श्री रामेश्वर संस्कृत विद्यालय भालूआही बदलापुर जौनपुर उत्तर प्रदेश .

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श्री रामेश्वर  संस्कृत  विद्यालय भालूआही बदलापुर  जौनपुर उत्तर प्रदेश . श्रीकृष्णा नगर भलुआही, प्रधानाचार्य श्री जगदम्बा प्रसाद शुक्ल

06/10/2023

कोई भी जातक अपनी कुंडली बनवाना चाहता है या किसी भी तरह को समस्या से जूझ रहा है , तो आप कमेंट में अपना प्रश्न पूछ सड़ते है या फिर इनबॉक्स आप अपना जन्म समय दिनांक भेज दे हम आपको उपाय और कुंडली बन कर भेज देंगे , और यह निःशुल्क है

कृपया इस पेज को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर और सब्सक्राइबकरे जिससे हम अधिकलोगो तक पहुँच सके और अपने धर्म ग्रंथके बारे में और व्याख्या दे पाये

#कुंडली #धर्म #संस्कृत #श्री_रामेश्वर_संस्कृत_विद्यालय_बदलापुर #श्री ेशाय_नमः

22/07/2021

*संस्कृत*: कुछ रोचक तथ्य....

*संस्कृत के बारे में ये 20 तथ्य जान कर आपको भारतीय होने पर गर्व होगा।*

आज हम आपको संस्कृत के बारे में कुछ
ऐसे तथ्य बता रहे हैं,जो किसी भी भारतीय
का सर गर्व से ऊंचा कर देंगे;;
1. संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी
माना जाता है।

2. संस्कृत उत्तराखंड की आधिकारिक
भाषा है।

3. अरब लोगो की दखलंदाजी से पहले
संस्कृत भारत की राष्ट्रीय भाषा थी।

4. NASA के मुताबिक, संस्कृत धरती
पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है।

5. संस्कृत में दुनिया की किसी भी भाषा से
ज्यादा शब्द है।
वर्तमान में संस्कृत के शब्दकोष में 102
अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है।

6. संस्कृत किसी भी विषय के लिए एक
अद्भुत खजाना है।
जैसे हाथी के लिए ही संस्कृत में 100 से
ज्यादा शब्द है।

7. NASA के पास संस्कृत में ताड़पत्रो
पर लिखी 60,000 पांडुलिपियां है जिन
पर नासा रिसर्च कर रहा है।

8. फ़ोबर्स मैगज़ीन ने जुलाई,1987 में
संस्कृत को Computer Software
के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था।

9. किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत
में सबसे कम शब्दो में वाक्य पूरा हो
जाता है।

10. संस्कृत दुनिया की अकेली ऐसी
भाषा है जिसे बोलने में जीभ की सभी
मांसपेशियो का इस्तेमाल होता है।

11. अमेरिकन हिंदु युनिवर्सिटी के अनुसार
संस्कृत में बात करने वाला मनुष्य बीपी,
मधुमेह,कोलेस्ट्रॉल आदि रोग से मुक्त हो
जाएगा।
संस्कृत में बात करने से मानव शरीरका
तंत्रिका तंत्र सदा सक्रिय रहता है जिससे
कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश
(PositiveCharges) के साथ सक्रिय
हो जाता है।

12. संस्कृत स्पीच थेरेपी में भी मददगार
है यह एकाग्रता को बढ़ाती है।

13. कर्नाटक के मुत्तुर गांव के लोग केवल
संस्कृत में ही बात करते है।

14. सुधर्मा संस्कृत का पहला अखबार था,
जो 1970 में शुरू हुआ था।

आज भी इसका ऑनलाइन संस्करण
उपलब्ध है।

15. जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियो
की मांग है।
जर्मनी की 14 यूनिवर्सिटीज़ में संस्कृत पढ़ाई
जाती है।

16. नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार जब
वो अंतरिक्ष ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे
तोउनके वाक्य उलट हो जाते थे।
इस वजह से मैसेज का अर्थ ही बदल
जाता था।
उन्होंले कई भाषाओं का प्रयोग किया
लेकिन हर बार यही समस्या आई।

आखिर में उन्होंने संस्कृत में मैसेज
भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उल्टे
हो जाने पर भी अपना अर्थ नही
बदलते हैं।
जैसे
अहम् विद्यालयं गच्छामि।
विद्यालयं गच्छामि अहम्।
गच्छामिअहम् विद्यालयं ।
उक्त तीनो के अर्थ में कोई अंतर नहीं है।

17. आपको जानकर हैरानी होगी कि
Computer द्वारा गणित के सवालो को
हल करने वाली विधि यानि Algorithms
संस्कृत में बने है ना कि अंग्रेजी में।

