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ढोला-मारू : राजस्थानी लोक-कथा......राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम ग...
27/11/2023

ढोला-मारू : राजस्थानी लोक-कथा......राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है इस गाथा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आठवीं सदी की इस घटना का नायक ढोला राजस्थान में आज भी एक-प्रेमी नायक के रूप में स्मरण किया जाता है और प्रत्येक पति-पत्नी की सुन्दर जोड़ी को ढोला-मारू की उपमा दी जाती है । यही नहीं आज भी लोक गीतों में स्त्रियाँ अपने प्रियतम को ढोला के नाम से ही संबोधित करती है, ढोला शब्द पति शब्द का प्रयायवाची ही बन चूका है ।राजस्थान की ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी विभिन्न मौकों पर ढोला-मारू के गीत बड़े चाव से गाती है ।

ढोला नरवर ( मध्य प्रदेश )के राजा नल का पुत्र था जिसे इतिहास में ढोला व साल्हकुमार के नाम से जाना जाता है, ढोला का विवाह बालपने में जांगलू देश (बीकानेर) के पूंगल नामक ठिकाने के स्वामी पंवार राजा पिंगल की पुत्री मारवणी के साथ हुआ था । उस वक्त ढोला तीन वर्ष का मारवणी मात्र डेढ़ वर्ष की थी । इसीलिए शादी के बाद मारवणी को ढोला के साथ नरवर नहीं भेजा गया । बड़े होने पर ढोला की एक और शादी मालवणी के साथ हो गयी । बचपन में हुई शादी के बारे को ढोला भी लगभग भूल चूका था । उधर जब मारवणी प्रोढ़ हुई तो मां बाप ने उसे ले जाने के लिए ढोला को नरवर कई सन्देश भेजे । ढोला की दूसरी रानी मालवणी को ढोला की पहली शादी का पता चल गया था उसे यह भी पता चल गया था कि मारवणी जैसी बेहद खुबसूरत राजकुमारी कोई और नहीं सो उसने डाह व ईर्ष्या के चलते राजा पिंगल द्वारा भेजा कोई भी सन्देश ढोला तक पहुँचने ही नहीं दिया वह सन्देश वाहको को ढोला तक पहुँचने से पहले ही मरवा डालती थी ।

उधर मारवणी के अंकुरित यौवन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया । एक दिन उसे स्वप्न में अपने प्रियतम ढोला के दर्शन हुए उसके बाद तो वह ढोला के वियोग में जलती रही उसे न खाने में रूचि रही न किसी और कार्य में । उसकी हालत देख उसकी मां ने राजा पिंगल से ढोला को फिर से सन्देश भेजने का आग्रह किया, इस बार राजा पिंगल ने सोचा सन्देश वाहक को तो मालवणी मरवा डालती है इसीलिए इस बार क्यों न किसी चतुर ढोली को नरवर भेजा जाय जो गाने के बहाने ढोला तक सन्देश पहुंचा उसे मारवणी के साथ हुई उसकी शादी की याद दिला दे ।

जब ढोली नरवर के लिए रवाना हो रहा था तब मारवणी ने उसे अपने पास बुलाकर मारू राग में दोहे बनाकर दिए और समझाया कि कैसे ढोला के सम्मुख जाकर गाकर सुनाना है । ढोली (गायक) ने मारवणी को वचन दिया कि वह जीता रहा तो ढोला को जरुर लेकर आएगा और मर गया तो वहीँ का होकर रह जायेगा ।

चतुर ढोली याचक बनकर किसी तरह नरवर में ढोला के महल तक पहुँचने में कामयाब हो गया और रात होते ही उसने ऊँची आवाज में गाना शुरू किया । उस रात बादल छा रहे थे, अँधेरी रात में बिजलियाँ चमक रही थी झीणी-झीणी पड़ती वर्षा की फुहारों के शांत वातावरण में ढोली ने मल्हार राग में गाना शुरू किया ऐसे सुहाने #मौसम में ढोली की मल्हार राग का मधुर #संगीत ढोला के कानों में गूंजने लगा और ढोला फन उठाये नाग की भांति राग पर झुमने लगा तब ढोली ने साफ़ शब्दों में गाया -
"ढोला नरवर सेरियाँ, धण पूंगल गळीयांह ।"

