Raghav Sharma

Raghav Sharma इंसान को उस जगह हमेशा 'खामोश' रहना चाहि?

"To this end, the greatest asset of a school is the personality of the teacher." ~John Strachan.
19/03/2024

"To this end, the greatest asset of a school is the personality of the teacher." ~John Strachan.

जीवन में दो परीक्षाएं अवश्य पास करना,सुख में 'विनम्रता' की और दुःख में 'धैर्य' की ।।।शुभप्रभात।।राम राम जी
16/02/2024

जीवन में दो परीक्षाएं अवश्य पास करना,
सुख में 'विनम्रता' की और दुःख में 'धैर्य' की ।
।।शुभप्रभात।।
राम राम जी

🤣🤣🤣🤣
05/08/2023

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कासगंज के चंदन गुप्ता को पहचानते होंगे! सीएम योगी के कट्टर समर्थक थे। कट्टर इतने की उनके सीएम बनने पर भंडारा किया था। 26...
03/08/2023

कासगंज के चंदन गुप्ता को पहचानते होंगे!
सीएम योगी के कट्टर समर्थक थे। कट्टर इतने की उनके सीएम बनने पर भंडारा किया था।
26 जनवरी 2018 को विहिप ने तिरंगा यात्रा के लिए प्रशासन से इजाजत मांगी। प्रशासन ने मना कर दिया। क्योंकि हालात बेहतर नहीं थे।
इसके बाद भी करीब 100 की संख्या में बाइक से तिरंगा यात्रा निकाली गई। मुस्लिम गलियों में जमकर नारेबाजी हुई। इस दौरान झड़प हो गई। गोलियां चली। एक गोली चंदन को आकर लगी और मौके पर ही मौत हो गई।

इसके बाद जमकर हंगामा हुआ। मुस्लिमों की दुकानें जलाई गई। प्रशासन को तीन दिन तक इंटरनेट बंद करना पड़ा। कई दिग्गज नेता चंदन की अंतिम यात्रा में पहुंचे। परिवार को आर्थिक मदद, बहन को नौकरी, चौक पर मूर्ति लगवाने का वादा किया। बहन को नौकरी मिली लेकिन 6 महीने बाद ही उस पद को खत्म करके उन्हें निकाल दिया। चौक पर मूर्ति लगी लेकिन आज भी ढकी हुई है। किसी नेता को फुर्सत नहीं कि उसका उद्धाटन कर सके।

परिवार कोर्ट-कचेहरी के चक्कर में फंसा हुआ है। जो उस वक्त चंदन गुप्ता अमर रहे कर रहे थे अब वह भूल गए। चंदन की मां बताती हैं कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इंसाफ मांगने जनता दरबार में गई थीं, लेकिन वहां अफसरों ने उन्हें बेइज्जत करके भगा दिया। पड़ोसी ताना मारते हैं कि बेटा बीजेपी समर्थक था, तो अब कोई पूछता क्यों नहीं..?

यह सब बातें इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि हर 6 महीने में दंगो की भेंट ऐसे ही मामूली परिवारों के लोग चढ़ते हैं। इनकी लाशों पर सियासत होती है। खूब वादे होते हैं लेकिन हकीकत में कुछ नहीं बदलता।

#सलाह सिर्फ इतनी है कि जब आप नहीं थे तब भी धर्म था, जब आप नहीं रहेंगे तब भी धर्म रहेगा। आपके बचाने से बचेगा नहीं, किसी के चाहने से खत्म नहीं होगा।
आप बस अपना ख्याल रखिए। उग्रता और कट्टरता से दूर रहिए। सोशल मीडिया पर जो आपको भड़का रहे हैं इनके पास अच्छी नौकरी है। इनके बच्चे सेट हैं। नेताओं के बच्चे तो विदेश में पढ़ते हैं। आपको अपना देखना है।
राम राम जी

अब से 150 वर्ष,(कृपया पूरा पढ़ें)अब से 150 साल बाद, आज इस पोस्ट को पढ़ने वाले हममें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा। अभी हम जि...
28/07/2023

