23/09/2026
आज 23सितंबर का दिन भारत के और विशेष रूप उत्तरी भारत के शिक्षा जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज ही के दिन सन अठारह सौ सत्तासी ईसवी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, जिसे आगे चलकर "ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट" के रूप में पूरे दुनिया में ख्याति प्राप्त हुई।
वर्ष 1985 से 1990 तक औपचारिक रूप से मैं इस विश्वविद्यालय का छात्र रहा। अनौपचारिक रूप से स्वयं को
आज भी इस विश्वविद्यालय का ही छात्र मानता हूँ।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने न केवल देश के लिए साहित्य, कला , विज्ञान तथा प्रशासन के क्षेत्र में अपने छात्रों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया है, बल्कि राजनीति के क्षेत्र में भी इस विश्वविद्यालय के छात्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को प्रमाणित किया है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में प्रोफेसर जे के मेहता, विज्ञान के क्षेत्र में
प्रोफेसर धर, राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में डॉक्टर अंबा दत्त पंत
तथा प्रोफेसर एच.एम. जैन, हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में
डॉक्टर राम कुमार वर्मा, डॉ॰ मोहन अवस्थी, डॉ॰ राम स्वरूप चतुर्वेदी, श्रीदूधनाथ सिंह, डॉ॰ जगदीश गुप्त, श्रीलाल शुक्ल , विधि के क्षेत्र में प्रोफेसर केसरी, प्रोफेसर पाडिया, प्रोफेसर एसएन पांडेय, प्रोफेसर जेएन पांडे, संस्कृत साहित्य में
प्रोफेसर राजेन्द्र मिश्र अभिराज, इतिहास के क्षेत्र में प्रोफेसर जीआर शर्मा, दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में प्रोफेसर संगम लाल पांडे इत्यादि अनगिनत नाम हैं जिन्होंने
अपने अपने क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया।
राजनीति के क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीचन्द्रशेखर तथा श्री वी पी सिंह व पूर्व मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी, डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी जैसे न जाने कितने नाम हैं, जिनके व्यक्तित्व को गढ़ने और पुष्पित पल्लवित करने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने योगदान दिया। यह परंपरा आज भी जारी है।
देश का कोई भी ऐसा जिला नहीं होगा जहां पर इस विश्वविद्यालय में पढ़े हुए छात्र कभी न कभी उच्च प्रशासनिक पद पर कार्यरत न रहे। इस विश्वविद्यालय का अमरनाथ झा हॉस्टल IAS हॉस्टल के नाम से तथा पी सी बनर्जी हॉस्टल PCS हॉस्टल के नाम से छात्रों के बीच में लंबे समय तक प्रसिद्ध रहा। वर्तमान समय में इनकी क्या स्थिति है, इसके बारे में मैं कुछ कह नहीं सकता।
मुझे अच्छी तरह से याद है, इस विश्वविद्यालय में नामांकन कराने के साथ ही उस दौर में छात्रों में अपने को विशिष्ट समझने का एक विशेष भाव भर जाता था। विशिष्टता का यह भाव अनायास ही या अहंकार के रूप में नहीं होता था। इसके पीछे
एक दायित्व बोध तथा आत्मबोध दोनों की गंभीर भूमिका होती थी जो छात्र को कुछ नया , कुछ अच्छा तथा कुछ विशिष्ट करने के लिए प्रेरित करती रहती थी।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय से उस दौर का पढ़ा हुआ छात्र ,जिस दौर में हम लोग इसके छात्र थे, पूरी दुनिया में कहीं भी स्वाभिमान के साथ अपने को स्थापित कर सकता है। वह परिस्थितियों को अपने अनुकूल मोड़ देता है, परिस्थितियों के आगे नतमस्तक नहीं होता।
इस विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का वर्णन कुछ पृष्ठों में करना संभव नहीं है जहां के साहित्यकारों ने ऐसे लाखों पृष्ठों की रचनाएं की हैं जो देश और देश के बाहर भी पढ़ी जाती रही हैं। इसी प्रकार इस विश्वविद्यालय की विभूतियों में सबका नामोल्लेख करना हमारे लिए संभव नहीं है क्योंकि ऐसे नामों की श्रृंखला अंतहीन है। यहां पर मैंने केवल उन्हीं विभूतियों का उल्लेख किया है, जिनके साहचर्य में रह कर या तो हमने स्वयं ज्ञानार्जन किया या जिनके बारे में अपने दौर में अपने सीनियर छात्रों से सुना। अतः जिनके नाम का उल्लेख न हो पाया हो उनके प्रति मैं क्षमाप्रार्थी भी हूँ।
एक कृतज्ञ छात्र:
अजीत कुमार सिंह, संस्थापक एक्सीलेंट आईएएस एकेडमी, जनपद बलिया,
संप्रति बरेली।