गीत में पूंगल व मारवणी का नाम सुनते ही ढोला चौंका और उसे बालपने में हुई शादी की याद ताजा हो आई । ढोली ने तो मल्हार व मारू राग में मारवणी के रूप का वर्णन ऐसे किया जैसे पुस्तक खोलकर सामने कर दी हो । उसे सुनकर ढोला तड़फ उठा ।

ढा़ढ़ी (ढोली) पूरी रात गाता रहा । सुबह ढोला ने उसे बुलाकर पूछा तो उसने पूंगल से लाया मारवणी का पूरा संदेशा सुनाते हुए बताया कि कैसे मारवणी उसके वियोग में जल रही है ।

आखिर ढोला ने मारवणी को लाने हेतु पूंगल जाने का निश्चय किया पर मालवणी ने उसे रोक दिया ढोला ने कई बहाने बनाये पर मालवणी उसे किसी तरह रोक देती । पर एक दिन ढोला एक बहुत तेज चलने वाले ऊंट पर सवार होकर मारवणी को लेने चल ही दिया और पूंगल पहुँच गया । मारवणी ढोला से मिलकर ख़ुशी से झूम उठी । दोनों ने पूंगल में कई दिन बिताये और एक दिन ढोला ने मारूवणी को अपने साथ ऊंट पर बिठा नरवर जाने के लिए राजा पिंगल से विदा ली । कहते है रास्ते में रेगिस्तान में मारूवणी को सांप ने काट खाया पर शिव पार्वती ने आकर मारूवणी को जीवन दान दे दिया । आगे बढ़ने पर ढोला उमर-सुमरा के षड्यंत्र में फंस गया, उमर-सुमरा ढोला को घात से मार कर मारूवणी को हासिल करना चाहता था सो वह उसके रास्ते में जाजम बिछा महफ़िल जमाकर बैठ गया । ढोला जब उधर से गुजरा तो उमर ने उससे मनुहार की और ढोला को रोक लिया । ढोला ने मारूवणी को ऊंट पर बैठे रहने दिया और खुद उमर के साथ अमल की मनुहार लेने बैठ गया । ढा़ढ़ी गा रहा था और ढोला उमर अफीम की मनुहार ले रहे थे उमर सुमरा के षड्यंत्र का ज्ञान ढा़ढ़ी (ढोली) की पत्नी को था वह भी पूंगल की बेटी थी सो उसने चुपके से इस षड्यंत्र के बारे में मारूवणी को बता दिया ।

मारूवणी ने ऊंट के एड मारी, ऊंट भागने लगा तो उसे रोकने के लिए ढोला दौड़ा, पास आते ही मारूवणी ने कहा - धोखा है जल्दी ऊंट पर चढो और ढोला उछलकर ऊंट पर चढ़ा गया । उमर-सुमरा ने घोड़े पर बैठ पीछा किया पर ढोला का वह काला ऊंट उसके कहाँ हाथ लगने वाला था । ढोला मारूवणी को लेकर नरवर पहुँच गया और उमर-सुमरा हाथ मलता रह गया ।

नरवर पहुंचकर चतुर ढोला, सौतिहा डाह की नोंक झोंक का समाधान भी करता है। मारुवणी व मालवणी के साथ आनंद से रहने लगा ।

इसी ढोला का पुत्र लक्ष्मण हुआ, लक्ष्मण का भानु और भानु का पुत्र परम प्रतापी बज्र्दामा हुआ जिसने अपने वंश का खोया राज्य ग्वालियर पुन: जीतकर कछवाह राज्यलक्ष्मी का उद्धार किया । आगे चलकर इसी वंश का एक राजकुमार दुल्हेराय राजस्थान आया जिसने मांची, भांडारेज, खोह, झोटवाड़ा आदि के मीणों को मारकर अपना राज्य स्थापित किया उसके बाद उसके पुत्र काकिलदेव ने मीणों को परास्त कर आमेर पर अपना राज्य स्थापित किया जो देश की आजादी तक उसके वंशजों के पास रहा । यही नहीं इसके वंशजों में स्व.भैरोंसिंहजी शेखावत इस देश के उपराष्ट्रपति बने व इसी वंश के श्री देवीसिंह शेखावत की धर्म-पत्नी श्रीमती प्रतिभापाटिल आज इस देश की महामहिम राष्ट्रपति है ।

