस्ट भी देता था। पेरेंट्स के अनुसार, वह हर टेस्ट में 650–700 के आसपास नंबर ला रहा था।
लेकिन जब उसने असली NEET परीक्षा दी, तो उसके सिर्फ़ 350–400 नंबर ही आए। पेरेंट्स बहुत परेशान थे। उनका मानना था कि परीक्षा वाले दिन बच्चे की तबियत खराब हो गई थी, इसलिए उसके नंबर कम आए।
उन्होंने अगले साल फिर से तैयारी शुरू करवाई—इस बार भी ऑनलाइन। और हैरानी की बात यह थी कि इस बार भी उसके ऑनलाइन टेस्ट में 650–700 तक नंबर आ रहे थे। लेकिन पेरेंट्स के मन में कहीं न कहीं एक संशय बना हुआ था, इसलिए वे उसे लेकर मेरे पास आए।
मैंने बच्चे से 10–15 मिनट बात की, कुछ बेसिक कॉन्सेप्ट पूछे… और वहीं मुझे समझ आ गया कि कुछ गड़बड़ है।
मैंने पेरेंट्स से कहा—
“आप अगला ऑनलाइन टेस्ट घर पर मत दिलवाइए, इसे मेरे यहाँ बैठाकर टेस्ट दिलवाइए।”
पेरेंट्स मान गए, लेकिन बच्चा तैयार नहीं था। जैसे-तैसे समझाकर उसे मेरे पास टेस्ट देने के लिए लाया गया।
जब वह टेस्ट दे रहा था, मैंने अपने स्टाफ को उसके पीछे खड़ा कर दिया—पूरे समय।
और जो रिज़ल्ट आया… वह चौंकाने वाला था।
जो बच्चा लगातार 650–700 नंबर ला रहा था, उसी के नंबर गिरकर 300 के आसपास आ गए।
अब तस्वीर साफ थी।
मैंने पेरेंट्स को समझाया—
“आपका बच्चा ऑनलाइन टेस्ट ईमानदारी से नहीं दे रहा था। इसलिए उसका सही असेसमेंट कभी हो ही नहीं पाया। असली स्तर वही है जो आज सामने आया है।”
यह सिर्फ़ उस बच्चे की कहानी नहीं है…
ऐसे कई बच्चे हैं जो घर पर ऑनलाइन तैयारी करते हुए अनजाने में या जानबूझकर गलत तरीके अपनाते हैं।
समस्या नंबर कम या ज्यादा आने की नहीं है…
समस्या है “गलतफहमी” में जीने की।
अगर आपको अपने बच्चे की सही स्थिति जाननी है, तो:
उसे ऑफलाइन टेस्ट जरूर दिलवाइए
टीचर्स से मिलवाइए
उसका वास्तविक असेसमेंट करवाइए
क्योंकि चयन हो या न हो…
लेकिन सच्चाई जानना बहुत जरूरी है।