Hussainiat Zindabad

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मिट्टी में मिल गये इरादे यज़ीद(लानती)के
लहरा रहा है आज भी परचम हुसैन(अलैहिस्सलाम)का..

29/09/2025

ّٰہ___وانا__الیہ__راجعون
آیت الله العظمى سید علی سیستانی کی زوجہ محترمہ وفات پاگیئں ہیں
پروردگار سيد بزرگوار اور جمیع اھل خانہ کو صبر جمیل عنایت فرمائے اور مرحومہ کی مغفرت فرمائے۔

इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन
महान और श्रद्धेय महिला, आयतुल्लाह सैय्यद मिर्ज़ा हसन की बेटी और सैय्यद अल-मुजद्दिद अल-शिराज़ी (अल्लाह उनकी आत्मा को शांति दे) की पोती, तथा परम धार्मिक autoridad सैय्यद अली अल-हुसैनी अल-सिस्तानी (अल्लाह उनका साया बनाए रखे) की पत्नी, अपने महान पालनकर्ता के पास चली गई हैं।
उनका पवित्र पार्थिव शरीर सोमवार, 6 रबी अल-आख़िर को सुबह 9:00 बजे शेख़ अल-तूसी मस्जिद से उनके अंतिम विश्राम स्थल तक ले जाया जाएगा। उनकी पवित्र आत्मा की शांति के लिए फ़ातिहा (प्रार्थना) सोमवार और मंगलवार को मग़रिब और ईशा की नमाज़ के बाद अल-ख़द्रा मस्जिद में आयोजित की जाएगी।
अल्लाह, जो सबसे उच्च और सर्वशक्तिमान है, के सिवा किसी में कोई शक्ति या सामर्थ्य नहीं है।
(यह अनुवाद शोक संदेश के मूल भाव और सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करता है।)
(إنّا لله وإنّا إليه راجعون)

انتقلت إلى جوار ربّها الكريم العلوية الجليلة كريمة آية الله السيّد ميرزا حسن حفيد السيّد المجدّد الشيرازي قدّس سرّهما، عقيلة سماحة المرجع الديني الأعلى السيّد علي الحسيني السيستاني (دام ظلّه)، وسيشيّع جثمانها الطاهر إلى مثواها الأخير في الساعة التاسعة من صباح يوم الاثنين ٦ شهر ربيع الآخر من جامع الشيخ الطوسي، ويقام مجلس الفاتحة على روحها الطاهرة في جامع الخضراء يومي الاثنين والثلاثاء بعد صلاة المغرب والعشاء، ولا حول ولا قوّة إلاّ بالله العلي العظيم.

(We belong to Allah and to Him we shall return)
The noble and venerable lady, the daughter of Ayatollah Sayyid Mirza Hassan, grandson of Sayyid al-Mujaddid al-Shirazi (may their secrets be sanctified), the wife of His Eminence the Supreme Religious Authority Sayyid Ali al-Husayni al-Sistani (may his shadow endure), has passed away to be with her noble Lord.

Her pure body will be escorted to her final resting place at 9:00 a.m. on Monday, the 6th of Rabi' al-Akhir, from the Sheikh al-Tusi Mosque. A Fatiha (prayer for the soul of her pure soul) will be held at the al-Khadra Mosque on Monday and Tuesday after the Maghrib and Isha prayers.

There is no power or strength except with Allah, the Most High, the Almighty.
Danish Husain (TheNish)

01/09/2025

अय्यामे अज़ा का आख़िरी दिन शहादत ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का पुरसा पेश करते हैं बारहवें इमाम अज्जल. की ख़िदमत में..😢

23/08/2025

Shahadat Hazrat Muhammad Mustafa saww. And Imam Hasan as.

06/08/2025

15 अगस्त 2025 चेह्लुम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम (अरबाईन)