ढोला को रिझाने के लिए ढा़ढ़ी (ढोली) द्वारा गाये कुछ दोहे -

आखडिया डंबर भई, नयण गमाया रोय ।
क्यूँ साजण परदेस में, रह्या बिंडाणा होय ।।

आँखे लाल हो गयी है रो रो कर नयन गँवा दिए है, साजन परदेस में क्यों पराया हो गया है ।

दुज्जण बयण न सांभरी, मना न वीसारेह ।
कूंझां लालबचाह ज्यूँ, खिण खिण चीतारेह ।।

बुरे लोगों की बातों में आकर उसको (मारूवणी को) मन से मत निकालो । कुरजां पक्षी के लाल बच्चों की तरह वह क्षण क्षण आपको याद करती है । आंसुओं से भीगा चीर निचोड़ते निचोड़ते उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए है ।

जे थूं साहिबा न आवियो, साँवण पहली तीज ।
बीजळ तणे झबूकडै, मूंध मरेसी खीज ।।

यदि आप सावन की तीज के पहले नहीं गए तो वह मुग्धा बिजली की चमक देखते ही खीजकर मर जाएगी । आपकी मारूवण के रूप का बखान नहीं हो सकता । पूर्व जन्म के बहुत पुण्य करने वालों को ही ऐसी स्त्री मिलती है ।

नमणी, ख़मणी, बहुगुणी, सुकोमळी सुकच्छ ।
गोरी गंगा नीर ज्यूँ मन गरवी तन अच्छ ।।

बहुत से गुणों वाली, क्षमशील, नम्र व कोमल है गंगा के पानी जैसी गौरी हैउसका मन और तन श्रेष्ठ है ।

गति गयंद, जंघ केळ ग्रभ, केहर जिमी कटि लंक ।
हीर डसण विप्रभ अधर, मरवण भ्रकुटी मयंक ।।

हाथी जैसी चाल, हीरों जैसे दांत, मूंग सरीखे होठ है । आपकी मारवणी की सिंहों जैसी कमर है, चंद्रमा जैसी भोएं है ।

आदीता हूँ ऊजलो मारूणी मुख ब्रण ।
झीणां कपड़ा पैरणां, ज्यों झांकीई सोब्रण ।।

मारवणी का मुंह सूर्य से भी उजला है, झीणे कपड़ों में से शरीर यों चमकता है मानो स्वर्ण झाँक रहा हो ।

इतिहास में इस प्रेमी जोड़े को ढोला मारू के नाम से जाना जाता है। तब से आज तक उनके नाम व प्रेम का गुणगान किया जाता है।
#राजस्थान #संगीत
#मरू
#राजपूताना #कहानी #कहानिया
#राजस्थान


वाह क्या बात है आज तो मारवाड़ का अमृत फल मिल गया, दोस्तों इसे देखने भर से ही कितना सुकून मिलता है तो आप कल्पना कर सकते ह...
14/09/2023

वाह क्या बात है आज तो मारवाड़ का अमृत फल मिल गया,
दोस्तों इसे देखने भर से ही कितना सुकून मिलता है तो आप कल्पना कर सकते हैं इसको खाने से कितना आनंद आता होगा। जब खेत में काम करते वक्त आराम करने का समय होता है उस समय मतीरे की बारी आती है, और खेजड़ी की ठंडी छाया में बैठकर परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर इसे खाना एक आनंदित पल है,
यह फल हमारे शरीर में पानी की कमी को दूर करता है क्योंकि इसमें 90% तक पानी पाया जाता है इसके अतिरिक्त इसमें लोह तत्व और अन्य खनिज लवण पाए जाते हैं जो हमारे शरीर के लिए अति आवश्यक है।
मारवाड़ के क्षेत्र में आप मतीरे की उपयोगिता दो राजाओं के मध्य युद्ध के माध्यम से जान सकते हैं, अर्थात मतीरे के लिए लोग सिर कटाने के लिए तैयार हो गए,,,उस लड़ाई को जानिए

