23/01/2024
सर्वस्व आहुति के इस यज्ञ में
मेरा अंश बहुत सूक्ष्म था
नन्ही गिलहरी के नख़ का क्षणाँश भी ना था
किंतु असंख्य लोगों की भांति
मेरा भी एक सुख स्वप्न था
के विराजोगे अपने मंदिर में, यह देख मेरी भी आंखें सुख पाएंगी
लेकिन काल की गति को, शायद यह मंजूर न था
कोई बल होता तो, किंचित थोड़ा ठहर जाती
आज के इस शुभ दिन पर मैं भी दीप जला पाती
कृपा से प्रभु तुम्हारे ही चरणों में जगह पाई है
पर क्या बिगड़ जाता, यदि मैं भी सभी की तरह तुमको यूं ही निहारती
आज खूब इतराओगे कि बरसों बाद अपने घर आए हो
हूँ मैं भी बहुत खुश करोड़ों तपस्यायें है आज पूरी हुई
पर प्रभु आप मुझे मेरे घर से थोड़े समय से पहले ले आए हो