Balaghat HALP GROUP

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ॐ तृयम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनं उर्वारुकमिव बंधनार्थ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात
08/03/2024

ॐ तृयम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनं उर्वारुकमिव बंधनार्थ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात

20/02/2019

मेरी कीमत क्या है ? (व्यंग्य)

हम ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो शिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रश्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रश्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाँँ में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाँँ में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाँँ हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’ उन्होंने हमारे प्रश्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ? ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते होंगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोशिश करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो , मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों को धोखा दे कर चुने जाते है और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

आलोक मिश्रा
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ब्बरू

मेरी कीमत क्या है ? (व्यंग्य)

हम ठहरे एक आम आदमी ........नहीं ... नहीं , जनता..... अरे......नहीं...... फिर राजनैतिक हो गया । खैर आप तो समझ ही गए है कि हम और आप एक जैसे है । अब हमारे नामों पर ही राजनैतिक दल चलने लगे है जिन्होंने हमारा ही नाम बदनाम कर दिया है । तो साहब अब अपने जैसे लोगों को अक्सर ही झोला ले कर बाजारों में देखा जा सकता है । हम भी एक दिन ऐसे ही बाजार में झोले के साथ विचरण करते हुए कुछ सस्ता और सस्ता खोज रहे थे । हमारी मुलाकात जुम्मन भाई से हो गई । जुम्मन भाई आलू और प्याज का धंधा करते है । दुआ सलाम के बाद वे बोल पड़े ‘‘ मिश्रा जी हमारी कीमत क्या है ? ’’ हम तो अचकचा ही गए । सोचने लगे ‘‘हमारी कीमत ....... ।’’ हम जब तक जवाब देते उन्होंने उसके पहले ही दूसरा सवाल दाग दिया ‘‘ अच्छा आप तो षिक्षक हो , वो भी गणित के , ये बताओ सौ करोड़ में कितने शून्य होते है ? ’’ हम मन ही मन शून्य गिनने में लग गए । जुम्मन भाई शायद आज किसी भी सवाल का जवाब सुनने के मूड में नहीं थे । वे किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता के समान ही केवल और केवल प्रष्न पूछना चाह रहे थे । वे आगे बढ़ कर और प्रष्न मेरी ओर उछालने लगे ‘‘ आप समाचार सुनते हो क्या ? ’’ इसमें सोचना क्या था, बस हमने अपना सिर हाॅं में हिला दिया । वे बोले ‘‘तो आपने सुना तो होगा ही चुनाव के बाद विधायक सौ करोड़ में बिक रहे है ।’’ हमने भी ईमानदारी से अपना सर फिर हाॅं में झटक दिया । वे अब अपनी लय में बोलने लगे ‘‘ बताईए वो चुनाव के पहले अपने आपको ईमानदार बताते है ,वोट हम ड़ालते है और वो जीतते है, फिर बिक जाते है । यहाॅं हम और आप है झोला ले कर बाजार में घूमते रहते है । ’’ मै बोल ही पड़ा ‘‘ तो आप ही बताओ क्या करना चाहिए ? ’’ उन्होंने हमारे प्रष्न को जैसे अनसुना ही कर दिया आखिर उन पर प्रवक्तापन जो सवार था । वे बोले ‘‘ अब आप ही बताओ आप की कीमत क्या है ? ’’ मै अपनी कीमत आंकता उसके पहले ही उन्होने बता दी ‘‘ दो कौड़ी की .........कोई आपको हजार दो हजार में न खरीदे । ’’ हमें अपनी कीमत जान कर बुरा लगा । हमने बुरा सा मॅुह बनाया तो शायद वे समझ गए वे बोले ‘‘ अरे ..... आप बुरा न मानें लेकिन आपकी और हमारी यही कीमत है । माना आप कुछ हमसे अधिक ही कमाते हांेगे लेकिन आपको और हमको कौन खरीदेगा ? बस हमारी कीमत दो कौड़ी की ही है । ’’ जब उन्होने अपने आपको भी हमारे साथ शामिल किया तो हमारे अहम् को संतुष्टि मिली । वे बोले जा रहे थे ‘‘ हम तो अच्छे लोग है और अच्छा कौन होता है ? वही न जो दूसरों के लाभ का कारण बने । बस हम भी अच्छे बन कर इनके लाभ के लिए वोट ड़ाल आते है और वो है जो लाभ कमाते है । ’’ हम सोचने लगे हम जैसे लोगों के पास विकल्प ही क्या है ? हर बार बेईमानों में से किसी कम बेईमान को चुनने की कोषिष करो और फिर उससे ये अपेक्षा करो कि वो हमारे हित में काम करेगा । जुम्मन भाई सही है जो अब अपनी कीमत पूछने लगे है । उन्होंने तो मुझे भी मेरी कीमत बता दी । मैनें बात बदलने के लिए उनसे पूछा ‘‘ जुम्मन भाई आलू क्या भाव है ?’’ वे बोले ‘‘ आलू के भाव वही है जो कल थे , आपकी हमारी ही तरह । भाव बदले है तो केवल उनके । ’’ हमें लगने लगा आज वे सौ करोड़ के सदमे से बाहर नहीं निकलने वाले । हमने उनसे आलू तौलने को कहा । वे आलू तौलते हुए बोले जा रहे थे‘‘ अब तो साहब हमें भी अपनी कीमतें तय ही कर लेनी चाहिए । अबकी चुनाव आने दो , मैने अपनी कीमत न उन्हें बताई तो मेरा नाम भी जुम्मन नहीं । ’’ हम आलू तो ले आए लेकिन सोचते रहे क्या वो लोग सही है शराब और पैसे में बिक कर उन्हें चुनते है और फिर उन्हें मौका देते है बिकने का ? या वो लोग सही है जो जुम्मन जैसों को धोखा दे कर चुने जाते है और खुद बिक जाते है ? इस मंड़ी मे सब खुले आम होता है हो सकता है सब सही हों ? इस पूरे नाटक में यह भी तो सही है कि मेरी कीमत दो कौड़ी की है ।

