25/09/2026
मेरे नानी का घर फर्रुखाबाद में था। एक ट्रेन हुआ करती थी, जिसके आगे भाप का काला इंजन लगा होता था। आज के बच्चों को शायद यह बात कुछ अजीब लगे, लेकिन हमारे बचपन में हम उसे ट्रेन नहीं, छुक-छुक गाड़ी कहा करते थे। और सच कहूँ तो उस गाड़ी में बैठकर नानी के घर जाना मेरे बचपन की उन यादों में से है, जिन्हें उम्र के इतने लंबे सफर के बाद भी मन ने जाने क्यों बिल्कुल संभालकर रखा है।
उस समय ट्रेन आज की तरह चुपचाप नहीं चलती थी। उसके आने की खबर बहुत पहले मिल जाती थी। दूर कहीं से इंजन की आवाज सुनाई देती, फिर काले धुएँ का गुबार दिखाई देता और थोड़ी देर बाद वह काला-काला इंजन सामने आ जाता। पहले उसकी आवाज आती—छू... छू... छू...
फिर पहियों की छुक-छुक तेज होती जाती और उसके पीछे लगे लाल रंग के छोटे-छोटे डिब्बे भी जैसे उसके साथ भागने लगते। और फिर अचानक उसका वह लंबा हॉर्न—कूऊऊऊऊऊऊऊऊ...!
पता नहीं उस आवाज में ऐसा क्या था कि मेरे जैसे छोटे बच्चे का मन एकदम खिल उठता था। मुझे इंजन से न जाने क्यों बहुत प्यार था। उसके काले शरीर को देखते रहना, ऊपर से निकलते धुएँ को देखते रहना, उसकी आवाज सुनना और खिड़की के पास बैठकर यह देखना कि धुआँ हवा में पीछे की ओर कैसे भाग रहा है, मेरे लिए यात्रा से कम खुशी की बात नहीं थी। मुझे तब क्या मालूम था कि किसी दिन यही इंजन मेरे बचपन की सबसे प्यारी यादों में बदल जाएगा।
एक बार नानी के घर कोई शादी-ब्याह का कार्यक्रम था। मम्मी और घर के बाकी लोग पहले ही फर्रुखाबाद चले गए थे। पीछे रह गए थे सिर्फ मैं और पिता जी। सुबह करीब पाँच बजे की ट्रेन थी। मुझे आज ठीक-ठीक समय तो याद नहीं, लेकिन शायद दोपहर के आसपास वह हमें फर्रुखाबाद पहुँचाती थी। सुबह-सुबह मैं बड़े उत्साह से तैयार हुआ था। नानी के घर जाना था और ऊपर से ट्रेन में बैठकर जाना था, इसलिए मेरे लिए उस दिन से बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती थी। लेकिन एक बात मुझे तब बड़ी अजीब लगी थी—मैं तो जैसे राजा बाबू बनकर तैयार हुआ था, जबकि पिता जी ने घर में पहनने वाले बिल्कुल सामान्य कपड़े ही पहन रखे थे। उस उम्र में मुझे लगा कि नानी के घर जा रहे हैं तो पिता जी को भी अच्छे कपड़े पहनने चाहिए थे। मुझे कहाँ मालूम था कि कुछ घंटों बाद यही सामान्य कपड़े अपने भीतर भाप के इंजन की एक पूरी कहानी समेटे होंगे।
हम उस समय की ट्रेन को देखकर ही खुश हो जाते थे। मुश्किल से चार-पाँच डिब्बे होते थे। लाल रंग के डिब्बे और आगे काला-काला इंजन। लकड़ी की सीटें, खुली खिड़कियाँ और बाहर भागती हुई दुनिया। आज के डिब्बों की तरह न इतनी भीड़ में चमकते हुए सामान, न हर जगह खाने-पीने की दुकानें और न यात्रा को लेकर इतनी भागदौड़। यात्रा जैसे धीरे-धीरे हमारे सामने खुलती थी। बच्चा खिड़की के पास बैठता और बाहर की दुनिया को अपनी आँखों से पकड़ने की कोशिश करता रहता। खेत आते, पेड़ आते, गाँव आते और फिर सब पीछे छूट जाता। कभी लगता हम बहुत तेज भाग रहे हैं और कभी लगता कि पेड़ और खेत ही हमारे साथ दौड़ रहे हैं।
