Bhagwat geeta and Hinduism

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64,🚩दोहावली 🚩(श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम)⚜️गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जा...
23/04/2022

64,🚩दोहावली 🚩
(श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम)

⚜️गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥

🔅भावार्थ—(जनकपुरीमें सखियोंके कहनेपर भी) मुनि गौतमकी पत्नी अहल्याकी गतिको याद करके (जो चरणस्पर्श करते ही देवी बनकर आकाशमें उड़ गयी थी) श्रीसीताजी अपने हाथोंसे भगवान् श्रीरामजीके पैर नहीं छूतीं। रघुवंशविभूषण श्रीरामजी सीताजीके इस अलौकिक प्रेमको जानकर मन-ही-मन हँसने लगे॥ १८९॥
जय श्री राम 🚩



🚩ॐ नमो नारायणाय🚩
🚩ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🚩
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41,🚩 दोहावली 🚩       (भगवान् की बाललीला)⚜️बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग।बालकेलि रघुबर करत बाल बंधु सब संग॥🔅भावार्थ—श...
06/04/2022

41,🚩 दोहावली 🚩
(भगवान् की बाललीला)

⚜️बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग।
बालकेलि रघुबर करत बाल बंधु सब संग॥

🔅भावार्थ—श्रीरामजी बालोचित सुन्दर गहने-कपड़ोंसे सजे हुए हैं; उनके श्रीअंग धूलसे मटमैले हो रहे हैं, सब बालकों तथा भाइयोंके साथ आप बालकोंके-से खेल खेल रहे हैं॥ ११७॥

अनुदिन अवध बधावने नित नव मंगल मोद।
मुदित मातु पितु लोग लखि रघुबर बाल बिनोद॥

🔅भावार्थ—श्रीअयोध्याजीमें रोज बधावे बजते हैं, नित नये-नये मंगलाचार और आनन्द मनाये जाते हैं। श्रीरघुनाथजीकी बाललीला देख-देखकर माता-पिता तथा सब लोग बड़े प्रसन्न होते हैं॥ ११८॥

⚜️राज अजिर राजत रुचिर कोसलपालक बाल।
जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल॥

🔅भावार्थ—कोसलपति महाराज दशरथके लाड़ले लाल राजमहलके सुन्दर आँगनमें हाथों और घुटनोंके बल (बकैयाँ) चलते हुए ऐसी उत्तम-उत्तम लीलाएँ कर रहे हैं जो मानो सब शुभ गुण और सुमंगलोंकी माला ही है॥ ११९॥

⚜️नाम ललित लीला ललित ललित रूप रघुनाथ।
ललित बसन भूषन ललित ललित अनुज सिसु साथ॥

🔅भावार्थ—श्रीरघुनाथजीका नाम, उनकी लीला, उनका सुन्दर रूप, उनके वस्त्र, उनके आभूषण सभी अत्यन्त सुन्दर हैं और सुन्दर छोटे भाई तथा अयोध्यावासी बालक उनके साथ (खेल रहे) हैं॥ १२०॥
जय श्री राम 🚩



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जयति यतिराज फणिराज अवतारमणे प्रबल पाखंड तमो हरण भानो, विजयी भव! विजयी भव ! विजयी भव !भगवान आदि शेष के सभी अवतारों में मण...
06/04/2022

जयति यतिराज फणिराज अवतारमणे
प्रबल पाखंड तमो हरण भानो,
विजयी भव! विजयी भव ! विजयी भव !

भगवान आदि शेष के सभी अवतारों में मणि स्वरूप यतिराज श्रीमद् जगद्गुरु रामानुजाचार्य की जय हो जो संसार में व्याप्त पाखंड रूपी अंधकार का हरण करने वाले देदीप्यमान सूर्य की भाँति हैं।

ऐसे श्रीमद् जगद्गुरु रामानुजाचार्य की
जय हो! जय हो! जय हो!

🚩ॐ नमो नारायणाय🚩
🚩ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🚩
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115,श्री विष्णु पुराण (भारतादि नौ खण्डोंका विभाग) (द्वितीय अंश /अध्याय 3) इन नदियोंके तटपर कुरु, पांचाल और मध्यदेशादिके ...
06/04/2022

115,श्री विष्णु पुराण (भारतादि नौ खण्डोंका विभाग) (द्वितीय अंश /अध्याय 3)

इन नदियोंके तटपर कुरु, पांचाल और मध्यदेशादिके रहनेवाले, पूर्वदेश और कामरूपके निवासी, पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दाक्षिणात्यलोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण तथा शूर, आभीर और अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व और कोशल-देशवासी तथा माद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसीगण रहते हैं॥ १५—१७॥