आलोक मिश्रा

16/02/2019

पांड़े जी की सायकिल

अब साहब आपका पूछना जायज ही होगा कि पांडे जी कौन ? आपने पूछ ही लिया है तो हम बताएं देते है। पांडे जी हमारे शहर की कोई नामचीन हस्ती तो है नहीं। दुबली सी काया के मालिक, कभी पेंट शर्ट तो कभी पजामा कुर्ते में शहर में दिखाई दे जाते है। उनकी खासियत यह है कि वे कभी अकेले नही होते। उनके साथ हमेशा ही उनकी सुख-दुःख की साथी ......सायकिल होती है। उनकी सायकिल उनकी दिलरूबा है, प्रेमिका है और प्रयशी भी है। मजाल है उनकी सायकिल पर एक किचड़ का धब्बा भी दिखाई दे। कपड़ा उनकी सायकिल में हमेशा ही होता है। वे कभी भी कहीं भी अपनी सायकिल को पोछ कर सजाने संवारने में परहेज नहीं करते। मजाल है उनकी सायकिल से एक भी आवाज आ जाये, बस वे खुद ही खोल कर बैठ जाते है सुधारने के लिये। सायकिल क्या है एक चलता-फिरता कारखाना, सायकिल के पीछे लगे बक्से में पंचर सुधारने के सामान से लेकर हर प्रकार के औजार हमेशा ही मौजूद रहते है। जहाॅं जरूरत पड़ी कारखाना चालू।

पांडे जी अपनी सायकिल की सुरक्षा का भी खास ध्यान रखते है। एक ताला तो है ही, अक्सर वे चैन के साथ लगा हुआ एक ताला और लेकर चलते है। सुरक्षा की दृष्टि से किसी खम्भे, हुक या किसी अन्य वाहन से बांधना नही भूलते । वैसे पांडे जी अमूमन तो वहां अपनी सायकिल खड़ी ही नहीं करते जहाॅं आम तौर पर खड़ी की जाती है जैसे वे किसी कार्यालय में हुए तो उस खिड़की के पास जहाॅं उनका काम है सायकिल पाई जाती है । किसी के घर जाने पर बैठक कमरे से सीधे दिखने वाले स्थान पर ही उनकी सायकिल मौजूद होती है। वे अपने घर में शयन कक्ष में ही सायकिल को रखते है या यूं कहें कि सायकिल के साथ ही शयन कक्ष में सोते है।

ऐसा भी नहीं कि पाण्डे जी मोटर सायकिल या स्कूटर नहीं ले सकते। धर्म पत्नी की समझाईश पर मोटर सायकिल ले भी ली है लेकिन उन्हें तो सायकिल से ही मोहब्बत है। अब आपको लग रहा होगा कि पाण्डे जी की सायकिल वाले इस किस्से में कोई नाटकीय मोड आयेगा। आप बिल्कुल सही है। इस किस्से में अहम मोड़ तब आया जब सारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद उनकी सायकिल भरे बाजार से चोरी हो गई। बेचारे पाण्डे जी ......उनके तो आंसू ही निकल गये। जिस खम्भे से सायकिल को चैन के साथ बांधा था वहाॅं अब केवल चैन थी बिना ताले की। वे पहले घर गये और मोटर सायकिल से थाने पंहुच कर रिपोर्ट लिखवाई । थानेदार से पूछा ‘‘साहब कब तक मिलेगी ?’’ थानेदार बोला ‘‘आप कैसे आये थे ?’’ पाण्डे जी बोले ‘‘ मोटर सायकिल से...’’ थानेदार बोला ‘‘ आपका काम तो चल रहा है न। ’’ पाण्डे जी समझ गये इन तिलों से तेल नहीं निकलेगा। पन्द्रह दिन बीत गये सायकिल न मिलनी थी और न मिली ।

एक दिन पाण्डे जी को तहसील आफिस के सामने एक काला सा लड़का किसी दूसरे की सायकिल के ताले से छेड़छाड़ करता हुआ दिखा। पाण्डे जी दबे पांव पहुंचे और उसे दबोच लिया। वो गिड़गिड़ाने लगा तो पाण्डे जी बोले ‘‘मै तुझे छोड़ दुंगा तू मुझे मेरी सायकिल दिला दे। ’’ चोर जिसका नाम कालू था बोला ‘‘ आप बताओ आपकी सायकिल कब और कहाॅं से चोरी हुई थी।’’ पाण्डे जी ने विस्तार से सायकिल चोरी का वृतांत बताया। कालू ने सिर खुजलाया और बोला ‘‘ वो .....वो ......वो.......इलाका तो भण्डारी का है भण्डारी के लोगों ने ही आपकी सायकिल उठाई होगी। पन्द्रह दिन हो गये तो अब तक तो वो बार्डर पार भी हो गई होगी।’’ पाण्डे जी बोले ‘‘ मै कुछ नही जानता मुझे तो बस मेरी सायकिल चाहिए।’’ कालू बोला ‘‘तो चलो प्रदेश के बार्डर पर चलते है।’’

