The K Square Classes By-Krishna Khetwal

The K Square Classes By-Krishna Khetwal K SQUARE CLASSES

14/04/2021
 #साभार -  #अज्ञात
18/02/2021

#साभार - #अज्ञात

03/01/2021

🌺🌺🌺 #प्रेरणाप्रद_कहानी 🌺🌺🌺
*बुद्धिमानी से सेवा करें!*

एक लड़की विवाह करके ससुराल में आयी| घर में एक तो उसका पति था, एक सास थी और एक दादी सास थी| वहाँ आकर उस लड़की ने देखा कि दादी सास का बड़ा अपमान, तिरस्कार हो रहा है! छोटी सास उसको ठोकर मार देती, गाली दे देती| यह देखकर उस लड़की को बड़ा बुरा लगा और दया भी आयी! उसने विचार किया कि अगर मैं सास से कह कहूँ कि आप अपनी सास का तिरस्कार मत किया करो तो वह कहेगी कि कल की छोकरी आकर मुझे उपदेश देती है, गुरु बनती है! अतः उसने अपनी सास से कुछ नहीं कहा| उसने एक उपाय सोचा| वह रोज काम-धंधा करके दादी सास के पास जाकर बैठ जाती और उसके पैर दबाती| जब वह वहाँ ज्यादा बैठने लगी तो यह सास को सुहाया नहीं| एक दिन सास ने उससे पूछा कि ‘बहु! वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की ने कहा कि ‘बोलो, काम बताओ!’ सास बोली कि ‘काम क्या बतायें, तू वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की बोली कि ‘मेरे पिता जी ने कहा था कि जवान लड़कों के साथ तो कभी बैठना ही नहीं, जवान लड़कियों के साथ भी कभी मत बैठना; जो घर में बड़े-बूढ़े हों, उनके पास बैठना, उनसे शिक्षा लेना| हमारे घर में सबसे बूढ़ी ये ही हैं, और किसके पास बैठूँ? मेरे पिताजी ने कहा था कि वहाँ हमारे घर की रिवाज नहीं चलेगी, वहाँ तो तेरे ससुराल की रिवाज चलेगी| मेरे को यहाँ की रिवाज सीखनी है, इसलिये मैं उनसे पूछती हूँ कि मेरी सास आपकी सेवा कैसे करती है?’ सास ने पूछा कि ‘बुढ़िया ने क्या कहा?’ वह बोली कि ‘दादी जी कहती हैं कि यह मेरे को ठोकर नहीं मारे, गाली नहीं दे तो मैं सेवा ही मान लूँ!’ सास बोली कि ‘क्या तू भी ऐसा ही करेगी?’ वह बोली कि ‘मैं ऐसा नहीं कहती हूँ, मेरे पिता जी ने कहा कि बड़ों से ससुराल की रीति सीखना!’

सास डरने लग गयी कि मैं अपनी सास के साथ जो बर्ताव करुँगी, वही बर्ताव मेरे साथ होने लग जायगा! एक जगह कोने में ठीकरी इकट्ठी पड़ी थीं| सास ने पूछा-‘बहू! ये ठीकरी क्यों क्यों इकट्ठी की हैं?’

लड़की ने कहा-‘आप दादी जी को ठीकरी में भोजन दिया करती हो, इसलिये मैंने पहले ही जमा कर ली|’

‘तू मेरे को ठीकरी में भोजन करायेगी क्या?’
‘मेरे पिता जी ने कहा कि तेरे वहाँ की रीति चलेगी|’
‘यह रीति थोड़े ही है!’
‘तो आप फिर आप ठीकरी मैं क्यों देती हो?’
‘थाली कौन माँजे?’
‘थाली तो मैं माँज दूँगी|’

‘तो तू थाली में दिया कर, ठीकरी उठाकर बाहर फेंक|’ अब बूढ़ी माँजी को थाली में भोजन मिलने लगा| सबको भोजन देने के बाद जो बाकी बचे, वह खिचड़ी की खुरचन, कंकड़ वाली दाल माँ जी को दी जाती थी| लड़की उसको हाथ में लाकर देखने लगी| सास ने पूछा-‘बहू! क्या देखती हो?’