उस समय हमारे यहाँ से कोई फर्रुखाबाद जाता तो टिकट नहीं लेता था और उधर से जो लोग आते थे, वे भी टिकट नहीं लेते थे। इसका कारण यह था कि मेरे नाना जी ट्रेन में गार्ड थे और मामा जी फर्रुखाबाद स्टेशन पर ही काम करते थे। इसलिए जब टीटी आता तो बस इतना बता देते कि हम लोग “शुक्ल जी के घर से हैं।” और बात खत्म। बचपन में मुझे यह सब बिल्कुल सामान्य लगता था। शायद मुझे लगता था कि ट्रेन में यात्रा करने के लिए टिकट से ज्यादा जरूरी यह जानना है कि आप किसके घर से हैं।
लेकिन उस यात्रा में मेरे लिए सबसे खास स्टेशन कन्नौज हुआ करता था। कानपुर से निकलने के बाद जब कन्नौज आता तो मुझे लगता कि अब फर्रुखाबाद आधा ही बचा है। बच्चों को समय और दूरी का हिसाब भी कितना अलग होता है। आज कोई पूछे कि फर्रुखाबाद कितने किलोमीटर है तो शायद हम किलोमीटर बताएँगे, लेकिन उस समय मेरे लिए कन्नौज एक पैमाना था—कन्नौज आ गया मतलब आधा रास्ता खत्म।
और कन्नौज की अपनी दो खास चीजें थीं—चाय और कलावती के गट्टे।
उस समय चाय आज की तरह हर आदमी की जिंदगी का हिस्सा नहीं थी। हमारे यहाँ मैंने लोगों को चाय कहते कम और “चा” या “चाह” कहते ज्यादा सुना था। स्टेशन पर चाय किसी मशीन से नहीं निकलती थी। एक बड़ा-सा पीतल का बर्तन होता था, नीचे अंगीठी जलती रहती थी और उसी में चाय गर्म होती रहती। पिता जी अपना सामान खोलते और उसमें से लोटा और गिलास निकालते। चाय वाले को एक रुपया या शायद पचास पैसे देते और चाय लोटे में भरवा लेते। आज यह दृश्य शायद किसी को कहानी जैसा लगे, लेकिन तब यात्रा में अपना लोटा और गिलास लेकर चलना बिल्कुल सामान्य था। लोग पानी भी साथ लेकर चलते थे और खाने का सामान भी। स्टेशन पर आज की तरह खाने-पीने का बाजार नहीं होता था। यात्रा का मतलब था—अपनी जरूरत की चीजें अपने साथ लेकर चलना।
और तभी थोड़ी देर बाद ट्रेन में वह आवाज सुनाई देती थी जिसका मुझे सबसे ज्यादा इंतजार रहता था—“गट्टे ले लो... गट्टे... कलावती के गट्टे!” मुझे आज तक नहीं मालूम कि कलावती कौन थीं, लेकिन बचपन में मेरे लिए कलावती कोई व्यक्ति नहीं थीं, वह एक मिठास थीं। कागज के बने छोटे-से डिब्बे में लंबे-लंबे आकार के करीब बारह मीठे गट्टे होते थे। आज मिठाई की दुकानों में सैकड़ों चीजें मिल जाती हैं, लेकिन उस समय ऐसी चीजें रोज-रोज देखने को नहीं मिलती थीं। हमारे घर से कोई फर्रुखाबाद जाता तो गट्टे जरूर लेकर जाता और फर्रुखाबाद से कोई कानपुर आता तो उसके हाथ में भी गट्टों के डिब्बे जरूर होते। किसी रिश्तेदार के लिए, किसी बच्चे के लिए या बस इसलिए कि रास्ते में किसी के चेहरे पर खुशी आ जाए।
