Astrologer akhilesh kumar mishra

Astrologer akhilesh kumar mishra to consult and solve all problem of life by indian vedic astrology...........

29/08/2022

केतु
जहां राहु है वहां केतु है। जहां केतु है वहां राहु है।
नवग्रहों की पंक्ति में केतु अंतिम ग्रह है। यह सर्वाधिक शक्तिशाली है। यह राहु का कबन्ध (धड़) है।
यह शिरहीन (अविचारी) है।
पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत को राहु ने भी पिया भगवान विष्णु ने अपने चक्र से राहु का सिर काट दिया इस प्रकार राहु के दो भाग हो गये ।
अमृत कहते हैं ज्योति (प्रकाश, ज्ञान) को। राहु नाम है निविडतम (अंधकार) का। देवता है चक्रमाण पिंड। सुदर्शन चक्र है श्रृत (दैवीय व्यवस्था)। राहु चक्र के भय से भागा पीछे की ओर लौटा। तब से राहु में वक्री गति का समावेश हुआ।
सिर पीछे चला तो धड़ भी पीछे चला इस प्रकार केतु भी वक्री हुआ।
अथर्व वेद में एक मंत्र है -
"अर्धेन विश्वं भुवनं जजान
यस्यार्ध कतम स: केतु"
ब्रम्हा के आधे भाग से सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ। (कुंडली के एक एक भाव भुवन है यही विश्व भुवनं का तात्पर्य है)
जो इस ब्रम्हा का आधा भाग है वह क्या है?
स: केतु: = वह केतु है।
पूर्ण में से अर्ध निकल जाए तो पूर्ण ही बचता है ऐसा उपनिषद कहते हैं। इसलिए
केतु= ब्रम्ह।
ब्रम्हा मुक्ति का द्योतक है इसलिए केतु मुक्तिदाता ग्रह है।
अन्य कुछ मन्त्रों में केतु का अर्थ किरण एवं धूमकेतु भी कहा गया है।
केतु का अर्थ ज्ञानी, चिकित्सक एवं वैद्य है।
केतु अग्नि तत्व राशि में लग्न में चिकित्सक, ज्ञानी बनाता है यश देता है दीर्घायु बनाता है।
सर्प (राहु)का सिर काटकर अलग कर दिया जाए तो शरीर का शेष भाग जिसे धड़ (केतु)कहते हैं विषहीन होने के कारण अविषय होता है।
केतु राक्षस है।जो अपनी रक्षा अपने आप करता है वह राक्षस है। दूसरे शब्दों में अहंकार, श्रेष्ठता की ग्रन्थि से युक्त को राक्षस कहते हैं। अहंकारी होना ही राक्षसत्व है। बहुतों को अपने ज्ञान विज्ञान का अहंकार होता है ऐसे लोग ही राक्षस है।राक्षस बलवान होता है। केतु ऐसा ही है।
केतु शिखी है।
शिखी नाम मयूर तथा शिखाधारी पाखंडी द्विज (ब्राम्हण) का। मयूर सर्प खाता है लेकिन कर्णप्रिय ध्वनि उगलता है देखने में मनोहर होता है। आचारहीन केवल लम्बी शिखा रखने वाला द्विज शिखी कहलाता है यह ऊपर से अच्छा अन्दर से खल होता है।
अग्नि को भी शिखी कहते हैं। लम्बी लम्बी लपटें एवं धुंआ इसकी शिखा है। लपटें जलाने वाली तथा धुंआ कालिख एवं घुटन पैदा करता है।
*केतु का प्रभाव ठीक ऐसा ही होता है।*
केतु ध्वज है। झन्डा ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है। यह आकाश में लहराता है । अतः केतु श्रेष्ठता,उच्च स्थान वा पद का द्योतक है।
झंडा वायु के झोंके से हिलता रहता है इसलिए केतु एक वायवीय ग्रह है।
यह विजय का प्रतीक है इसलिए वाहनों पर ध्वज लगाया जाता है।
मंदिर के शिखर पर ध्वज होता है ध्वज पूज्य होता है।
वृषभध्वज नाम शंकर का।
गरुणध्वज नाम विष्णु का।
मकरध्वज नाम कामदेव का।
ये सब केतु से युक्त है और परम पूज्य है।
केसरिया रंग का झंडा आदरणीय होता है। अग्नि की ज्वाला का भी यही रंग है। उगते हुए सूर्य का रंग भी यही है। यह रंग त्याग वा संन्यास का प्रतीक है। संन्यासी इसी रंग के वस्त्र पहनता है।
ज्ञान का रंग भी यही है।
ज्ञान केतु है। ध्वज केतु है। केतु का रंग गैरिक लाल केसरिया ही है।यह रक्ताभ है।
केतु लग्न में होता है तो शरीर रक्ताभ होता है। यह वातुल है अतः वात व्याधि भी देता है।
*केतु संन्यास का भी कारक है*
पंचम स्थान बुद्धि है। केतु प्रज्ञा है। इसमें केतु प्रखर प्रतिभा देता है मंत्र शास्त्र में प्रवीण करता है।
नवम स्थान भाग्य है। केतु प्रकाश है। यहां पर केतु भाग्य को प्रकाशित करता है।
द्वादश भाव मोक्ष है। केतु ज्ञान है। यहां का केतु मोक्षदायक है विशेष कर जलतत्त्व राशि में।
चतुर्थ स्थान सुख है। केतु अध्यात्म परक सुख है। यहां केतु मन का उन्नयन करता है भौतिक सुखों में बाधा पैदा करता है।
केतु धृतराष्ट्र है। धृतराष्ट्र अन्धा था और बहुत बलवान था। उसने लोहे की बनी भीम की प्रतिमा को भीम समझ कर अपने हाथों से चूर चूर कर दिया था।
यही केतु का गुण है।
केतु के बल का थाह नहीं है।जिस भाव में पड़ता है उसे बल देता है वह भाव उसके बल को आत्मसात कर सका तो अच्छा है, अन्यथा वह भाव केतु के बल से नष्ट हो जाता है।
*केतु उस भाव को या तो धन्य कर देगा या नष्ट भ्रष्ट ही कर देगा।*
अब यहां एक प्रश्न उठता है कि जब राहु से केतु की उत्पत्ति हुई है तो केतु में राहु के गुण क्यों नहीं है??
राहु अज्ञान है तथा केतु ज्ञान यह सत्य है। फिर??
इस पर तर्क पूर्वक विचार करता हूं।
राहु कोयला है। कोयले की अग्नि जब प्रज्ज्वलित होती है तो प्रकाश की ज्वाला एवं धुंआ प्रकट होती है।इस प्रकार कोयले के दो भाग हो जाते हैं।
१. धुंआ और राख
२. ऊष्मा और प्रकाश।
धुंआ और राख वाला पहला भाग राहु है। ऊष्मा और प्रकाश वाला दूसरा भाग केतु है।
राहु अन्धकार है, केतु आभा है।
अन्धकार और प्रकाश के जोड़े की तरह राहु और केतु परस्पर संबंधित है। राहु एक छोर है तो केतु दूसरा।
राहु अज्ञान है। अज्ञान से ज्ञान का जन्म हुआ है। उपनिषद कहता है पहले असत था असत से सत की उत्पत्ति हुई है। असत कहते हैं शून्य को। अभाव से भाव का अस्तित्व हुआ है। अविद्या से विद्या का जन्म हुआ।
यह अज्ञान अविद्या अभाव असत राहु है तथा ज्ञान विद्या भाव सत केतु है।
*इनका युग्म शास्वत सत्य है।*
केतु भगवान शिव का यज्ञोपवीत है,किंकिणी है करधनी है। बाजूबंद है कंगन है कंठहार है। शिव के आभूषण रुप केतु से मैं सबके कल्याण की कामना करता हूं।
केतु भगवान विष्णु की शैय्या है। विष्णु जी राहु पुच्छ पर नित्य सोते हैं यह शैय्या बहुत गुलगुल है तथा कभी भी मैली नहीं होती है।एक तो समुद्र इसे धोता रहता है , दूसरे यह प्रकृतितः अमल है। सर्प कभी स्नान नहीं करता किन्तु उसकी काया सदैव साफ एवं चमकती रहती है।
इस पर लेटने वाला भी तो अमल है न!
ऐसा केतु हमारे हृदयों को अमल करे यही प्रार्थना एवं कामना है।
॥ॐ॥
-------अखिलेश कुमार मिश्र -----

