03/06/2019
संघर्ष भाषा का ----- #मातृभाषा #राष्ट्रभाषा #राजभाषा
कल हमने देखा कि किस तरह से तमिलनाडु में हिन्दी भाषा को लेकर एक उग्र आंदोलन की चेतावनी दी गयी।
अब सवाल यह भी उठता है कि क्या इसतरह कि चेतावनी अंग्रेजी भाषा को लेकर भी मिल सकती है शायद,हाँ कहना थोड़ा सा मुश्किल हो खैर छोड़िये यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे कि पड़ोसी का भला नही होना चाहिए भले ही उसकी कीमत कुछ भी हो।
हम उस देश मे रहते हैं जिस देश कि संस्कृति और मूल ही अनेकता में एकता है,जिस देश का आभूषण पग-पग पर बदलती हुई भाषा और रंग रूप है,और इस पग-पग पर बदलती हुई भाषा और रंगरूप को संजोए रखना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती हैं।लेकिन जब हम इनसबसे आगे जाकर एक देश की कल्पना करते हैं तब कही न कही हमे एक बिंदु पर केंद्रित होना पड़ता है,और तब हमें यह भी ख्याल रखना पड़ता कि आखिर वे कौन से बिंदु हैं जिससे हमारी संस्कृति और सभ्यता भी और मजबूत बन सकती हैं। जब हम एक क्षेत्र में रहते है तब हमारी क्षेत्रीय भाषा हमारे लिए गर्व का विषय होना चाहिए लेकिन जब हम एक देश की कल्पना करते हैं तब यह क्लेश का कारण नही बनना चाहिए।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम परिस्थियों का आकलन सिर्फ वर्तमान को ध्यान में रखकर ही करते हैं।जबकि आज के वर्तमान की नींव बीता हुआ कल होती है,और इसको मजबूती आने वाला कल देता हैं।
इन सब तकरारों के बीच हमे लॉर्ड मैकाले का 1835 में ब्रिटिश संसद में दी गयी यह स्पीच भी सुननी चाहिए,जिसमे उन्होंने कहा कि-
--मैंने भारत की लंबाई और चौड़ाई में यात्रा की है और मैंने एक व्यक्ति को नहीं देखा है जो एक भिखारी है, जो एक चोर है। ऐसी दौलत मैंने इस देश में देखी है, ऐसे उच्च नैतिक मूल्य, ऐसे कैलिबर के लोग, कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश पर विजय प्राप्त करेंगे, जब तक कि हम इस राष्ट्र की रीढ़ नहीं तोड़ेंगे, जो उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है, और इसलिए, मैं प्रस्ताव करता हूं कि हम उसकी पुरानी और प्राचीन शिक्षा प्रणाली, उसकी संस्कृति को बदल दें, क्योंकि अगर भारतीयों को लगता है कि वह सब कुछ विदेशी और अंग्रेजी अच्छा है और अपने से बड़ा है, तो वे अपना आत्म-सम्मान खो देंगे, उनका मूल स्व- संस्कृति और वे वही बन जाएंगे जो हम उन्हें चाहते हैं, एक सही मायने में वर्चस्व वाला राष्ट्र। ”
भाषा सम्प्रेषण का माध्यम और संपर्क का साधन होने के साथ-साथ संस्कृति व संस्कार के संरक्षण,संवर्धन व संवहन का साधन हो न कि टकराव का कारण।
मुकेश कुमार सिंह