हे महाभाग! वे लोग सदा आपसमें मिलकर रहते हैं और इन्हींका जल पान करते हैं। इनकी सन्निधिके कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं॥ १८॥

हे मुने! इस भारतवर्षमें ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं॥ १९॥

इस देशमें परलोकके लिये मुनिजन तपस्या करते हैं, याज्ञिकलोग यज्ञानुष्ठान करते हैं और दानीजन आदरपूर्वक दान देते हैं॥ २०॥

जम्बूद्वीपमें यज्ञमय यज्ञपुरुष भगवान‍् विष्णुका सदा यज्ञोंद्वारा यजन किया जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य द्वीपोंमें उनकी और-और प्रकारसे उपासना होती है॥ २१॥

हे महामुने! इस जम्बूद्वीपमें भी भारतवर्ष सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है इसके अतिरिक्त अन्यान्य देश भोग-भूमियाँ हैं॥ २२॥

हे सत्तम! जीवको सहस्रों जन्मोंके अनन्तर महान् पुण्योंका उदय होनेपर ही कभी इस देशमें मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है॥ २३॥

देवगण भी निरन्तर यही गान करते हैं कि ‘जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्गके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक धन्य (बड़भागी) हैं॥ २४॥

जो लोग इस कर्मभूमिमें जन्म लेकर अपने फलाकांक्षासे रहित कर्मोंको परमात्म-स्वरूप श्रीविष्णु भगवान‍्को अर्पण करनेसे निर्मल (पापपुण्यसे रहित) होकर उन अनन्तमें ही लीन हो जाते हैं [वे धन्य हैं!]॥ २५॥

‘पता नहीं, अपने स्वर्गप्रदकर्मोंका क्षय होनेपर हम कहाँ जन्म ग्रहण करेंगे! धन्य तो वे ही मनुष्य हैं जो भारतभूमिमें उत्पन्न होकर इन्द्रियोंकी शक्तिसे हीन नहीं हुए हैं’॥ २६॥

हे मैत्रेय! इस प्रकार लाख योजनके विस्तारवाले नववर्ष-विशिष्ट इस जम्बूद्वीपका मैंने तुमसे संक्षेपसे वर्णन किया॥ २७॥

हे मैत्रेय! इस जम्बूद्वीपको बाहर चारों ओरसे लाख योजनके विस्तारवाले वलयाकार खारे पानीके समुद्रने घेरा हुआ है॥ २८॥
🙏🏻अंश 2 का अध्याय 3 सम्पूर्ण 🙏🏻
🚩जय श्रीमन्नारायण🚩


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06, श्री राधा (कल्याण पत्रिका गीताप्रेस)इसके अनेक अंग हैं - रति, प्रेम, स्नेह ,मान,प्रणय, राग, अनुराग भाव और महाभाव | ये...
13/03/2022

06, श्री राधा (कल्याण पत्रिका गीताप्रेस)

इसके अनेक अंग हैं - रति, प्रेम, स्नेह ,मान,प्रणय, राग, अनुराग भाव और महाभाव | ये सभी आह्यादिनी-शक्ति के ही भाव हैं | इन सारे भावो का जहा तक पूर्णप्रकाश ,अनंततम प्रकाश है - वह श्री राधा भाव हैं | अब श्री राधा क्या है ? यह कोई नही बता सकता कि वे क्या है | राधा है -श्री कृष्ण का आनंद | राधा न हो तो श्री कृष्ण के आनंद रूप कि सिद्धि ही नही हैं | श्री कृष्ण के आनंद का का नाम हैं ' राधा ' | इस राधा के अनेक स्तर हैं , अनेक स्वरूप हैं , अनेक विकास हैं |
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83, श्री विष्णु पुराण (प्रह्लाद-चरित)(प्रथम अंश /अध्याय 17) यदि हमारे कहनेसे भी यह विष्णुका पक्ष नहीं छोड़ेगा तो हम इसको...
25/02/2022

83, श्री विष्णु पुराण (प्रह्लाद-चरित)(प्रथम अंश /अध्याय 17)

यदि हमारे कहनेसे भी यह विष्णुका पक्ष नहीं छोड़ेगा तो हम इसको नष्ट करनेके लिये किसी प्रकार न टलनेवाली कृत्या उत्पन्न करेंगे॥ ५२॥

श्रीपराशरजीने कहा—पुरोहितोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दैत्यराजने दैत्योंद्वारा प्रह्लादको अग्निसमूहसे बाहर निकलवाया॥ ५३॥

फिर प्रह्लादजी, गुरुजीके यहाँ रहते हुए उनके पढ़ा चुकनेपर अन्य दानवकुमारोंको बार-बार उपदेश देने लगे॥ ५४॥