26/03/2022

🙏🙏
🌹शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है। (ब्रह्म पुराण')*
*🌹हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।(पद्म पुराण)
:
🌹कोई आपको शत्रु मान के परेशान करता हो तो प्रतिदिन प्रात:काल पीपल के नीचे वृक्ष के दक्षिण की ओर अरंडी के तेल का दीपक लगायें तथा थोड़ी देर गुरुमंत्र या भगवन्नाम जपें और उस व्यक्ति को भगवान सद्बुद्धि दें तथा मेरा, उसका-सबका मंगल हो ऐसी प्रार्थना करें | कुछ दिनों तक ऐसा करने से शत्रु शनै: शनै : दब जाते हैं व शत्रु पीड़ा धीरे-धीरे दूर हो जाती है।
🙏🙏🙏

07/03/2022

अध्यात्म ज्योतिष श्रंखला----3
:
जीवन में चार पुरुषार्थ होते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मनुष्य का जीवन इन्ही चारों पर केन्द्रित होता है।
ज्योतिष शास्त्र में 12 भाव होते हैं और तीन तीन भावों के चार त्रिकोण बनते हैं।
1,5,9 राशियों/भावों से धर्म त्रिकोण बनता है।
2,6,10 राशियों/भावों से अर्थ त्रिकोण बनता है।
3,7,11 राशियों/भावों से काम त्रिकोण बनता है।
4,8,12 राशियों/भावों से मोक्ष त्रिकोण बनता है।
इन चारों त्रिकोणों पर एक साथ लिखने/चर्चा करने से विषय बहुत विस्तृत हो जाएगा अतः आज़ मैं अपने लेखन को धर्म त्रिकोण पर केन्द्रित करता हूं।
सबसे पहले त्रिभुज/त्रिकोण को समझते हैं।
तीन रेखाओं से बनी आकृति को त्रिभुज कहते हैं।
तीन का सब पर वर्चस्व है। तीन समस्त आकारों की मूल है। तीन का विस्तार यह विश्व है।
सृष्टि की सूक्ष्मातिसूक्ष्म ईकाई बिन्दु (परब्रम्ह )है। बिन्दु का भौतिक अस्तित्व नहीं है किन्तु यह है। जिसमें न लम्बाई हो, न चौड़ाई हो , न मोटाई हो, पर अस्तित्वमान हो , वह बिन्दु है।
बिन्दु (परब्रम्ह) चलता है तो रेखा (प्रकृति) बनती है ।
रेखा (प्रकृति) के रूप में बिन्दु (परब्रम्ह) प्रकट हो जाता है, आस्तित्व में आ जाता है।
रेखा से आकृति (ब्रम्हाण्ड)बनती है। एक रेखा (ब्रम्हा, रजो गुण) से कोई आकृति नहीं बनती। दो रेखाओं (विष्णु, सतो गुण) से भी कोई आकृति नहीं बनती। तीन रेखाओं (महेश, तमोगुण) से आकृति बनती ही है।
तीन रेखाओं से बनी हुई आकृति त्रिभुज है। यह सबसे पहले अस्तित्व में आया।
अनन्त त्रिभुजों के योग से एक वृत्त (गोल) बनता है। यह ब्रम्हाण्ड गोल है। नाना आकृतियों के मूल में यह त्रिभुज है।
प्रकृति विकृति को प्राप्त कर त्रिगुणात्मक हो जाती है।और इन तीन गुणों से ही यह विश्व अस्तित्व में आता है। अतः प्रकृति का विकार यह विश्व ही साक्षात धर्म है। इसी लिए यह धर्म त्रिकोण है।
लग्न पंचम नवम भाव प्रकतितः धर्म त्रिकोण है।
मंगल, सूर्य, बृहस्पति मिल कर यह त्रिकोण बनाते हैं।
यह दैवीय श्रेणी के ग्रह हैं। इन्ही श्रेणी के ग्रहों को मोक्ष त्रिकोण का भी स्वामित्व है। इसमें चन्द्र भी शामिल है यह भी दैवीय श्रेणी का ग्रह है।
1,5,9------4,8,12
यहां मंगल शरीर (क्रिया, गति) सूर्य(बुद्धि) बृहस्पति (ज्ञान)।
चन्द्र (मन) मंगल (क्रिया, गति) बृहस्पति (मोक्ष)।
संसार (धर्म) में बुद्धि (सूर्य)का प्रयोग।(विद्या)।
मोक्ष में मन (चन्द्र) का उपयोग।(अविद्या)।
गति (कर्म) दोनों में आवश्यक है।
पंचम का कारक बृहस्पति।
सूर्य (बुद्धि) का धन है विवेक यह बृहस्पति है।
नवम का कारक है सूर्य । धर्म का कारण है बुद्धि। यह सूर्य है।
बुद्धि एवं विवेक से धर्म कर्म करते हुए इस त्रिभुज (त्रिगुणात्मक प्रकृति) से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। तीन गुणों से ऊपर उठ कर द्वादश भाव (मोक्ष, आत्म साक्षात्कार)तक पहुंचने के लिए यह शरीर मिला है। इसके लिए लग्न (शरीर) को पंचम (तर्क, बुद्धि) की कसौटी पर कसते हुए नवम (तप, धर्म) तपाना चाहिए।
यही इस त्रिकोण का आशय है।
तीसरा भाव पराक्रम है इससे दशम (कर्म)भाव द्वादश (मोक्ष) भाव है।
जीवन का सारा पराक्रम मोक्ष के लिए हो।
पराक्रम (तृतीय भाव)में धर्म (नवम भाव) जोड़ दें तो द्वादश भाव (मोक्ष) होता है।
बस इतना ही।
बाकी के त्रिकोणों पर अगले लेख में।
:
-------अखिलेश कुमार मिश्रा-----

