22/01/2024
*विधि एवं न्याय के परिप्रेक्ष्य में राम राज्य की परिकल्पना*
*डॉ अमित सिंह*
भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहा जाता हैं क्योंकि उनका व्यक्तित्व मर्यादा, करुणा ,सत्य ,धर्म व सदाचार से ओत-प्रोत है । श्रीराम जैसा आर्दश व्यक्तित्व आज के वर्तमान युग में मिलना अत्यंत दुर्लभ है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे पति की कामना प्रत्येक महिला करती है, राम जैसे पुत्र की कामना प्रत्येक माता-पिता करते हैं एवं श्री राम जैसे राजा की कामना प्रत्येक नागरिक और प्रजा करती है।
मर्यादा का अर्थ संस्कृत में न्याय एवं धर्म की सीमा है। पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र भी मर्यादित है। इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम कहा जाता है। श्रीराम ने सीता जी को वचन दिया था कि मैं आपके अलावा किसी और का चिंतन नहीं करूंगा और इस वचन को उन्होंने निभाया वह आजीवन सीता माता के साथ एक ही विवाह(monogamy ) में बंधे रहे, जबकि उस समय बहु विवाह का प्रचलन था। उस समय उनके पिता दशरथ की तीन पत्नियां थी लेकिन उन्होंने एक विवाह का आदर्श रखा जो हिंदू वैवाहिक विधि से बिल्कुल मेल खाता है। अतः हमारी हिंदू वैवाहिक विधि का स्रोत रामराज्य से प्रेरणा लेता है। उन्होंने सूपर्णखा के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा था
*कृतदारोस्म भवति भायेयं*
*दयिता मम।*
*त्वद्भिधानां तु नारीणां सुदुःखा ससपतनता*।।
देवी मेरा विवाह हो चुका है मेरी पत्नी विद्यमान है और मैं पत्नी धर्म से बंधा हुआ हूं।
श्री राम ने अपने पिता को दिए गए वचनों (Promise)का पालन किया। वनवास के दौरान ही उनके पिता राजा दशरथ का देहांत हो चुका था। दिए गए वचन का पालन ही विधि एवं न्याय का आधार है।इसे विधि में विवंधन ( estoppel) का सिद्धांत कहते हैं।
वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस में भगवान श्री राम का मर्यादित चित्रण का वर्णन है।
विधि और न्याय के अनुसार मानवाधिकारों का संरक्षण,प्रजा में अंतिम व्यक्ति तक को न्याय एवं सर्वांगीण विकास की उनकी संकल्पना उनको मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनती है।
*राम राज्य की संकल्पना*
राम राज्य का अर्थ है राजा अथवा शासक द्वारा राज्य में विधि एवं न्याय के अनुसार सुशासन व्यवस्था ( Good Governance )होना है। रामराज्य कुशल राजव्यवस्था,शासन के संचालन के लिए आवश्यक है। प्रजा के हित में विकसित,प्रगतिशील, सम्पन्न एवं सकारात्मक सुदृण राज्य की स्थापना करना है, जो भारतीय संविधान ,अंतर्राष्ट्रीय विधियों एवं संधियों में राज्य की परिकल्पना ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रामराज्य शासन का प्रतिबिंब है।
*दैहिक दैविक भौतिक तापा।*
*राम राज नहिं काहुहि ब्यापा*
*सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती*
भावार्थ:- 'रामराज्य' में किसी को दैहिक, दैविक और भौतिक तकलीफ नहीं थी। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते थे और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संस्कृति, नैतिकता, भारतीय विधि व राजनीतिक मूल्यों के आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन दर्शन के अनुरूप हैं। श्री राम द्वारा अपने वचनों का पालन हमें हमारे जीवन में वचनों को निभाने की प्रेरणा देते हैं। वचनों के पालन से संबंधित भारतीय संविदा विधि हमारे सामने है।
*युद्ध विधि और श्री राम:*
लंका के साथ युद्ध में शामिल होने से पहले, राम ने सीता की शांतिपूर्ण वापसी सुनिश्चित करने और युद्ध से बचने के प्रयास में अंगद को दूत के रूप में रावण के दरबार में भेजा था। रावण ने इस अवसर का उपयोग अंगद को मारने के लिए योजना बनाई। हालाँकि, उनके भाई विभीषण ने उन्हें याद दिलाया कि *एक राजदूत या दूत को मारना राजधर्म या राजा के कर्तव्य के विरुद्ध है। यह सिद्धांत राजनयिक संबंधों पर वियना कन्वेंशन, 1961 के अनुच्छेद 29 में प्रतिबिंबित होता है।* यह राजनयिक प्रतिरक्षा और विशेषाधिकारों को नियंत्रित करता है। किसी राजनयिक एजेंट को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता है। उन्हें राज्य के अतिथि के रूप में माना जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाए जाने चाहिए कि उन्हें किसी भी तरह से नुकसान न हो।
विधि का शासन एवं अंतर्राष्ट्रीय विधि के नियम चाहे वह युद्ध नीति से संबंधित हो या राज्यों के पारस्परिक व्यवहार से संबंधित हो। श्री राम का चरित्र एवं जीवन दर्शन हमारे सामने ही इन्हें सर्वांगीण रूप से व्यवहार में अमल में लाने की सीख देता है। *पैक्टा सैंट सर्वेंडा* संधि सदैव पालनीय है क्योंकि संधि का पालन सदैव विबंध में बांधता है। यह आदर्श वाक्य
