09/08/2024
'जो गोल्ड जीता,वो भी म्हारा ही छोरा है जी'
यह कथन सुनने में भले ही सामान्य लगता है,मगर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी के लिए ऐसा कहने के लिए कलेजा चाहिए।
दरअसल,यह भावाभिव्यक्ति दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन पेरिस ओलंपिक में जैवलिन थ्रो में सिल्वर मेडल जीतने वाले भारतीय खिलाड़ी नीरज चौपड़ा की माॅं का अपने ही बेटे को पछाड़ कर गोल्ड मेडल जीतने वाले पाकिस्तानी खिलाड़ी नदीम के संबंध में है।
गत वर्ष जब नीरज ने गोल्ड जीता था ,उस वक्त नदीम के पास अपने देश का झंडा तक नहीं था, इसलिए नीरज ने उसे भी अपने साथ तिरंगे के नीचे समेट लिया था और उस वक्त इंटरव्यू में पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए नीरज की माॅं ने कहा था कि नदीम गोल्ड जीत जाता ,तो भी मुझे खुशी ही होती , क्योंकि वो भी मुझे मेरे बेटे जैसा ही लगता है।
भले ही भारत और पाकिस्तान में सियासी दुश्मनी हो, लेकिन कहा जाता है कि
"लकीरें खींचने से रिश्ते नहीं बदलते
जगह बदलने से पुरखे नहीं बदलते"
और बात सियासत की नहीं, बल्कि खेल भावना की हो तो ये पंक्तियाॅं ज्यादा सत्य साबित होती हैं, क्योंकि खेल में सिर्फ प्रतिद्वंद्विता का भाव होता है,न कि दुश्मनी का।
नदीम को अपने देश में कोई विशेष सुविधा नहीं मिली,फिर
भी अपने जुनून के दम पर अभावों को ही अपनी ताकत बनाकर जो कामयाबी हासिल की,वो वाकई एक मिसाल है ,उन लोगों के लिए,जो जिंदगी में अपनी असफलता के लिए संसाधनों के अभावों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
खेल तो खेल होता है और ये दुनिया को जोड़ने के सबसे अच्छे माध्यम हैं और इन्हें खेल ही रहने दिया जाए तो बेहतर होगा। हार-जीत तो एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, अर्थात् स्वाभाविक- सी बात है कि जो बेहतरीन प्रदर्शन करेगा ,वो जीतेगा, इसलिए यह ध्यान रहे कि खिलाड़ी चाहे कोई हारे और कोई जीते, लेकिन खेल हमेशा जीतना चाहिए, क्योंकि खेल हार गया तो हार-जीत का भी कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।
इस प्रतियोगिता में कई गोल्ड मेडल भारत की झोली में आते- आते चूक गए, नीरज से पूरे देश को उम्मीद थी, लेकिन वो भी नसीब नहीं हुआ, लेकिन नीरज ने बहुत शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को सिल्वर मेडल दिलाने में कामयाबी हासिल की।
चाहे हारें या जीतें, भारत के सारे खिलाड़ी हमारे लिए तो गोल्ड ही हैं। नीरज सहित सभी प्रतिभागियों को बहुत-बहुत बधाई!!