29/11/2018
C/p
नवोदय : अमीरी दिल से
इसकी शुरुआत तब से हुई थी जब एक कमरे में 20 लोगों ने रहना शुरू किया था । रहने के लिए इनके पास कीलों से छेद की हुई दिवालें , हाथ से पंखी रोकने का करतब दिखाने के कारण टेढे हुए पंखे , बिना दरवाजे की अलमारियां , ओर नीचे से टूटे संडास के गेट । यही चीजे थीं । होस्टल के बाहर लगे हुए हर पेड़ में एक क्रिकेट की पिच नज़र आना , या फिर होस्टल में ही मोजे की गेंद बना कर उससे खेलना । खाने के नामपर ये दोस्त की गलियों और होस्टल में पड़ी पुरानी रोटियों से काम चलाते । रहीसी इन्हें कभी नहीं भाती , अगर संडे को माता पिता ने ट्राला भर भी खाने का सामान भेजा हो तो उसे उसी दिन अपने जैसे बाकी नंगे भूखे मित्रो में बाढ़पीड़ितों की तरह बांट कर फिर रात में अलमारी में पड़ी रोटी को ढूंढना इनका हर संडे का काम था । मोबाइल के अभाव में आज तक इन्होंने प्रेमपत्र को आदान प्रदान करने की प्रथा को जिंदा रखा । जहाँ चार लोगों के परिवार में एक टीवी के रिमोट से झगड़ा हो जाता है वहीं ये 250 लोग एक साथ टीवी देखते हैं । बाहरी बच्चे बिस्तर पर अपने टेडी , गेजेट के साथ सोते वहीं इनके सिरहाने एक चिट्ठी रखी हुई है , जो कल घर भेजना है लिखा हुआ है में सकुशल हूँ , आशा करता हूँ आप भी सकुशल होंगे , मम्मी आपके हाथ का हलवा ले आना याद आती है । टाइम पास के नाम पर इनके पास अपनी उँगलियों पर थाली घुमाने की कला है । माना कि होंगे विश्व मे अच्छे बावर्ची पर बिना मसाले की सब्जी बनाना केवल इन्हें आता है । जहाँ भारत मे अधिकतर बच्चे बिस्तर में शुशु करने के कारण डांट खा रहे होते हैं इन्होंने अपने कपड़े भी धुलना शुरू कर दिया है । इन्हें "बेटा उठ जा स्कूल जाना है " वाली ममतामयी आवाज़ नहीं उठती ,डर उठाता है । इनके पास नाईट गाउन नहीं होता ये चड्डी पर ही सो जाते हैं , कइयों में तो छेद भी होता है । इन्हें सोने के लिए छातीपर थपकार देने वाला कोई नहीं होता , स्वतः सो जाते हैं, उठना जो है । ना तो भाई बहिन है ना कजिन है , इसलिए कभीकभार खुद ही आपस में झगडलेते हैं ओर पता है कोई मनाने वाला नहीं आएगा तो खुद ही दोस्ती भी कर लेते हैं - पर सबसे खाश , ये खुश हैं , ये नवोदय के बच्चे हैं । इन्होंने सीख लिया महँगी-महँगी वस्तु कभी खुशी नहीं देती हैं , ओर अगर देतीं हैं तो उनके चेहरे पर खिलखिलाहट कैसें ?
इसी अनुभव के आधार पर कभी अपने मोटिवेशनल लेक्चर में तो कभी कभी अपने लेक्चर में , बड़े दम-खम से कहता हूँ , चीजो से पैसे से खुशी नहीं आती - लोगों से आती है , प्रेम से आती है और कहते हुए वही दीवार , गेट , पंखा, रोटी , मन ही मन में दिख रहे होते हैं ।
~अनुभव मिश्र
ज न वि गोंडा
1988-1995
First batch