अब से 150 वर्ष,
(कृपया पूरा पढ़ें)

अब से 150 साल बाद, आज इस पोस्ट को पढ़ने वाले हममें से कोई भी जीवित नहीं रहेगा। अभी हम जिस चीज पर लड़ रहे हैं उसका 70 प्रतिशत से 100 प्रतिशत पूरी तरह से भुला दिया जाएगा। शब्द को पूरी तरह से रेखांकित करें।

अगर हम अपने से 150 साल पहले की स्मृतियों में जाएं, तो वह 1872 होगा, उस समय दुनिया को अपने सिर पर उठाने वालों में से कोई भी आज जीवित नहीं है। इसे पढ़ने वाले हममें से लगभग सभी को उस युग के किसी भी व्यक्ति के चेहरे की कल्पना करना मुश्किल होगा।

थोड़ी देर रुकें और कल्पना करें कि कैसे उनमें से कुछ ने अपने रिश्तेदारों को धोखा दिया और दर्पण के एक टुकड़े के लिए उन्हें दास के रूप में बेच दिया। कुछ लोगों ने ज़मीन के एक टुकड़े या रतालू या कौड़ियों के कंद या एक चुटकी नमक के लिए परिवार के सदस्यों को मार डाला। वह रतालू, कौड़ी, दर्पण, या नमक कहाँ है जिसका उपयोग वे डींगें हांकने के लिए कर रहे थे? यह अब हमें अजीब लग सकता है, लेकिन हम इंसान कभी-कभी कितने मूर्ख होते हैं, खासकर जब बात पैसे, ताकत या प्रासंगिक बनने की कोशिश की आती है!

यहां तक ​​कि जब आप दावा करते हैं कि इंटरनेट युग आपकी याददाश्त को सुरक्षित रखेगा, उदाहरण के तौर पर माइकल जैक्सन को लें। आज से ठीक 13 साल पहले 2009 में माइकल जैक्सन की मौत हो गई थी. कल्पना कीजिए कि जब माइकल जैक्सन जीवित थे तो उनका पूरी दुनिया पर कितना प्रभाव था। आज के कितने युवा उन्हें विस्मय के साथ याद करते हैं, यानी क्या वे उन्हें जानते भी हैं? आने वाले 150 वर्षों में, जब भी उनके नाम का उल्लेख किया जाएगा, बहुत से लोगों के लिए कोई घंटी नहीं बजेगी।

आइए जीवन को आसान बनाएं, इस दुनिया से कोई भी जीवित नहीं जाएगा। . . जिस भूमि के लिए आप लड़ रहे हैं और मरने-मारने को तैयार हैं, उस भूमि को किसी ने छोड़ दिया है, वह व्यक्ति मर चुका है, सड़ चुका है, और भुला दिया गया है। वही तुम्हारा भी भाग्य होगा. आने वाले 150 वर्षों में, आज हम जिन वाहनों या फ़ोनों का उपयोग डींगें हांकने के लिए कर रहे हैं उनमें से कोई भी प्रासंगिक नहीं रहेगा। बाइको, जीवन को आसान बनाओ!

प्रेम को नेतृत्व करने दो। आइए एक-दूसरे के लिए सचमुच खुश रहें। कोई द्वेष नहीं, कोई चुगली नहीं. कोई ईर्ष्या नहीं. कोई तुलना नहीं। जीवन कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है. दिन के अंत में, हम सभी दूसरी ओर चले जायेंगे। यह सिर्फ एक सवाल है कि वहां पहले कौन पहुंचता है, लेकिन निश्चित रूप से हम सभी एक दिन वहां जाएंगे।
Cp

 #कितने_मददगार_हैं_हम_?जब " टाईटेनिक "  समुद्र मे डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफि...
09/06/2023

#कितने_मददगार_हैं_हम_?