‘मैं देखती हूँ कि बड़ों को भोजन कैसा दिया जाय|’
‘ऐसा भोजन देने की कोई रीति थोड़े ही है!’
‘तो फिर आप ऐसा भोजन क्यों देती हो?’

‘पहले भोजन कौन दे?’
‘आप आज्ञा दो तो मैं दे दूँगी|’
‘तो तू पहले भोजन दे दिया कर|’
‘अच्छी बात है!’

अब बूढ़ी माँ जी को बढ़िया भोजन मिलने लगा| रसोई बनते ही वह लड़की ताजी खिचड़ी, ताजा फुलका, दाल-साग ले जाकर माँ जी को दे देती| माँ जी तो मन-ही-मन आशीर्वाद देने लगी| माँ जी दिनभर एक खटिया में पड़ी रहती| खटिया टूटी हुई थी| उसमें से बन्दनवार की तरह मूँज नीचे लटकती थी| लड़की उस खटिया को देख रही थी| सास बोली कि ‘क्या देखती हो?’
‘देखती हूँ कि बड़ों को खाट कैसे दी जाय|’
‘ऐसी खाट थोड़े ही दी जाती है! यह तो टूट जाने से ऐसी हो गयी|’

‘तो दूसरी क्यों नही बिछातीं?’
‘तू बिछा दे दूसरी|’
‘आप आज्ञा दो तो दूसरी खाट बिछा दूँ!’
अब माँ जी के लिए निवार की खाट लाकर बिछा दी गयी| एक दिन कपड़े धोते समय वह लड़की माँ जी के कपड़े देखने लगी| कपड़े छलनी हो रखे थे| सास ने पूछा कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बूढों को कपड़ा कैसे दिया जाय|’

‘फिर वही बात, कपड़ा ऐसा थोड़े ही दिया जाता है? यह तो पुराना होने पर ऐसा हो जाता है|’
‘फिर वही कपड़ा रहने दें क्या?’
‘तू बदल दे|’
अब लड़की ने माँ जी का कपड़ा चादर, बिछौना आदि सब बदल दिया| उसकी चतुराई से बूढ़ी माँ जी का जीवन सुधर गया!

अगर वह लड़की सास को कोरा उपदेश देती तो क्या वह उसकी बात मान लेती? बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का असर पड़ता है|

✴️बैजनाथ मंदिर समूह✴️              """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""     बागेश्वर जनपद से 22 किलोमीटर दूर  गरूर घ...
02/01/2021

✴️बैजनाथ मंदिर समूह✴️
""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
बागेश्वर जनपद से 22 किलोमीटर दूर गरूर घाटी के पास गोमती नदी घाटी की समतल तलहटी में बैजनाथ धाम स्थित हैं। भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक प्राचीन बैजनाथ मंदिर समूह उत्तराखंड राज्य के अंतर्गत बागेश्वर जिले के छोटे कस्बे में स्थित हैं, बैजनाथ मंदिर के कारण इस कस्बे का नाम भी बैजनाथ ही हैं। बैजनाथ की दूरी कौसानी से 17किमी०, अल्मोड़ा से 53किमी और बागेश्वर से 22किमी० हैं। इसकी समुंद्रतल से ऊँचाई लगभग 1126 मीटर हैं। बैजनाथ मंदिर की स्थिति बहुत ही खूबसूरत हैं, पुल के नीचे से निकलने के बाद गोमती नदी एक यू आकार का मोड़ लेती हैं और इस आकार के बीच के स्थान पर एक कुछ ऊँचे मंडप पर नागर स्थापत्य कला शैली में निर्मित बैजनाथ मंदिर समूह के कई छोटे,बड़े मंदिर स्थापित हैं।
कहा जाता हैं की यह मंदिर समूह का निर्माण 1150 ई. के आसपास कुमाऊँ के कार्तिकेयपुर के कत्यूरी राजाओ के द्वारा बनवाया गया था और बाद में यह बारहवी और तेरहवी सदी के बीच कुमाऊँ कत्यूरी राजबंश के शासनकाल में राजधानी भी रहा था बारहवी सदी में निर्मित यह बैजनाथ मंदिर अति प्राचीन होने के साथ-साथ ऐतहासिक और धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। मंदिर समूह में छोटे-बड़े मंदिर मिलाकर सत्रह गौण मंदिर हैं और यह सभी मंदिर पत्थरों से एक विशेष प्रकार के नागर शैली में बने हुए हैं। इन समूह में हर मंदिर का अपना एक ऊँचा शिखर और गर्भगृह हैं। कुछ मंदिरों के गर्भगृह में कोई भी भगवान की प्रतिमा नहीं हैं। इन मंदिर समूह में मुख्य मंदिर भगवान शिव का और बाकी मंदिरों में केदारेश्वर, लक्ष्मीनारायण, ब्राम्हणी देवी, गणेश, पार्वती, चंडिका, कुबेर सूर्य आदि के मंदिर हैं। वैसे तो यहाँ पर सभी मंदिरों के शिखर सुरक्षित हैं पर मुख्य मंदिर के शिखर पूर्व में नष्ट हो चुका था और वर्तमान में इस मंदिर की छत चौकोर ढलवा आकार में लोहे की टिन निर्मित हैं। मंदिर परिसर में देखो तो कई जगह प्राचीन मूर्तियां व उनके अवशेष देखे जा सकते हैं ।
मंदिर परिसर में कई-छोटे बड़े मंदिर और निर्माण शैली देखकर आपको इन मंदिरों की खूबसूरती का सुखद अहसास होगा। मंदिर परिसर बिल्कुल साफ सुधरा और गन्दगी का नामोनिशान भी नहीं है। कुछ मंदिरों के अंदर प्रतिमाये है और कुछ मंदिर अंदर से खाली

