05/07/2024
यह तुम्हारे- हमारे दरमियान जो
चंद लम्हों के फासले है
ऐसा लगे मानो दरिया से समंदर की दूरी हो
बादल से धरती की मजबूरी हो
कलियों से भंवरों की दूरी हो, पर
वक्त के पन्नों ने है इनको बांध रखा
दिन को दिन सांझ को सांझ रखा
टूटेगी वक्त की बेडिया इतना एहसास रखो
रात को ही सही इस मौसम में प्रीत की बरसात रखो
छटेगी यह धूल भरी बादलो की गर्दिश
होगा सवेरा बिखरेगी किरण
बोलेगी कोयल बागों में उनके संग
कलियां भी खिलकर बदलेगी रंग
भंवरों के मन में भी छाएंगे उमंग
दरिया भी मिल गए हैं ,समंदर के संग।
क्या लिखूं किस पर लिखूं
सबका पढ़ने का है, अपना अपना ढंग✍️✍️✍️✍️