CARE
Teaching, have always been a dream. To me its like a sense of social responsibility, giving back to Care a team with common people with an uncommon dream.
We together trying to inspiring and motivating many of students everyday.
17/12/2024
Prithvi Samrat Sengupta: A Living Example of the Power of Nurturing
Prithvi Samrat Sengupta made history by winning a bronze medal at the IPF World Open Powerlifting Championship 2024. But more inspiring than his victory is his journey of overcoming challenges, thanks to the power of nurturing.
Born with Down syndrome, Prithvi defied the odds to become a heavyweight champion, proving that the right upbringing and encouragement can help overcome any obstacle.
The Role of Parenting in Overcoming Down Syndrome
Down syndrome, caused by an extra chromosome 21, often impacts physical and mental development, leading to slower learning and social exclusion. However, Prithvi's parents turned this challenge into his strength.
With unconditional love, support, and a positive outlook, they empowered him to chase his dreams. They believed in his potential, constantly motivated him, and taught him that limitations exist only in the mind.
Prithvi’s story is a testament to how nurturing can unlock extraordinary potential, regardless of challenges.
2017 के आंकड़ों को 32% वृद्धि दर से पीछे छोड़ 2021 में कई बच्चों ने अपनी जान दे कर हमें पूरे विश्व में विद्यार्थी आत्महत्या दर में सबसे ऊपर पहुंचा दिया था और 2023 लगभग 13000 रजिस्टर्ड सुसाइड केसेज,एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक प्रति दिन 36 बच्चों ने अपनी जान दी तब जाकर हमें यह स्थान प्राप्त हुआ है, मुख्यत: पांच विषयों पर यह आधारित परीक्षाएं जो असल में पूरी तरह से विफल है बच्चों में उपल्ब्ध अनगिनत टैलेंट्स को नापने या तौलने में और इन्ही के आधार पर घर परिवार विद्यालय रिश्तेदार किसी को सफल असफल मान लेते है,और धीरे धीरे इतना दबाव उस बालमन पर थोपा जाता है की आज प्रति वर्ष आत्महत्या में वृद्धि दर निर्बाधित बढ़ रही है। आप सभी से निवेदन है निसंदेह बच्चों से उनके अंक पूछे ,गलतियों और कमियों पर अवश्य समझाएं परंतु अपने कारण और पूर्वाग्रह थोपने से पहले उनसे समझें–जाने की कारण क्या रहे और उन पर उन्हें क्या सहयोग चाहिए, तुलनात्मक बातचीत की बजाय उन्हें मार्गदर्शन दे और कर सके तो उन्हे गले लगाकर यह अवश्य जता दे की आप उन्हे स्वीकार करते है और हर स्तिथि में उनके साथ खड़े है।क्यों की एक कागज के टुकड़े से कही ज्यादा आपका व्यवहार प्यार उन्हे सफल या असफल बनाएगा।
प्रिय अभिभावक ,
प्रति 3 मिनट 1 बच्चे को एग्जाम और रिजल्ट्स के समय सुसाईडियल थॉट आता है,एक रिपोर्ट के अनुसार 27% की वृद्धि हुई है पिछले 7 सालो में,
एग्जाम्स फोबिया , डिप्रेशन, एंजाइटी डिसऑर्डर , सुसाइडल थॉट
76% ज्यादा बच्चे आजकल इनसे ग्रसित हो रहे है,कारण एग्जाम्स रिजल्ट्स और उसके चलते जो उनकी तुलना की जाती है व अन्य,
एग्जाम्स और रिजल्ट्स का समय चल रहा है और हमारी परवरिश और सामाजिक माहौल के चलते चाहे अनचाहे हम में एक अभिभावक के तौर पर तुलना, अंको को बुद्धिमता समझना , अंको को अच्छे भविष्य की कुंजी मानना जैसी कई मान्यताएं हम में समाई हुई है, तो सोचा चलिए आज इस पर बात करते है,
एक महान शिक्षाविद् के अनुसार ऐसी कोई परीक्षा कभी बनाई ही नही जा सकती जिससे की किसी बच्चें का असल मूल्यांकन किया जा सके , और ये जो परीक्षाएं ब्रिटिश एजुकेशन सिस्टम के आधार पर आजकल हो रही है मात्र एक घंटे में वर्ष भर पढ़े हुए को लिखना ज्यादातर विषयों में यह मात्र यादाश्त की परीक्षा है,इसके आधार पर बच्चें की इंटेलजेंसी या स्किल्स या भविष्य को तोलना, नापना निहायती गलत है, कम अंक या अच्छे अंक इस बात का प्रमाण बिल्कुल नही है की वो जीवन में सफल या असफल होगा या अन्य किसी बच्चे से उसकी क्षमता को अंक आधार पर नापा जा सकता है, जरा सोचिए सचिन तेंदुलकर म्यूजिक का और लता मंगेशकर क्रिकेट का एग्जाम्स देते तो उनका परिणाम क्या होता, आप किसी भी फील्ड के टॉप 10 सक्सेसफुल लोगो की अंक तालिका उठा लीजिए 10 में से 7 लोग जो भविष्यदृष्टा ,क्रिएटिव माइंड्स,इनोवेटर्स हुए है वे ज्यादातर इस अंक विज्ञान में फेल हुए है, अतः अपने बच्चे पर डायरेक्ट इनडायरेक्ट प्रेशर बनाने से पहले इन बातो को अवश्य ध्यान में रखे।
धन्यवाद
19/10/2023
Tomorrow 5:30 to 9:30 join us with your kids and friends for musical dandiya.
