10/03/2017
छात्रों और शिक्षकों की संख्या का अनुपात है मूल समस्या
शिमला: विधानसभा बजट सत्र में आज बीजेपी के विधायक कर्नल इन्द्र सिंह ने सरकारी स्कूलों में छात्रों की घटती संख्या के कारणों पर सदन में संकल्प रखा जिसमे पक्ष तथा विपक्ष के विधानसभा सदस्यों ने भाग लिया। जिसमे सभी सदस्यों ने कहा कि मुफ्त मिड-डे मील, मुफ्त वर्दी, मुफ्त किताबें आदि के बावजूद लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में न पढ़ा कर किसी भी प्राइवेट स्कूल में भेज रहें है विषय पर चिंता जाहिर की । इन हालात को बदलने के लिए सभी ने अपने -2 विचार रखे कि लुभावनी योजनाओं के स्थान पर स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्तियों को बढ़ाया जाए, ताकि प्रति कक्षा एक शिक्षक मिल सके तथा सरकारी स्कूल के अध्यापको के ऊपर नकेल कसी जाए।
शिक्षा समाज का आईना है और समृद्ध समाज को सशक्त शिक्षा का आधार माना जाता है। लेकिन सरकारी शिक्षा का गिरता स्तर और छात्रों की दिन-प्रतिदिन घटती संख्या चिंता का विषय बना हुआ है। सरकारी शिक्षण संस्थानों से निकल कर ही कई लोगों ने सफलता के परचम लहराए हैं। उन्हीं लोगों के दृष्टिकोण में आए बदलाव से सरकारी शिक्षा अपने अस्तित्व की जंग लड़ती नजर आ रही है। सूबे के आज सेकड़ो स्कूल कम छात्र संख्या के कारण बंद होने के कगार पर खड़े हैं। यहां इंतजार है तो बस एक सरकारी फरमान का। आने वाले समय में ऐसा न हो कि सरकारी स्कूल कहानी बन कर रह जाएं। प्राथमिक शिक्षा, जिसे शिक्षा की नींव माना जाता है, वहां हालात और भी दयनीय हैं। प्रश्न उठता है कि सरकार की कई लुभावनी योजनाओं, जिनमें मुफ्त मिड-डे मील, मुफ्त वर्दी, मुफ्त किताबें, कई छात्रवृत्ति आदि बांट कर भी क्यों लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में न पढ़ा कर किसी भी प्राइवेट स्कूल में भेज देते हैं। इस प्रश्न का हल जाने बिना सरकारी शिक्षा को बचाना संभव नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है कक्षा और अध्यापक का अनुपात सही न होना। अभिभावक अपने बच्चों को उन स्कूलों से निकाल लेते हैं, जहां एक या दो अध्यापकों के सहारे पूरा स्कूल चलता है।