प्रह्लादजी बोले—हे दैत्यकुलोत्पन्न असुर-बालको! सुनो, मैं तुम्हें परमार्थका उपदेश करता हूँ, तुम इसे अन्यथा न समझना, क्योंकि मेरे ऐसा कहनेमें किसी प्रकारका लोभादि कारण नहीं है॥ ५५॥

सभी जीव जन्म, बाल्यावस्था और फिर यौवन प्राप्त करते हैं, तत्पश्चात् दिन-दिन वृद्धावस्थाकी प्राप्ति भी अनिवार्य ही है॥ ५६॥

और हे दैत्यराजकुमारो! फिर यह जीव मृत्युके मुखमें चला जाता है, यह हम और तुम सभी प्रत्यक्ष देखते हैं॥ ५७॥

मरनेपर पुनर्जन्म होता है, यह नियम भी कभी नहीं टलता। इस विषयमें [श्रुति-स्मृतिरूप] आगम भी प्रमाण है कि बिना उपादानके कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती*॥ ५८॥

पुनर्जन्मप्राप्त करानेवाली गर्भवास आदि जितनी अवस्थाएँ हैं उन सबको दु:खरूप ही जानो॥ ५९॥

मनुष्य मूर्खतावश क्षुधा, तृष्णा और शीतादिकी शान्तिको सुख मानते हैं, परन्तु वास्तवमें तो वे दु:खमात्र ही हैं॥ ६०॥

जिनका शरीर [वातादिदोषसे] अत्यन्त शिथिल हो जाता है उन्हें जिस प्रकार व्यायाम सुखप्रद प्रतीत होता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रान्तिज्ञानसे ढँकी हुई है उन्हें दु:ख ही सुखरूप जान पड़ता है॥ ६१॥

अहो! कहाँ तो कफ आदि महाघृणित पदार्थोंका समूहरूप शरीर और कहाँ कान्ति, शोभा, सौन्दर्य एवं रमणीयता आदि दिव्य गुण? [ तथापि मनुष्य इस घृणित शरीरमें कान्ति आदिका आरोप कर सुख मानने लगता है]॥ ६२॥

यदि किसी मूढ पुरुषकी मांस, रुधिर, पीब, विष्ठा, मूत्र, स्नायु, मज्जा और अस्थियोंके समूहरूप इस शरीरमें प्रीति हो सकती है तो उसे नरक भी प्रिय लग सकता है॥ ६३

अग्नि, जल और भात क्रमश: शीत, तृषा और क्षुधाके कारण ही सुखकारी होते हैं और इनके प्रतियोगी जल आदि भी अपनेसे भिन्न अग्नि आदिके कारण ही सुखके हेतु होते हैं॥ ६४



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04,🚩 दोहावली 🚩   रामनाम - जपकी महिमा⚜️नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून।अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून॥🔅भावार्थ—श्...
21/02/2022

04,🚩 दोहावली 🚩
रामनाम - जपकी महिमा

⚜️नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून॥

🔅भावार्थ—श्रीरामजीका नाम अंक है और सब साधन शून्य (०) हैं। अंक न रहनेपर तो कुछ भी हाथ नहीं लगता, परंतु शून्यके पहले अंक आनेपर वे दसगुने हो जाते हैं (अर्थात् रामनामके जपके साथ जो साधन होते हैं, वे दसगुने लाभदायक हो जाते हैं), परंतु रामनामसे हीन जो साधन होता है वह कुछ भी फल नहीं देता॥ १०॥

⚜️नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥

🔅भावार्थ—कलियुगमें श्रीरामजीका नाम कल्पवृक्ष (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) है और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे तुलसीदास भाँगसे (विषयमदसे भरी और दूसरोंको भी विषयमद उपजानेवाली साधुओंद्वारा त्याज्य स्थितिसे) बदलकर तुलसीके समान (निर्दोष, भगवान् का प्यारा, सबका आदरणीय और जगत् को पावन करनेवाला) हो गया॥ ११॥

⚜️राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि।
तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि॥

🔅भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जीभसे रामनामका जप करके लोग पुण्यात्मा और परमसुखी हो गये; परंतु इस नाम-जपमें जो आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ समझो॥ १२॥
जय श्री राम 🚩



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अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।(श्रीमद्भागवतम्-9.4.63)यद्यपि मैं परम स्व...
21/02/2022

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।
(श्रीमद्भागवतम्-9.4.63)

यद्यपि मैं परम स्वतंत्र हूँ, किन्तु फिर भी मैं अपने भक्तों का सेवक बन जाता हूँ। वे मुझे अत्यंत प्रिय है और उनके प्रेम के कारण मैं उनका ऋणी हो जाता हूँ।" अर्जुन की श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में उसके रथ के सारथी बने जबकि अर्जुन यात्री के रूप में उस रथ के आसन पर सुविधापूर्वक बैठे हुए श्रीकृष्ण को निर्देश देता रहा।