04/11/2021

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
*दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन शूक्ष्म व सहज विधी*
!! *ज्योतिषाचार्य* अखिलेश कुमार मिश्रा!!

इस विधी से सभी सामान्य व्यक्ति भी स्वयं विधिपूर्वक लक्ष्मी जी की दीपावली उपासना कर सकते हैं।।
🌻🌻🌻🌻🌻

तीन बार प्राणायाम करके... मन और स्वसन तंत्र को एकाग्र व शांत कर लें।।
************
*पवित्रीकरण विधी ....*
बायें हाथ में जल लेकर उसे दाये हाथ से ढक कर मंत्र पढे एवं मंत्र पढ़ने के बाद इस जल को दाहिने हाथ से अपने सम्पूर्ण शरीर पर छिड़क ले ... 👇👇
*ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥*
*********
*आचमन विधी....*
मन , वाणि एवं आत्मशुद्धि के लिए आचमनी द्वारा जल लेकर तीन बार इन तीनों मंत्रों के उच्चारण के साथतीन बार पिए । 👇👇
*ॐ केशवया नमः*
*ॐ नारायणाय नमः*
*ॐ माधवाय नमः*
ततपश्चात.....
*ॐ हृषीकेशाय नमः* ( इस मंत्र को बोलकर हाथ धो लें )
**********
संकल्प.......
*ॐ विष्णु र्विष्णु र्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे वीर विक्रमादित्य नृपतेः2078, तमेब्दे प्लवंग नाम संवत्सरे दक्षिणायने … शरद ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तम कार्तिक मासे क्रष्णपक्षे अमावस्या तिथौ …गुरुवासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोहं (अपना नाम लें) सकलपाप क्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांति निमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्त फलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री महालक्ष्मी पूजनं च अहं करिष्ये।*
**************

*शिखा बंधन विधी ...*
शिखा पर दाहिना हाथ रखकर दैवी शक्ति की स्थापना करें .... *चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते , तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥*
*******
*आसन पूजन....*
अब अपने आसन के नीचे चन्दन से त्रिकोण बनाकर उसपर अक्षत , पुष्प, जल समर्पित करें एवं मन्त्र बोलते हुए हाथ जोडकर प्रार्थना करें
*ॐ पृथ्वि त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।*
*त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥*
**********
*दिग् बन्धन...*
बायें हाथ में जल या चावल लेकर दाहिने हाथ से चारों दिशाओ में छिड़कें
*॥ ॐ अपसर्पन्तु ये भूता ये भूताःभूमि संस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया , अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम् । सर्वे षामविरोधेन पूजाकर्म समारम्भे ॥*
*********
*गणेश स्मरणन - मंत्र*
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
***********
*श्री गुरु ध्यान .....*
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः प्रार्थनां समर्पयामि , श्री गुरुं मम हृदये आवाहयामि मम हृदये कमलमध्ये स्थापयामि नमः ॥
************
*गणेश पूजनं*
ध्यान.....
खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं,
प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् ।
दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दुरशोभाकरं,
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः ध्यानं समर्पयामि ।
*************
*पूजन.....*
ॐ गणपतये नमः आवाहयामि आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि । गंध , अक्षत , पुष्पाणि , दूर्वांकुरान , सिन्दूरं , यज्ञोपवीतं समर्पयामि । धूपं दीपं दर्शयामि , नैवेद्यं निवेदयामि , सदक्षिणाम समर्पयामि ।
*( भगवान गणेश जी को ऊपर बताए गए सामग्री चढ़ाएं । )*