18/11/2020

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।

जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।

इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।
सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है ।

08/11/2020

सर्दियों में होने वाले जायफल के चमत्कारी फायदे...

सर्दियों के मौसम ज्यादातर लोगों को सर्दी – जुकाम की परेशानी शुरू हो जाती है। जिसके बाद डॉक्टर के चक्कर लगने लगते हैं। लेकिन, अगर घर के बुजुर्गों का कहा माने तो हम इन बीमारियों से घर की रसोई में मौजूद चीजों से ही छुटकारा पा सकते है। दादी या नानी अक्सर सर्दियों के मौसम जायफल का प्रयोग करने के लिए कहती हैं। इसे हम मसाले में तो प्रयोग करते हैं, लेकिन इसके और क्या-क्या औषधीय गुण हैं, इनको भी जानना जरूरी है। मिरिस्टिका नामक वृक्ष से जायफल तथा जावित्री प्राप्त होती है. चलिए जानते हैं जयफल के फायदे...

मुहांसों में फायदेमंद
मुहांसे होने पर जायफल को दूध में घिसकर चेहरे पर लेप लगाने से मुहांसे समाप्त हो जाते हैं।

पाचन तंत्र
आमाशय के लिए उत्तेजक होने से आमाशय में पाचक रस बढ़ता है, जिससे भूख लगती है। आंतों में पहुंचकर वहां से गैस हटाता है।

सर्दी-खांसी
सुबह-सुबह खाली पेट आधा चम्मच जायफल चाटने से गैस्ट्रिक, सर्दी-खांसी की समस्या नहीं सताती है। पेट में दर्द होने पर चार से पांच बूंद जायफल का तेल चीनी के साथ लेने से आराम मिलता है।

सिर दर्द
सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल को पानी में घिस कर लगाएं।

सर्दी से सुरक्षा
सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन को मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये। यह शरीर की स्वाभाविक गर्मी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।

बढ़ाए भूख
आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।

दस्त और पेट दर्द
दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये। एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।

लकवा वाले अंगों में फूंकता है नई जान
लकवा का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर जायफल को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की संभावना देखी गयी है।

प्रसव बाद कमर दर्द में फायदा
प्रसव के बाद अगर कमर दर्द खत्म नहीं हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पर सुबह-शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।

फटी एड़ियों पर लगाएं
फटी एडियों के लिए जायफल महीन पीसकर बिवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।

हृदय को बनाए मजबूत
जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।
जी मिचलाए तो पिएं जायफल मिक्स पानी
जी मिचलाने की बीमारी भी जायफल को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।