जब " टाईटेनिक " समुद्र मे डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरो को बचा सकते थे I

सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम "SAMSON " था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दुरी पर था I

सैमसन के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक कि ओर से फायर किए गए सफेद शोले ( जो इमरजेंसी वाली हालत मे जहाज से हवा मे फायर किया जाता है) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरो के चिल्लाने के आवाज़ को भी सुना भी था I

लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बहुत कीमती समुद्री जीवो का शिकार कर रहे थे और नही चाहते थे कि पकड़े जाए लिहाजा वो टाईटेनिक की हालात को देखते हुए भी मदद न करके अपनी जहाज़ को दुसरे तरफ़ मोड़ कर चले गए...

" ये जहाज़ हम मे से उन लोगो कि तरह है जो अपनी गुनाहो भरी जिन्दगी मे इतने मग़न हो जाते है कि उनके अंदर से इन्सानियत का एहसास खत्म हो जाता है और फिर वो सारी जिन्दगी अपने गुनाहो को छिपाते गुजार देते है I"

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम "

"CALIFORNIAN " था जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की तरफ़ से मदद की पुकार को सुना..

और बाहर निकल कर सफेद शोलों अपनी आखो से देखा लेकिन क्योकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानो (आइसबर्ग्स ) से घिरा हुआ था I

और उसे उस चट्टानो के चक्कर काट कर जाना पड़ता इसलिए वो कैप्टन मदद को ना जा कर अपने बिस्तर मे चला गया और सुबह होने का इन्तेजार करने लगा I

जब सुबह वो टाईटेनिक के लोकेशन पर पहुचा तो टाईटेनिक को समुद्र कि तह मे पहुचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन Adword_Smith समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे I

" ये जहाज़ हम लोगो मे से उनकी तरह है जो किसी की मदद करने अपनी सहूलत और असानी देखते है और अगर हालात सही ना हो तो किसी की मदद करना अपना फ़र्ज़ भूल जाते है I "

तीसरा जहाज़ "CARPHATHIYA" था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफिरो की चीख पुकार सुनी..

जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोडा और बर्फ़ की चट्टानो और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बेगैर, मदद के लिए रवाना हो गया I

हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुच सका लेकिन यही वो जहाज़ था। जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरो को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचाया था I

उस जहाज़ के कैप्टन "आर्थो रोसट्रन " को ब्रिटेन के इतिहास मे चंद बहादुर कैप्टनो मे शुमार किया जाता है और उनको कई समाजिक और सरकारी आवार्ड से भी नवाजा गया I

याद रखिए!
हमारी जिन्दगी मे हमेशा मुश्किलें रहती है, चैलेंज रहते है लेकिन जो इस मुश्किलात और चैलेंज का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए उन्हे ही इन्सान और इंसानियत सदैव याद करती है I

लेखक-अज्ञात से साभार

'फूटी कौड़ी' शुरूआत की एक 'करन्सी' थी जिसकी क़ीमत सबसे कम थी3 फूटी कौड़ियों से 1 'कौड़ी' बनती थी और 10 कौड़ियों से 1 'दम...
31/05/2023

'फूटी कौड़ी' शुरूआत की एक 'करन्सी' थी जिसकी क़ीमत सबसे कम थी
3 फूटी कौड़ियों से 1 'कौड़ी' बनती थी और 10 कौड़ियों से 1 'दमड़ी'।कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना सिक्का शायद यही 'फूटी कौड़ी' है।
यह 'फूटी कौड़ी' फटा हुआ घोंटा है जिसे 'कौड़ी' नाम से जाना गया। इसका प्रयोग सिन्ध घाटी में करेन्सी के रूप में किया गया। कुदरती तौर पर घोंघों की पैदावार सीमित मात्रा में थी। इसके सीमित मात्रा में उपलब्ध होने का यह अर्थ लगाया गया कि यह मूल्यवान है। इसे बाद में रूपया कहा जाने लगा।
1 रूपया 128 धुले, 192 पाई, या 256 दमड़ियों के बराबर था।
इनके साथ 10 भिन्न-भिन्न सिक्के थे जिन्में : - कौड़ी, > दमड़ी > दमफ > पाई > धेला > पैसा > टिक्का > आना > दुअन्नी > चवन्नी > अठन्नी और फिर कहीं जाकर रुपया बनता था।
करेन्सी की क़ीमत निम्नलिखित थी : -
3 फूटी कौड़ी = 1 कौड़ी
10 कौड़ी = 1 दमड़ी
2 दमड़ी = 1.50 पाई
1.50 पाई = 1 धेला
2 धेला = 1 पैसा
3 पैसा = 1 टकः
2 टके = 1 आना
4 आने = 1 चवन्नी
8 आने = 1 अठन्नी
16 आने = 1 रुपया
क्योंकि सबसे बड़ा और संपूर्ण हैसियत रुपया की थी जिसमें 16 आने होते थे इसलिए बात का सोलह आने सच होने का मतलब शत प्रतिशत सच होने के समान होता है।