18. नासा के वैज्ञानिको द्वारा बनाए
जा रहे 6th और 7th जेनरेशन Super
Computers संस्कृतभाषा पर आधारित
होंगे जो 2034 तक बनकर तैयार हो जाएंगे।

19. संस्कृत सीखने से दिमाग तेज हो जाता
है और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है।
इसलिए London और Ireland के कई
स्कूलो में संस्कृत को Compulsory
Subject बना दिया है।

20. इस समय दुनिया के 17 से ज्यादा
देशो की कम से कम एक University
में तकनीकी शिक्षा के कोर्सेस में संस्कृत
पढ़ाई जाती है।

संस्कृत के बारे में ये 20 तथ्य जान कर
आपको भारतीय होने पर गर्व होगा।


⚜🕉⛳🕉

26/04/2021

#कोरोना इस महामारी में आप अपने आप को सुरिक्षत रख्खे, सरकार का सहयोग दे , हिम्मत न हारे, मन को हराने न दे, एक बहुत प्रचलित कहावत है कि, चिंता चिता की देन है ।। इस लिए चिंता को हावी न होने दे, सकारात्मक विचार आपके अंदर एक प्रभावी ऊर्जा उतपन्न करता है , जो आपके शरीर को रोगों से लड़ने में शक्ति प्रदान करता है।। बाकी उचित दूरी बनाए, रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने वाले आहार को ले , योग से जुड़े ,

और सत्य है कि कुछ दिन के लिए इस आधुनिक जीवन को त्याग कर , सनातन धर्म में लिखे दैनिक दिनचर्या को अपनाये,

सुबह प्राणायाम करे, विकार रहित भोजन करे, सुबह सूर्य नस्कार करे, दिन में सोए नही, रात को पर्याप्त नींद ले,

और एक छोटी सा , विचार व्यक्त करता हू, ऐसे बहुत सारी चीजें है जो हमारे जीवन का एक भाग था और हम आधुनिकता में उसे खोते गए, शायद आज हमे अपने पूर्वजो की बातों को, परमपराओं को ध्यान में रखना है,

कृपया नीचे लिखी एक छोटी सी परम्परा पढ़े।।

अपने पूर्वजों को समझने में हमसे ही भूल हुई:

जब किसी की मृत्यु होती थी तब 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था। यही आइसोलेशन था क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है।यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का क्वॉरंटीन बनाया गया।

जो शव को अग्नि देता है, उसको घर वाले तक नहीं छू सकते। 13 दिन तक उसका भोजन, पानी, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते हैं।

तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात, सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था।लेकिन तब भी आप बहुत हँसे थे। ब्लडी इंडियन कहकर खूब मजाक बनाया।

जब मां बच्चे को जन्म देती है तो जन्म के 11 दिन तक बच्चे व माँ को कोई नही छूता। ताकि जच्चा और बच्चा किसी इंफेक्शन के शिकार ना हों। लेकिन इस परम्परा को पुराने रीति रिवाज, ढकोसला कह कर त्याग दिया गया।जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है, इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने।

अब समझ मे आ गया होगा आपके कि हमारे धर्म को

-सत्य सनातन क्यों कहते हैं !

#जगदम्बा_प्रसाद_शुक्ल #श्री_रामेश्वर_संस्कृत_विद्यालय_भालुआहि_बादलपुर_जौनपुर

19/03/2021

#आर्यत्व

#क्या है #सनातन_धर्म?

बहुत से लोग हिन्दू धर्म को सनातन धर्म से अलग मानते हैं। वे कहते हैं कि हिन्दू नाम तो विदेशियों ने दिया। पहले इसका नाम सनातन धर्म ही था। फिर कुछ कहते हैं कि नहीं, पहले इसका नाम आर्य धर्म था। कुछ कहते हैं कि नहीं, पहले इसका नाम वैदिक धर्म था। हालांकि इस संबंध में विद्वानों के भिन्न भिन्न मत है।

#सत्यम_शिवम_सुंदरम
'यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें।'- (ऋग्वेद-3-18-1)
सनातन का अर्थ है जो शाश्वत हो, सदा के लिए सत्य हो। जिन बातों का शाश्वत महत्व हो वही सनातन कही गई है। जैसे सत्य सनातन है। ईश्वर ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है, मोक्ष ही सत्य है और इस सत्य के मार्ग को बताने वाला धर्म ही सनातन धर्म भी सत्य है। वह सत्य जो अनादि काल से चला आ रहा है और जिसका कभी भी अंत नहीं होगा वह ही सनातन या शाश्वत है। जिनका न प्रारंभ है और जिनका न अंत है उस सत्य को ही सनातन कहते हैं। यही सनातन धर्म का सत्य है।