मिटा देता है पुराने घावों के निशानों को
कई बार त्वचा पर कुछ चोट के निशान रह जाते हैं तो कई बार त्वचा पर नील और इसी तरह के घाव पड़ जाते हैं। जायफल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करें। जहां भी आपकी त्वचा पर पुराने निशान हैं रोजाना मालिश से कुछ ही समय में वे हल्के होने लगेंगे। जायफल से मालिश से रक्त का संचार भी होगा और शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी बनी रहेगी।

बढ़ाता है आंखों की रौशनी
इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आंख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आंख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।

मिटाए चेहरे की झाईयां
चेहरे पर या फिर त्वचा पर पड़ी झाईयों को हटाने के लिए आपको जायफल को पानी के साथ पत्थर पर घिसना चाहिए। घिसने के बाद इसका लेप बना लें और इस लेप का झाईयों की जगह पर इस्तेमाल करें, इससे आपकी त्वचा में निखार भी आएगा और झाईयों से भी निजात मिलेगी।

झुर्रियों का है दुश्मन
चेहरे की झुर्रियां मिटाने के लिए आप जायफल को पीसकर उसका लेप बनाकर झुर्रियों पर एक महीने तक लगाएंगे तो आपको जल्द ही झुर्रियों से निजात मिलेगी। जायफल, काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।

बार-बार लघुशंका जाने से मिलेगा छुटकारा
किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्रा में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार।

बच्चों की करे सुरक्षा
बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये, फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को सुबह शाम चटायें।
आंखों के नीचे से मिटाए काला घेरा
आंखों के नीचे काले घेरे हटाने के लिए रात को सोते समय रोजाना जायफल का लेप लगाएं और सूखने पर इसे धो लें। कुछ समय बाद काले घेरे हट जाएंगे।

दूर भगाए अनिद्रा को
अनिद्रा का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और इसका त्वचा पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। त्वचा को तरोताजा रखने के लिए भी जायफल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए आपको रोजाना जायफल का लेप अपनी त्वचा पर लगाना होगा। इससे अनिद्रा की शिकायत भी दूर होगी और त्वचा भी तरोताजा रहेगी।

दांत दर्द को करे तुरंत ठीक
दांत में दर्द होने पर जायफल का तेल रुई पर लगाकर दर्द वाले दांत या दाढ़ पर रखें, दर्द तुरंत ठीक हो जाएगा। अगर दांत में कीड़े लगे हैं तो वे भी मर जाएंगे।

मुंह के छालों को करे ठीक
जायफल को पानी में पकाकर उस पानी से गरारे करें। मुंह के छाले ठीक होंगे, गले की सूजन भी जाती रहेगी।

दूध पाचन
शिशु का दूध छुड़ाकर ऊपर का दूध पिलाने पर यदि दूध पचता न हो तो दूध में आधा पानी मिलाकर, इसमें एक जायफल डालकर उबालें। इस दूध को थोडा ठण्डा करके कुनकुना गर्म, चम्मच कटोरी से शिशु को पिलाएं, यह दूध शिशु को हजम हो जाएगा।
भाई दीपक राघव -8383026803

06/11/2020

,🙏 शिक्षा 🙏

*एक पति ने अपनी गुस्सैल पत्नी से। तंग आकर उसे कीलों से भरा एक थैला देते हुए कहा ,"तुम्हें जितनी बार क्रोध आए तुम थैले से एक कील निकाल कर बाड़े में ठोंक देना !"*

🎯पत्नी को अगले दिन जैसे ही क्रोध आया उसने एक कील बाड़े की दीवार पर ठोंक दी। यह प्रक्रिया वह लगातार करती रही।

🤦🏻‍♂धीरे धीरे उसकी समझ में आने लगा कि कील ठोंकने की व्यर्थ मेहनत करने से अच्छा तो अपने क्रोध पर नियंत्रण करना है और क्रमशः कील ठोंकने की उसकी संख्या कम होती गई।

🙋🏻‍♂एक दिन ऐसा भी आया कि पत्नी ने दिन में एक भी कील नहीं ठोंकी।

🤷🏻‍♂उसने खुशी खुशी यह बात अपने पति को बताई। वे बहुत प्रसन्न हुए और कहा, "जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एक बार भी क्रोधित नहीं हुई, ठोंकी हुई कीलों में से एक कील निकाल लेना।"