पाण्डे जी और कालू बार्डर पर भण्डारी से मिले। भण्डारी ने पाण्डे जी को गौर से देखा जैसे उन्हें परख रहा हो फिर बोला ‘‘ चलो पंडित जी हमारे गोदाम में देखते है।’’ अब पाण्डे जी जहाॅं खडे़ थे वहाॅं सायकिलों, मोटर सायकिलों और स्कूटरों की सैकड़ों मे कतारंे लगी थी। ये सारे वाहन यहाॅं-वहाॅं से चुराकर लाये गये थे और आगे बिक्री के लिये तैयार थे। भण्डारी बोला ‘‘ देख लीजिए आपकी कौन सी सायकिल है।’’ पाण्डे जी ने बहूत ढूंढा पर उनकी सायकिल नही मिली। तब भण्डारी बोला ‘‘ अब पंडित जी आप कोई भी सायकिल, मोटर सायकिल या स्कूटर हमारी ओर से लेकर जाइये।’’ पाण्डे जी बोले ‘‘ नहीं ......हमें तो हमारी ही सायकिल चाहिए।’’ भण्डारी ने फिर एक बार उनसे चोरी का वृतांत पूछा। फिर बोला ‘‘ अच्छा बाजार में खम्भे से चैन के साथ बंधी थी वो वाली ।’’ पाण्डे जी झट से बोले ‘‘ हाॅ... हाॅ.. वही ।’’ भण्डारी बोला ‘‘ वो .....वो तो बिक गई...थानेदार के भाई के पास है। चलिये.... हम उन्हें दूसरी देकर आपकी आपके पास पहुंचा देंगे। ’’

पाण्डे जी की रात आॅखो-आॅखो में कटी। सुबह उनकी सायकिल लावारिस हालत में बिना सुरक्षा के दरवाजे पर खड़ी मिली । पाण्डे जी खुशी से रो ही पड़े। वे सायकिल से ऐसे मिले जैसे बिछड़ा हुआ आशिक अपनी महबूबा से मिलता है।

आलोक मिश्रा

12/10/2018

चूहा घोटाला ( व्यंग्य)

फाईल मंत्रालय में मंत्री जी को ज्ञात हुआ कि पुराने घोटाले की एक फाईल को चूहों ने कुतर दिया , केवल इतना ही होता तो ठीक था परन्तु चूहों ने एक कमीशन की फाईल को भी नहीं छोड़ा । मामला गंभीर था इसलिए चूहा मंत्रालय को सूचित किया गया । चूहा मंत्री जो केवल जातिय समन्वय हेतु मंत्री थे, को कुछ काम मिल गया । चूहा मंत्री ने अपने एक कार्यकर्ता को इस काम हेतु उपयुक्त पाया क्योकि वो दिन भर में दो-चार लोगों से मारपीट तो करता ही था । अब जो आदमी मारने से नहीं हिचकता चूहे तो मार ही सकता है । बस उसे चूहे मारने का ठेका दे दिया गया ।

एक हफ्ते में मंत्रालय के सवा तीन लाख चूहे मारे गए , याने एक मिनट में लगभग तीन सौ चूहे । यह बात मंत्री जी को बिल से मालूम चली । मंत्री जी को चूहों की संख्या पसंद आई लेकिन बिल की राशि नहीं । उन्होने राशि को देखते हुए इस अभियान को एक हफ्ते के लिए बढा दिया । अब चूहे भी दुगने थे और राशि भी । फटाफट भुगतान हुआ , सबने अपना - अपना हिस्सा लिया और सब खुश हो गए । इतने सारे चूहे मारे जाने की खबर जब बिल्लियों को लगी तो वे नाराज हो गई । इतने चूहे मरे और उन्हें एक भी नसीब नहीं हुआ । बस उन्होने बवाल खड़ा कर दिया । बिल्लियों के अपने चैनल और अखबार थे । वे चूहा घोटाला पर अखबारों में छापने लगी और चैनलों पर विवाद करने लगी । मामला संगीन होता गया । आखिर मुख्यमंत्री को जाॅच की बात स्वीकारनी पड़ी । चूहा मंत्री मान रहे थे कि इतने चूहे मारे गए है । वहीं फाईल मंत्री कह रहे थे कि इतने चूहे मरे है या नहीं उन्हें नही मालूम लेकिन प्रति चूहा एक चूहा मार गोली क्रय की गई है , जिसका बिल लगा है ।

कुछ राष्ट्रभक्त कुत्ते भी थे । वे बिल्लियों से अलग सोच रखते थे । उनका मानना था कि पाॅच-छः लाख तो चूहा घोटाले में चले ही गए , अब यदि इसकी जाॅच की जाती है तो पचास-साठ लाख जाॅच घोटाले में भी जा सकते है । वे मानते थे कि हर बात की जाॅच करना गलत है । ऐसे मामलों में मंत्री जी को खुद ही स्वयम् को साफ सुथरा घोषित कर देना चाहिए । मुख्यमंत्री को आने वाले चुनावों की फिक्र थी इसलिए वे अपने आपको और मंत्रियों को बेदाग साबित करना चाहते थे । उन्होने निष्पक्ष जाॅच कुत्तों को सौप दी । जाॅच समिति के समक्ष अनेक प्रष्न थे । क्या चूहे मारना आवश्यक था ? क्या इतने ही चूहे थे ? क्या सही में इतने ही चूहे मारे गए ? चूहे मारने की विधि क्या थी ? मारे गए चूहों की डेडबाॅडी का क्या हुआ ? आदि ..........आदि ।

