19/07/2017
"संभव क्या है और असंभव क्या होना चाहिए ये कौन तय करेगा, अतीत के अनुभव पर आधारित मान्यताएं या वर्त्तमान की परिस्थितियों की आवश्यकता द्वारा शाषित प्रयासों से उत्पन्न संभावनाएं ?
पहली बार चाँद पर जाने का विचार इंसान के मन में आया था मस्तिष्क में नहीं ; ह्रदय कल्पनाओं का स्त्रोत है और बुद्धि का काम तर्क और विश्लेषण; ऐसे में, अगर चाँद पर जाने की कल्पना अपने अस्तित्व के स्वीकृति के लिए बुद्धि से पूछती तो पहला सवाल यही होता, 'आखिर जाने की आवश्यकता क्या है?'
बुद्धि का काम अपने तर्क और विश्लेषण से लक्ष्य के संघर्ष को सरल बनाना है, ऐसे में अगर निर्णय का अधिकार ह्रदय से लेकर बुद्धि को सौंप दिया जाए तो स्वभाविकतः वह संघर्ष को सरल बनाने के क्रम में, संघर्ष को ही टालने का प्रयास करेगा पर ह्रदय लाभ हानि, तर्क और विश्लेषणों से नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं द्वारा शाषित है इसलिए, उसके निर्णय काल्पनिक व आदर्श तो होते हैं पर कई बार व्यवहारिक नहीं ;
ह्रदय का काम लक्ष्य निर्धारित करना है और बुद्धि का महत्व उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए युक्ति सुझाने में, इसी प्रक्रिया से मनुष्य ने नए की खोज की; चाँद पर पहुंचना एक उदाहरण था ;
ऐसे में, व्यवहारिकता के नाम पर जीवन के निर्णय के निर्धारण का अधिकार ह्रदय से छीन कर बुद्धि को दे दिया जाए तो यह परिस्थिति बिलकुल वैसी ही होगी मानो ज़ोर से प्यास लगी हो और पीने के लिए पानी के अलावा सब कुछ हो; गला तो भीग जाएगा पर प्यास नहीं बुझेगी ; जीवन में सफलता और संतुष्टि के बीच यही अंतर है।
ज्ञान की सीमा होती है पर कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं, इसीलिए , नए का जन्म हमेशा कल्पनाओं में ही होता है। दृष्टिकोण को दृश्य में रूपांतरित करने के लिए विश्वास निर्णायक है ; संघर्ष की परीक्षा में अगर विश्वास सत्य पर आधारित न हो तो उसका क्षय स्वाभाविक है ;
अगर सत्य सापेक्ष है तो इस संसार का एक मात्र सच यह वर्त्तमान भी हमारे अस्तित्व के सापेक्ष है, इसलिए, स्वयं के सत्य को जाने बिना वर्त्तमान की परिस्थिति का परिवर्तन असंभव है .; स्वयं के सत्य का ज्ञान ही आत्मविश्वास के रूप में प्रतिबिंबित होता है ; अतः, आत्म ज्ञान आत्मविश्वास का आधार है।