#वैदिक या #हिंदू_धर्म को इसलिए सनातन धर्म कहा जाता है, क्योंकि यही एकमात्र धर्म है जो ईश्वर, आत्मा और मोक्ष को तत्व और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है। मोक्ष का कांसेप्ट इसी धर्म की देन है। एकनिष्ठता, ध्यान, मौन और तप सहित यम-नियम के अभ्यास और जागरण का मोक्ष मार्ग है अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है। मोक्ष से ही आत्मज्ञान और ईश्वर का ज्ञान होता है। यही #सनातन धर्म का सत्य है।

#सनातन_धर्म के मूल तत्व #सत्य, #अहिंसा, दया, क्षमा, दान, जप, तप, यम-नियम आदि हैं जिनका शाश्वत महत्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व वेदों में इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था।

।।ॐ।।असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।।- वृहदारण्य उपनिषद
भावार्थ : अर्थात हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।

जो लोग उस परम तत्व #परब्रह्म #परमेश्वर को नहीं मानते हैं वे असत्य में गिरते हैं। असत्य से #मृत्युकाल में अनंत अंधकार में पड़ते हैं। उनके जीवन की गाथा भ्रम और भटकाव की ही गाथा सिद्ध होती है। वे कभी अमृत्व को प्राप्त नहीं होते। मृत्यु आए इससे पहले ही सनातन धर्म के सत्य मार्ग पर आ जाने में ही भलाई है। अन्यथा अनंत योनियों में भटकने के बाद #प्रलयकाल के #अंधकार में पड़े रहना पड़ता है।

।।ॐ।। पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।- ईश उपनिषद
भावार्थ : सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह। दोनों ही सत्य है। अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि। अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो। यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म पूर्ण है। यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है। पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती। वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है। यही सनातन सत्य है।

जो तत्व सदा, सर्वदा, #निर्लेप, #निरंजन, #निर्विकार और सदैव स्वरूप में स्थित रहता है उसे #सनातन या शाश्वत सत्य कहते हैं। वेदों का ब्रह्म और गीता का #स्थितप्रज्ञ ही शाश्वत सत्य है। जड़, प्राण, मन, आत्मा और ब्रह्म शाश्वत सत्य की श्रेणी में आते हैं। सृष्टि व ईश्वर (ब्रह्म) अनादि, अनंत, सनातन और #सर्वविभु हैं।

जड़ #पांच तत्व से #दृश्यमान है- आकाश, वायु, जल, अग्नि और पृथ्वी। यह सभी शाश्वत सत्य की श्रेणी में आते हैं। यह अपना रूप बदलते रहते हैं किंतु समाप्त नहीं होते। प्राण की भी अपनी अवस्थाएं हैं: प्राण, अपान, समान और यम। उसी तरह आत्मा की अवस्थाएं हैं: जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति और तुर्या। ज्ञानी लोग ब्रह्म को निर्गुण और सगुण कहते हैं। उक्त सारे भेद तब तक विद्यमान रहते हैं जब तक ‍कि आत्मा मोक्ष प्राप्त न कर ले। यही सनातन धर्म का सत्य है।

#ब्रह्म #महाआकाश है तो #आत्मा घटाकाश। आत्मा का मोक्ष परायण हो जाना ही ब्रह्म में लीन हो जाना है इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्‍या यही सनातन सत्य है। और इस शाश्वत सत्य को जानने या मानने वाला ही #सनातनी कहलाता है।

#हिंदुत्व : #ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे। कुछ विद्वान कहते हैं कि हिमालय से हिन्दू शब्द की उत्पत्ति हुई है। हिन्दू कुश पर्वत इसका उदाहरण है। हिन्दू शब्द कोई अप्रभंश शब्द नहीं है अन्यथा सिंधु नदि को भी हिन्दू नहीं कहा जाता।

#आर्यत्व : #आर्य_समाज के लोग इसे आर्य धर्म कहते हैं, जबकि आर्य किसी जाति या धर्म का नाम न होकर इसका अर्थ सिर्फ श्रेष्ठ ही माना जाता है। अर्थात जो मन, वचन और कर्म से श्रेष्ठ है वही आर्य है। #बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य का अर्थ चार श्रेष्ठ सत्य ही होता है। #बुद्ध कहते हैं कि उक्त श्रेष्ठ व #शाश्वत सत्य को जानकर आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना ही 'एस धम्मो सनंतनो' अर्थात यही है #सनातन धर्म।

इस प्रकार #आर्य_धर्म का अर्थ #श्रेष्ठ_समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था।

सनातन मार्ग : विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और #सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।

हमारे #ऋषि_मुनियों ने ध्यान और #मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।

