09/10/2023
मृच्छकटिकम् की सूक्तियाँ-
1- अपण्डितास्ते पुरुषा मता मे ये स्त्रीषु च श्रीषु विश्वसन्ति।
भावार्थ- शर्विलक का कथन- वे मनुष्य मुझे मूर्ख लगते हैं जो स्त्रियों और सम्पत्ति पर विश्वास करते हैं।
2- अल्पक्लेशं मरणं द्रारिद्रयमनन्तकं दु:खम्।
भावार्थ - चारुदत्त का कथन- मृत्यु में थोड़ा कष्ट है, किन्तु निर्धनता कभी न समाप्त होने वाला दु:ख है।
3- अर्थत: पुरुषो नारी या नारी साऽर्थत: पुमान्।
भावार्थ- चारुदत्त का कथन- धनहीन पुरुष नारीतुल्य तथा धन से युक्त नारी पुरुष के समान है।
4- अहो धिग् वैषम्यं लोकव्यवहारस्य।
भावार्थ- अधिकरणिक का कथन- लोकव्यवहार की विषमता को धिक्कार है।
5- आलाने गृह्यते हस्ती वाजी वल्गासु गृह्यते।
हृदये गृह्यते नारी यदिदं नास्ति गम्यताम्।।
भावार्थ- विट का शकार से कथन- हाथी खम्भे में बांधने से, घोड़ा लगाम से रोका जाता है, स्त्री हृदय में प्रेम से वश में की जाती है, और यदि हृदय में प्रेम नहीं है तो जाइए।
6- कामो वाम: ।
भावार्थ- विदूषक का चारुदत्त से कथन- काम का स्वभाव तो उल्टा ही होता है।
7- छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति।
भावार्थ- चारुदत्त न्यायालय में सोचता है- आपत्ति काल में मनुष्य की भूल होते ही अनेक अनिष्ट एकत्रित हो जाते हैं।
8- दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमना: खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति।
वसन्तसेना का कथन- निर्धन व्यक्ति में मन लगाने वाली वेश्या नि: सन्देह संसार में निन्दनीय नहीं होती।
9- दारिद्रयाद्घ्रियमेति ह्रीपरिगत: प्रभ्रश्यते तेजसो।
भावार्थ- चारुदत्त का कथन- दरिद्रता से मनुष्य लज्जा को प्राप्त होता है, लज्जा को प्राप्त मनुष्य तेजरहित हो जाता है तथा तेजहीन अपमानित होता है।
10- दुष्करं विषमौषधीकर्तुम्।
भावार्थ- विट मन में सोचता है- विष की औषधि बनाना दुष्कर है।
11- न चन्द्रादातपो भवति।
मदनिका का कथन - चन्द्रमा से गर्मी नहीं होती।
12- न युक्तं परकलत्रदर्शनम्।
भावार्थ- चारुदत्त का कथन- पराई स्त्री का दर्शन करना उचित नहीं।
13- न शक्या हि स्त्रियो रोद्धुं प्रस्थिता दयितं प्रति।
भावार्थ- वसन्तसेना का कथन - प्रियतम के प्रति प्रस्थान करती हुई स्त्रियां रोकी नहीं जा सकतीं।
14- पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते, न पुनर्ग्रहेषु।
भावार्थ- वसन्तसेना का कथन- पुरुषों पर धरोहर रखी जाती है, न कि घर पर।
15- बहुदोषा हि शर्वरी।
भावार्थ- चारुदत्त का विदूषक से कथन- आभूषण को ठगी चोरी से बचाना चाहिए क्योंकि रात्रि वास्तव में बहुत दोषपूर्ण होती है।
16- मूले छिन्ने कुत: पादपस्य पालनम्।
भावार्थ- सजा प्राप्त चारुदत्त द्वारा विदूषक से रोहसेन का पालन करने को कहने पर विदूषक का कथन- जड़ कट जाने पर वृक्ष का पालन कैसे होगा।
17- वीणा हि नामासमुद्रोत्थितं रत्नम्।
भावार्थ-चारुदत्त का कथन- वीणा तो वास्तव में बिना समुद्र से निकला हुआ रत्न है।
18- वेश्या श्मशानसुमना इव वर्जनीया:।
भावार्थ- शर्विलक का कथन- श्मशान के पुष्पों के समान वेश्याओं का त्याग कर देना चाहिए।
19- शङ्कनीया हि लोकेऽस्मिन्निष्प्रतापा दरिद्रता।
भावार्थ- वसन्तसेना के आभूषण चोरी होने पर चारुदत्त का विदूषक से कथन- इस संसार में पौरुषविहीन निर्धनता शङ्का के योग्य होती है।
20- शून्यमपुत्रस्य गृहं चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम्।
मूर्खस्य दिश: शून्या: सर्वं शून्यं दरिद्रस्य।
भावार्थ-सूत्रधार का कथन- पुत्रहीन का घर सूना है, जिसका अच्छा मित्र नहीं है उसका सब समय सूना है, मूर्ख के लिए सब दिशाएँ सूनी हैं, निर्धन के लिए तो सब कुछ सूना है।
21- शून्यैर्गृहै: खलु समा: पुरुषा दरिद्रा:।
भावार्थ - चारुदत्त का कथन- दरिद्र वयक्ति वस्तुत:सूने घरों, जलरहित कूपों तथा शुष्क वृक्षों के समान है।
22- सर्वत्र आर्जवं शोभते।
भावार्थ- शर्विलक का कथन- सरलता सब जगह शोभायमान होती है।
23- साहसे श्री: प्रतिवसति।
भावार्थ- शर्विलक का मदनिका से कथन- साहस में लक्ष्मी निवास करती हैं।
24- स्वैर्दोषैर्भवति हि शङ्कितो मनुष्य:।
भावार्थ- शर्विलक का कथन- वस्तुत: मनुष्य अपने दोषों के द्वारा शङ्कित हो जाता है।
25- न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यश: ।
भावार्थ- चारुदत्त का कथन- मृत्युदण्ड पाने पर भी डर नहीं है, डर है तो केवल अपयश का।