जाॅच समिति अपनी जाॅच में जुट गई । जाॅच समिति ने फाईल मंत्री , चूहा मंत्री से लेकर बिल्लियों और बचे हुए चूहों तक के बयान लिए । चुनाव को देखते हुए जाॅच समिति को रिपोर्ट जल्दी देनी थी । बस आनन- फानन में रिपोर्ट तैयार हो गई । जाॅच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ‘‘ मंत्रालय में चूहों की संख्या बहुत बढ़ गई थी । ये चूहे पूराने सत्ता रूढ दल के समर्थक थे इसलिए वे उनके द्वारा किये गए घोटालों की फाईलों को चुन -चुन कर खा रहे थे । भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इन चूहों को मारना जरूरी था । इन चूहों को मारने के लिए बहुत ही अनुभवी व्यक्ति को यह कार्य सौपा गया था । इस अनुभवी व्यक्ति पर पूर्व से ही दस हत्या के आरोप है अतः उसके अनुभव पर शक नहीं किया जा सकता ।

चूहों को मारने की प्रक्रिया बहुत ही वैज्ञानिक थी । इसके लिए पहले सर्वे किया गया और चूहों की गिनती हो गई । इसके बाद चूहों को मारने के लिए गोलियों का क्रय किया गया । अब सभी चूहों की एक आमसभा माननीय चूहा मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित की गई । इस आयोजन में चूहों को राष्ट्रहित में बलिदान करने हेतु प्ररित किया गया । उन्हे गोली देने के पहले बताया गया कि गोली तीस मिनट में असर करेगी अतः गोली खाने के बाद उन्हें मरने से पहले समुद्र तक पहुॅच कर उसमें कूदना है । इससे वे मरते- मरते भी स्वच्छता अभियान में भागीदारी भी कर सकेंगे और देष हित में उनकी डेडबाडी को फेकने का खर्च भी बचेगा ।

इस पूरी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यह काम राष्ट्रहित में पूरी मितव्ययता और ईमानदारी से किया गया । भ्रष्टाचार मिटाने के लिए यह कार्यवाही आवष्यक थी । रही बात बिल्लियों की तो वे राष्ट्रविरोधी है । बिल्लियों पर अलग से कार्यवाही की जानी चाहिए । ’’ सरकार इस रिर्पोट से खुश है और अब बिल्लियांे को मारने की योजना बना रही है ।

आलोक मिश्रा

06/10/2018

लोटन का शौचालय (व्यंग्य कथा)

एक गाँव में एक बुजुर्ग रहते थे, नाम था लोटनलाल। पहले उनका भरा-पूरा परिवार था। फिर धीरे-धीरे सब साथ छोड़ते गए, कुछ मौत के कारण और कुछ लोग शहर की ओर दौड़ के कारण। आज लोटन छोटी-सी झोपड़ी में अकेले रहते हैं। दिन में एक पंप के सहारे हवा भरते तथा पंचर बना कर अपने पेट का जुगाड़ कर लेते हैं। अब लोटन खाते हैं तो जाना भी होता है। वे हमेशा ही लोटा लेकर निकल जाते हैं। सुबह शाम की सैर की सैर और काम का काम। एक दिन सुबह सूरज निकलने से पहले वे नित्यक्रिया हेतु लोटा लेकर सड़क के किनारे बैठे थे। अचानक किसी ने टार्च की रोशनी उन पर डाली। वे हड़बड़ा कर खड़े हो गये। टार्च के उस ओर गाँव के गुरूजी थे। वे बोले ‘‘क्या गुरूजी.....मजाक करते हो।’’ गुरूजी बोले ‘‘मजाक तो हमारे साथ हो रहा है हमें तो यह देखने की ड्यूटी मिली है कि कौन-कौन गाँव को गंदा करता है।’’ लोटन बोले ‘‘गुरूजी अब आप ही बताओ खायें यहाँ और गंदा करने दूसरे गाँव जायें क्या ?’’

लोटन को बातों-बातों में यह मालूम हुआ कि उनक गाँव अब स्वच्छ गाँव हो गया है। ऐसे गाँव में सबके घरों में संडास याने शौचालय बन गये होते हैं, ऐसा माना जाता है। लोटन उसी दोपहर में पंचायत गया और पता किया तो मालुम हुआ कि गाँव में सभी घरों में शौचालय बन चुके हैं। लोटन सोचने लगा ‘‘ये भूल गये होंगे मेरे घर में बनाना।’’ उसने प्रधान से पूछा ‘‘मेरे घर में शौचालय कब बनाओगे ?’’ प्रधान बोले ‘‘दादा सठिया गया है क्या....... तुम्हारे घर में तो बन भी गया है।’’ लोटन को लगा शायद प्रधान ही सही होगा। उसने घर आकर झोपड़ी के आस-पास शौचालय खोजने का बहुत प्रयास किया परन्तु होता तो मिलता ना। वो फिर प्रधान के पास गया ‘‘प्रधान जी शौचालय तो नहीं है वहाँ..........आप लोगों ने कहाँ बनवाया है बता देते तो........।’’ प्रधान बोला ‘‘क्या दादा अब हमारे ये दिन आ गये कि हम तुम्हें शौचालय दिखायें, जाओ और ढूंढ लो।’’ लोटन का अब लगने लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है।

लोटन ने गाँव में पता किया तो और बहुत से घर थे जहाँ शौचालय नहीं बने थे। प्रधान के कागज पर बने थे। अब गाँव स्वच्छ होता तो कैसे ? लोटन पुरानी सातवी तक पढ़े थे सो अपने शौचालय का आवेदन लेकर तहसील पहुँच गये। दो-तीन दफ्तरों में धक्के खाने के बाद पता लगा कि कौन अफसर इसके लिए जिम्मेदार है। लोटन ने अफसर को अपनी समस्या बताई। अफसर मुस्कुराये, फिर एक बाबू से गाँव की फाईल बुलवाई। अफसर बोले ‘‘लोटन पिता महेतलाल तुम्हारे यहाँ तो बन गया है ना।’’ लोटन ने न में मुंडी हिलाई और बोले ‘‘नहीं साहब नहीं बना है।’’ अफसर और बाबू धीरे-धीरे बात करने लगे। लोटन के कुछ शब्द सुनाई दिये जैसे ठेका, ठेकेदार और मंत्री का साला। अफसर ने कहा ‘‘अच्छा हम देखते हैं क्या हो सकता है।’’ कई महिने बीत गये कुछ नहीं हुआ। अब लोटन ने जिले की ओर रूख किया, दृश्य वैसा ही था वही बाबू, वही फाईल, वही फूसफूसाहट और वही जवाब।