👉 मतीरे की राड़' नामक लड़ाई 1644 ईस्वी में लड़ी गई थी। यह कहानी कुछ इस तरह है कि उस समय बीकानेर रियासत का सीलवा गांव और नागौर रियासत का जाखणियां गांव एक दूसरे से सटे हुए थे। ये दोनों गांव दोनों रियासतों की अंतिम सीमा थे। हुआ कुछ यूं कि तरबूज का एक पौधा बीकानेर रियासत की सीमा में उगा, लेकिन उसका एक फल नागौर रियासत की सीमा में चला गया।

अब बीकानेर रियासत के लोगों का मानना था कि तरबूज का पौधा उनकी सीमा में है तो फल भी उनका ही हुआ, लेकिन नागौर रियासत के लोगों का कहना था कि जब फल उनकी सीमा में आ गया है तो वो उनका हुआ। इसी बात को लेकर दोनों रियासतों में झगड़ा हो गया और धीरे-धीरे ये झगड़ा एक खूनी लड़ाई में तब्दील हो गया।
अंततः युद्ध में नागौर की हार हुई। इस प्रकार से राजस्थान की दो रियासतों बीकानेर और नागौर के बीच एक फल यानी कि तरबूज के लिए लड़ाई लड़ी गई। इस लड़ाई को इतिहास में 'मतीरे की राड़' नाम से जाना जाता है।
दोस्तों आज के समय में ऐसे फल के लिए लड़ाई करना एक मूर्खता का विषय माना जाता है तो आप उस लड़ाई को क्या शूरवीरता कहेंगे।

 #सोचो_जरा!          नासा द्वारा 1977 में लॉन्च किया गया व पिछले 45 वर्षों निरन्तर अन्तरिक्ष की अनन्त दूरियों को मापते व...
27/08/2023

#सोचो_जरा! नासा द्वारा 1977 में लॉन्च किया गया व पिछले 45 वर्षों निरन्तर अन्तरिक्ष की अनन्त दूरियों को मापते वॉयेजर-1 ने यह डॉट सी दिखती पृथ्वी की तस्वीर जब भेजी तो कुछ ख्याल मन में आये।

हम अपने दायरों में कितने सिमटे हुए हैं। हमारा संसार कितना छोटा है। हमारा तथाकथित सुख और दुःख इतना या उतना छोटा या बड़ा कैसे हो गया जब हमारी प्राणदायक धरती के खुद के अस्तित्व का ही पता नहीं।

समय के अनन्त प्रवाह में हमारा अस्तित्व हवा के एक झोंके से भी छोटा है। एक अणु सी दिखती यह धरती भी परिक्रमण व परिभ्रमण के मामले में एक अनुशासन में बंधी हुई है इसे देखकर यही प्रेरणा मिलती है कि रुकना प्रकृति के नियमों के खिलाफ है। कुछ भी ब्रह्माण्ड में रुकता कहाँ है? कर्म में रत रहकर जीवन के हजारों रहस्यों को समझने के लिए हम रोज एक नए सूर्योदय का इन्तजार करते हैं।

जब हम हमारे क्षुद्र झगड़ों में उलझकर या संसार के दुःखों से टूटकर या सुखों के सागर में गोता लगाकर भावनाओं के हिंडोले में झूल रहे होते हैं तब हमें यह ख्याल रखना चाहिए कि हमारी कोई जीत या हार इतनी बड़ी या छोटी नहीं है कि उसको लेकर नशे में डूब जाएं या व्यथित होकर टूट जाएं।

हम अभी तक न तो पूरे ब्रह्मांड को समझ पाए हैं और न ही अपने भीतर की चेतना को। बस चले जा रहे हैं। कभी सुखी होने का भ्रम हो जाता है तो कभी दुःखी होने का भ्रम। एक छोटे के कालखण्ड के जीवन में जिजीविषा बनाए रखो। नजर दौड़ाओ तो सृष्टि में खूब खुशियां बिखरी पड़ी है। नजर बन्द करो तो खुद के साये से भी डर लगेगा।

आओ पूरे जुनून और शिद्दत से इस जीवन को खूब उमंग से जिये और इस डॉट सी दिखती धरती में अपने डॉट का अस्तित्व मजबूत करें। क्या पता कोई किसी ग्रह या गैलेक्सी से हमें भी ज़ूम करके देख रहा हो। अन्त में जाकर सारे डॉट इस बड़े डॉट में ही विलीन होने हैं तो हम हमारे डॉट की स्याही को कमजोर क्यों रखें।

