11/11/2016
सुप्रभात
एलुमनाई मीट में सिर्फ गिने चुने कुछ दिन बचे हैं और कहीं से कोई हरकत नहीं हो रही है यह घोर आश्चर्य का विषय है लगातार 5साल आयोजन कर लेने और व्यापक प्रचार प्रसार के बाद भी लोगों के आयोजन और एसोसिएशन के प्रति गंभीर नहीं होना....यह दर्शाता है कि एलुमनाई एसोसिएशन जैसे संगठन की कोई आवश्यकता नही है और समय समय पर सिर्फ आपस में मिलने जुलने और नवोदय और नवोदयन्स के प्रति इमोशन का इज़हार कर लेने मात्र से ही मिलने जुलने और परस्पर सहयोग की भावना बढ़ ही रही है तो ऐसे में विद्यालय में आयोजन की जरुरत अप्रासंगिक है अतएव क्यों न इस तरह के आयोजन को समाप्त कर दिया जाय।हर साल 1महीने पहले से हर आदमी को कॉल कर के डेट बताना ,आने की याद दिलाना,कुछ आर्थिक सहयोग मांगना ये सब दर्शाता है की लोगों को इन सब में विशेष रूचि नहीं है।आने न आने की तो बात दूर की है लोग आयोजन और एसोसिएशन से सम्बंधित पोस्टों पर प्रतिक्रिया तक नहीं देते ऐसे में मेरे ख्याल में इस आयोजन को अब यहीं एक पूर्ण विराम दे देना चाहिए और आयोजन से जुड़े तमाम लोगों को भी बहुत सर दर्द नहीं लेना चाहिए,वैसे भी इन पांच सालों में हम जहाँ से चले थे आज भी वहीँ खड़े हैं कुछ भी तो नहीं बदला है बस बदला है तो बस यही की अब हमारा एक नाम बाना मिला है, एक फेसबुक ग्रुप है,एक व्हाट्सएप्प ग्रुप है एक बैंक खाता है जिसमें कुछ सौ रुपल्ली हैं और कुछ दिवास्वप्न हैं दूर तक जाती एक सोच है,और दिलों में नवोदय और नवोदयन्स के प्रति एक एहसास है.....इसलिए आइये मेरा सुझाव मानिये और बन्द कर दीजिये ये सब ताकि आने जाने में लोगों का समय न ख़राब हो,नहीं आ पाने के बहाने न बनाने पड़ें, आर्थिक सहयोग न करना पड़े और सबसे बड़ी बात कि सिर्फ नवोदय के प्रति अपनी भावना व्यक्त कर देने भर से काम चल जाए हकीकत में कुछ नहीं करना पड़े।बाना के तमाम सम्मानित सदस्य आगे आएं और इस संस्था की अकाल मृत्यु पर एक बार फिर अपनी संवेदना ये कहते हुए जटाएं "कि नहीं लेकिन काम ठिक्के हो रहा था करना चाहिए था,संगठन तो होने चाहिए,फलना नवोदय का बड़ा जबर्दस्त है भाय और उ लोग बड़ी काम करता है,"आइये एक सच्ची श्रद्धांजलि दीजिये।RIP
आप का अपना
सुधाकर पांडेय
संयोजक
स्वर्गीय बाना
भूतपूर्व बाँका नवोदय एलुमनाई एसोसिएशन।