लोटन अब तक अनेकों दफ्तरों में अपने घर का शौचालय मांगने जा चुका है। जहाँ वो जाता है उसे फर्स और दिवारें तो साफ-सुथरी दिखाई देती है परन्तु वो फुसफुसाहटों की गंदगी को महसूस करता है। उसे लगता है कि कुछ लोगाें को यह अच्छा नहीं लगता कि आम आदमी सड़क के किनारे बैठकर गंदा करे। भले ही वे कुर्सी पर बैठकर वह सब करते रहें। लोटन को अब अपने घर के अलावा सभी कुर्सीयों अपना शौचालय दिखाई देता है।

आलोक मिश्रा

06/10/2018

भगवान फॅस गए.....

हमारे रामलाल जी हमेशा ही परेशानियों में रहते है । कुछ लोगों कहते है कि उनका और परेशानियों का चोली-दामन का साथ है तो कुछ लोग रामलाल को पैदायशी परेशान आदमी मानते है । रामलाल भी ऐसे कि अब वे छोटी-छोटी बातों पर भी परेशान हो जाते है ; आज घर में अखबार नहीं आया .... परेशानी , घरवाली ने सब्जी लाने को कह दिया ....... परेशानी और तो और आफिस में बाॅस ने अभिवादन का जवाब नहीं दिया....... परेशानी । रामलाल जिदंगी क्या है पूरी की पूरी परेशानियों का मकड़जाल है । ये अलग बात है कि कुछ परेशानियाॅ वास्तविक है और कुछ आभासी है । वैसे रामलाल किसी भी आम आदमी की ही तरह अपनी परेशानियों के लिए स्वयम् से अधिक अपने भाग्य और ग्रह नक्षत्रों को दोषी मानते है । बस ऐसे ही परेशान लोगों के लिए ही कई दरबार खुले होते है । रामलाल भी कभी एक दरबार में माथा टेकता तो कभी दूसरे में ।

रामलाल अपनी परेशानियों को किसी रोग की ही तरह मानता है जिन्हे यदि एक ड़ाॅक्टर ठीक नहीं कर पाया तो शायद दूसरा ठीेक कर दे । इस आशा में रामलाल कभी गंडे-ताबीज बांधता तो कभी रत्नों की अंगूठीयाॅ धारण करता । रामलाल को एक बाबा ने बताया कि रात को घर के दरवाजे खुले रख कर सोया करो । उसने किया .....चोरों का लाभ हो गया और रामलाल की परेशानियाॅ और बढ़ गई । उसे एक बााबा ने पाॅच हजार रुपये ले कर बताया कि रोज चार समोसे खाया करो कृपा आने लगेगी । रामलाल ने पूरी आस्था और विश्वास के साथ समोसे खाने के इस धर्मिक अनुष्ठान को दस दिनाें तक किया फिर दस दिनों तक सरकारी अस्पताल में भर्ती रहे ।

बेचारे रामलाल परेशानियाॅ पीछा छोड़ें तो कैसे ... कोई अच्छा गुरु ,भगवान या बाबा तो मिले । फिर उन्हें किसी ने भगवान बाबा का नाम बताया । भगवान बाबा के विषय में कहा जाता है कि वे जो कह देते है वही होता है । भगवान बाबा मानव की लीला करने के लिए मानव की देह में भगवान ही पैदा हुए है । भगवान बाबा के चरणों में बड़े-बड़े मंत्री-संत्री भी झुकते है । कहा तो यहाॅ तक जाता है कि भगवान बाबा के आर्शिवाद से कुछ राज्यों की सरकारें भी चल रही है । रामलाल को लगा कि शायद ये ही वे भगवान है जो उसके जीवन की परेशानियों का दूर कर सकते है । रामलाल ने इस बार परखने के लिए एक ही परेशानी बताने का निश्चय किया ।

भगवान के दरबार में हजारों भक्त थे । सब पहले से ही अपने नाम पते लिखवा कर अपने लिए निर्धारित स्थान पर बैठे थे । मंच पर भगवान किसी भजन की धुन पर कुछ गोपीयों के साथ नाच रहे थे । जब वे रुके तो वहीं से इषारा करते हुए आवाज लगाई ‘‘ रामलाल .........ओ.......... रामलाल ।’’ रामलाल चमत्कृत हो गया भगवान ने उसे बुलाया इतने सारे लोगों में ........चमत्कार ....... चमत्कार । रामलाल ने मंच पर ही सब के सामने अपनी परेशानी बताई । भगवान बाबा बोले ‘‘ जा सात दिन में सब ठीक होगा । ’’ रामलाल की वह परेशानी सात दिनों में संयोग से जाती रही ।

रामलाल अब भगवान बाबा का अनन्य भक्त है । उसके लिए भगवान से भी बढ़ कर अब भगवान बाबा है । अब वो अक्सर भगवान बाबा के आश्रम जाता दो-चार दिन ए.सी. कमरों में मुफ्त में रुकता , अच्छा भोजन करता वो भी मुफ्त में और प्रवचन सुन कर अपने आप को परेशानियों से मुक्त होता हुआ पाता । भगवान बाबा के फोटो, प्रवचन और साहित्य अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा हो गए है ।