#मोक्ष का मार्ग : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में मोक्ष अंतिम लक्ष्य है। यम, नियम, अभ्यास और जागरण से ही मोक्ष मार्ग पुष्ट होता है। जन्म और मृत्यु मिथ्‍या है। जगत भ्रमपूर्ण है। ब्रह्म और मोक्ष ही सत्य है। मोक्ष से ही ब्रह्म हुआ जा सकता है। इसके अलावा स्वयं के अस्तित्व को कायम करने का कोई उपाय नहीं। ब्रह्म के प्रति ही समर्पित रहने वाले को ब्राह्मण और ब्रह्म को जानने वाले को ब्रह्मर्षि और ब्रह्म को जानकर ब्रह्ममय हो जाने वाले को ही ब्रह्मलीन कहते हैं।

विरोधाभासी नहीं है सनातन धर्म :
सनातन धर्म के सत्य को जन्म देने वाले अलग-अलग काल में अनेक ऋषि हुए हैं। उक्त ऋषियों को दृष्टा कहा जाता है। अर्थात जिन्होंने सत्य को जैसा देखा, वैसा कहा। इसीलिए सभी ऋषियों की बातों में एकरूपता है। जो उक्त ऋषियों की बातों को नहीं समझ पाते वही उसमें भेद करते हैं। भेद भाषाओं में होता है, अनुवादकों में होता है, संस्कृतियों में होता है, परम्पराओं में होता है, सिद्धांतों में होता है, लेकिन सत्य में नहीं।

वेद कहते हैं ईश्वर अजन्मा है। उसे जन्म लेने की आवश्यकता नहीं, उसने कभी जन्म नहीं लिया और वह कभी जन्म नहीं लेगा। ईश्वर तो एक ही है लेकिन देवी-देवता या भगवान अनेक हैं। उस एक को छोड़कर उक्त अनेक के आधार पर नियम, पूजा, तीर्थ आदि कर्मकांड को सनातन धर्म का अंग नहीं माना जाता। यही सनातन सत्य है।

28/12/2020

#खरमास #खरमास_के_कारण #खरमास_के_दोष

धनु एवं मीन राशि वृहस्पति ग्रह की राशियां हैं। इनमें ग्रहराज सूर्य के प्रवेश करते ही खरमास दोष लगता है। इस कारण इस मास में शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। दक्षिणायन का आखिरी महीना ही खरमास होता है।

इस वर्ष 16 दिसंबर यानी बुधवार को प्रात: 6.49 बजे सूर्य धनु राशि में प्रवेश कर रहे हैं। इस प्रकार 16 दिसंबर से लेकर 14 जनवरी 2021

तक धनु संक्रांति जनित खरमास दोष रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक इस पृथ्वीतल पर संपूर्ण विश्व में प्राणिमात्र को जीवनदायिनी शक्ति का अक्षय स्त्रोत संपूर्ण वस्तुजात के परम प्रकाशक भगवान सूर्य हैं। अखिलकाल की गणना इन्हीं से होती है। दिन एवं रात्रि के प्रवर्तक भी सूर्य ही हैं।

प्राणिमात्र के जीवनदाता होने के कारण इन्हें विश्व की आत्मा कहा गया है। चाहे नास्तिक हो या आस्तिक, भारतीय हो या अन्य देशीय, स्थावर जंगम सभी इनकी सत्ता स्वीकार करते हैं। इनकी ऊर्जा से ऊर्जावान होकर अपने दैनंदिन कृत्य में प्रवृत्त होते हैं। भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन वेद, संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, आर्षग्रंथ, रामायण, महाभारत, पुराण सभी करते हैं। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना प्राणिमात्र को करनी चाहिए, क्योंकि आराधना के आराध्यस्थ दिव्य गुणों का संक्रमण आराधक में भी अवश्य होता है। इसलिए आस्तिकों में लोककल्याण की भावना रूप दैविय गुण सर्वाधिक होता है। सूर्य से ही दिन, रात, लग्न, ऋतु, अयन, वर्ष तथा युगादि निर्णीत होते हैं। इसी प्रकार गुरु को भी ज्योतिष शास्त्र में मंत्री, पुरोहित, ज्ञान एवं सुख का कारक माना गया है। गुरु पुत्र, पति, पत्नी, धन, धान्य का भी कारक है। सूर्य की राशि में गुरु हो तथा गुरु की

राशि में सूर्य संक्रमण कर रहा हो तो उस काल को गुर्वादित्य नाम से जाना जाता है। जो समस्त कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। यथा-

