12/11/2025
धुंध में लिपटा वह वृक्ष,
जैसे कोई बूढ़ा साधु,
धीरे से कह रहा हो —
"रुक जा ज़रा, मनुष्य,
मैंने भी देखा है समय को गुजरते हुए।"
उसकी शाखाएँ काँपती हैं,
जैसे याद कर रही हों बीते मौसम,
और वह मनुष्य —
बस सुन रहा है,
प्रकृति की एक पुरानी कहानी।
अनेकों तूफानों, ऋतुओं से गुजरा हुआ प्राचीन वृक्ष बोला —
"क्यों भागता है रे मनुष्य?
तू भी तो मुझ-सा ही बीजे से जन्मा,
और एक दिन मिट्टी में लौट जाएगा।"
मनुष्य ठिठक गया, उसकी आँखों में नमी थी।
वृक्ष ने धीमे से कहा —
"मैंने अनगिनत ऋतुएँ देखी हैं,
पत्तों को जन्म लेते, झरते, सड़ते देखा है।
जीवन बस इतनी ही कहानी है —
उगना, खिलना, और फिर लौट जाना।"
मनुष्य ने थरथराते स्वर में पूछा —
"तो क्या सब अंत है?"
वृक्ष मुस्कराया धुंध के पार —
"नहीं, अंत नहीं… परिवर्तन है।
मुझसे गिरा हर पत्ता,
तेरे श्वास में कहीं जीवित है।
और जब तू मिट्टी बनेगा,
मैं फिर तेरे भीतर अंकुरित होऊँगा।"
उस पल, धुंध में दोनों मौन खड़े थे —
मानो जीवन और मृत्यु एक-दूसरे को प्रणाम कर रहे हों।
@ विवेकानंद विनय ✍️