फिर पता लगा कि भगवान बाबा पर कोई केस 15-20 सालों से चल रहा था । अब उसका फैसला होने वाला है । रामलाल ने सोचा ‘‘ सबको नेक रास्ता दिखाने वाले भगवान गलत काम कैसे कर सकते है ? भगवान को सजा कैसे हो सकती है ? हो भी जाए तो भगवान अपना स्वरुप दिखा ही देंगे । ’’ भगवान बाबा ने अपने भक्तों को दिलासा दी और बताया कि वे निर्दोष है लेकिन मानव लीला तो करनी ही होगी । फैसले का दिन भी आ गया । भक्तों को अपने भगवान पर भरोसा था लेकिन भगवान को अपने ऊपर नहीं था । भगवान को अपने बारे में सब मालूम था वे जानते थे कि सब के सामने भगवान रुप धर कर घूमने वाला वो कभी भी आपने जीवन में तुच्छ मानव से ऊपर नहीं उठ पाया । वो जानता है उसे उसके केवल एक ही पाप की सजा मिल रही है ऐसे और न जाने कितने जिन्हें प्रमाणित भी नहीं किया जा सकता ।

आखिर फैसला आ ही गया भगवान को फंसना था और वे फंस ही गए । लाखों भक्तों को गहरा आघात लगा । वो जिस भोलेपन से उसे भगवान मान रहे थे अचानक वो भगवान ,भगवान न रहा । भगवान तो अब जेल में निवास करते है । सब ओर उनके किस्से आम है । परन्तु रामलाल जैसे भक्तों की ओर किसी ने देखा तक नहीं । रामलाल जिसे अपनी परेशानियों में रोने के लिए भगवान की आवश्यकता है अब वो फिर भगवान विहीन हो गया है । अब उसकी सारी परेशानियों से भी बड़ी परेशानी है कि उसके पास भगवान नहीं है । करोड़ों भगवान वाले देश में तब तक भगवान बाबा पैदा होते रहेंगे जब तक रामलाल अपने लिए एक अदद भगवान ढूढता रहेगा ।

आलोक मिश्रा









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10/04/2015

ब्रेकिंग न्यूज - रामलाल देष छोड़ेगा

अभी-अभी मिले समाचार के अनुसार रामलाल जी देष छोड़ने पर विचार कर रहे है । हमारे रामलाल जी आजकल बहुत परेषान है । आप रामलाल को को तो जानते ही होगे , अरे.. वही षिक्षक जो कभी - कभी उलजलूल लेख भी लिखता है ; अरे .. वही जो बा्रम्हण होकर भी जातिवाद को नहीं मानता ; अरे भाई ... वही जो अक्सर ही सामाजिक कार्यक्रमों में घुटे सर के साथ दिखाई दे जाता है। वे अब परेषान है कारण, वे सोचते है कि उन्हें हर कोई तीन वजहों से गालीयाॅं देता है ; पहला उनका षिक्षक होना ,दूसरा उनका लेखक होना और तीसरा उनका ब्राम्हण होना । देखा जाए तो वे इस असांप्रदायिक देष में तीनों बेचारी और निरीह प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करते है । देष में षिक्षकों का सम्मान केवल एक दिन पोले और नागपंचमी की तरह होता है; बाकी समय इन पावन पर्वों से जुडे जन्तुओं की ही तरह व्यवहार ही अधिक होता है । पैदा होने पर उनका कोई बस न था , सो वे ब्राम्हण के रुप में पैदा हो गए । वे सोचते है कि उनके पास पैदा होने का विकल्प होता तो वे आज षिक्षक न हो कर किसी बड़े पद पर बैठे मलाई छान रहे होते । खैर .. वे अब जो है इसमंे उनका क्या दोष ? वे दुखी है क्योकि कुछ लोग ब्राम्हणों को पानी पी पी के कोसते है ; ऐसे लोगों के साहित्य से यदि केवल ब्राम्हण शब्द ही निकाल लिया जाए तो पढ़ने को कुछ भी न बचे । वे तो बस गालीयाॅं खाते हुए अपनी सांप्रदायिक सद्भावना का परिचय देते रहते है ।

रही लेखक होने की बात तो इससे रामलाल सबसे अधिक भयभीत रहते है । जो वे सोचते है वही लिखें तो उन्हें बचाने वाला भी कोई न होगा और न लिखें ; ऐसा कैसे हो सकता है ? वे बेचारे लेखक बन कर भी फंस गए । अब उन्हें लोग गली चैराहों पर विषय बताते है और लिखने को कहते है । ऐसा नहीं वे लिखते भी है मगर दो खुष होते है तो चार नाराज हो जाते है । अब उनसे मिल कर नेता और उनके चमचे कहते है कि सम्हल कर लिखना नही ंतो .... ।

बेचारे रामलाल इन कारणों से परेषान तो थे ही फिर पहले शाहरुख भाई और बाद में कमल हासन ने देष छोड़ कर जाने की बात कर दी । रामलाल तो पहले से ही देष की दषा ,दिषा और दुर्दषा से दुखी थे उन्हें भी लगने लगा कि ‘‘ जिस देष में महिलाऐं सुरक्षित न हों । जहाॅं सरकारें जातिवाद को बढावा देती हो । जहाॅं जनता केवल एक मषीन का बटन दबाने वाली दूसरी मषीन हों । जहाॅं सांप्रदायिकता के मायने हर सांप्रदाय के लिए अलग-अलग हो । वहाॅं निवास करना खतरे से खाली नहींे होता । ’’