🌻🌻🌻🌻
*लक्ष्मी पूजन शूक्ष्म विधी*
👇👇
ध्यान ......
*पद्मासनां पद्मकरां पद्ममाला विभूषिताम्*
*क्षीरसागर संभूतां हेमवर्ण - समप्रभाम् ।*
*क्षीरवर्णसमं वस्त्रं दधानां हरिवल्लभाम्*
*भावेय भक्तियोगेन भार्गवीं कमलां शुभाम्।*
*सर्वमंगलमांगल्ये विष्णुवक्षःस्थलालये*
*आवाहयामि देवी त्वां क्षीरसागरसम्भवे*
*पद्मासने पद्मकरे सर्वलोकैकपूजिते*
*नारायणप्रिये देवी सुप्रीता भव सर्वदा।* श्री महालक्ष्म्यै नमः ध्यानं समर्पयामि।।
**********
*पूजन .....*
ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
आवाहयामि ।।
आसनार्थे पुष्प-अक्षतं समर्पयामि।।
स्नानं, अर्घं, पाद्यं समरपयामि।(तीन बार जल चढ़ाएं।)
अक्षतं, गन्धं , पुष्पाणि पुष्पमाल्यां समर्पयामि ।
धूपं दीपं दर्शयामि। (धूप दीप दिखाकर हस्त प्रच्छालन करें)
नैवेद्यं निवेदयामि । (भोग प्रसादी अर्पित करें)
त्रतुफलं समर्पयामि।
श्रीफलं समर्पयामि।
मुखशुद्धि हेतार्थं, आचमनं समर्पयामि। (तीन बार घुमाकर जल जमीन पर छोडें।)
ताम्बूलं पुंगीफलं समर्पयामि।
सद्रव्य दक्षिणाम समर्पयामि ।
*( माता लक्ष्मी जी को ऊपर बताए गए सामग्री चढ़ाएं । )*
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*जाप मंत्र....*
कमलगट्टे की माला या स्फटिक माला से इस लक्ष्मी मन्त्र का जाप अपनी सुविधनुसार करे ।
*ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥*
*************
*जप समर्पण.....*
( दाहिने हाथ में जल लेकर मंत्र बोलें एवं जमीन पर छोड़ दें )
*ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं ,*
*सिद्धिर्भवतु मं देवी त्वत् प्रसादान्महेश्वरि ॥*
*************
श्री लक्ष्मी जी की आरती...
*ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया† जय लक्ष्मी माता ।*
*तुमको निसिदिन सेवत, हर-विष्णू धाता ॥ ॐ जय* ॥*
*उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ।*
*सूर्य - चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता ॥ ॐ जय ॥*
*दुर्गारुप निरञ्जनि, सुख-सम्पति दाता ।*
*जो कोइ तुमको ध्यावत, ऋधि-सिधि-धन पाता॥ ॐ जय॥*
*तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।*
*कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधिकी त्राता ॥ ॐ जय ॥*
*जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद् गुण आता ।*
*सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ ॐ जय ॥*
*तुम बिन यज्ञ न होते, दान न हो पाता ।*
*खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ ॐ जय ॥*
*शुभ-गुण-मन्दिर सुन्दर , क्षीरोदधि जाता ।*
*रत्न चतुर्दश तुम बिन कोइ नहि पाता ॥ ॐ जय ॥*
*महालक्ष्मी जी कि आरति, जो कोई नर गाता।*
*उर आनन्द समाता , पाप उतर जाता ॥ ॐ जय ॥*
***********

सरल पुष्पांजलि...
*ऊँ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे, विष्णु पत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ऊँ।।*
*शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि, नारायणी नमोSस्तुते।।*
*पुष्पांजलि समर्पियामि।।*

क्षमा - याचना...
*मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्युजितं मया देवी परिपूर्ण तदस्तु मे ॥*
*आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी।।*
*अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम । तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वरी ।।*
🙏🏻 *श्री महालक्ष्म्यै नमः क्षमायाचनां समर्पयामि🙏🏻* ना मैं आवाहन करना जानता हूँ , ना विसर्जन करना जानता हूँ और ना पूजा करना हीं जानता हूँ । हे परमेश्वरी क्षमा करें । हे परमेश्वरी मैंने जो मंत्रहीन , क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है , वह आपकी कृपा से पूर्ण व शुभफलदायी हो।
विसर्जन......
*(हमारे मतानुसार इस अर्थप्रधान युग में लक्ष्मी जी को कभी विसर्जन नहीं करना चाहिए..... अन्यथा धन, यश, वैभव, उन्नति आदि भी विसर्जित हो जाती है।)*
परिक्रमा.....
*यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणेपदे पदे।*
*जय महालक्ष्मयै नम:*🌹🌹💐

