15/10/2025
Ram Dayal Pandey
जीवन का सरलीकरण एवम तनाव से मुक्ति !
15/10/2025
10/06/2024
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08/06/2023
उबंटू (Ubuntu)
कुछ साल पहले अफ्रीकन जनजाति के कुछ बच्चों को एक मानवविज्ञानी ने एक खेल खेलने के लिए कहा. उसने एक टोकरी में मिठाइयाँ और कैंडीज एक वृक्ष के पास रख दिए और बच्चों को वृक्ष से 100 मीटर दूर खड़ा कर दिया. फिर उसने कहा कि जो बच्चा सबसे पहले पहुँचेगा उसे टोकरी की सारी मिठाइयाँ और कैंडीज मिलेंगी. जैसे ही उसने "रेडी स्टेडी गो" कहा, सभी बच्चों ने एक दूसरे के हाथ पकड़े और एक साथ वृक्ष की ओर दौड़ पड़े. पास जाकर उन्होंने सारी मिठाइयाँ और कैंडीज आपस में बांट लीं और खुश होकर बोले 'उबंटू', दरअसल यह उस उदात्त सोच का विस्तार है जिसका मर्म है, हममें से कोई कैसे खुश हो सकता है अगर बाकी सब दुखी हों?"
उबंटू एक नैतिक अवधारणा, एक दर्शन और जीवन का एक तरीका है जो हमारे पश्चिमी पूंजीवादी समाज में फैल रही संकीर्णता और व्यक्तिवाद का विरोध करता है. उबंटू की भावना है- सामूहिक कल्याण की कीमत पर व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाना, उबंटू यानी "मैं हूँ क्योंकि हम हैं!" I am because we are. आइये हम सब बोलें 'उबंटू'....
Ram Dayal Pandey
27/05/2023
निश्छल निर्मल नदी होना है
आज कल नहीं सदी होना है
अपना अस्तित्व नहीं खोना है
सागर नहीं मुझे नदी होना है ….
15/03/2023
यादें बचपन की 📺 📷
'क्यों, ये देखकर कुछ याद आया?'
बहुत दिनों बाद यह "भार" देखा जोकि अब लगभग लुप्तप्राय हो गया है। अचानक से 20-25 साल पहले का समय याद आ गया जब लोग महरा काका के यहाँ दाना-लाई-चबैना भुजाने जाया करते थे। काकी 3 बजे दोपहर ही भार जला देतीं। भार से उठता हुआ धुँआ देखकर लोग कह उठते, 'चल-चल, भार जल गया।' फिर वहाँ पहुँचते-पहुँचते लोगों की लाइन लग जाती। सब कहते हे काकी! पहले हमारा, पहले हमारा !!
अब सोचता हूँ तो पाता हूँ यह भार बहुत ही वैज्ञानिकता पर आधारित था। इसमें भार के मुँह, जिधर से झोंका जाता है- उसकी तरफ से अलग-अलग ऊँचाई और दूरी पर अलग-अलग छेद बनाये जाते। उन छेदों में छोटी-छोटी मटकी लगाई जाती। उनमें बालू भरी रहती। हर मटकी की बालू अलग-अलग तापमान पर गर्म होती। जो दाना जिस तापमान पर भूजा जाना है, काका-काकी उसे उसी तापमान वाली बालू निकालकर भूजते। फिर चाहे ज्वार-बाजरा हो चाहे गेहूं-जौ या चावल-मक्का हो या फिर चना-मटर।
हल्की गर्म बालू में वो अनाज को पहले कउरि देते, फिर उसे ज़्यादा गर्म मटकी वाली बालू में डाल दिया जाता। अनाज पट-पटाकर फूट जाता। उससे दाना-चबैना, लाई, मुरमुरा, लावा तैयार हो जाता।
यह बात उन्होंने किसी किताब में नहीं पढ़े थे, बल्कि यह ज्ञान उन्होंने अपने अनुभव और ऑब्ज़र्वेशन से हासिल किया होता था।
दाना-चबैना, लाई, मुरमुरा, लावा हम देहाती लोगों का प्रमुख और एकमात्र स्नैक होता। कलेवा या खरमिटाव के लिए, खेती-किसानी से लौटकर, राही-बटोही के लिए, भैंस चराने के दौरान गमछे में बांधे रहते...और कभी-कभी स्कूल के इंटरवल में भी। यही खाया-चबाया जाता। साथ में थोड़ा सा नोन-मिर्च पीस कर रख दिया जाता। और एक ढोंका गुड़। इसके बाद एक लोटा पानी पी लिया जाता। दो-चार घंटे के लिए फुर्सत।
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