रामलाल नेताओं के भाषणों में बीज तत्व खोजने का प्रयास करते है जो पिछले साठ सालों से भूख , गरीबी ,बेरोजगारी और भ्रष्टाचार समाप्त करने का वादा करते आ रहे है । वे केवल वादे करते है , राज करते है और समस्याऐं वैसी की वैसी रह जाती है । इन समस्याओं से तो रामलाल को ही जूझना पड़ता है । अब रामलाल को लगने लगा है इस देष में नहीं तो कहींे और इन समस्याओं का हल अवष्य होगा । अब रामलाल देष को नेताओं के हवाले कर के देष छोड़ना चाहता है । रामलाल को लगता है कि देष में बोलने की आजादी है ... केवल नेताओं और बाबाओं को ।आम जनता के लिए बोलना तो दूर कराहना भी दूभर है ।

साहित्य और कला की समझ न रखने वाले लागों को कौन बताए जिस देष में नेताओं को टिकट , नौकरीयाॅं और दंगे जाति आधारित होते हांे । वहाॅं नायक और खलनायक की भी जातियाॅं होना ही है । ऐसे में कहानी को कहानी की तरह से न देख कर कुछ रुढीवादी कठमुल्ले सभी को जातियों में बाॅंट कर देखते है । यहीे से तुष्टिकरण की की राजनीति के चलते नेताओं की सियारी हुआ... हुआ प्रारम्भ होता है । रामलाल को लगता है कि मकबूल फिदा हुसैन , सलमान रषदी , जूलियन आसांज और तसलीमा नसरीन की तरह ही उसका चरित्र भी विवादित हो उससे पहले उसे देष छोड़ देना चाहिए ।

रामलाल ने सोचा कि वो भी इस बात की घोषणा करेगा कि वो देष छोड़ रहा है । उन्हे यह लगता था कि इस घोषणा के बाद वे ब्रेकिंग न्यूज बन जाएगा । उसने अपने छोटे से शहर में पत्रकार वार्ता बुलाई । कुछ पत्रकार आए भी चाय नाष्ते के साथ विज्ञप्ती ली और चले गए ।अधिकांष अखबारों ने छापा ही नहीं कुछ ने बहुत सारे विज्ञापनों के बीच छोटी सी जगह पर छापा । इस समाचार पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई , कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं और कोई वाद विवाद नहीं । फिर रामलाल का जोष भी धीरे-धीरे कम होने लगा । वो इन बड़े नामी लोगों की तरह अमीर भी तो नहीं है । जब उसे एक शहर से दूसरे शहर जाना होता है तो वो चार बार सोचता है । जब उसे कोई नेता दूसरे शहर में तबादले की धमकी देता है ता ेवो चरणवंदन करने लगता है । सबसे बड़ी बात छोटी-मोटी ही सही यहाॅ नौकरी तो है । फिर सभी रामलाल देष छोड़ देंगे तो भाषण ,चुनाव और वादों का क्या होगा ? रामलाल को भरोसा है कभी तो भाषण में उसका जिक्र होगा ; कभी तो सच्चे वादे होंगे । अब रामलाल देष नहीं छोड़ेगा क्योंकि