हम इसको अपनी पसंद के रंग में रंगेंगे।

✒️डॉ अर्जुन सिंह साँखला

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमारे विद्यालय रविंद्र नाथ टैगोर शिक्षण संस्थान बोड़वा, में आयोजित कार्यक्रम का परिदृश्य, कार...
16/08/2023

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमारे विद्यालय रविंद्र नाथ टैगोर शिक्षण संस्थान बोड़वा, में आयोजित कार्यक्रम का परिदृश्य,
कार्यक्रम में पधारने वाले सभी ग्रामीण जनों, मेहमान जनों का आभार, आप तय समय पर कार्यक्रम में पधारे एवं कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सहयोग किया इसलिए विद्यालय परिवार की तरफ से धन्यवाद।
विद्यालय में भामाशाह के रूप में ग्रामीण जनों का सहयोग हेतु भी विद्यालय परिवार धन्यवाद स्थापित करता है।
एक अलग से हमारे द्वारा चलाई गई डिजिटल बोर्ड की मुहिम में भी दानदाताओं के द्वारा बढ़-चढ़कर भाग लिया उनका भी यह विद्यालय परिवार सदैव ऋणी रहेगा।
शिक्षा के क्षेत्र में किया गया दान हमारे आने वाली पीढ़ियों को शिक्षित करने का काम करेगा। शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार से आधुनिकीकरण से हमारे अपने ही बच्चे आगे बढ़ेंगे और अपने माता-पिता का नाम रोशन करेंगे । #आरएलपी_प्रदेशाध्यक्ष_उम्मेदाराम_जी_बेनीवाल के द्वारा भी बोड़वा ग्राम पंचायत के RNT विद्यालय के साथ-साथ सरकारी विद्यालय में भी डिजिटल बोर्ड लगाने की घोषणा की इस हेतु भी समस्त शिक्षा जगत से जुड़े विद्यार्थियों की तरफ से बहुत-बहुत आभार।
कार्यक्रम को रोमांटिक और आनंदित बनाने के लिए कल विद्यालय में कई प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, इन प्रतियोगिता में सभी का सहयोग शानदार रहा। यहां पेश है विद्यालय में रंगारंग कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें जो अभी भी कार्यक्रम से अनभिज्ञ है। 👇

इस संसार में सबसे बढ़िया दवा – हँसी,सबसे बड़ी सम्पत्ति – बुद्धि, सबसे अच्छा हथियार – धैर्यऔर सबसे अच्छी सुरक्षा – विश्वा...
20/05/2023

इस संसार में सबसे बढ़िया दवा – हँसी,
सबसे बड़ी सम्पत्ति – बुद्धि,
सबसे अच्छा हथियार – धैर्य
और सबसे अच्छी सुरक्षा – विश्वास और
आनंद की बात यह है कि, ये सब निशुल्क हैं ।

Click pic. Mount Abu. Sirohi

कोई भी इंसान अपने साथ अच्छी किस्मत लेकर पैदा नहीं होता। वो अपने हुनर और मेहनत से अपनी सफलता की नई कहानी लिखता है जिसे लो...
13/10/2022

कोई भी इंसान अपने साथ अच्छी किस्मत लेकर पैदा नहीं होता। वो अपने हुनर और मेहनत से अपनी सफलता की नई कहानी लिखता है जिसे लोग सदियों तक याद रखते हैं। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं 22 हजार से भी अधिक महिलाओं को सशक्त और हुनरमंद बनाने वाली रूमा देवी। बेहद साधारण सी दिखने वाली रूमा देवी ने अपने हुनर के दम पर अमेरिका तक का सफर तय किया है। महज 8वीं पास रूमा देवी आज हजारों महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं। हांलाकि उनका ये सफर आसान नहीं था। उन्होंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है। बावजूद इसके रूमा देवी आज 75 गांव में रहने वाली हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। उन्होंने सांस्कृतिक विरासत के ज़रिये बाड़मेर और राजस्थान की तमाम महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया है। इनके काम के चलते इन्हें अमेरिका में सफोक काउंटी एग्जीक्यूटिव के कार्यक्रम में सम्मानित भी किया गया है। आइए जानते हैं कैसे संघर्ष से जूझकर रूमा देवी ने बड़ी सफलता हासिल की है।