*"रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाए"*
में प्रतिबिंबित होता है।
जिस समय राजा दशरथ ने प्रभु श्री राम को 14 वर्षों का वनवास दिया उस समय राम ने उनकी आज्ञा को इस प्रकार माना जैसे ऑस्टिन के सिद्धांत में संप्रभु की आज्ञा को सर्वोपरि माना गया है ऑस्टिन सिद्धांत में राजा की आज्ञा को भगवान की आज्ञा के समान माना गया है विधि शास्त्र रामराज्य शासन व्यवस्था पर आधारित है। एक राजा को ग्रंथों में भगवान कहा गया है क्योंकि राज्य के निवासियों का सुख-दुख राजा के हाथों में होता है।
एक राजा के अंदर दया, करुणा ,क्षमा, उदारता आदि मानवीय गुण का होना आवश्यक है। एक राजा में प्राथमिक गुण न्यायप्रिय होना चाहिए और न्याय पक्षपात रहित(Rule against Bias)होना चाहिए। यह प्रशासनिक विधि का प्रारंभिक सिद्धांत है। आदर्श राजा का उदाहरण आदर्श युद्ध नीति एवं कुशल योद्धा के रूप में भगवान श्री राम न सिर्फ कुशल योद्धा थे बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। उन्होंने अपने युद्ध कौशल के कारण पत्थरों से रामसेतु का निर्माण किया एवं रावण से अंतिम क्षणों में भी वार्तालाप की। यह लक्षण मध्यस्थता एवं सुलह विधि की बात करता है। उन्होंने युद्ध की स्थिति में शत्रु राज्य से शरणथियो को शरण देकर रक्षा का आश्वासन दिया। जब विभीषण भगवान श्री राम से मिलने आए तब सुग्रीव ने कहा कि वह दुश्मन के भाई हैं लेकिन श्री राम ने उन्हें समझाते हुए कहा कि उनको अपने देश से निस्काषित किया गया है और वह उनसे शरण (asylum )मांगने आए प्रत्येक व्यक्ति को शरण देना और उसकी रक्षा करना उनका स्वभाव व धर्म है। जो प्राकृतिक न्याय सिद्धांत पर आधारित है।
युद्ध में वध करने के पश्चात मृत व्यक्ति का ससम्मान अंतिम संस्कार करना भगवान श्री राम ने सुनिश्चित किया। युद्ध को विधिक नियंत्रण के संबंध में उन्होंने कहा था कि युद्ध नीति को नियमानुसार होना चाहिए जैसे युद्ध को दिन में होना चाहिए रात में लड़ने वाले युद्ध आसुरी युद्ध होता है और युद्ध में ऐसे अस्त्रों शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए जो जनसंहार करने वाले हो और पर्यावरण के लिए घातक हो। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर अध्याय 7 अनुच्छेद 51 में वैध युद्ध के नियमों का वर्णन किया गया है। पेरिस घोषणा व जिनेवा अभिसमय में इन नियमों को देखा जा सकता है। घातक व आणविक शास्त्रों के प्रयोग को गलत बताया। इस नियम के उल्लंघन का प्रभाव हिरोशिमा व नागासाकी पर परमाणु बम के दुष्प्रभाव को देखा जा सकता है।
युद्ध बंदियों की स्थिति का समाधान ,युद्ध के प्रभाव से लोगों का संरक्षण, शत्रु के साथ उचित व्यवहार, युद्ध के समय घायल एवं मृत्यु लोगों के साथ सम्यक व्यवहार, अधिग्रहीत राज्य के साथसमुचित व्यवहार आदि श्री राम का जीवन को एक आदर्श बनाते है। रावण से युद्ध के विषय में वाद एवं श्री राम द्वारा जीता गया राज्य उचित उत्तराधिकारियों विभिषण को सौंपा गया, जिससे वहां प्रजा का उचित संरक्षण हो सके। वह जीते हुए राज्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते थे तथा उसे अपने भाइयों में से किसी एक को दे सकते थे लेकिन श्री राम द्वारा ऐसा नहीं किया गया उन्होंने जनता के कल्याण(welfare )को देखते ऐसा किया यह लोकतंत्र के आधुनिक स्वरूप को दर्शाता है।
श्री राम का व्यक्तित्व राष्ट्रवाद (Nationalism ) का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने अपने देश/ मातृभूमि को स्वर्ग से भी ज्यादा बढ़कर माना है।
*अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।*
*जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥*
अनुवाद : " लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
रामायण एक आदर्श महाकाव्य है जो हमेशा विधि और न्याय व्यवस्था के लिए एक आदर्श है चाहे वह समानता का अधिकार हो या प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार व नीति निर्देशक तत्व,इन को समझने के लिए हमें श्री राम ,सीता ,लक्ष्मण आदि का चरित्र समझना होगा। रामराज्य में हमेशा स्त्रियों के सम्मान की बात कही गई एवं स्त्रियों को पुरुषों से पहले संरक्षित किया एवं सम्मान दिया। वेदों व दूसरे ग्रंथों में पहले सीता का नाम लिया जाता है और *जयसियाराम* कहा जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि भगवान श्री राम के सहनशील व धैर्यवान, दयालु ,पुत्र, मित्र ,प्रबंधक व आदर्श भाई जैसे गुण किसी व्यक्ति ने अपना लिए तो जीवन में फिर किसी संकट से वह भयभीत नहीं होगा।
*डॉ अमित सिंह*
संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष विधि
रोहिलखंड विश्वविद्यालय बरेली