06/07/2025
06/07/2025

कर्बला पर तर्क, वितर्क, कुतर्क, सब इस बात की दलील हैं कि इसका ज़िक्र मरने नहीं दिया गया है। 1400 साल में जाने कितने संसाधन, जाने कितने मौलवी, कितने मदरसे इस ज़िक्र को रोकने पर लगाए गए, मगर हमारे बुज़ुर्गों ने जिस तरह आशूरा को इंस्टीट्यूट्यूशनलाइज़ किया है वो अपने आप में रिसर्च का विषय है।
टीवी, मोबाइल के ज़माने से पहले मास कम्यूनिकेशन की शायद ही कोई सफल विधा बची होगी जो आशूरा का हिस्सा नहीं बनी है। लोग ऐतराज़ करते रहे लेकिन कर्बला का ज़िक्र ऐसे ही चलता रहा। कर्बला के इस ज़िक्र ने क़ातिल और मक़तूलों नाम लोगों को भूलने नहीं दिए। ये इस मिशन की कामयाबी है कि न सिर्फ संबंधित पक्ष, बल्कि तमाम न्यूट्रल पक्ष और समुदाय कर्बला के ज़िक्र में जुड़ते चले गए।
इसलिए, कोई मुहर्रम, आशूरा, जुलूस या परंपराओं पर तनक़ीद भी कर रहा है, इसको झुठला रहा है, या इसके ख़िलाफ कुतर्क गढ़ रहा है, तब भी वो हमारा ही काम कर रहा है। हमें इसपर गर्व होना चाहिए की कर्बला की चर्चा क़यामत तक ज़िंदा रखने का जो लक्ष्य इमाम हुसैन की बहन ज़ैनब बिन्ते अली ने हमें दिया था, हम उससे पीछे नहीं रहे हैं।
कर्बला का मौजज़ा भी यही है। एक-एक शहीद का नाम लोग ले रहे हैं। कोई मुहब्बत में और कोई तर्क-कुतर्क में। सफलता इससे समझिए कि बद्र, उहद, ख़ंदक के क़ातिल रज़ि अल्लाह हो गए मगर कर्बला में ज़ुल्म करने वालों के गले में लानत के तौक़ पड़े हैं। क़ातिलों के रिश्तेदार उनसे अपना रिश्ता मानने को राज़ी नहीं है। जिन्हें क़ातिल से मुहब्बत है वो भी इल्ज़ाम दूसरों पर डाल रहे हैं। मगर मक़तूल के लिए हमदर्दी ख़त्म होने के बजाए बढ़ रही है।
मौजज़ा यही है कि हाकिम ने कर्बला को इसलिए चुना कि भूखे-प्यासे लोगों की दास्तान सहरा की रेत में दफ्न हो जाएगी मगर उनका ज़िक्र इराक़ के तपते सहरा से निकलकर कूफा, शाम की दीवारें गिराते हुए साइबेरिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूरोप तक के दूर-दराज़ गांव तक पहुंच गया। दुनिया में शायद कोई मुल्क हो जहां आशूरा के रोज़ या हुसैन की सदाएं बुलंद न होती हों। क़ातिल के हमदर्द ऐतराज़ करते रह गए, शरीयत, दीन, ईमान, क़ुरान के मीज़ान पर दलीले गढ़ते रहे और हुसैन का ज़िक्र घर-घर पहुंच गया।
लोग पूछते हैं, चौदह सौ साल से ज़्यादा हो गए फिर ये सब तमाशा क्यों। जवाब है कि ये सब इसी तमाशे का फैज़ है। मजमा जोड़कर अपनी बात पहुंचाना एक कला है। हमने कर्बला को यूनिवर्सिटी बना दिया। और सबसे बड़ी बात... क़ातिलों के, उनकी औलादों के नामो निशान मिट गए और हमने हुसैन के नाम पर गांव-गांव गली-गली कर्बला बना लीं। अब ये ज़िक्र क़यामत तक मिटने वाला नहीं है। चाहे इसपर फत्वे लगाएं, चाहे तर्क-कुतर्क करें, हुसैन और उनके असहाब का ज़िक्र मिटने वाला नहीं है।
Cpd
TheNishMedia
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26/06/2025

मुहर्रम इस्लामिक माह का पहला महीना (नया साल शुरू) है ये शोक का महीना (2 महीना 08 दिन) है जिसमे हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सअवव के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उनका परिवार (जिसमे 06 महीने के बच्चे से लेकर जवान-बूढ़े) व उनके साथी शहीद हुए तो इसकी मुबारकबाद नही बल्कि शोक व्यक्त करें (श्रद्धांजलि दें)😢
कृप्या करबला के बारे में पढ़ें जानें
-दानिश हुसैन TheNishMedia

Today marks the beginning of the first Islamic month, Muharram — a month of remembrance, as the grandson of Prophet Muhammad, along with his family and companions, was martyred at Karbala.

