29/08/2022
केतु
जहां राहु है वहां केतु है। जहां केतु है वहां राहु है।
नवग्रहों की पंक्ति में केतु अंतिम ग्रह है। यह सर्वाधिक शक्तिशाली है। यह राहु का कबन्ध (धड़) है।
यह शिरहीन (अविचारी) है।
पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत को राहु ने भी पिया भगवान विष्णु ने अपने चक्र से राहु का सिर काट दिया इस प्रकार राहु के दो भाग हो गये ।
अमृत कहते हैं ज्योति (प्रकाश, ज्ञान) को। राहु नाम है निविडतम (अंधकार) का। देवता है चक्रमाण पिंड। सुदर्शन चक्र है श्रृत (दैवीय व्यवस्था)। राहु चक्र के भय से भागा पीछे की ओर लौटा। तब से राहु में वक्री गति का समावेश हुआ।
सिर पीछे चला तो धड़ भी पीछे चला इस प्रकार केतु भी वक्री हुआ।
अथर्व वेद में एक मंत्र है -
"अर्धेन विश्वं भुवनं जजान
यस्यार्ध कतम स: केतु"
ब्रम्हा के आधे भाग से सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ। (कुंडली के एक एक भाव भुवन है यही विश्व भुवनं का तात्पर्य है)
जो इस ब्रम्हा का आधा भाग है वह क्या है?
स: केतु: = वह केतु है।
पूर्ण में से अर्ध निकल जाए तो पूर्ण ही बचता है ऐसा उपनिषद कहते हैं। इसलिए
केतु= ब्रम्ह।
ब्रम्हा मुक्ति का द्योतक है इसलिए केतु मुक्तिदाता ग्रह है।
अन्य कुछ मन्त्रों में केतु का अर्थ किरण एवं धूमकेतु भी कहा गया है।
केतु का अर्थ ज्ञानी, चिकित्सक एवं वैद्य है।
केतु अग्नि तत्व राशि में लग्न में चिकित्सक, ज्ञानी बनाता है यश देता है दीर्घायु बनाता है।
सर्प (राहु)का सिर काटकर अलग कर दिया जाए तो शरीर का शेष भाग जिसे धड़ (केतु)कहते हैं विषहीन होने के कारण अविषय होता है।
केतु राक्षस है।जो अपनी रक्षा अपने आप करता है वह राक्षस है। दूसरे शब्दों में अहंकार, श्रेष्ठता की ग्रन्थि से युक्त को राक्षस कहते हैं। अहंकारी होना ही राक्षसत्व है। बहुतों को अपने ज्ञान विज्ञान का अहंकार होता है ऐसे लोग ही राक्षस है।राक्षस बलवान होता है। केतु ऐसा ही है।
केतु शिखी है।
शिखी नाम मयूर तथा शिखाधारी पाखंडी द्विज (ब्राम्हण) का। मयूर सर्प खाता है लेकिन कर्णप्रिय ध्वनि उगलता है देखने में मनोहर होता है। आचारहीन केवल लम्बी शिखा रखने वाला द्विज शिखी कहलाता है यह ऊपर से अच्छा अन्दर से खल होता है।
अग्नि को भी शिखी कहते हैं। लम्बी लम्बी लपटें एवं धुंआ इसकी शिखा है। लपटें जलाने वाली तथा धुंआ कालिख एवं घुटन पैदा करता है।
*केतु का प्रभाव ठीक ऐसा ही होता है।*
केतु ध्वज है। झन्डा ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है। यह आकाश में लहराता है । अतः केतु श्रेष्ठता,उच्च स्थान वा पद का द्योतक है।
झंडा वायु के झोंके से हिलता रहता है इसलिए केतु एक वायवीय ग्रह है।
यह विजय का प्रतीक है इसलिए वाहनों पर ध्वज लगाया जाता है।
मंदिर के शिखर पर ध्वज होता है ध्वज पूज्य होता है।
वृषभध्वज नाम शंकर का।
गरुणध्वज नाम विष्णु का।
मकरध्वज नाम कामदेव का।
ये सब केतु से युक्त है और परम पूज्य है।