~ जानकारी मेरी ओर से जुटाई नहीं गई है कृपया पुष्टि करें....

30/05/2023

गंगा दशहरा की शुभकामनाएं देते हुए ध्यान में रखियेगा,

1.गंगाजी में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक प्रतिदिन 144.2
मिलियन क्यूबिक मलजल प्रवाहित किया जाता है।
2. गंगाजी में लगभग 3840 नाले गिरते है।
3. गंगाजी तट पर स्थापित औद्योगिक इकाईया प्रतिदिन 430 मिलियन लीटर जहरीले अपशिष्ट का उत्सर्जन करती है जो सीधे गंगा में बहा दिया जाता है।
4. लगभग 172.5 हजार टन कीटनाशक रसायन और खाद हर वर्ष गंगाजी में पहुँचता है।
5.वर्तमान समय में गंगाजी में डालफिन लुप्तप्राय है. उत्तर प्रदेश में मात्र 100 बची हैं।
6.गंगाजी किनारे तीन किलोमीटर के दायरे में धोबीघाट पाए जाते है जो चालीस से साठ प्रतिशत फास्फोरस डिटर्जेंट के माध्यम से पहुचा रहे है।
7. गंगा बेसिन में केवल 14.3 परसेंट वन शेष बचे हैं।

गंगाजी की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति भी समझ लीजिए,

1. गणेश गंगा (पातालगंगा )---- सूखी
2. गरुड्गंगा ------ सूखी
3. ऋषी गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
4. रूद्र गंगा ------ विलुप्त
5. धवल गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
6. विरही गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
7. खंडव गंगा ----- विलुप्त
8. आकाश गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
9. नवग्राम गंगा ------ विलुप्त
10. शीर्ष गंगा ----- विलुप्त
11. कोट गंगा ----- विलुप्त
12. गूलर गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
13. हेम गंगा ----- सूखी
14. हेमवती गंगा ---- विलुप्त
15. हनुमान गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
16. सिध्तारंग गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
17. शुद्ध्तारंगिनी गंगा ---- विलुप्त
18. धेनु गंगा ----- विलुप्त
19. सोम गंगा ----- विलुप्त
20. अमृत गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
21. कंचन गंगा ----- वनस्पति के तीव्र दोहन से गादयुक्त हो गयी है
22. लक्ष्मण गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
23. दुग्ध गंगा ----- विलुप्त
24. घृत गंगा ----- विलुप्त
25. रामगंगा ----- तेजी से सूख रही
26.केदार गंगा जलस्तर में तेजी से गिरावट

2014 से पहले गंगाजी स्थाई रूप से रुग्ण थीं, 2014 के बाद गंगाजी को समयानुसार साफ/ धाराओं को मुक्त कर वाह वाही लूटी जाती है। कोई स्थायी मॉडल अभी विकसित नही हुआ है जो संतोषजनक हो। गंगाजी के किनारे होटल्स और टेनरियों की भीड़ ने गंगा को अति दूषित कर रखा है। हरिद्वार के आगे गंगाजी सहायक नदियों के भरोसे हो जाती हैं। यही हाल अन्य नदियों का है। दिल्ली में यमुनाजी मर गयी है, नदी के नाम पर सीवर बह रहा है।