21/06/2025

स्पष्ट है आज का यज़ीद वो है जो मज़लूमो पर ज़ुल्म करे यानी इस्राएल जिसने फिलिस्तीन की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया फ़िर उसी ज़मीन पर खुद का अवैध राष्ट्र बसाया फ़िर उन्ही को उनकी ज़मीन से हटाया और फ़िर उन पर पिछले दो साल से बम मिसाइल बरसा रहा है

लेकिन ये चीज़ लोगों को मुसलमानों की नफ़रत के आगे नही दिखती और तब कोई देश या गोरा कुत्ता नही देखा और जब इसने ज़बरदस्ती ईरान पर हमला किया और ईरान ने जवाबी कार्यवाही की तो गोदी मीडिया और सफ़ेद कुत्ता सहित कई अन्य को मौत आने लगी

फ़िलहाल हम मज़लूम के साथ और ज़ालिम के ख़िलाफ़ हैं
✍️दानिश हुसैन The Nish
हुसैनियत ज़िंदाबाद ✊

05/06/2025

60 हिजरी सफ़र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम काबा से जानिबे कूफ़ा..

रिवायत-हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम ने ये खुतबा ख़ानाए काबा की छत पर 8 ज़िलहिज सन् 60 हिजरी में दिया जब इमाम हुसैन (अलै) मक्का से करबला की तरफ़ रवाना हो रहे थे, "तमाम हम्द अल्लाह के लिए हैं जिसने बैतुल्लाह (काबा) को इज़्ज़त बक्शी मेरे आक़ा इमाम हुसैन (अलै) के वालिद (हज़रत अली (अलै.) की आमद से, अमीरूल मोमेनीन (हज़रत अली अलै) की आमद से पहले, ये घर सिर्फ़ पत्थरों के घर के अलावा कुछ नही था. अमीरूल मोमेनीन (हज़रत अली अलै) की ख़ाना ए काबे में आमद के बाद ये क़िबला बन गया…"
📚हिस्टोरिकल सेर्मोन्स, चैप्टर1

05/06/2025

08 ज़िलहिज 60 हिजरी 💔
मै हुसैन इब्न अली इब्न अबूतालिब ع आज 8 ज़िलहिज को हज के मौक़े पर ख़ाना-ए-काबा को छोड़कर जा रहा हूँ क्योकि मैं ऐसे लोगों को देख रहाँ हूँ जो। यज़ीद की तरफ़ से अपने अहराम (हाजियों के लिबास) में तलवारें छुपाये मेरे क़त्ल के लिये लश्कर की शक्ल में मक्के आएं हुए हैं जिनके पेट में यज़ीद मलऊन का हराम बोल रहा है ख़ुदा की क़सम मैं हुसैनع अपने क़त्ल से नहीं डरता। मगर इस लिये जा रहा हूँ कि काबे में मेरे क़त्ल की वजह से ख़ून ख़राबा होगा इसकी वजह से काबे की हुरमत ना पामल हो जाए ...

22/03/2025

हज़रत अली की विरासत
कॉपी Dhruv Gupt

आज 21 रमजान विश्व की कुछ सबसे शानदार शख्सियतों में एक अली इब्ने अबू तालिब उर्फ़ हज़रत अली की शहादत का दिन है। इस्लाम के लगभग डेढ़ हज़ार साल के इतिहास में वे ऐसे शख्स हैं जो अपनी सादगी, प्रेम, करुणा, सज्जनता और न्यायप्रियता के कारण सबसे अलग खड़े दिखते हैं। शांति और अमन का दूत कहे जाने वाले अली ने आस्था के आधार पर इस्लाम में कत्ल, भेदभाव और नफरत को जायज़ नहीं माना। उनके प्रति लोगों में श्रद्धा इतनी थी कि उन्हें 'शेर-ए-खुदा’ और 'मुश्किल कुशा’ जैसी उपाधियां दी गईं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद ने उन्हें 'अबू-तुराब' की संज्ञा देते हुए उनके कहा था -'मैं इल्म का शहर हूं और अली उसके दरवाज़े। मैँ जिसका मौला हूं अली भी उसके मौला हैं।'

हज़रत अली पैगम्बर मुहम्मद के चचाजाद भाई भी थे और दामाद भी। उनके जीवन को दो हिस्सों में बांटकर देखा जाय तो उनके व्यक्तित्व को समझने में आसानी होगी। अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में वे अपने दौर के एक अद्भुत योद्धा थे जिन्होंने हज़रत मुहम्मद के साथ रहकर कई युद्ध लड़े। हज़रत मुहम्मद पर उतारे गए कुरान के पाठ को लिखने की ज़िम्मेदारी उन्हें ही सौंपी गई जिसे उन्होंने कुशलता से पूरा किया। मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद उनके जीवन का एक दूसरा दौर शुरू हुआ। राजनीति और युद्धों से उन्होंने संन्यास ले लिया। अपना जीवन उन्होंने समाज की सेवा को समर्पित कर दिया। आम लोगों के उपयोग के लिए उन्होंने बहुत सारे कुएं खोले और मदीने के आसपास कई बाग़ लगाए। यह वह समय था जब अली का रूपांतरण इस्लाम के एक प्रखर योद्धा से मानवीय करुणा और समाज सेवा के जज़्बे से भरे एक महामानव के रूप में हुआ।