केसरिया रंग का झंडा आदरणीय होता है। अग्नि की ज्वाला का भी यही रंग है। उगते हुए सूर्य का रंग भी यही है। यह रंग त्याग वा संन्यास का प्रतीक है। संन्यासी इसी रंग के वस्त्र पहनता है।
ज्ञान का रंग भी यही है।
ज्ञान केतु है। ध्वज केतु है। केतु का रंग गैरिक लाल केसरिया ही है।यह रक्ताभ है।
केतु लग्न में होता है तो शरीर रक्ताभ होता है। यह वातुल है अतः वात व्याधि भी देता है।
*केतु संन्यास का भी कारक है*
पंचम स्थान बुद्धि है। केतु प्रज्ञा है। इसमें केतु प्रखर प्रतिभा देता है मंत्र शास्त्र में प्रवीण करता है।
नवम स्थान भाग्य है। केतु प्रकाश है। यहां पर केतु भाग्य को प्रकाशित करता है।
द्वादश भाव मोक्ष है। केतु ज्ञान है। यहां का केतु मोक्षदायक है विशेष कर जलतत्त्व राशि में।
चतुर्थ स्थान सुख है। केतु अध्यात्म परक सुख है। यहां केतु मन का उन्नयन करता है भौतिक सुखों में बाधा पैदा करता है।
केतु धृतराष्ट्र है। धृतराष्ट्र अन्धा था और बहुत बलवान था। उसने लोहे की बनी भीम की प्रतिमा को भीम समझ कर अपने हाथों से चूर चूर कर दिया था।
यही केतु का गुण है।
केतु के बल का थाह नहीं है।जिस भाव में पड़ता है उसे बल देता है वह भाव उसके बल को आत्मसात कर सका तो अच्छा है, अन्यथा वह भाव केतु के बल से नष्ट हो जाता है।
*केतु उस भाव को या तो धन्य कर देगा या नष्ट भ्रष्ट ही कर देगा।*
अब यहां एक प्रश्न उठता है कि जब राहु से केतु की उत्पत्ति हुई है तो केतु में राहु के गुण क्यों नहीं है??
राहु अज्ञान है तथा केतु ज्ञान यह सत्य है। फिर??
इस पर तर्क पूर्वक विचार करता हूं।
राहु कोयला है। कोयले की अग्नि जब प्रज्ज्वलित होती है तो प्रकाश की ज्वाला एवं धुंआ प्रकट होती है।इस प्रकार कोयले के दो भाग हो जाते हैं।
१. धुंआ और राख
२. ऊष्मा और प्रकाश।
धुंआ और राख वाला पहला भाग राहु है। ऊष्मा और प्रकाश वाला दूसरा भाग केतु है।
राहु अन्धकार है, केतु आभा है।
अन्धकार और प्रकाश के जोड़े की तरह राहु और केतु परस्पर संबंधित है। राहु एक छोर है तो केतु दूसरा।
राहु अज्ञान है। अज्ञान से ज्ञान का जन्म हुआ है। उपनिषद कहता है पहले असत था असत से सत की उत्पत्ति हुई है। असत कहते हैं शून्य को। अभाव से भाव का अस्तित्व हुआ है। अविद्या से विद्या का जन्म हुआ।
यह अज्ञान अविद्या अभाव असत राहु है तथा ज्ञान विद्या भाव सत केतु है।
*इनका युग्म शास्वत सत्य है।*
केतु भगवान शिव का यज्ञोपवीत है,किंकिणी है करधनी है। बाजूबंद है कंगन है कंठहार है। शिव के आभूषण रुप केतु से मैं सबके कल्याण की कामना करता हूं।
केतु भगवान विष्णु की शैय्या है। विष्णु जी राहु पुच्छ पर नित्य सोते हैं यह शैय्या बहुत गुलगुल है तथा कभी भी मैली नहीं होती है।एक तो समुद्र इसे धोता रहता है , दूसरे यह प्रकृतितः अमल है। सर्प कभी स्नान नहीं करता किन्तु उसकी काया सदैव साफ एवं चमकती रहती है।
इस पर लेटने वाला भी तो अमल है न!
ऐसा केतु हमारे हृदयों को अमल करे यही प्रार्थना एवं कामना है।
॥ॐ॥
-------अखिलेश कुमार मिश्र -----