बचपन से ही किया संघर्ष

नवम्बर 1988 को राजस्थान के बाड़मेर शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रावतसर के एक मध्यमवर्गीय जाट परिवार में जन्मीं रूमा देवी का जीवन बचपन से ही संघर्षमय रहा। उनके जन्म के कुछ साल बाद ही उनकी मां का देहांत हो गया। आठ भाई-बहनों में रूमा सबसे बड़ी बेटी थी। माँ की मृत्यु के बाद रूमा के पिता ने दूसरी शादी कर ली और उन्हें चाचा के पास छोड़ दिया। मां की मृत्यु हो जाने के कारण उन्होंने केवल 8वीं तक ही पढ़ाई की। कम उम्र से ही घर के सारे काम सीख लिए और काम भी करने लगी।

बेटे की मौत ने झकझोर दिया था

कम उम्र में ही रूमा देवी की शादी करा दी गई। ससुराल में भी उनके आर्थिक हालात अच्छे नहीं थे। गृहस्थ जीवन संभला भी नहीं था कि उनका बच्चा बीमार पड़ गया। ससुराल में पैसों की कमी के कारण उसका इलाज नहीं हो सका और उसकी मौत हो गई। यहीं से रूमा ने ठाना कि वो अब नियति के भरोसे नहीं बैठ सकती हैं। गरीबी ने उनसे पढ़ाई, बच्चा और खुशी सबकुछ छीन लिया था। इसके बाद ही उन्होंने निश्चिय किया कि अब वो अपने पैरों पर खड़ी होंगी।

कशीदाकारी के हुनर को बनाया अपना हथियार

रूमा देवी बेशक पढ़ाई नहीं कर पाई थी लेकिन उनके पास हुनर था। उन्होंने अपने इसी हुनर को अपना करियर बनाने की ठानी। वो दीप-देवल नाम के एक एनजीओ से जुड़ गईं जहां कशीदाकारी का काम करने वाली रूमा देखते-देखते सबकी चहेती बन गई। साल 2010 में उन्हें एनजीओ का अध्यक्ष बना दिया गया। आज रूमा देवी की पहचान फैशन डिजाइनर के रूप में है। उन्होंने अपने हुनर का जादू विदेशों में भी दिखाया। रूमा देवी के कशीदाकारी कपड़ों की विदेशों तक मांग है। रूमा के बनाए कपड़ों को लंदन, जर्मनी, सिंगापुर और कोलंबो के फैशन शो में भी दिखाया जा चुका है।

हजारों महिलाओं को बनाया सशक्त

खुद विपरीत परिस्थिति की मार झेल चुकी रूमा देवी ने केवल खुद को ही आत्मनिर्भर नहीं बनाया बल्कि अपने जैसी हजारों महिलाओं का जीवन संवारा है। उन्होंने कई महिलाओं को अपने एनजीओ से जोड़ना शुरू किया और आज इस एनजीओ से 75 गांवों की 22 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। ये महिलाएं हस्तशिल्प के उत्पाद बनाकर अपना घर चलाती हैं।

नारी शक्ति सहित कई पुरुस्कारों से हो चुकी हैं सम्मानित

रूमा देवी के हुनर और उनकी काबिलियत को देखते हुए उन्हें हावर्ड यूनिवर्सिटी में लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था जहां इन्होंने लेक्चर देकर भारत का मान बढ़ाया। इनके महान कार्यों के लिए इन्हें 2018 में महिला दिवस के मौके पर नारी शक्ति अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। यही नहीं रूमा देवी अपना कौशल केबीसी में भी दिखा चुकी हैं। 'कौन बनेगा करोड़पति' में उन्होंने अमिताभ बच्चन के सवालों का बखूबी जवाब देकर 12 लाख 50 हजार रुपये जीते थे। हाल ही में मेरिडियन कॉन्फ्रेंस सेंटर में जीटो इंटरनेशनल की ओर से आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विशेष अतिथि के रूप में रूमा देवी को आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम में UAE समेत 12 देशों की जानी मानी हस्तियाँ शामिल थी। इसके अलावा वो कई अन्य पुरुस्कारों से भी सम्मानित हो चुकी हैं।
बचपन से ही संघर्ष की आग में तपने वाली रूमा देवी आज खरा सोना बन चुकी हैं। कभी 10 किलोमीटर दूर से पानी भर के लाने वाली रूमा अब अमेरिका तक की यात्रा कर चुकी हैं लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी पारम्परिक वेशभूषा को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से सफलता की नई कहानी लिखी है। आज वो लाखों महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