🚩ॐ नमो नारायणाय🚩
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🚩02,भक्तराज ध्रुव🚩      🙏श्रीहरि: शरणम्🙏ध्रुव रोने लगे । यद्यपि वे बालक ही थे , तथापि उनमें क्षत्रिय - तेजकी कमी न थी । ...
20/02/2022

🚩02,भक्तराज ध्रुव🚩
🙏श्रीहरि: शरणम्🙏

ध्रुव रोने लगे । यद्यपि वे बालक ही थे , तथापि उनमें क्षत्रिय - तेजकी कमी न थी । उचित - अनुचित कुछ भी उनके मुँहसे न
निकला । उनकी आँखोंसे झर - झर आँसू बहने लगे । सुरुचिमें आसक्ति होनेके कारण उत्तानपाद भी चुप रह गये । उन्होंने न तो ध्रुवको गोदमें ही लिया और न समझाया ही । ध्रुव बहुत ही उदास होकर अपनी माता सुनीतिके पास आये । उस समय ध्रुवके आँसू सूख गये थे । उनका चेहरा कुछ तमतमा उठा था । उनके ओंठ फड़क रहे थे । माताने बड़े स्नेहसे उन्हें गोदमें बैठाकर पूछा – ' बेटा ! किसने तुम्हारा अपमान किया है ? तुम्हारा अपराध करना तो तुम्हारे पिताका अपराध करना है । बताओ , किससे तुम्हें दुःख पहुँचा
है ? तुम्हारे दुःखका कारण क्या है ? ' ध्रुवने सारी बातें कहीं । सुनीतिने लम्बी साँस लेकर कहा – ' बेटा ! सुरुचिका कहना सत्य है । मैं अभागिनी और तुम मेरी ही कोखसे पैदा हुए हो । यदि तुम पुण्यवान् होते तो दूसरे लोग तुम्हें इस प्रकार अपमानित नहीं कर सकते , परंतु तुम सुरुचिसे बुरा मत मानना । क्योंकि तुम एक ऐसी माताके गर्भसे पैदा हुए हो और उसके दूधसे पुष्ट हुए हो , जिसे महाराज अपनी पत्नी कहनेमें भी संकोच करते हैं । सौतेली माँ होनेपर भी सुरुचिने एक बात बड़े महत्त्वकी कही है । सत्य ही भगवान् की आराधना किये बिना तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण नहीं हो सकती । ' ध्रुवने अपनी मातासे बहुत - से बालसुलभ प्रश्न किये । उन्होंने पूछा – ‘ माँ ! जब तुम दोनों ही मेरी माँ हो , तब पिताजी सुरुचिसे ही अधिक प्रेम क्यों करते हैं ?

स्त्रोत : भक्तराज ध्रुव
गीता प्रेस गोरखपुर

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02, 🚩 दोहावली 🚩   (रामनाम-जपकी महिमा)⚜️चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत।राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत।।🔅भावार्...
20/02/2022

02, 🚩 दोहावली 🚩
(रामनाम-जपकी महिमा)

⚜️चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत।।

🔅भावार्थ—श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी चित्रकूटमें सदा-सर्वदा निवास करते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे राम-नामका जप जपनेवालेको इच्छित फल देते हैं॥ ४॥

⚜️पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास॥

🔅भावार्थ—छ: महीनेतक केवल दूधका आहार करके अथवा फल खाकर राम-नामका जप करो। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसा करनेसे सब प्रकारके सुमंगल और सब सिद्धियाँ करतलगत हो जायँगी (अर्थात् अपने-आप ही मिल जायँगी)॥ ५॥

⚜️राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥

🔅भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर राम-नामरूपी (हवाके झोंके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय) मणिदीप रख दो (अर्थात् जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह)॥ ६।
जय श्री राम 🚩



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01,ऐसा को उद्वार जग माही (कल्याण)पट्टमहिषि सत्यभामा चित्रशालामै दर्शिकासे प्रेत्येक चित्र का परिचय मनोयोगसे सुन्ति जाति ...
19/02/2022

01,ऐसा को उद्वार जग माही (कल्याण)

पट्टमहिषि सत्यभामा चित्रशालामै दर्शिकासे प्रेत्येक चित्र का परिचय मनोयोगसे सुन्ति जाति थी | सहसा वे ऐक चित्र के सामने रुकी | चित्र को देखकर विस्मय विमुग्ध वे हठात बोली - प्रभु के समीप बेठी हुइ देवी कॉन हैं, चित्रा ? मैंने इनहे कभी नहीं देखा था | साथ ही यह चरनो मैं कोन बेठा है?

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