उस दिन कन्नौज आते ही पिता जी ने चाय ली और थोड़ी देर बाद गट्टे वाला भी आ गया। पिता जी ने तुरंत चार डिब्बे खरीद लिए। चार डिब्बे देखकर मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ। मैंने तुरंत अपना हिसाब लगा लिया—ज्यादा से ज्यादा दो डिब्बे नानी के यहाँ देंगे, बाकी दो तो अपने हैं। उस उम्र में खुशी का गणित भी कितना सीधा होता है। लेकिन नानी के घर पहुँचने के बाद जब देखा कि पिता जी चारों डिब्बे चारों मामाओं के घर देने के लिए ले गए, तो मेरे मन का सारा हिसाब वहीं खत्म हो गया। चारों डिब्बे चले गए और मेरे हिस्से में बस उनकी याद रह गई।
कन्नौज से ट्रेन आगे चली तो गुरसहायगंज, फिर कमालगंज और आखिर में फतेहगढ़ आया। यहीं पहुँचकर पिता जी ने अपना सामान खोला और कपड़े बदलने लगे। मैं फिर हैरान था। सुबह तो मैं इसलिए हैरान हुआ था कि नानी के घर जाने के लिए पिता जी ने अच्छे कपड़े क्यों नहीं पहने और अब वह अचानक कपड़े क्यों बदल रहे हैं। उस समय मुझे भला क्या मालूम कि इसके पीछे मेरा वही प्यारा भाप का इंजन था।
अनवरगंज से फर्रुखाबाद जाने वाली उस रेलगाड़ी की एक और चीज मुझे बहुत याद आती है—रेल की पटरियों के साथ-साथ चलती हुई वह सड़क।
खिड़की से बाहर देखता तो लगता था जैसे हमारी छुक-छुक गाड़ी अकेली नहीं जा रही। उसके साथ एक सड़क भी लगातार दौड़ रही है। कभी वह पटरियों के बिल्कुल पास आ जाती, कभी थोड़ी दूर चली जाती और फिर अचानक किसी मोड़ से निकलकर दोबारा हमारे साथ आ खड़ी होती। ट्रेन अपनी रफ्तार में आगे भागती और सड़क भी जैसे अपनी पूरी ताकत लगाकर हमारे साथ दौड़ती रहती। बचपन में मुझे समझ ही नहीं आता था कि सड़क हमें पीछे छोड़ क्यों नहीं देती और हम उसे हमेशा आगे निकलकर फिर पीछे कैसे छोड़ आते हैं।
रास्ते में कहीं-कहीं सड़क के ऊपर बनी छोटी-सी क्रॉसिंग आती थी। जैसे ही ट्रेन उसके पास पहुँचती, सड़क पर चल रहे लोग और बैलगाड़ियाँ रुक जातीं। कोई साइकिल वाला उतरकर खड़ा हो जाता, कोई मोटरसाइकिल रोक देता और कोई दूर से ही ट्रेन को देखने लगता। हमें लगता जैसे पूरी सड़क हमारी छुक-छुक गाड़ी को रास्ता देने के लिए कुछ पल के लिए ठहर गई हो। ट्रेन क्रॉसिंग पार करती और हम खिड़की से गर्दन निकालकर पीछे देखते रहते कि अभी-अभी जो लोग रुके थे, वे अब क्या कर रहे होंगे।
कहीं सड़क के किनारे छोटा-सा गाँव दिखाई देता। मिट्टी या ईंट के घर, बाहर बंधे जानवर, किसी पेड़ के नीचे बैठे दो-चार आदमी और सड़क पर धीरे-धीरे चलता कोई किसान। कई बार लगता कि ट्रेन के साथ-साथ पूरा गाँव भी कुछ दूर तक चल रहा है। फिर अचानक खेत आ जाते और घर पीछे छूट जाते। गेहूँ या धान के खेतों के बीच से सड़क एक पतली लकीर की तरह आगे निकलती दिखाई देती और हमारी रेल उसकी बगल में अपनी काली पटरियों पर दौड़ती रहती।
सबसे मजेदार बात यह थी कि उस उम्र में मुझे सड़क और रेल में कोई फर्क ही नहीं लगता था। मुझे लगता था दोनों एक-दूसरे से दौड़ लगा रहे हैं। ट्रेन कभी आगे निकलती, फिर कोई मोड़ आने पर सड़क गायब हो जाती और थोड़ी देर बाद वही सड़क किसी दूसरे मोड़ से फिर सामने आ जाती। मैं खिड़की से बाहर आँखें गड़ाकर उसे ढूँढता रहता—“अरे, सड़क कहाँ गई?”