कैसे कहूँ कि गंगा माई तोहार ऊंची अररिया 🙄

कृपया पूरा पढ़ें,👇👇👇👇👇👇जनता अगर बुलडोजर चलने पर, एनकाउंटर होने पर खुश हो रही है तो इसका एक ही मतलब है कि देश की जनता को द...
18/04/2023

कृपया पूरा पढ़ें,
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जनता अगर बुलडोजर चलने पर, एनकाउंटर होने पर खुश हो रही है तो इसका एक ही मतलब है कि देश की जनता को देश की न्याय व्यवस्था पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है.
देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा सिर्फ नेता और पैसे वाले करते हैं, क्योंकि ये लोग ही न्याय को खरीद पाते हैं.
कोई भी आम नागरिक देश के सिस्टम, न्याय, संविधान पर भरोसा नहीं करता ये ही सच है.
संजय दत्त को इतने बड़े अपराध की इतनी छोटी सजा मिली और वो भी पूरी पेरोल मे कट गई.
लालू यादव मेडिकल ग्राउन्ड के नाम पर जेल से बाहर रहता है, सलमान खान फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ा देता है पर उसकी गाड़ी कोई नहीं चला रहा था वो अपने आप ही चाल रही थी और हिरण की हत्या के मामले में भी हिरण ने भी खुद आत्महत्या कर ली थी.
राणा अयूब को कोर्ट ये कहकर छोड़ देता है कि 12 करोड़ की रकम छोटी होती है इसके लिए महिला को जेल मे नहीं रख सकते.
वही कोर्ट 50 रु की बात पर पोस्टमेंन को 10 साल जेल कटवा देता है... रवि तिवारी ने 25 साल जेल काटी उस अपराध के लिए जिसमे अधिकतम सजा 1 साल होती है.
अट्रासिटी ऐक्ट, दहेज प्रताड़ना के 95% केस फर्जी होते है पर फिर भी एसे कानून हैं.
बेअंत सिंह के हत्यारों को फासी नहीं दी 25 साल हो गए, क्योंकि वोट बैंक का मामला है.
तमिलनाडु मे राजीव गांधी की हत्या करने वालों को नहीं दी, वोट बैंक का मामला है.
लाखों लोग जेलों मे बंद है अपनी सजा से 20 गुना जयदा तक सजा जेल मे काट चुके हैं, क्योंकि मिलॉर्ड से सुनवाई की तारीख नहीं मिल रही, क्योंकि जमानत के लिए पैसे नहीं है.
पार्टियों की सुप्रीम कोर्ट मे याचिका लगती है तो 1 दिन मे डेट मिल जाती है, आम आदमी को सालों में भी नहीं.

आज बाहर कोई छेड़छाड़ कर रहा हो, गुंडाई कर रहा हो, दुर्घटना ग्रस्त हो... तो आम आदमी चाह कर भी मदद के लिए आगे नहीं आता... क्योंकि बाद मे कोर्ट मे उसका खून पी लिया जाएगा, जैसे आप ही अपराधी हो.
आप पुलिस के पास जाएंगे वहा लूटा जाएगा, कोर्ट मे जाएंगे वहा और लूटा जाएगा.
संविधान संविधान कितना भी गा लो, सब कुछ प्रत्यक्ष है.
संविधान बनाने वाले सब वकील थे, इसलिए न्याय का सिस्टम वकीलों की कमाई के लिए बना है न्याय देने के लिए नहीं.
जुडीशियरी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के जैसे काम करती है. जजों ने खुद के लिए सुविधाओं का अंबार लगा लिया है. कभी किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर देखना... उसे छोड़ने और लिवाने निचली अदालतों के कई जज ढेर सारे चपरासी और पुलिस वाले मक्खन लगाते खड़े मिलेंगे. गाड़ी पर नंबर प्लेट के ऊपर नंबर के अलावा कुछ भी लिखना अपराध माना जाता है. पर किसी भी कोर्ट के बाहर खड़ी गाड़ियां देख लीजिए आपको हर जज की गाड़ी की नंबर प्लेट पर कहीं न्यायधीश कहीं जिला जज कहीं मजिस्ट्रेट लिखा नजर आ जाएगा.
हम जानते है कि हर गुंडा जेल से बाहर आ जाता है, इसलिए हम खुश होते है एनकाउंटर होने पर.
पर ये खुश होने से ज्यादा, देश के लोकतंत्र और संविधान पर शर्मिंदा होने की बात ज्यादा है.