रविक्षेत्र गते जीवे जीवक्षेत्र गते रवौ।

गुर्वादित्य: स विज्ञेय: गर्हित: सर्वकर्मसु।।

वर्जयेत्सर्वकार्याणि व्रतस्वत्यनादिकम्।।

इसी प्रकार सिंह राशि में गुरु के होने पर सिंहस्थ दोष माना जाता है। जो कि विवाह आदि कार्यों में वर्जित है। जब सूर्य गुरु की राशियों में होता है तब सूर्य के प्रताप से गुरु की राशि धनु एवं मीन निर्बल हो जाती है। इस स्थिति में किया गया शुभकार्य निष्फल होता है या अपूर्ण रह जाता है।

जब सूर्य वृहस्पति की राशियों में जाता है तो इसे खरमास होता है

सूर्य हर महीने राशि परिवर्तन करता है। जब यह वृहस्पति की राशियों में जाता है तो इसे खरमास कहते हैं। वृहस्पति की दो राशियां एक धनु दूसरा मीन है। सूर्य जब धनु राशि जब प्रवेश करते हैं तो पौस मास रहता है। वहीं जब मीन राशि में प्रवेश करते हैं तब चैत्र मास होता है। इन दो महीनों को खरमास कहते हैं। इसमें आध्यात्मिक कार्य तो किया जा सकता है। लेकिन सभी तरह के मांगलिक कार्य स्थगित रहेंगे। मीन वाले खरमास में ब्रह्माणों के बच्चों का उपनयन किया जा सकता है।

मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध लग जाएगा

18 दिसंबर से शहनाइयों की धुन के साथ ही अन्य मांगलिक कार्यों पर प्रतिबंध लग जाएगा। धार्मिक प्रतिबंध

सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता भगवान भास्कर के वृश्चिक से धनु राशि में जाने के साथ ही हो जाएगा। धर्मशास्त्रीय व्यवस्था में गुरु की राशि में सूर्य और सूर्य की राशि में गुरु जाता है तो गुर्वादित्य नामक दोष होता है। धर्मशास्त्रीय व्यवस्था के अंतर्गत खरमास में विवाह, गृहारंभ, गृहप्रवेश, नव प्रतिष्ठान व व्यवसाय का आरंभ, वधूप्रवेश, द्विरागमन, मुंडन, कर्णवेध, नवनिर्माण खरमास की समाप्ति तक प्रतिबंधित रहते हैं।

इनमें ग्रहों के राजा सूर्य के प्रवेश करते ही खरमास दोष लगता है।

14 जनवरी 2021 तक खरमास रहेगा

जब सूर्य धनु तथा मीन राशि में प्रवेश करता है तो इसे खरमास कहते हैं। इस वर्ष सूर्य धनु राशि में 16 दिसंबर को प्रात: काल 6.50 पर प्रवेश कर रहा है। इस दिन से 14 जनवरी 2021 तक खरमास रहेगा । इस अवधि में मांगलिक कार्य निषेध रहेगा। संहिता ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास में धनु संक्रांति होने से यह दुर्भिक्ष कारक है। इस वर्ष दिन के प्रथम भाग में धनु संक्रांति होने के कारण यह शासक वर्ग हेतु कष्ट कारक है। बालव करण

में संक्रांति होने के कारण यह बैठे हुए सूर्य की संक्रांति है जो सामान्य फल कारक है।

23/04/2020

#यज्ञ के बारे में सभी लोग बहुत अच्छे से जानते है। से कैसे लड़ने में मदद कर सकता हैं ,

ये कहते हुए मुझे कोई भी संसय नही है कि यज्ञ वातारवरण को शुद्ध करने के लिए अब तक का सबसे उपयुक्त प्रकिया है , यदि पूर्ण रूप से सभी यज्ञ सामग्री के साथ यज्ञ को किया जाए तो उससे निकलने वाला धुंआ हर प्रकार के कीटाणु जो वातावरण में है को नष्ट करने में लाभदायक है , मैं आपको धर्म की तरफ न ले जा कर बस इतना कहना चाहता हूँ कि हमारे वेदों में जो धर्म ग्रंथो में जो चीजे निहित है वो आज के माहौल में।लड़ने के लिए बहुत लाभदायक है कोरोना जैसे वायरस को खत्म करने के लिए घर पर रहै और संभव हो तो सप्ताह में 1 से 2 बार यज्ञ आहुति करे , मन को शांति मिलेगी साथ मे वातावरण भी शुध्दिकरण होगा