👱‍♀️पत्नी ऐसा ही करने लगी। एक दिन ऐसा भी आया कि बाड़े में एक भी कील नहीं बची। उसने खुशी खुशी यह बात अपने पति को बताई।

*पति उस पत्नी को बाड़े* *में लेकर गए और कीलों के छेद* *दिखाते हुए पूछा, "क्या तुम ये छेद भर सकती हो?"*

🌿पत्नी ने कहा,"नहीं जी"

🌿पति ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा,"अब समझी, क्रोध में तुम्हारे द्वारा कहे गए कठोर शब्द, दूसरे के दिल में ऐसे छेद कर देते हैं, जिनकी भरपाई भविष्य में तुम कभी नहीं कर सकते !"

*सन्देश : जब भी आपको क्रोध आये तो सोचिएगा कि कहीं आप भी किसी के दिल में कील ठोंकने तो नहीं जा रहे ?*
🌹

31/10/2020

#अवकाश
*************
जब शिक्षा विभाग में नौकरी लगी तो अवकाशों को लेकर मैनें सबके मुंँह से अपने अपने बनाये और अमल में लाये शासनादेश ही सुने।
आज भी वास्तविक शासनादेशो के उलट अवकाशों को लेकर कई मिथक प्रचलित है।
मसलन-

दिसम्बर माह में तीन से ज्यादा C. L. नही ले सकते।

ग्रीष्मावकाश या शीतकालीन अवकाश के शुरू होने से पहले Last working day को आप C. L. या अवकाश पर नही रह सकते या दीर्घावकाश के पश्चात स्कूल खुलने के पहले दिन आप अवकाश पर नही रह सकते, ऐसा करना पाक परवरदिगार ए आलम की शान में गुस्ताखी माना जायेगा और उस आदमी की गर्दन उतार दी जायेगी।

मेडिकल लीव के दौरान वेतन रूकेगा और बाद में भुगतान होगा।

मेडिकल लीव जाने वाला कर्मचारी बाकयदा अपनी एप्लीकेशन में डेट भी लिखता है कि उसे किस तिथि से #दस्त लगेगे और किस तिथि तक उसका िकार सही हो जायेगा,
यानि कि मेडिकल लीव लेने वाले सरकारी कर्मचारी के आगे बड़े बडे़ डाक्टर सर्जन और वैज्ञानिक भी फेल है।

विशेष अवकाश अधिकतम नौ मिल सकते है, इससे ज्यादा यदि हो गये तो वे #भुस्स माने जायेगे।

विशेष अवकाश तीन वर्ष के भीतर खत्म करने होगे, यदि नही किये तो वे सारे के सारे भुस्स हो जायेगे और आपकी सर्विस बुक में इस श्रेणी के अवकाशो के आगे मुर्गी का एक सुंदर प्यारा अंडा शुशोभित होगा।

विशेष अवकाशो के दौरान आने वाला सार्वजनिक अवकाश भी विशेष अवकाशो के साथ जोड़ा जायेगा।

लेकिन....

इन सब अवकाशो के इतर एक अवकाश ऐसा था जिसे लेकर यदि आपको पाँच सरकारी कर्मचारी मिलेगे तो उनके दिमाग में अलग अलग शासनादेश होगे, वह था #यात्रावकाश ।
इस अवकाश के नियमो को लेकर वे इतने Confidence में बात करते थे मानों इस अवकाश को स्वीकृत करने वाले शासनादेश पर इन्ही के दस्तखत हुये हो।

बहरहाल शासनादेश ऐसा था कि ब्रिटिश काल के दौरान अँग्रेजो ने सयुंक्त प्रांत के सरकारी कर्मियो को अपने कार्य स्थल से निवास स्थल पर जाने के लिये वर्ष में एक बार यात्रावकाश देने का प्राविधान किया था, इस अवकाश का उपभोग वही कर सकता था जिसे अपने डयूटी स्थल से घर जाने में दो दिन और वापस आने में भी दो दिन लगते थे, इस तरह से यात्रावकाश टोटल 4 दिन का मिलता था, इसके साथ कर्मचारी अपने आकस्मिक अवकाश लेकर अपने निजी कार्य हेतु इनका उपभोग करता था, किंतु सनद रहे कि वह इनका उपभोग वर्ष में एक ही बार कर सकता था, ऐसा नही था कि वह हर महीने घर जा रहा है तो उसे खुद की CL के साथ बार बार Journey Leave मिले।