✒️RK Sharma ji

आपके लिए क्या महत्व रखता है???पिछले दिनों दलाई लामा जी के कुत्ते (श्वान) "डूका" की नीलामी हुई। श्वान 12 वर्ष तक तिब्बत क...
14/04/2023

आपके लिए क्या महत्व रखता है???

पिछले दिनों दलाई लामा जी के कुत्ते (श्वान) "डूका" की नीलामी हुई। श्वान 12 वर्ष तक तिब्बत के इस सर्वोच्च धर्मगुरु जी की सुरक्षा में कार्यरत था। उनकी सुरक्षा दस्ते का सबसे विश्वासपात्र जीव था 'डूका'। रिटायरमेंट के बाद उसे नीलाम कर दिया गया। नीलामी के समय उसका मूल्य 500 ₹ रखा गया था, जिस पर 1500 ₹ दे कर किसी व्यक्ति ने उसे खरीद लिया। इस प्रकरण में ध्यान देने लायक बात यह भी है कि बारह वर्ष पूर्व इस श्वान को लगभग सवा लाख ₹ में क्रय किया गया था।

यूं तो यह सामान्य सी घटना है, पर ध्यान से देखें तो जीवन के अनेक भ्रम दूर हो जाएंगे। सवा लाख में खरीदे गए श्वान का मूल्य भी एक दिन 500 रुपये हो जाएगा, इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते हम, पर अंततः होता यही है। वह तो ये श्वान सरकारी था, इसलिये उतना मूल्य भी मिल गया, वरना यूं ही भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाता।

हम जब प्रभावशाली होते हैं तो सोचते भी नहीं कि कभी दिन ढलेंगे भी! लगता है जैसे संसार सदैव मुट्ठी में ही रहेगा। पर संसार किसी की मुट्ठी में रहता नहीं। अगर रहता, तो अकबर महान के वंशज चांदनी चौक पर अंडे का ठेला न लगा रहे होते।

इस घटना को एक दूसरी दृष्टि से भी देख सकते हैं। क्या दलाई लामा जी जैसे प्रभावशाली व्यक्ति उस श्वान को दो चार वर्ष यूं ही नहीं रख सकते थे ? कितना खा लेता वह ? जहाँ सुरक्षा दस्ते के अन्य श्वान खाते हे, वही वह भी खा लेता। उसने अपनी पूरी जवानी भर इनकी चौकीदारी की थी, उसके बुढ़ापे के दो चार वर्ष बिना काम किये भी कट जाने चाहिये थे! पर नहीं । वैसे भी जिस युग में लोग बूढ़े माँ-बाप को छोड़ देते हैं, तो उस युग में इस प्राणी मात्र श्वान की कौन सोचे...

हम यह सब स्वीकार नहीं कर पाते, पर हर वस्तु की एक एक्सपायरी डेट होती है। उसके बाद उसका मूल्य समाप्त हो ही जाता है। वस्तु ही नहीं, रिश्तों की भी एक्सपायरी डेट होती है। यदि हमेशा भइया या बाबू कहने वाला व्यक्ति किसी एक छोटी सी बात पर चिढ़ कर गाली देने लगे, तो असहज न होइए। बस इतना ही समझिए कि सम्बन्धों की आयु पूरी हो गयी..

