01/03/2026
श्री काटम राजा (कटम राजू) आंध्र आदि तेलुगु क्षेत्र के राजनायक हैं जिनकी वीरता की गाथा आज भी गाकर सुनाए जाते हैं। यादवों की वीरता से परिपूर्ण काटम राजा की कथाओं को इतनी प्रसिद्धि प्राप्त है कि इसे तेलुगु साहित्य में "यदुशास्त्रम", "Gollabharatam" या YadavBharatam का दर्जा प्राप्त है।
ये प्रकाशम जिले में स्थित राजधानी कनकगिरी/कन्निगिरी से शासन करते थे।
इनका जन्म 13वी सदी में योगमाया भगवती गंगम्मा की अनुकंपा से राजा पेड्डीराज के यहां हुआ।
इस राजवंश की प्रमुख गद्दी Alavapadu थी तथा ये काकतीय, Addanki, देवगिरी सम्राट महादेव और Panugal के यादवों के समकालीन यादव राजवंश था।
तेलुगु चोल/चोड़ा नरेश के अधीनस्थ Alavalapadu के यादवों की सत्ता नेल्लौर, प्रकाशम और विशाखापटनम के इलाकों में व्याप्त थी ।
श्री काटम राजा और Alavapadu के इतिहास संदर्भ में उस दौर के प्राप्त अभिलेख, शिलालेख और ताड़पत्र आदि अति महत्वपूर्ण हैं। जिनमें अन्नामय्या जिले से प्राप्त 1593 के ताम्र पत्र तथा 1258 के गुंडलपालेम का ब्रह्मेश्वर मंदिर शिलालेख प्रमुख हैं ।
>अन्नामय्या ताम्र पत्र के संदर्भ में कांची के एकम्बरेश्वर मंदिर के विद्वान ब्राह्मणों ने इसमें तेलुगु Golla यादवों के जिक्र और "Badugula पदवी" की पुष्टि की।
>गुंडपालेम शिलालेख विशेष रूप से सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें तेलुगु मूल के Golla यादवों से संबंधित इस राजवंश के: ऋषि गोत्र अत्री/अत्रेय, तथा यदुवंश में वृष्णी शाखा और श्रीकृष्ण की वंश परम्परा में उत्पन्न होने का बोध होता है। साथ ही इसमें यादवों की उत्पत्ति के संदर्भ में लिखा है कि ये " द्वारापुर/द्वारिकापुरी, मथुरापुरी के स्वामी गोपीवल्लभ भगवान विष्णुयोगमाया के चरण कमलों से उत्पन्न हुए"।
> काटमराजा और Alvalapadu से संबंधित अभी तक 63 ताड़पत्र अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं जिनकी खोज प्रो. वेंकट सुब्बाराव द्वारा 80के दशक में की गई। अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के प्रयासों से ताड़पत्रों का बेहतर रखरखाव किया गया तथा इनमें से 56 अभिलेख काटम राजा और Alvalapadu राजवंश से संबंधित हैं तथा शेष 7 में महाभारत के रुक्मिणी कल्याणम, आदीपर्व इत्यादि घटनाओं से संबंधित हैं। इन अभिलेख में भगवान श्री कृष्ण से लेकर काटम राजा तक की वंश परम्परा के 23 पीढ़ियों के नाम खोजे जा चुके हैं जो निम्न प्रकार हैं:
भगवान श्रीकृष्ण> प्रद्युम्न > अनिरुद्ध> वज्रनाभ> प्रतिबाहु> सुबाहु > उग्रसेन > अमृतभोज> विजयभोज> कनकभोज> गजभोज> रामभोज> रत्नभोज > वीर विजय> पद्मराज> कुर्मराज> सिम्हाद्रिराज> गंगराज > Avula Valuraj> Avula Peddiraj और > Avula Katamaraju।
हालांकि ये नाम अभी कुछ ही हैं तथा शेष सैकड़ों पीढ़ियों के नाम उजागर नहीं हो सके। किंतु एक तथ्य स्पष्ट होता है कि काटम राजा का कुटुंब भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ जी से संबंधित है।
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इस राजवंश को अक्सर नेल्लौर के चोल/चोड़ शासकों से संघर्ष के लिए जाना जाता है।
1248 से 1267 के मध्य दोनों राजवंशों के मध्य कई युद्ध हुए।
नेल्लौर के चोल/चोड़ महाराजा नलसिद्ध तृतीय ने कई विजय अर्जित कर दर्जन दुर्ग अपने अधीन किए थे। किंतु अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए Alavalapadu के यादवों ने भी वीरता का प्रदर्शन करते हुए नेल्लौर के विजय पथ में सेंध लगाई थी।
मुख्य युद्ध 1263 में राजा वल्लराज के पौत्र और पेड्डी राज के प्रतापी पुत्र काटम राजा और नलसिद्ध के मध्य हुआ। 6 दिनों तक चले इस युद्ध में दोनों पक्षों को भारी क्षति पहुंची किंतु अंततः काटम राजा और यादव सेना ने नलसिद्ध को युद्ध में मार गिराया। गौ रक्षा के हित में लड़े इस युद्ध में यादवों को विजय प्राप्त हुई यद्यपि युद्ध में घायल हो जाने के कारण काटम राजा वीरगति को प्राप्त हो गए किंतु उनकी वीरता जनमानस में युगों युगों के लिए अमर हो गई।
युद्ध में यादव राजवंश में काटम राजा के भाई का एक पुत्र जीवित बचा जिनके नेतृत्व में एक सैन्य दल गंजाम भेज दिया गया जिससे राजवंश की परंपरा जीवित रहे।
( इस राजवंश से संबंधित कई मंदिर, दुर्ग आदि भग्नावशेष में विद्यमान हैं)।
तेलुगु प्रदेश में काटम राजा लोक देव के रूप में पूजित हैं तथा "गंगभवानी" आदि इनके मंदिर भी हैं।
Gangadonakonda मंदिर की दीवार पर राजवंश का राजप्रतीक चित्रित है जिसमें " गज, सिंह, वृषभ(नंदी) और शिवलिंग" अंकित हैं।
काटम राजा और Alavaladu राजवंश "Avula" उपनाम का भी प्रयोग करते थे तथा आंध्र आदि इलाकों में आज भी इस उपनाम के यादव परिवारों की तादाद है जिससे इनके जीवंत वंशजो के होने की पुष्टि होती है।
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काटम राजा और राजवंश के संदर्भ में तेलुगु राज्य के स्कूल पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाया जाता है जिससे वहां के इतिहास में इनकी प्रासंगिता बोध होता है।
इसके अतरिक्त दूरदर्शन DD पर कन्नड़ भाषा में काटम राज और इनके कुटुंब पर एक ऐतिहासिक धारावाहिक भी प्रसारित हो चुका है जिसमें बड़ी उम्दा ढंग से स्थितियों का मंचन किया गया।
Alavalapadu के यादवों का विधिवत वर्णन Katamaraju Kathalu साहित्य में मिलता है इसके अतरिक्त इतिहासज्ञ यशोदा देवी द्वारा प्रकाशित the history of andhra country, 1000 a.d.-1500 a.d.: administration, literature and society किताब में मिल जाता है।
इसके अतरिक्त इसका सूक्ष्म वर्णन मराठी इतिहासकार प्रो• विशाल अहिर गवली के शोध संग्रह में भी मिल जाता है।
Regards: Shiva Krishna Yadava and Raja Jai Kumar.
ीम
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