02/09/2023
Drop your number in the comments to get the webinar zoom link and other details.
05/08/2023
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25/07/2023
शीर्षक : "बेबस सब्र"
क्या और इंतजार करना मूर्खता नही होगी एक युवा मछली ने पानी में जीने वाले समस्त जीव जंतुओं की बैठक में कहा , वो सभी बूढ़ी मछलियां निशब्द थी जो इंसानों का अब तक पक्ष लेती रही थी ,पानी तो उनका भी जीवन है पर क्यों इतनी छोटी सी मौलिक बात वे समझ नही रहें और जल संसाधनों को लगातार प्रदूषित कर हमारा और उनका जीवन घुट घुट कर समाप्त करने को अग्रसर है, एक मछली ने आंसू पोंछते हुए कहा , यह जानते हुए की उनके जीवन क्रम के सबसे पहले पूर्वज हम है हम उनके नुकसान की बात केसे सोचे भले वो ये बात भूल चुके है ,और सन्नाटा बिखर गया ,काफी देर की शांति के बाद एक प्लास्टिक की बॉटल जिसे इस्तेमाल के बाद इंसान द्वारा फेंका गया था उसे धीरे धीरे नीचे आते देखते हुए बैठक में आई मछलियों के बेबस आंसू पानी में घुल रहे थें।
तुषार वर्मा
एकलव्य ,अर्जुन, द्रोणाचार्य इन तीन नामों को लेते ही आपके मन मस्तिष्क में वो किस्सा उभर आया होगा जहा द्रोणाचार्य ने दक्षिणा में अंगठा मांग शिष्य के गुरु के प्रति प्रेम का उद्धारहण बना दिया और आज तक इसे ज्यादातर इसी तरह सुना गया समझा गया की देखो गुरु के लिए इतना प्रेम भाव होना चाहिए और निसंदेह इसमें कोई गलती नहीं परन्तु मेरा मानना हे की यह आधा और एक तरफ़ा बात है, मुझे लगता है की इतिहास का यह एक वो उद्धारहण हे जिससे हम यह भी समझ सकते हे की एकलव्य एक ऐसा किरदार था जिसे गुरुकुल ने और गुरु ने नकार दिया किसी भी तरह की शिक्षा देने के लिए और न ही वो सक्षम था स्वयं से व्यवस्थाएं करने के लिए , पंरतु सिखने की जो ललक उसके मन में उठी वो अप्रभावित रही इन सभी कारणों से और स्वयं उसने अपना गुरु बनना तय किया ,क्या यह सेल्फ लर्निंग का अनूठा उद्धारहण नहीं हे जिसने गुरुकुल ,गुरु ,सुविधाये सभी के न होने से कुछ नहीं बन पाने को नकार अपनी सिखने की यात्रा को पूरा किया और इस कदर पूरा किया की अर्जुन जिसे उस समय की सबसे अच्छी गुरुकुल और स्वयं प्रभु परशुराम के शिष्य द्रोणाचार्य से सिखने का मौका मिला जो सभी तरह की सुविधाओं से पूर्ण था से भी स्वयं को इतना श्रेष्ट बना लिया की गुरु द्रोणाचार्य को अंगूठा मांग अपना वचन की वे अर्जुन को विश्व का श्रेस्ट धनुर्धारी बनायेंगे पूरा करना पड़ा ,वर्तमान में बच्चो से ज्यादा अभिभावक इस चिंता में सब दांव पर लगा कर सुविधाएं जुटाने को भागते रहते हे ,और बचो के साथ अपने समय प्यार रिश्ते को दांव पर लगा देते हे ,और सम्माज के सामूहिक दबाव के चलते बच्चे के अंर्तमन , नेचुरल टैलेंट सबकुछ को मार्कशीट्स और नंबर्स के निचे दबा धीरे धीरे सुविधाओं के लेनदेन में उसकी आत्मा छीन उसे वो बनाने के लिए धकेलते हे जिसका शायद दूर दूर तक उससे कोई रिश्ता न हो और पुरे जीवन वो सुविधाओं की भागदौड़ में नीरस आत्मा रहित उन्ही की तरह भागता रहे । तो एकलव्य के उद्धारहण से अभिभावक यह समझे की हमारा पहला काम सुविधाएं जुटाने से कही ज्यादा जरुरी बच्चे को अपनी नेचुरल टैलेंट को ढूढ़ने में सहायता करना हे और बच्चो को ऐसे उधारहण से समझाना सीखाना है की सिखने के लिए सुविधाएं नहीं मात्र सिखने की ललक चाहिए।
तुषार वर्मा
चाइल्ड काउंसलर
7568245678
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