Thanks for,,,  ,सर निर्मल गहलोत के सानिध्य में शुरू किए गए   के माध्यम से हमें राजस्थान में शिक्षा के क्षेत्र में इतना ब...
11/09/2022

Thanks for,,, ,

सर निर्मल गहलोत के सानिध्य में शुरू किए गए के माध्यम से हमें राजस्थान में शिक्षा के क्षेत्र में इतना बड़ा मंच प्रदान करके हमारी प्रतिभा को लोगों के सामने रखने का मौका दिया, इसलिए सर निर्मल जी और उनके संपूर्ण टीम का आभार, मुझे उत्कर्ष परिवार से भविष्य में यह भी आशा रहेगी कि यह परिवार राजस्थान में ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में शिक्षा की एक नई क्रांति लेकर आएगा जिसमें हर समाज का विद्यार्थी शिक्षा को घर बैठे आसानी से ग्रहण कर सकता हो, और इसी के साथ साथ समाज में ऐसी प्रतिभाओं को चुनकर अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से लोगों के समक्ष रखना,,, और उन्ही प्रतियोगिताओं में से,,, मैं भी एक टीचिंग टैलेंट हंट शो का प्रतिभागी बना। इस शो के दौरान उत्कर्ष परिवार ने हमें आने जाने (Traveling) और रहने & अपने स्टूडियो में डिजिटल बोर्ड की निशुल्क ट्रेनिंग दी, अपार मान सम्मान देने के लिए उत्कर्ष परिवार का एक बार पुनः धन्यवाद।
हंसते रहिए मुस्कुराते रहिए

आज ठीक 12:00  बजे उत्कर्ष क्लासेज जोधपुर के यूट्यूब चैनल पर लाइव  होने वाले    मैं आप सभी जुड़ कर हम 5 प्रतिभागियों में ...
04/09/2022

आज ठीक 12:00 बजे उत्कर्ष क्लासेज जोधपुर के यूट्यूब चैनल पर लाइव होने वाले मैं आप सभी जुड़ कर हम 5 प्रतिभागियों में से मेरे लाइव आने पर live Voting जरुर करें। क्योंकि इसके परिणाम में 40% वोटिंग और 60% स्वंय प्रतिभागी की मेहनत का वेटेज रखा गया हैं। वीडियो पूरा होने के बाद उसी वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिंक मिलेगी वहां पर भी आपको फाइनल वोटिंग करनी है। इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें।
🙏 धन्यवाद 🙏

हम 5 प्रतिभागी हैं उन में से मेरा कोई भी क्रम हो सकता है एक शिक्षक को अधिक से अधिक 25 मिनट का टाइम मिलेगा। आज का लाइव 12:00 बजे से 2:00 बजे तक चलेगा।
उत्कर्ष संस्थान के यूट्यूब चैनल( Utkarsh Classes Jodhpur ) पर ही लाइव होगा ।यही Link h ..👉

का भौकाल || Teaching Talent Hunt (Episode - 3) || Utkarsh Classes"Utkarsh Presents Teac...

आज़ादी का अमृत महोत्सव 2022 ..RNT मेंआजादी का अमृत महोत्सव का अर्थ है “आजादी के 75 वर्ष पूरे करना।....                 द...
12/08/2022

आज़ादी का अमृत महोत्सव 2022 ..RNT में
आजादी का अमृत महोत्सव का अर्थ है “आजादी के 75 वर्ष पूरे करना।....
देखिए इस महोत्सव की खूबसूरत तस्वीरें👇