यज्ञ करना यानि की भगवान को याद करना साथ ही अपने घर का और आसपास का वातावरण शुद्ध करना। यज्ञ को बहुत अलग अलग तरह से अलग अलग स्थानों पर किया जाता है। इसे करने का सबका एक अलग कारण या उद्देश्य होता है लेकिन जो भी इसे करने के फायदे और लाभ बहुत ज्यादा होते है जिसके चलते इसे करने के लिए सभी तैयार रहते है और कोई भी व्यक्ति इससे पीछे नहीं हठता है। जैसा की यज्ञ बहुत तरह से किये जाते है सभी में मंत्रो का उच्चारण अलग तरीके से होता है लेकिन जब भी कही यज्ञ होता है तो हमारे दिल और दिमाग को एक अलग तरह की शांति मिलती है जिसकी हमे आजकल सबसे ज्यादा जरुरत होती है। आज हम आपके लिए लाये है यज्ञ करने के कुछ फायदे जो आपको बताएंगे की आपको यज्ञ करने से क्या लाभ हो सकता है।

यज्ञ करने के फायदे:सुख शांति के लिए यज्ञ–

अगर आपके घर में किसी तरह की परेशानी जैसे लड़ाई झगडे कलेश आदि होते है तो उसके लिए आप अपने घर में यज्ञ जरूर करे इससे आपको बहुत ही जल्द फायदा होगा। घर में यज्ञ करने से घर का वातावरण एकदम शुद्ध हो जाता है और जो भी गन्दी या बुरी चीज़े घर में होती है जिसकी वजह से परेशानी आती है वो बहुत ही जल्द दूर हो जाती है। हमे कुछ समय के बाद अपने घर में यज्ञ जरूर करना चाहिए।

सभी समस्या से छुटकारा–

अगर आपके घर में एक के बाद एक व्यक्ति बीमार हो रहा है और सभी तरह के इलाज के बाद भी आपको कोई नतीजा दिखाई नहीं दे रहा है तो उसके लिए आप यज्ञ की मदद ले सकते है। इससे आपके घर में मंत्रो का उच्चारण होगा साथ ही हवन की सामग्री से जो धुआँ और हवा आपके घर में आएगी उससे आपके घर की बीमारी निकल जाएगी और आप स्वस्थ महसूस करेंगे।

#सेहत ले लिए लाभदायक–

जब भी आपके घर में हवन होता है तो उसमे जो आग जलाई जाती है वो बहुत तेज़ होती है जिससे आसपास जितने भी #आर्गेनिक #मैटेरियल होते है वो जल जाते है जो आपके लिए लाभदायक होते है।
इससे आपकी आँखों की भी सफाई होती है साथ ही साँस की समस्या भी दूर हो जाती है।

भभूति लाभदायक–

जब भी यज्ञ होता है तो उसमे भभूति का इस्तेमाल किया जाता है। इस भभूति को माथे पर लगाने से आपका दिमाग शांत रहता है साथ ही यह आपकी स्किन के लिए भी अच्छा होता है। कुछ लोग तो भभूति को अपनी जीब पर भी लगते है क्योकि यह बहुत ही लाभदायक होती है। हवन में प्रयोग की जाने वाली भभूति बहुत ही फायदेमंद होती है।

     #बदलापुर  #जौनपुर     शिक्षार्थ आयें , सेवार्थ जाए
04/02/2019

#बदलापुर #जौनपुर

शिक्षार्थ आयें , सेवार्थ जाए

        #बदलापुर  #भलुआही  #संस्कृत
03/02/2019



#बदलापुर #भलुआही #संस्कृत

कौन हैं ये  #नागा  #साधू ?******************** #महाकुंभ,  #अर्धकुंभ या फिर  #सिंहस्थ  #कुंभ में आपने  #नागा  #साधुओं को ...
02/02/2019

कौन हैं ये #नागा #साधू ?
********************
#महाकुंभ, #अर्धकुंभ या फिर #सिंहस्थ #कुंभ में आपने #नागा #साधुओं को जरूर देखा होगा. इनको देखकर आप सभी के मन में अक्सर यह सवाल उठते होंगे कि - कौन हैं ये नागा साधु, कहां से आते हैं और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं ? आइए आज हम लोग चर्चा करते है हिंदू धर्म के इन सबसे रहस्यमयी लोगों के बारे में.

" #नागा" शब्द बहुत पुराना है. यह शब्द #संस्कृत के 'नग' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ 'पहाड़' से होता है. इस पर रहने वाले लोग 'पहाड़ी' या 'नागा' कहलाते हैं. 'नागा' का अर्थ 'नग्न' रहने वाले व्यक्तियों से भी है. भारत में नागवंश और नागा जाति का बहुत पुराना इतिहास है. शैव पंथ से कई संन्यासी पंथों और परंपराओं की शुरुआत मानी गई है.

#भारत में प्राचीन काल से नागवंशी, नागा जाति और दसनामी संप्रदाय के लोग रहते आए हैं. उत्तर भारत का एक संप्रदाय "नाथ संप्रदाय" भी दसनामी संप्रदाय से ही संबंध रखता है". 'नागा' से तात्पर्य 'एकबहादुर लड़ाकू व्यक्ति' से लिया जाता है. जैसा कि हम जानते है कि - सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आध्य शंकराचार्य ने रखी थी.