19/05/2021

🙏🙏
अध्यात्म ज्योतिष---1.
जन्म जन्मान्तरों के संस्कारों को किस ग्रह को केन्द्र मानकर विचार करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में जिसे लग्र कहते हैं। चिकित्सा शास्त्र में जिसे काया/शरीर कहते हैं। नीति शास्त्र में जिसे मूर्ति कहते हैं। तथा गीता शास्त्र में जिसे क्षेत्र कहते हैं बिना उसे जाने आगे की प्रगति असम्भव है।
जिसने लग्न को जान लिया वह पक्का ज्योतिषी हो गया। जो शरीर की क्रिया प्रणाली जान गया वह चिकित्सा शास्त्री हो गया। जिसने मूर्ति के स्वरूप को जान लिया वह निश्चय ही नीतिज्ञ हो गया। जो इस क्षेत्र को अच्छी तरह जान लिया वह अध्यात्म के द्वार पर पहुंचा हुआ है--ऐसा माना जाय। यह सब शब्द पर्याय वाची है।
भगवान कृष्ण कहते हैं --
" इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते:''
पुनः
" क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्व क्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ।।"
यह शरीर क्षेत्र है। जो इस शरीर को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है। जो केवल अपने शरीर को जानता है वह जीवात्मा है। जो सभी शरीरों को जानता है, वह परमात्मा है।
क्षेत्र का अर्थ है -- खेत/भूमि/पृथ्वी। क्षीयते त्रायते इति क्षेत्रम। भगवान ने इस शरीर को क्षेत्र नाम क्यों दिया ?
क्षेत्र में बीज बोया जाता है। फ़सल काटने के बाद पुनः उसमें खाद वा उर्वरक न डाला जाए तो अगली फसल अच्छी नहीं होगी। क्यों कि खेत क्षीण हो चुका है। इसलिए क्षेत्र को पुष्ट करने के लिए वा त्राण करने के लिए उसमें खाद डालते हैं।
ठीक यही दशा इस शरीर की है। यह शरीर क्षीण (दुर्बल) होता है। इसको पुष्ट करने के लिए भोजन किया जाता है। इसका बार बार क्षयन त्रायण होता रहता है। इसलिए यह शरीर क्षेत्र है।
इस शरीर को क्षेत्र कहने का एक अन्य कारण भी है। खेत (भूमि) में जैसा बीज बोया जाता है, वैसा फल होता है। आम के बीज से आम, इमली के बीज से इमली, नारियल के बीज से नारियल का पेड़........ होता है। ठीक ऐसे ही इस शरीर से जो कर्म किया जाता है उसका सूक्ष्म बीज संस्कार रूप में इस शरीर में पड़ा रहता है। समय आने पर उस संस्कार रूप बीज से शुभाशुभ फल व्यक्ति को मिलता रहता है। पुण्य कर्मों का मीठा, पाप कर्मों का खट्टा तथा मिश्र कर्मो का फल खटमिठ होता है। इसलिए यह शरीर क्षेत्र है--ऐसा भगवान कहते हैं।
यह शरीर पृथ्वी सदृश है। लोक में प्राणों के निकल जाने पर शरीर (शव) को मिट्टी कहते हैं।
यह शरीर पंच भूतात्मक है। पृथ्वी में पांचो तत्व है अतः पृथ्वी पंच भूतात्मक है। पृथ्वी से अन्न उत्पन्न होता है अतः अन्न पंच भूतात्मक हुआ। अन्न से शरीर बनता है अतः यह शरीर भी पंच भूतात्मक हुआ। अतः शरीर = पृथ्वी ।
वेद इस बात का समर्थन करता है।
"सूर्यो में चक्षुरवात: प्राणोऽन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम ।
पुनः---
सूरयाच्चक्षु: अन्तरिक्षाच्छो्त्रं पृथिव्या: शरीरम।
---- अथर्व वेद-----
प्रथम मंत्र में पृथिवी शरीरम (पृथ्वी शरीर है) तथा द्वितीय मंत्र में पृथिव्या: शरीरम( पृथ्वी से शरीर है) कहा गया है दोनों का भाव एक है।
प्रथम मंत्र में ही वात: प्राण: (वायु प्राण है) ऐसा कहा है, मन वायु सदृश चंचल है। अतः वात:= मन। मन = चन्द्रमा। अतएव चन्द्रमा प्राण है।
स्थूल शरीर पृथ्वी है। सूक्ष्म शरीर वायवीय होने से चन्द्रमा है।
कारण शरीर सूर्य है।
स्थूल शरीर का स्वामी लग्नेश है।
सूक्ष्म शरीर का स्वामी चन्द्रमा है।यह प्राणमय है।
कारण शरीर का स्वामी सूर्य है। यह ज्ञानमय है।
तीन शरीर होने के कारण तीन लग्नें है। भू लग्न, चन्द्र लग्न, सूर्य लग्न। सुदर्शन पद्धति में तीनों पर बराबर दृष्टि डाली जाती है।
यह शरीर प्रथम भाव है। यह सर्व प्रथम अस्तित्व में आता है। वीर्य एवं रज के संयोग से यह बन कर तैयार होता है, तब चेतन तत्व का इसमें प्रवेश होता है। "भू अस्तित्वे भवति" से शरीर है तो सब है अन्यथा कुछ नहीं। अतः यह प्रथम भाव है।
शरीर से शारीर शब्द बना है।
शारीर= आत्मा/जीवात्मा/जीव।
चिकित्सक का ज्ञान शरीर के बारे में अत्यल्प होता है। इस शरीर के अमूर्त तत्त्वों को जाने बिना ज्ञान अधूरा है। वह तत्त्व हैं मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार।
आत्मा षडभाव शून्य है। शरीर षडभाव युक्त है। इसलिए शरीर को भाव कहा गया है। यह शरीर आत्मा का वस्त्र है इसलिए यह शरीर धरा है। आत्मा इसमें बसता है अतः यह गृह है।आत्मा इसमें रहता है अतः यह अस्ति(भू) है। यह शरीर अन्य शरीरों से लगा रहता है अतः यह लग्न है।
इन तीनों शरीरों की , भू लग्र से स्थूल देह का, चन्द्र लग्न से सूक्ष्म देह का, कारण शरीर का सूर्य लग्न से पुष्टता,अपुष्टता का ज्ञान किया जाता है।
लग्न शरीर है। लग्नेश इस देह का स्वामी जीव है जो कि "यह शरीर मेरा है" ऐसा कहता/ समझता है। इस जीव का मन जिसके द्वारा यह सतत क्रियाशील/विचारशील होता है, चन्द्रमा है। इस जीव का आत्मा जो कि सबका केन्द्र बिन्दु है, सूर्य है। भू लग्न, चन्द्र लग्न, सूर्य लग्न इन तीनों को एक साथ जानना त्रिनयन शिव को जानने के समान है। यह तीनों लग्नें और नवांश लग्न इन चारों को एक साथ सम्यक रूप से जानना चतुर्भुज विष्णु को जान लेने के समान है। यह सब जानना कितना कठिन है? जिसको राम जनाये वही जाने।
लग्नेश लग्न रूपी वृक्ष है।
लग्न रूपी वृक्ष का बीज है उसका नवांश।
लग्न रूपी वृक्ष का फल है चन्द्रमा। फल के बिना वृक्ष व्यर्थ है।
लग्न रूपी वृक्ष का रखवाला वा माली है सूर्य। माली अच्छा व दक्ष नहीं है तो वृक्ष उसका फल तथा बीज सब रुग्ण वा दूषित हो जाता है।
लग्नेश शरीर का स्वामी होता है। लग्न और लग्नेश से बाह्य व्यक्तित्व का विचार किया जाता है।
आन्तरिक व्यक्तित्व ,शील स्वभाव एवं चरित्र का अध्ययन चन्द्रमा/चन्द्र लग्न से किया जाता है।
सूक्ष्म व्यक्तित्व का विचार सूर्य/सूर्य लग्न से करना चाहिए।
जन्म जन्मान्तरों के संस्कार सूर्य लग्न से जानने चाहिए। ये संस्कार व्यक्ति के भीतर अति सूक्ष्म रूप से सुप्त पडे होते हैं। काल क्रम से जाग्रत होते हैं।
जीव जब शरीर छोड़ता है तो सभी संस्कारों सहित लिंग/करण शरीर निकल जाता है तथा अगला शरीर संस्कारों सहित धारण करता है। इस शरीर का स्वामी सूर्य है अतः जन्म जन्मान्तरों के संस्कार सूर्य को केन्द्र मानकर देखना चाहिए।
शनि अपनी दशा, साढे साती, ढैया के दौरान जीव के कर्मों का शुभाशुभ फल भुगतवा कर कंचन की तरह निर्मल कर देता है। जिससे व्यक्ति के अन्दर वैराग्य की उत्पत्ति होती है और जीव श्रेय मार्ग की ओर चलता है।
पुनर्जन्म की प्रक्रिया में शनि का कोई रोल नहीं होता है।
सीमित शब्दों में लग्न का वर्णन नहीं किया जा सकता। लग्न नाम शरीर का। शरीर जितने हैं सब परमात्मा के हैं। जब सब शरीर परमात्मा है वा परमात्मा का है तो हम क्यों कहते हैं कि यह(शरीर) मैं हूं वा यह (शरीर) मेरा है।
यही तो माया है।धन्य है यह माया।
----------अखिलेश कुमार मिश्रा---
ज्योतिष विशारद
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13/09/2020