जिनके माध्यम से लोगों को यह संदेश दिया कि आज हमारे आजादी को 75 साल पूरे होने जा रहे हैं इस खुशी में आज अपने ही ग्राम बोड़वा के निजी विद्यालय रविंद्र नाथ टैगोर में विद्यार्थियों, शिक्षक गणों, ग्रामीणजनों के द्वारा विद्यालय में महोत्सव को आयोजित किया गया , इस महोत्सव में नन्हे मुन्ने बालक बालिकाओं एक विद्यालय गणवेश से परिपूर्ण एक ही रंग में , हाथों में तिरंगा लिए जो जोश और खुशी मुझे दिखाई दी,,,वो खुशी उस दिन (15 अगस्त 1947 ) से शायद ही कम होगी।
सच में इस प्रकार के कार्यक्रम विद्यालय में आयोजित होना अनिवार्य है क्योंकि इससे विद्यार्थियों में देश प्रेम की भावना, नेतृत्व और समर्पण , आत्मविश्वास की भावना जागृत होती है। और इससे बालक अपने आप को गर्व से भरा महसूस करते है।

यह अमृत महोत्सव भारत सरकार की एक पहल है। जो प्रगतिशील भारत के 75 साल और इसके लोगों, संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास को मनाने के लिए है। आजादी का अमृत महोत्सव भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक पहचान के बारे में प्रगतिशील है। Azadi ka Amrut Mahotsav की आधिकारिक यात्रा 12 मार्च 2021 को शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम को देश के युवाओं को आगे आने और हमारे लोकतंत्र की सच्ची भावना को आत्मसात करने तथा भारत की आजादी के 75 साल पूरे जोश के साथ मनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

आजादी का अमृत महोत्सव देश को विश्वगुरू बनाने की दिशा में एक प्रयास है। ऐसे में इस अभियान के माध्यम से नई पीढ़ी को उन लोगों के बारे में भी बताया जा रहा है जिन्होंने आजादी के संग्राम में बलिदान दिए। देश के लिए बलिदान देने वाले वीरों की कहानियां नई पीढ़ी में देशभक्ति की भावना को बल देंगी।

” भारत के प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) ने इस अभियान की शुरुआत 12 मार्च 2021 को की थी। यह महोत्सव 15 अगस्त 2023 तक जारी रहेगा। इस पहल का उद्देश्य भारत के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों और उपलब्धियों के बारे में आम लोगों को जागरूक करना है।

चुंडावत मांगी (निशानी) सैनाणी सिर काट दे दियो क्षत्राणि! हाड़ी रानी हाड़ा वंश की राजकुमारी सहल कंवर सलूम्बर के युवा सामन...
06/07/2022

चुंडावत मांगी (निशानी) सैनाणी
सिर काट दे दियो क्षत्राणि!

हाड़ी रानी हाड़ा वंश की राजकुमारी सहल कंवर सलूम्बर के युवा सामन्त रतनसिंह चुंडावत की नवविवाहिता पत्नी थी।
रतनसिंह चुंडावत मेवाड़ के महाराणा राजसिंह सिसोदिया का सामंत था। महाराणा राजसिंह का विवाह चारूमति से होने वाला था, उसी समय औरंगजेब अपनी सेना लेकर मेवाड़ की ओर बढ़ा।

विवाह होने तक मुगल सेना को रोकने की जिम्मेदारी नवविवाहित राव रतनसिंह चुंडावत ने ली। जब वह युद्ध के मैदान में जा रहा था तो जाते हुए अपनी पत्नी की याद सताने लगी। चूंडावत ने अपने सेवक को भेजकर रानी से सैनाणी (निशानी) लाने को कहा ताकि युद्ध के मैदान में उसकी याद न सताएं। रानी ने सोचा कि मेरी यादों के कारण वे अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर पायेंगे। अतः मैं कर्त्तव्य में बाधक क्यों बनूं। इस कारण हाड़ीरानी ने सेवक के हाथ से तलवार लेकर अपना सिर काट डाला। सेवक ने रानी का कटा सिर थाल में रखा और चूंडावत को भेंट किया ...... ताकि मेरे कारण युद्ध में कोई विघ्न न पड़े। यह है वीरता की निशानी,,,,,,

जब रतनसिंह ने अपनी ही नई नवेली रानीसा का सिर कटा हुआ देखा तो चूंडावत की भुजाएं फड़क उठी। और शत्रुदल पर दोगुनी ताकत से टूट पड़ा। हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर भूखे शेर की भांति टूट पड़ा।

इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा।
राव रतनसिंह युद्ध में विजयी रहा लेकिन वीरगति को प्राप्त हुआ।

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