656 ई में इस्लाम के तीसरे खलीफा उथमान इब्न अफ़ान की हत्या के बाद अली मुसलमानों के चौथे खलीफा बने। उन्होंने 656 से 661 तक बहुत थोड़े समय के लिए राशदीन ख़िलाफ़त के चौथे ख़लीफ़ा के रूप में शासन किया। एक शासक के तौर पर उनकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। वे प्रजावत्सल तो थे ही, तमाम वैभव के बीच उनकी सादगी ऐसी थी कि खलीफा बनने के बाद उन्होंने सरकारी खज़ाने का इस्तेमाल अपने, अपने परिवार या अपने रिश्तेदारों के हित में कभी नहीं किया। वे वही जौ की रोटी और नमक खाते थे जो खिलाफत के बहुसंख्यक लोगों को नसीब था। राजकोष को वे सार्वजनिक संपति मानते थे। उनके सार्वजनिक जीवन से जुडी एक घटना बहुत मशहूर है। एक शाम वे चिराग जलाकर राजकीय कार्य मे लगे हुए थे। उसी समय एक निजी काम के सिलसिले में उनका एक मित्र वहाँ आ पहुँचा। अली ने तुरंत चिराग बुझा दिया और अँधेरे मे ही उससे बाते करने लगे। मित्र द्वारा कारण पूछने पर उनका उत्तर था - चिराग़ राजकोष से जलता है। अपने व्यक्तिगत कार्य में मैं इसका प्रयोग नही कर सकता।

अली सुन्नी समुदाय के आखिरी राशदीन और शिया समुदाय के पहले इमाम थे। खलीफा के तौर पर अपने छोटे-से कार्यकाल में उन्होंने जीवन और शासन के जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उनकी मिसाल दुनिया की किसी दार्शनिक या राजनीतिक विचारधारा मेँ नहीं मिलती। यहां तक कि आधुनिक लोकतंत्र और मार्क्सवादी विचारधारा में भी नहीं। अपने और अपने बाद आने वाले ख़लीफ़ाओं के लिए जो आदर्श और जीवन तथा शासन के जो सूत्र उन्होंने बताए, उनमें से कुछ की बानगी देखिए - 'अगर कोई शख्स भूख मिटाने के लिए चोरी करता पाया जाय तो हाथ उस चोर के नहीं, बल्कि बादशाह के काटे जाएं।' / 'राज्य का खजाना और सुविधाएं मेरे और मेरे परिवार के उपभोग के लिए नहीं हैं। मै बस इसका रखवाला हूं।' / 'तलवार ज़ुल्म करने के लिए नहीं. हर हाल में मज़लूमों की जान-माल की हिफ़ाज़त के लिए उठनी चाहिए !' / 'तीन चीज़ों को हमेशा साथ रखो - सच्चाई, ईमान और नेकी। तीन चीज़ों के लिए लड़ो - वतन, इज्ज़त और हक़।' /'जब मैं दस्तरख्वान पर दो रंग के खाने देखता हूँ तो लरज़ जाता हूं कि आज फिर किसी का हक़ मारा गया है।' / 'ख्याल रहे कि किसी की आंखें तुम्हारी वजह से नम न हों। तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा।'

हज़रत अली ने अपने आदर्शों को अपने जीवन में ज़रूर उतार लिया था, लेकिन अपनी शासन-व्यवस्था में उनमें से कुछ को अमली जामा पहनाने के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिला। उनके उदारवादी विचारों के कारण इस्लाम के कट्टरपंथियों में उनका विरोध प्रबल होता चला गया। 661 ई. मे माहे रमज़ान में कूफे की मस्जिद मे सुबह की नमाज़ के वक्त नमाज़ियों की भीड़ में खड़े एक शख्स अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम ने ज़हर बुझी तलवार से वार कर उन्हें शहीद कर दिया। विरोधियों की दुश्मनी का सिलसिला उनकी मौत के बाद भी नहीं रुका। आततायियों ने अली के बड़े बेटे हसन को जहर देकर मारा। अली के दूसरे बेटे इमाम हुसैन की क़र्बला में शहादत को सत्य,न्याय और मनुष्यता के लिए दी गई दुनिया की सबसे बड़ी कुर्बानियों में एक माना जाता है। यह लेख फेसबुक मित्र ध्रुव गुप्त की वॉल से लिया गया है

शहादत दिवस पर हज़रत अली को सलाम !
#हज़रतअली
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