#शंकराचार्य का जन्म 8 वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था. उस समय भारत सम्रद्ध तो बहुत था परन्तु धर्म से विमुख होने लगा था. भारत की धन संपदा को लूटने के लालच में तमाम आक्रमणकारी यहां आ रहे थे. कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए,

लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी. ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे में आध्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए कई बड़े कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों (चार धाम) का निर्माण करना.

#आदिगुरु आध्य #शंकराचार्य को लगने लगा था कि - केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है. इसके लिए अधर्मियों से युद्ध करने के लिए धर्मयोद्दाओं की भी आवश्यकता है. तब उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को मजबूत बनाए और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें.

इसके लिए उन्होंने कुछ ऐसे मठों का निर्माण किया, जिनमे व्यायाम करने और तरह तरह के शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा. आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं. कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए.

#शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि - मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें. इस तरह विदेशी और विधर्मी आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक भारत को सुरक्षा कवच देने का काम किया. विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं ने अनेकों युद्धों में हिस्सा लिया.

प्रथ्वीराज चौहान के समय में हुए मोहम्मद गौरी के पहले आक्रमण के समय सेना के पहुँचने से पहले ही नागा साधुओ ने कुरुक्षेत्र में गौरी की सेना को घेर लिया था जब गौरी की सेना कुरुक्षेत्र और पेहोवा के मंदिरों को नुकशान पहुंचाने की कोशिश कर रही थी. उसके बाद प्रथ्वी राज की सेना ने गौरी की सेना को तराइन (तरावडी) में काट दिया था.

इस युद्ध के बाद पड़े #कुम्भ में , नागा योद्धाओं को सम्मान देने के लिए, प्रथ्वीराज चौहान ने कुम्भ में सबसे पहले स्नान करने का अधिकार दिया था. तब से यह परम्परा चली आ रही है कि - #कुम्भ का पहला स्नान नागा साधू करेंगे. इन नागा धर्म योद्धाओं ने केवल एक में ही नहीं बल्कि अनेकों युद्धों में विदेशी आक्रान्ताओं को टक्कर दी.

दिल्ली को लूटने के बाद हरिद्वार के विध्वंस को निकले "तैमूर लंग" को भी हरिद्वार के पास हुई ज्वालापुर की लड़ाई में नागाओं ने मार भगाया था. तैमूर के हमले के समय जब ज्यादातर राजा डर कर छुप गए थे. जोगराज सिंह गुर्जर, हरवीर जाट, राम प्यारी, धूलाधाडी , आदि के साथ साथ नागा योद्धाओं ने तैमूर लंग को भारत से भागने पर मजबूर किया था.

इसी प्रकार खिलजी के आक्रमण के समय नाथ सम्प्रदाय के योद्धा साधुओं ने कडा मुकाबला किया था. अहेमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय जब उत्तर भारत के राजाओं ने नोटा दबा दिया था और मराठा सेना पानीपत में हार गई थी तब मथुरा - वृन्दावन - गोकुल की रक्षा के लिए 40,000 नागा योद्धाओं ने अब्दाली से टक्कर ली थी..

पानीपत की हार का बदला लेने के लिए जब पेशवा माधवराव ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था तो नागा योद्धाओं ने अब्दाली के स्थानीय मददगारों को मारा था. इस प्रकार आप अब यह समझ चुके होंगे कि - नागा साधू सनातन धर्म के रक्षक धर्म योद्धा हैं. यह सांसारिक सुखों से दूर रहकर केवल धर्म के लिए जीते हैं.

अब बात करते हैं कि - नागा साधू कौन बनते हैं तथा कैसे बनते है. नागाओं को आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है. नागा साधु बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन है. नागा साधु बनने के लिए इतनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इसे पार ही नहीं कर पाए इस प्रक्रिया को पूरा होने में कई साल लग जाते हैं.

जब कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है, तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता, पहले अखाड़ा अपने स्तर पर ये पता लगाता कि वह साधु क्यों बनना चाहता है? उस व्यक्ति की तथा उसके परिवार की संपूर्ण पृष्ठभूमि देखी जाती है. पहले उसे नागाा सन्यासी जीवन की कठिनता से परिचय कराया जाता है

अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है, तो ही उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है. अखाड़े में प्रवेश के बाद उसको ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जाती है. उसके तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं।

इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं. अगर अखाड़ा यह निश्चित कर लें कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है. इसके बाद वह अपना श्राद्ध, मुंडन और पिंडदान करते हैं तथा गुरु मंत्र लेकर संन्यास धर्म मे दीक्षित होते है. अपना श्राद्ध करने का मतलब सांसारिक रिश्तेदारों से सम्बन्ध तोड़ लेना.