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कर्म योग से परमात्म प्राप्ति संभव है????
कुंडली में दशम भाव कर्म भाव कहा गया है। राशि चक्र में मकर राशि कर्म राशि है।
अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं-
'झषाणां मकरश्चास्मि।'
( मत्स्यों में मैं मकर हूं) भगवान द्वारा ऐसा कहने से मकर राशि की महत्ता झलकती है।
मकर का सरल अर्थ है घड़ियाल/ग्राह।
म + कर = मकर
म = काल, विष, चन्द्र, ब्रम्हा, विष्णु,शिव यम, जल, प्रसन्नता।
कर = जिसके द्वारा कर्म किया जाता है हाथ।
अतः मकर = प्राकृतिक कर्म, सहज कर्म।
कुबेर की नौ निधियों में एक है मकर।
मकर शब्द में कृ धातु सन्निहित है अतः इस राशि का कर्म से विशेष संबंध है। तुलसी दास जी कहते हैं- 'करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं सो तस फल चाखा।
करम = मकर।
दशम आकाश स्थान है इसलिए यहां कर्म से तात्पर्य विस्तृत कर्म, व्यापक कर्म, विशेष रूप से किये गये कर्म वा यज्ञ कर्म।
म अर्थात काल यम जल चन्द्र विष्णु शिव ये सब देव है। इसलिए मकर = दिव्य कर्म, श्रेष्ठ कर्म।
दशम भाव धर्म और लाभ के बीच में है। दशम भाव कर्म है। दशम (कर्म) के पहले नवम (धर्म) है और इसके पश्चात लाभ भाव है।
इससे स्पष्ट हुआ- कर्म का आधार धर्म है। तथा कर्म का लक्ष्य फल(लाभ) है।
अतः जातक को चाहिए कि वह धर्म से अनुशासित होकर तथा लाभ को लक्ष्य में रखकर कर्म का सम्पादन करे।
धर्म बहुत गूढ़ विषय है इसकी व्याख्या थोडे शब्दों में असम्भव है। भागवत कार कहता है।
श्रीकृष्ण ही धर्म है। यानि जीवात्मा को मनुष्य योनि मिली है तो जीव भगवान को याद करना,भजन करना जीव का धर्म है। धर्म से अनुशासित होकर कर्म करना मतलब भगवान को याद करते हुए उन्हें अपने कर्मफल सौंपते हुए कर्म करना।
लाभ को लक्ष्य में ले कर कर्म करना इसको समझने के लिए लाभ क्या है इसको समझना पड़ेगा।
लाभ, कुंडली में भाव २और भाव ९ मिलकर भाव ११की बराबरी करते हैं।
भाव २ आंख है भाव ९ भाग्य है भगवान है। अपनी आंखों से भगवान का दर्शन करना वास्तविक लाभ है।
भाव ३ + भाव ६ = भाव ११।
अपने पराक्रम से अपने भीतर के शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर)को जीतना ही लाभ है।
भाव ४ सुख है समस्त भौतिक सुखों का। भौतिक सुख तब होंगे जब उनका लाभ होगा। सुख भाव से लाभ भाव आंठवा पड़ता है।
मतलब भौतिक सुखों का लाभ से षडाष्टक संबंध है मतलब यह भौतिक लाभ वास्तविक लाभ नहीं है।
चतुर्थ भाव है मन और मन की मृत्यु स्थली है लाभ भाव। यानि मन की मृत्यु हो जाना वास्तविक लाभ है। मन का अमल होना, भौतिक सुख दुःख से परे होना ही मन की मृत्यु है। ऐसा मन महेश्वर के दर्शन का अधिकारी होता है।
लाभ को उल्टा लिखा जाये तो शब्द बनता है भला । जिस लाभ से जातक का भला हो वही लाभ है।
शंकराचार्य से प्रश्नोत्तरी में मंडन मिश्र पूंछते है कि वास्तविक लाभ क्या है?
शंकराचार्य कहते हैं कि "आत्म साक्षात्कार" सबसे बड़ा और वास्तविक लाभ है।
लाभ भाव में प्रकृतित: कुंभ राशि है।जो एक स्थिर राशि है। यानि लाभ स्थिर होना चाहिए। आत्मसाक्षात्कार स्थिर लाभ है।
दशम भाव धर्म से द्वितीय है। इसलिए यह धर्म का धन है। धर्म का धन है सत्कर्म। अतः जातक को सत्कर्म करने चाहिए।
दशम भाव एकादश भाव से द्वादश है इस लिए दशम लाभ का व्यय अर्थात दान है। अतः जीव को दानकर्म करते रहना चाहिए।
शास्त्रानुसार, दानकर्म = सत्कर्म = यज्ञ = निष्काम भाव।
आकाश यज्ञ करता है यह यज्ञ अनवरत चलता रहता है। यह प्रकाश, वायु, जल के रूप में आहुति देता रहता है। हमें आकाश का अनुसरण करते हुए यज्ञ(निष्काम कर्म) के सम्पादन में दत्तचित्त होना चाहिए।
इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भगवान ने जो गीता में कर्म योग को कहा है। ज्योतिष शास्त्र उसकी पुष्टि करता है।
कि कर्म योग से परमात्मा की प्राप्ति अवश्य ही संभव है।
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09/09/2020