इस घटना पर एक दृष्टि और हो सकती है। सबकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, किसी के लिए सम्बन्ध महत्वपूर्ण होते हैं, भावनाएं महत्वपूर्ण होती हैं, और किसी के लिए केवल भौतिक उपलब्धियां। यह हमारे ही हाथ में होता है कि हम अपने सम्बन्धों को संजोकर रखते हैं या उसे 'डूका' की तरह नीलाम कर देते हैं।

C/p

संवाद: लेख अवश्य पढ़ें सुझाव दीजिए! 'प्राइवेट स्कूल की भारी भरकम फीस से बचा सकते हैं  #सरकारी_स्कूल' निजी विद्यालय की फी...
14/04/2023

संवाद: लेख अवश्य पढ़ें सुझाव दीजिए!
'प्राइवेट स्कूल की भारी भरकम फीस से बचा सकते हैं #सरकारी_स्कूल'
निजी विद्यालय की फीस का स्थाई समाधान सरकारी परिषदीय विद्यालय ही बन सकते हैं बशर्ते उन विद्यालयों में प्राइवेट स्कूलों की सुविधाएं सरकार प्रदान कर दे और यह जनता ही मांग सकती है।
🟡 पिछले कई दशकों से शिक्षा का अधिकार भारत में प्राथमिकता पर रहा है। शिक्षा को प्रत्येक सरकार ने अपने निर्णयों में प्राथमिकता पर रखा। सरकार जब शिक्षा को प्राथमिकता पर रखती है तो ध्यान जाता है सरकारी विद्यालयों की ओर, लेकिन जनता का रुझान #प्राइवेट_विद्यालयों की ओर चला जाता है जो वर्तमान समय में जनमानस को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रहते हैं। भारी भरकम फीस के बावजूद अभिभावक छात्र का दाखिला प्राइवेट स्कूल में नाम लिखवा कर खुद को संतुष्ट पाते हैं, लेकिन फीस को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। आए दिन सुनने में आता है कि लोग प्राइवेट स्कूल की फीस को लेकर बेहद चिंतित दिखाई देते हैं, एक रिक्शा चलाने वाला, एक ठेला लगाने वाला कभी निजी विद्यालयों के सपने भी नहीं देखता है लेकिन कोई भी इससे बचने के उपाय के बारे में नहीं सोचता।
#क्यों - अधिक फीस के बाद भी निजी विद्यालयों में ऐसा क्या व्यवस्था है जो वह अभिभावकों को आकर्षित करने में सफल रहते हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़वाना ज्यादा पसंद और वहीं सरकारी परिषदीय विद्यालय हैं जहां पर शोषित और वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा दी जा रही है, आर्थिक रूप से सामान्य अभिभावक और यहां तक की शिक्षक, कर्मचारी नेता आदि भी स्वयं के बच्चों का दाखिला परिषदीय विद्यालयों की बजाय प्राइवेट स्कूलों में पढ़वाना ज्यादा पसंद करते हैं। लोग अभिभावक निजी स्कूलों की फीस से त्रस्त तो हैं लेकिन उसके स्थाई समाधान के बारे में विचार नहीं कर रहे। निजी विद्यालय की फीस का स्थाई समाधान सरकारी परिषदीय विद्यालय ही बन सकते हैं बशर्ते उन विद्यालयों में प्राइवेट स्कूलों की सुविधाएं सरकार प्रदान कर दे और यह जनता ही मांग सकती है।
🟡 इस पर आत्म मंथन की आवश्यकता है और यह भी समझना चाहिए कि सिर्फ सरकारी विद्यालय के शिक्षक पर हंटर चलाने से क्या व्यवस्था में सुधार आ सकता है, शायद नहीं। क्योंकि अगर शिक्षक अपनी जगह सही नहीं होता तो पूरे प्रदेश में पिछले शिक्षा सत्र से लगभग 3 लाख छात्रों का अधिक नामांकन हुआ है, इससे काफी हद तक स्पष्ट है कि शिक्षक तो अपनी जगह कार्य कर रहा है तो फिर कमी कहां है। बहुत कुछ स्थिति स्पष्ट हो जाएगी अब एक बार प्राइवेट स्कूल की तुलना अगर परिषदीय विद्यालय से की जाए तो आपको बहुत कुछ स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि क्यों अभिभावक प्राइवेट में अपनी पूरी जमा पूंजी देने के बाद भी क्यों प्राइवेट स्कूल की ओर ही आकर्षित होता है।
