07/10/2024
पुणे के येरवडा की झुग्गी-झोपड़ी से लेकर अमेरिका में प्रोफ़ेसर बनने तक का बेहतरीन सफ़र तय करने वाली शैलजा पाइक ने अब प्रतिष्ठित 'मैकआर्थर' फ़ैलोशिप भी हासिल कर लिया है।
इस फ़ैलोशिप के लिए सिलेक्ट हुए उम्मीदवारों को पांच साल के लिए कई चरणों में 8 लाख डॉलर (भारतीय मुद्रा में 6 करोड़ 71 लाख रुपये) की राशि मिलती है।
शैलजा को एक ऐसी इतिहासकार के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने दलित महिलाओं के योगदान और उनकी आत्मचेतना की जागृति का इतिहास लिखा है।
शैलजा ने खुद अपनी ज़िन्दगी में बहुत भेदभाव झेला है — सिर्फ दलित होने के कारण ही नहीं, बल्कि एक महिला होने के कारण भी। इन मुश्किलों के बावजूद, वह अपनी दृढ़ता का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं, जिन्होंने कई मुश्किलों के बावजूद उनकी और उनकी तीन बहनों की पढ़ाई नहीं रुकने दी।
"बचपन में, मुझे जीने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा," पाइक ने NPR से बातचीत में बताया। महाराष्ट्र के पोहेगांव में जन्मी शैलजा का परिवार 1960 के दशक में बेहतर अवसरों की तलाश में पुणे आ गया था।
वे येरवाड़ा की एक झुग्गी में एक कमरे के मकान में रहते थे, जहाँ उनकी माँ, जो सिर्फ 6वीं तक पढ़ी थीं, ने उन्हें इंग्लिश का अल्फाबेट सिखाया।
"मेरी माँ सारा काम अकेले ही करती थीं ताकि मैं और मेरी बहनें अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकें। उन्होंने हमें हर मुश्किल से बचाया और हमें खुद को सुरक्षित रखना सिखाया। उन्होंने मुझे सिखाया कि अपने सपनों का पीछा बिना किसी रुकावट के करना चाहिए और अपने काम पर विश्वास रखना चाहिए।"
अपने माता-पिता के इस समर्थन से प्रेरित होकर, शैलजा ने सावित्रीबाई फुले यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री हासिल की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए UK और US चली गईं।
आज, एक प्रसिद्ध इतिहासकार और सामाजिक न्याय की समर्थक के रूप में, शैलजा दलित कहानियों पर काम करती हैं, प्रचलित धारणाओं को चुनौती देती हैं और बदलाव की प्रेरणा बनीं हैं।
अब, MacArthur fellow के रूप में, उन्हें 5 साल में $800,000 की फेलोशिप मिलेगी, जिससे वह बिना किसी बाधा के अपना अहम शोध जारी रख सकेंगी।
[Shailaja Paik, MacArthur Fellowship, Inspiring, Education, academic achievement]