कई अखाड़ों मे महिलाओं को भी नागा साधु की दीक्षा दी जाती है.वैसे तो महिला नागा साधु और पुरुष नागा साधु के नियम कायदे समान ही है, फर्क केवल इतना ही है की महिला नागा साधु को एक पीला वस्त्र लपेटकर रखना पड़ता है और यही वस्त्र पहन कर स्नान करना पड़ता है. उन्हें नग्न स्नान की अनुमति नहीं है,

जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है, तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है. उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं. ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं. इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं. यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं.

महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है. इसमें सबसे पहले उसे अपने बाल कटवाने होते हैं. अवधूत रूप में दीक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है. ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं. अब ये संसार और परिवार के लिए मृत हो जाते हैं. इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा.

नागा साधुओं को वस्त्र धारण करने की भी अनुमति नहीं होती. अगर वस्त्र धारण करने हों, तो सिर्फ गेरुए रंग का एक वस्त्र ही नागा साधु पहन सकते हैं. नागा साधुओं को शरीर पर सिर्फ भस्म लगाने की अनुमति होती है. नागा साधुओं को विभूति एवं रुद्राक्ष धारण करना पड़ता है, उन्हें अपनी चोटी का त्याग करना होता है और जटा रखनी होती है.

नागा साधुओं को 24 घंटे में केवल एक ही समय भोजन करना होता है. वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है. एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है. अगर सात घरों से भिक्षा मांगने पर कोई भिक्षा ना मिले, तो वह आठवे घर में भिक्षा मांगने भी नहीं जा सकता. उसे उस दिन भूखा ही रहना पड़ता है.

नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकता. नागा साधु केवल पृथ्वी पर ही सोते हैं. यह बहुत ही कठोर नियम है, जिसका पालन हर नागा साधु को करना पड़ता है. दीक्षा के बाद गुरु से मिले गुरुमंत्र में ही उसे संपूर्ण आस्था रखनी होती है. उसकी भविष्य की सारी तपस्या इसी गुरु मंत्र पर आधारित होती है.

कुम्भ मेले के अलावा नागा साधु पूरी तरह तरह से आम आवादी से दूर रहते हैं और गुफाओं, कन्दराओं मे कठोर तप करते हैं. ये लोग बस्ती से बाहर निवास करते हैं. ये किसी को प्रणाम नहीं करते है तथा केवल संन्यासी को ही प्रणाम करते हैं. ऐसे और भी कुछ नियम हैं, जो दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को पालन करना पड़ते हैं.

नागाओं को सिर्फ साधु नहीं, बल्कि योद्धा माना गया है. वे युद्ध कला में माहिर, क्रोधी और बलवान शरीर के स्वामी होते हैं. अक्सर नागा साधु अपने साथ तलवार, फरसा या त्रिशूल लेकर चलते हैं. ये हथियार इनके योद्धा होने के प्रमाण हैं, नागाओं में चिमटा रखना अनिवार्य होता है. चिमटा हथियार भी है और इनका औजार भी.

नागा साधू अपने भक्तों को चिमटे से छूकर ही आशीर्वाद देते हैं. माना जाता है कि- जिसको सिद्ध नागा साधू चिमटा छू जाए उसका कल्याण हो जाता है. आधुनिक आग्नेयास्त्रों के आने के बाद से इन अखाड़ों ने अपना पारम्परिक सैन्य चरित्र त्याग दिया है. अब इन अखाड़ों में सनातनी मूल्यों का अनुपालन करते हुए संयमित जीवन जीने पर ध्यान रहता है.

इस समय 13 प्रमुख अखाड़े हैं जिनमें प्रत्येक के शीर्ष पर महन्त आसीन होते हैं. प्रयागराज के कुंभ में उपाधि पाने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा, नासिक में उपाधि पाने वाले को खिचड़िया नागा कहा जाता है. इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है.

इन प्रमुख अखाड़ों के नाम प्रकार हैः श्री निरंजनी अखाड़ा, श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा, श्री महानिर्वाण अखाड़ा, श्री अटल अखाड़ा, श्री आह्वान अखाड़ा, श्री आनंद अखाड़ा, श्री पंचाग्नि अखाड़ा, श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, श्री वैष्णव अखाड़ा, श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा, श्री उदासीन नया अखाड़ा, श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा।

वरीयता के हिसाब से इनको कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव जैसे पद दिए जाते हैं. सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद सचिव का होता है. नागा साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं. तथा तपस्या करने के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं।

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10/01/2019

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10/08/2018

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