🟡 एक ओर जहां प्राइवेट प्राइमरी स्कूल में हर कक्षा के लिए एक कमरा होता है जहां कक्षा 1 से 5 तक के छात्र के लिए 5 कमरे, 1 कमरा कॉमन रूम जिसमें बच्चे खेलें, 1 स्टाफ रूम, 1 प्रधानाचार्य कक्ष, खेल का मैदान और साफ-सुथरे और पर्याप्त मात्रा में शौचालय, चारों तरफ से दीवार से घिरा सुरक्षित परिसर। वहीं परिषदीय विद्यालयों में 2 कमरे, 1 बरामदा, 1 किचन, 1 प्रधानाचार्य कक्ष, कहीं-कहीं मैदान और कहीं-कहीं चारदीवारी।
🟡 प्राइवेट स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए टेबल कुर्सी, पढ़ाने के लिए व्हाइट/ग्रीन बोर्ड बिजली पंखा, शुद्ध पानी, एलईडी आदि दिए जाते हैं लेकिन परिषदीय प्राइमरी विद्यालय में आज भी छात्र को जमीन पर फट्टी बिछा कर, उसी काले श्याम पट पर पढ़ना होता है जो आदि काल से चला आ रहा है।
🟡 अब आप विद्यालय का स्टाफ देखिए अब आप विद्यालय स्टाफ देखिए जहां एक ओर प्राइवेट स्कूल में कम से कम 5 शिक्षक, 1 प्रधानाध्याक, 1 लिपिक, 1 चपरासी, 1 सफाई कर्मी वहीं परिषदीय में 1 या 2 शिक्षक ही पूरा विद्यालय संभालते हैं। और इसी के साथ समय-समय पर सूचनाओं को भेजना, प्रतिदिन खाना (एमडीएम) की व्यवस्था करना, मीटिंग में जाना और कई प्रकार के गैर शैक्षणिक कार्य आदि करना भी शिक्षक के ही जिम्मे सौंप रखे गए हैं।
🟡 विद्यालय के ताले खोलने से लेकर साफ-सफाई, फट्टी बिछाना हर पीरियड की घंटी बजाना और शौचालयों में साफ-सफाई रखना भी उन्हीं 1 या 2 शिक्षकों के हवाले है जो शिक्षण कार्य के लिए रखे गए थे। यहां तक की अगर स्कूल समय में किसी बच्चे ने गंदगी फैलाई तो उसकी सफाई के लिए भी कोई अन्य स्टाफ (सफाई कर्मी, चपरासी) नहीं है यह भी उसी शिक्षक के जिम्मे है, तो शिक्षक तो अपना दायित्व कहीं ना कहीं अच्छे से निर्वाह कर रहा है, तो फिर चूक कहां हो रही है?
🟡 अब शिक्षकों की योग्यता देखिए अब शिक्षकों की योग्यता देखिए, प्राइवेट में अधिकांश जगह योग्यता का कोई मानक नहीं रखा गया है और जहां मानक है भी वह इंटरमीडिएट या स्नातक अथवा ज्यादा से ज्यादा बीएड को नियुक्ति दे देते हैं। लेकिन परिषदीय विद्यालय में एक शिक्षक की योग्यता बीएड/बीटीसी फिर शिक्षक पात्रता परीक्षा फिर सहायक अध्यापक लिखित परीक्षा और उसके बाद मेरिट तब जा कर एक युवा शिक्षक बन पाता है। अगर यह कहा जाए कि पूरे प्रदेश का सबसे योग्य युवा बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापक है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जागरूक जनता को चाहिए कि वह सरकार से मांग करे कि सरकारी विद्यालयों में प्राइवेट की सुविधाएं दी जाएं जिससे कि अनुचित फीस के बोझ से आम जनता को मुक्ति मिले और वह बचा हुआ बच्चे के भविष्य के लिए सहेज सकें। सभी को मुफ्त और उत्तम शिक्षा मिल सके, और सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र को निजी विद्यालय के छात्र को देख कर हीन भावना ना हो।
- विपिन बिहारी
(लेखक पेशे से एक शिक्षक हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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