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जैसे नदियों में गंगा, वैष्णवों में शिव, अक्षरों में अकार, विद्याओं में ब्रम्हविदया को श्रेष्ठ माना गया है वैसे ही कुंडली के द्वादश भावों में नवम भाव सबका सिरमौर है।
अतः संख्या 9 को नमस्कार है।
भाग्य भवन के कारक गुरु को प्रणाम करता हूं।
अंक 9 सर्वोपरि है। इसलिए अन्य सभी भावों से बढ़कर है भाग्य भाव। संख्या 9 का अधिपति हैं बृहस्पति। जिसका भाग्य ठीक नहीं उसका कुछ भी ठीक नहीं, भले ही ठीक लगे।
मृत्यु (अष्टम) के मुख से निकला हुआ भाव है, भाग्य। अतः यह असाधारण भाव हुआ।
सर्व प्रथम जातक के भाग्य की परीक्षा करनी चाहिए।
१. संख्या 9 कुंडली के किस भाव में है? वह भाव शुभ है या अशुभ? उसमें कैसे ग्रह बैठे हैं और देखते हैं?
२. भाव 9 में स्थित एवं देखने वाले ग्रह।
3. बृहस्पति किस भाव में है कैसे प्रभाव में है? यह कितना बली है?
4. नवमेश कहां है, किन ग्रहों से आक्रान्त है, तथा कितना सक्षम है।
5. नवम में कौन सा नवांश है? इस नवांश संख्या का स्वामी ग्रह एवं इस नवांश राशि में स्थित ग्रह की शुभाशुभता एवं बलवत्ता क्या है?
इन पांच बातों का विचार लग्न एवं चन्द्र दोनों से करना चाहिए। भाग्य का अंकुर नवम में फूटता है। यह वृक्ष रूप होकर समस्त भावों को अपनी शाखा प्रशाखाओं से आवृत्त करता है। इसके फल हर भाव में लगते हैं तथा रंग बिरंगे, छोटे बड़े,खट्टे मीठे स्वाद के होते हैं। भगवत कृपा से इसका रस मिलता है।
पूर्व जन्म में किए गए पुण्य एवं पाप कर्मों का अभिलेखागार है भाग्य भाव, हमारा वर्तमान जीवन पूर्व जन्म के शुभाशुभ कर्मों का फल है।
कर्म की ईंटों से भाग्यभित्ति के निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। काल रूप गारे से प्रत्येक ईंट स्थायित्व प्राप्त करती है।
भाग्य भित्ति के दो छोर हैं - तृतीय एवं नवम।
तृतीय= भुजा,हांथ। नवम= जांघ।
सब की बांहे जांघों तक लटकती है।इसका अर्थ हुआ कि जांघों पर बांहों का पूरा अधिकार है।
३ = हाथ = कर्म। ९= जांघ=भाग्य। अर्थात कर्म ही भाग्य विधाता है। कर्म होता है हांथ से। हाथ में उत्कीर्ण रेखाएं भाग्य लेख है।जो इस लेख को लिखता है,वह ब्रम्हा है तथा जो इसे पढ़ता है वह ज्योतिषी है।
दोनों को मेरा प्रणाम।
स्त्री पुरुष अपनी दोनों जांघों को ढके रहते हैं। अतः भाग्य ढका हुआ वा अदृश्य न दिखाई देने वाला होने से अदृष्ट नाम से जाना जाता है। यह अदृष्ट करभ क्षेत्र में दृष्ट है।
तीसरा भाव नवम को देखता है,नवम तीसरे को देखता है। दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता है।
तृतीय भाव संख्या ३का अधिपति बुध है। बुध = बुद्धि। नवम भाव संख्या ९का अधिपति गुरु है। गुरु=ज्ञान।
निष्कर्ष यह निकला कि जो संबंध बुद्धि और ज्ञान में है वही संबंध तृतीय एवं नवम में है।
दोनों द्विस्वभाव अंक हैं। अतः ये ज्ञेय एवं अज्ञेय एक ही साथ हैं। भाग्य जितना ज्ञेय है, उतना ही अज्ञेय है।द्विस्वभावता के कारण अज्ञेय एवं ज्ञेय का द्वंद्व टिका रहता है। इस द्वंद्व से परे सबका भाग्य लिखने वाले महर्षि भृगु को प्रणाम है।
भाग्य पत्र में अनन्त जन्मों का इतिहास समाविष्ट रहता है।इसका लेखक विश्वयोगी है।इसको पढ़ने वाला भी योगी होता है।
नवम भाव एवं तृतीय भाव एक दूसरे के सामने है। तृतीय भाव हाथ है। तृतीय का नवम में पूर्ण प्रभाव है।अतएव मनुष्य का भाग्य उसके हाथ में है।यह सिद्ध हुआ।
तृतीय में द्विस्वभाव राशि मिथुन नवम में भी द्विस्वभाव राशि धनु। इसका अर्थ हुआ-हाथ में दो विरुद्ध धर्म है, लेना और देना। अर्जित करना,व्यय करना। भाग्य के दो विरुद्ध धर्म है सुख और दुःख। सौभाग्य,दुर्भाग्य। भाग्य अचर है, भाग्य चर है। भाग्य अपरिवर्तन शील है, भाग्य को बदला जाता है। भाग्य को बदलने का उपकरण है हाथ। हाथ कर्मेन्द्रिय है। अतः भाग्य में परिवर्तन कर्म द्वारा होता है।
हाथ सदैव वाणी का अनुगमन करता है। पहले वचन तब कर्म। सर्व प्रथम मन में संकल्प उठता है।यह परा वाणी है। जिव्हा इसका अनुमोदन कर इसे श्रवण योग्य रूप में प्रकट करती है।इसे वचन कहते हैं।इस वचन के पालन के लिए हाथ कर्म के लिए सक्रिय होता है। यह कर्म आगे चलकर परिपक्व होता है और भाग्य कहलाता है।
जातक का हाथ त्रिदेव है। हाथ से पालन रक्षण तथा संहार होता है। असंख्य हाथ विश्व के निर्माण में लगे हैं। इतने ही हाथ इस विश्व को संभालने में लगे हैं। इतने ही हाथ विश्व का विध्वंस करने में लगे हैं। भाग्य का यह खेल हाथों से खेला जा रहा है। खेलने वाला प्रत्यक्ष है।पर इस खेल का प्रेरक सूत्रधार पुरुष अप्रत्यक्ष है। इसके इस खेल में मैं भी सम्मिलित होकर अपने को खिलाड़ी मान रहा हूं।वस्तुतः खिलाड़ी भी वही है। भाग्य का प्रपंच ही ऐसा है कि जीव इसमें पड़कर मोहित हो रहा है। जीव का यह मोह ज्ञान से छंटता है और ज्ञान अनिरवाच्य है।
भाग्य भाव जांघ है। भाग्य विधाता हाथ है।जांघ तक हाथ की पहुंच है। सम्पूर्ण जांघ पर्यन्त जिसका हाथ पहुंचता है वह मानव महाभाग्यशाली है। ऐसा पुरुष अजानुभुज कहलाता है।
मनुष्य जन्म पाना ही भाग्य वान होना है। सम्पूर्ण जांघ को ढकने वाला हाथ चक्रवर्ती सम्राट एवं वीतराग योगी का होता है। भाग्य भवन का निर्माण इन हाथों से होता है।
इन हाथों को मेरा नमस्कार।
🙏🙏🙏🙏🙏