और जब वह फिर दिखाई देती तो मन को जैसे कोई अपना मिल जाता।
आज सोचता हूँ तो लगता है, वह सड़क केवल सड़क नहीं थी। वह भी मेरी उस यात्रा का हिस्सा थी। एक तरफ लोहे की पटरी पर धुआँ उड़ाती हमारी काली छुक-छुक गाड़ी थी और दूसरी तरफ मिट्टी-धूल से भरी वह सड़क, जिस पर गाँव, खेत, बैलगाड़ियाँ, साइकिलें और लोग अपनी-अपनी दुनिया लेकर हमारे साथ फर्रुखाबाद की ओर चले जा रहे थे।
उस छोटी-सी खिड़की से मुझे तब शायद पूरी दुनिया इतनी ही बड़ी दिखाई देती थी—एक ट्रेन, उसके साथ दौड़ती सड़क, रास्ते में आते छोटे-छोटे गाँव और हर थोड़ी देर में कोई क्रॉसिंग।
और मैं उन सबको पीछे छूटते हुए देखकर भी बार-बार आगे देखने लगता था, क्योंकि मुझे पता था कि कहीं आगे फर्रुखाबाद है… और फर्रुखाबाद में मेरी नानी का घर।
भाप के इंजन कोयले से चलते थे। जैसे-जैसे इंजन की गति बढ़ती थी, वैसे-वैसे उसके धुएँ के साथ कोयले की राख और छोटे-छोटे कण पीछे के डिब्बों तक उड़ते चले आते थे। खिड़की के पास बैठा आदमी तो जैसे उस धुएँ और राख का सबसे आसान शिकार होता था। वे दोनों हवा के साथ अंदर आते और बालों से लेकर कपड़ों तक अपना निशान छोड़ जाते। अगर कपड़े सफेद हों तो यात्रा खत्म होते-होते उनकी सफेदी का पता लगाना मुश्किल हो जाता। इसलिए अपनी ससुराल जाने वाले पिता जी फर्रुखाबाद से करीब पाँच किलोमीटर पहले फतेहगढ़ में कपड़े बदल लेते थे। उस समय मुझे यह बात समझ नहीं आई थी, लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है कि मेरे पिता जी ने यात्रा की एक ऐसी समझ अपने अनुभव से सीख रखी थी, जो उस समय के बच्चे किताबों में नहीं सीख सकते थे।
फर्रुखाबाद स्टेशन पर मामा जी हमारा इंतजार कर रहे थे। हमारे लिए वे एक इक्का लेकर आते थे। इक्का भी आज के बच्चों के लिए शायद किसी पुराने किस्से का शब्द हो गया है। इक्का तांगे से अलग होता था। उसमें दो-तीन लोग बैठते थे, जबकि तांगे में चार-पाँच लोग आ जाते थे। दोनों घोड़े से चलते थे, दोनों आगे से उठे हुए होते थे और दोनों पर सजावट होती थी, लेकिन इक्का छोटा और थोड़ा निजी-सा लगता था। कानपुर में खड़खड़ा भी होता था, जो मुख्यतः सामान ढोने के काम आता था। आज की सड़क पर कार, बस और बाइक के बीच उस समय घोड़े की टाप और इक्के के पहियों की आवाज भी जीवन का हिस्सा हुआ करती थी।