उस दौर में बारबंकी,प्रयागराज, जौनपुर, मैनपुरी के कर्मचारी गढवाल मंडल में कार्यरत रहते थे और यहाँ के कई कर्मचारी इलाहाबाद मंडल या लखनऊ मंडल मे कार्यरत थे तो इस अवकाश की वास्तविक प्रासंगिकता भी थी।

अँग्रेज चले गये, शासनादेश यथावत रहा,यूपी से हम अलग हुये शासनादेश यथावत रहा, मगर पता नही कहाँ से यह दस्तूर बनाया गया कि दूरी को आधार बनाकर दिया जाने वाला यात्रावकाश जिलो की सीमाओं में बाँट दिया गया।

कहा जाने लगा कि यदि आप पौडी जिले के निवासी है और वही नौकरी करते है तो आपके लिये कोई यात्रावकाश नही, भले ही आपको पौडी के एक सीमान्त इलाके शंकरपुर से पौडी जिले के दूसरे छोर श्रीनगर जाने में 250 किमी की यात्रा करने मे पूरा दिन बर्बाद करना पडे।
लेकिन यदि आप पौडी जिले के श्रीनगर के स्थायी निवासी है और आपका स्कूल अलकनंदा पार ,तीन किमी दूर कीर्तिनगर/किंकिलेश्वर (टिहरी गढवाल) है तो आप यात्रावकाश के पात्र है।
इस तरह के कुतर्को का सहारा लेकर कर्मचारियो और सक्षम अधिकारियों ने इस अवकाश को काफी वर्षो तक उपभोग किया है।
जबकि वास्तविक शासनादेश के अनुरूप राज्य के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में कही भी यात्रा करने में दो दिन नही लगते है।
( अब ये कुतर्क मत करना कि क्या बात कर रहे हो यार। मुझे तो स्कूल से सडक में आने में ही चार घंटे लग जाते है और बस का वेट करने में दो घंटे)
इसलिये वास्तविक शासनादेश के अनुरूप इसको तो रद्द ही होना था लेकिन...

साहब! कभी आपने पिथौरागढ में कार्यरत उत्तरकाशी जिले के किसी कर्मचारी के बारे में सोचा है? कभी बागेश्वर में नौकरी कर रहे टिहरी जिले या रूद्रप्रयाग जिले के शिक्षक के बारे मे सोचा है कि इनको घर आने जाने में दो दिन भले ही न लगते हो मगर एक दिन व पूरी रात तो जरूर लगती है।

मैं त्योहार व पर्वो के दौरान होने वाली छुट्टियो में बस में यात्रा के दौरान जब ऐसे शिक्षको कर्मचारियो को देखता हूँ तो करूणा भाव उभर आते है जो बताते है कि उन्हे अभी घर पहुँचने में 22 घंटे और लगेगे, और ट्रेन लेट हो गयी, सो अलग!!

उनके लिये क्या पर्व और क्या त्योहार जो घर जाकर उसकी तैयारी भी न कर पाये।

पूर्व शासनादेश भले ही आज के हिसाब से सही नही था, लेकिन कर्मचारियो के लिये दूरी के आधार पर यात्रवकाश की जरूरत आज भी है।
इसे नये नियम व स्पष्ट दिशा निर्देश के साथ पुन: लागू किया जाना चाहिये।

#धन्यवाद

 #यदि_आपको_वीडियो_उपयोगी_लगे_तो_चैनल_को_सब्सक्राइब_और_वीडियो_को_लाईक_जरूर_करे  #वीडियो_ज्ञान_परक_ना_लगे_तो_पूरा_देखने_बा...
17/09/2020

#यदि_आपको_वीडियो_उपयोगी_लगे_तो_चैनल_को_सब्सक्राइब_और_वीडियो_को_लाईक_जरूर_करे #वीडियो_ज्ञान_परक_ना_लगे_तो_पूरा_देखने_बाद_डिस्लाइक_कर_दे_अपने_सुझाव_कमेंट_में_दे
Please watch the complete video. I am sure your concept will be clear.

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