जीना यहाॅं मरना यहाॅं

इसके सिवा जान कहाॅं ।

आलोक मिश्रा

02/03/2014

कहानी
संदेष
वो थोड़ी देर मुझे अपलक देखती रही और फिर उठ कर अंदर चली गर्इ । मै जहां बैठा हुं यह एक झुग्गी बस्ती में झोपड़ी है । मै यहां कैसे हुं ? इसकी कहानी दो या तीन वाक्य की ही है । कुछ ही दिनों पहले सुभाष से मेरी मित्रता हुर्इ है । आज अचानक ही सुभाष ने मुझे यहां भेजा है ये बताने के लिए कि उसकी तबियत बहुत खराब है । मंै इसी संदेश के साथ खोजता हुआ यहां पहुचा हुं । मै जिस महिला से मिला, उसने अपना नाम उमा बताया ; सांवली, तीखे नैन-नक्श ,उम्र यही कोर्इ बत्तीस-तैतीस । मैने जैसे ही संदेश दिया वो बोल पड़ी '' हां........हां तबियत खराब है ,अब वो अपनी बीबी के पल्ले में घुसा रहेगा । तबियत खराब ही है तो यहां आकर भी तो सो सकता था । मुझे लगा शायद मुझे यहां नहीं आना चाहिए था । वो मुझ से बोली '' अरे........ आप बैठ जाइए न बाबा....... । हा..... तो क्या हुआ सुभाष को ? मेरा दिमाग ''बाबा के विश्लेषण में लगा था और सीधे प्रश्नों के लिए तैयार नहीं था ; मैं चुप ही रहा । वो फिर बोली '' मै आपको कुछ थोड़े ही कह रही हुं .......। पानी पिऐंगे ? मैने हां में सर हिलाया ।
उमा पानी लेकर आ गर्इ । पानी पीते हुए ध्यान दिया कि ये एक छोटी झोपड़ी है, दो भागों में बंटी हुर्इ ;शायद अंदर चौका और सामान रखने का कमरा हो । उमा ने मेरी निगाहों को पकड़ ही लिया । वो हाथ के इशारे के साथ ही बोल पड़ी '' यही है सुभाष का दिया हुआ महल और मै इसकी रानी हु । मै उठने लगा तो वो पूरे अधिकार के साथ बोली '' आप बैठ जाइए न ..........बाबा । मै वहीं पड़ी खटिया पर बैठ गया । वो भी मेरे पास ही जमीन पर बैठ गर्इ । वो शायद बातों का सिलसिला आगे बढाना चाहती थी । उसने पूछा '' हां .....तो क्या हुआ प्रभात को ? मै धीरे से बोला ''शायद ......शायद बुखार ........... । '' शायद ...... क्या मतलब है .... ? कैसे दोस्त हो ?....... पूरा पता किए बगैर ही आ गए । वो बीच में ही बोल पड़ी । मै फिर उठने की कोशिश करने लगा । वो बोली '' अरे बैठो न ..........बाबा । मै खटिया से आधा ही उठा था फिर बैठ गया । उमा ने प्रश्न बदल दिया '' क्या तुम्हें सुभाष ने मेरे बारे में कुछ बताया ?...... क्या बताया ? मै सोचने लगा क्या बताउ । वो शायद पूछने से अधिक बताना चाहती थी । वो बोले बगैर भी कहा रह सकती थी '' उसने मेरे बारे में तुम्हें बताया तो होगा कि मैं उसकी प्रेमिका हुं .........उसकी पत्नी के अलावा प्यार .....। आप लोग मुझे न जाने किस -किस नाम से पुकारते हो .......। उसकी अवााज कम होती हुर्इ बंद हुर्इ। वो मेरी आंखों में प्रतिकि्रया देखने का प्रयास करने लगी । उसे कुछ मिला या नहीं मुझे शराब की गंध अवश्य महसूस हुर्इ । मै क्या कहता वो बोले जा रही थी '' आपको संकोच हो रहा है न .....बाबा । उसकी पत्नी वहां हवेली में रहती है ;मै दूसरी हु न तो मेरे लिए ये है झोपड़ा । अब मै बीच में बोल पड़ा '' मुझे जाना होगा जल्दी में हु । वो पूरे अधिकार से बोली '' जाना तोे सबको ही है लेकिन मै सुभाष से पहले जाउंगी ।...... हां तो आप को ड़र लग रहा है या शर्म आ रही है । मुझे खुद पर विश्वास है आपको है न तो बैठो न .........बाबा । ड़रने की कोर्इ बात नहीं है । सबसे र्इमानदार और बेबस लोग ऐसी ही बस लोग ऐसी ही जगहों पर रहते है । मै कसमसा कर बैठ गया । उसका बोलना जारी था '' अब यहां कोर्इ नहीं आता। पहले-पहल शरीफजादे आते थे । मैं तो सुभाष को ही चाहती हु न । अब कोर्इ नहीं आता। मै मन की बात करने को भी तरस जाती हुं । आप आए है तो आ को लगता होगा कि मैं बहुत बोलती हुं मन की बात करने को भी तरस जाती हुंं । मै तो बस मोहल्ले के बच्चों से ही बात करके मन बहला लेती हु। मैं न चाहते हुए भी बोल ही पड़ा '' और तुम्हारे बच्चे ? वो अपनी ही लय में थी '' मेरे बच्चे ......... नहीं है । होने ही नहीं दिये । मैं तो बस मोहल्ले के बच्चों से ही बातें करके मन बहला लेती हु । मुझ से फिर बोले बगैर नहीं रहा गया '' और सुभाष भी तो रहते होगें । उसने बुरा सा मुंह बनाया '' आता है दिन में एक-दो बार । रात को तो वो अपनी बीबी के पल्ले में ही घुसा रहता है । वहीं सोता है । मैं तो अकेली रहती हुं रातों को भी और अपने आप से ही बात करती रहती हुं । रातों को ड़र भी बहुत लगता है। अक्सर ही मैं नशे में खुद से ही बातें करती हुं । अक्सर तो मै बात करने को भी तरसती रहती हुं ।
फिर वो अपलक मुझे देखने लगी जैसे मेरे भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही हो। मेरे निर्विकार चेहरे ने उसे निराश ही किया होगा । वो उठी और अंदर चली गर्इ । अंदर से टीन की संदूक खुलने की आवाज आर्इ और फिर बंद होने की भी । उमा वापस कमरे में आर्इ तो उसके हाथ में मुड़ा हुआ अखबार था । वो मेंरे पास आकर अखबार खोलने लगी । उसमें एक बुजुर्ग आदमी की फोटो थीे । उसने फोटो को चूमा , पैर भी छुए और बिना मेंरी ओर देखे कहा '' ये मेरे पापा है । बस अब ये ही मेंरे अकेलेपन में मेरे साथ होते है । मैं अपनी सब बात इन्हें ही बताती हुं । मैने युं ही कहा '' बहुत ही अच्छे है ........ कहां है अभी? उसने जवाब दिया '' थे । मै बोला '' याने ....... अब नहीं हैं। उमा बोली '' नहीं...... वे मुझे बहुत प्यार करते थे और मै सुभाष को । मै सुभाष की राधा ,मीरा और गोपी थी । मै इसके साथ भाग आर्इ । मेरे पिता मेरे आने के चौथे दिन ही मर गए । वो मरे नहीं मैने उन्हें मार ड़ाला । मै दोषी हुं उनकी मौत की । उन्होंने मरते समय मुझे श्राप दिया होगा तभी तो मै आज अकेलापन झेलने को मजबूर हुं । मुझे यह भी लगता है कि पापा मुझे श्राप नहीं दे सकते । ये तो मेरी ही करनी का फल है जो मै भोग रही हुं । मुझे लगता है मुझ जैसी बेटी भगवान किसी बाप को न दे । शायद कोर्इ और होता तो इसे बहाना,झूठ और फरेब का तरीका ही समझता लेकिन मुझे उसकी आंखों के कोर पर आंसुओं की सच्चार्इ ही दिखार्इ दी अचानक ही अपने अतीत से बाहर आ गर्इ और बोली '' मै भी कहां आपको बोर करने लगी । अच्छा अब आप जाइए .........बाबा । मै और मेरे पापा अकेले में आपस में बातें करेंगे । मै झोपड़ी से निकला तो आस-पास के लोगों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा । मै गया तो था संदेश देने मगर अपने साथ एक संदेश लेकर भी जा रहा हुं ।
आलोक मिश्रा

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