हम दोनों इक्के पर बैठकर नानी के घर चल पड़े। नानी का घर स्टेशन से बहुत दूर नहीं था, बमुश्किल दो किलोमीटर, बजरिया निहाल चन्द्र। लेकिन मेरे लिए उस समय वह आखिरी दो किलोमीटर भी किसी बड़ी यात्रा का हिस्सा था। ट्रेन पीछे छूट गई थी, लेकिन उसका धुआँ जैसे अभी भी मेरे कपड़ों में था। कानों में उसका हॉर्न था, आँखों में लाल डिब्बे थे और मन में वही चार गट्टों का हिसाब। इक्के के पहिए धीरे-धीरे घूम रहे थे और मुझे मालूम था कि बस थोड़ी देर में नानी सामने होंगी।
उस समय मुझे क्या पता था कि जिंदगी में एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं पचास साल का हो जाऊँगा और पीछे मुड़कर देखूँगा तो नानी का वह घर, फर्रुखाबाद का वह स्टेशन, कन्नौज का वह पीतल का बर्तन, लोटे में भरी चाय, कलावती के गट्टे, फतेहगढ़ में पिता जी के बदले हुए कपड़े और वह इक्का—सब एक साथ मेरी आँखों के सामने खड़े हो जाएँगे।
आज पचास साल का हो गया हूँ। जिंदगी ने इस बीच न जाने कितनी यात्राएँ कराईं। न जाने कितनी ट्रेनें देखीं, कितने स्टेशन आए और कितने पीछे छूट गए। अब ट्रेनें बहुत तेज चलती हैं। उनके डिब्बे आरामदायक हैं, खिड़कियाँ बंद रहती हैं, चाय कप में मिलती है और रास्ते की हर जरूरत प्लेटफॉर्म पर मिल जाती है। लेकिन जाने क्यों उन सुविधाओं के बीच मन कभी-कभी उसी पुरानी ट्रेन को ढूँढ़ता है। उस काले इंजन को, जिसकी धुआँ छोड़ती हुई देह मुझे इतनी प्यारी थी; उन लाल डिब्बों को, जिनकी लकड़ी की सीट पर बैठकर मुझे लगता था कि दुनिया मेरे साथ दौड़ रही है; उस हॉर्न को, जिसकी आवाज आज भी कहीं भीतर सुनाई देती है।
अब समझ आता है कि उस बच्चे को भाप के इंजन से इतना प्रेम क्यों था। वह इंजन सिर्फ कोयले और पानी से नहीं चलता था, वह मेरी छोटी-सी दुनिया को अपने साथ लेकर चलता था। उसकी एक सीटी मुझे नानी के घर पहुँचा देती थी, उसकी छुक-छुक मुझे मामाओं के पास ले जाती थी और उसके पीछे उड़ता हुआ धुआँ जैसे मेरे बचपन को आसमान में लिखता हुआ चला जाता था।
शायद इसलिए आज भी किसी पुराने इंजन की तस्वीर सामने आ जाए तो मैं उसे कुछ देर तक देखता रहता हूँ। मुझे उसमें कोई पुरानी मशीन नहीं दिखाई देती। मुझे उसमें वही बच्चा दिखाई देता है जो कभी कानपुर अनवरगंज स्टेशन पर पिता जी का हाथ पकड़े खड़ा था और सामने खड़े काले इंजन को देखकर खुशी से भर गया था।
वह बच्चा अब पचास साल का हो चुका है।
लेकिन सच कहूँ तो वह पूरी तरह बड़ा कभी हुआ ही नहीं।
वह आज भी कहीं भीतर बैठा है और किसी सुबह अचानक अगर दूर से कोई आवाज आए—छू... छू... छू...—तो उसकी आँखें आज भी उसी तरह चमक उठती हैं।
उसे लगता है...
नानी के घर जाने वाली छुक-छुक गाड़ी फिर आ गई है।