18/08/2020

कुंडली में जिस भाव में सूर्य स्थित होता है उस भाव को ऊर्ध्व मुख कहते हैं। जो भाव ग्रह विहीन हो उसे अधोमुख कहते हैं। जिसमें सूर्य को छोड़कर अन्य ग्रह हों वह तिर्यकमुख कहते हैं।
इससे स्पष्ट है सूर्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह है।
मेष लग्न में सूर्य पंचमेश होता है। त्रिकोणेश हमेशा शुभ होता है।
लग्न में उच्च का होता है। उच्च पद पर प्रतिष्ठित करता है। मेष के सूर्य में प्रखर प्रकाश होता है अतः जातक के अधीनस्थ या आसपास के लोग भयभीत होकर अनुशासित होते हैं।
पंचम में स्थित हो तो जातक की बुद्धि तीक्ष्ण होती है।
दशम में राजयोग का निर्माण करता है।
सूर्य क्योंकि शुभ ग्रह होता है इस लग्न में इसलिए कहीं भी हो। अन्य ग्रहों के तारतम्य से फल देता है। पीड़ित होने पर भी अशुभ फल की मात्रा न्यून या नगण्य ही होगी।
हर राशि एवं भाव का फल ज्योतिष की पुस्तकों में है। मैं उसकी चर्चा न करके । सूर्य संबंधी कुछ विशेष चर्चा करता हूं।
सूर्य का अर्थ है प्रकाश।जिस भाव में सूर्य है वहां प्रकाश है। जहां प्रकाश है वहां धन है। सम्पूर्ण धन प्रकाश/ज्योति में है।
सूर्य युक्त भाव अपने स्वरूप एवं कारकत्व के अनुसार धन देता है।
ऐसा भाव भाग्य का विकल्प होता है।
जहां सूर्य है वहां धन है।
जैसे व्यय भाव में सूर्य है तो दान लेने/देने या व्यय करने से धन मिलता है।
दशम में सूर्य है तो सरकारी स्रोतों से धन की प्राप्ति होती है।
नवम में सूर्य के होने से भाग्यवश, अनायास ,पिता से धन मिलता रहता है।
अष्टम का सूर्य ससुराल से वा अपमान पूर्वक धन देता है।
सप्तम का सूर्य स्त्री वा सहयोगी से धन प्राप्ति कराता है।
षष्ठस्थ सूर्य शत्रु से धन का लाभ कराता है। पंचम स्थान का सूर्य पुत्र व बुद्धि से धन लाभ कराता है। चतुर्थ का सूर्य भूमि, माता से धन की प्राप्ति कराता है।
तृतीय का सूर्य बाहुबल, लघु भ्राता से तथा एकादश का सूर्य ,अग्रज से ,ब्याज से उपहार स्वरूप धन दिलाता है।
द्वितीय स्थान का सूर्य वाकशक्ति से एवं लग्न का सूर्य जन्मस्थान से धन की प्राप्ति कराता है।
रात का सूर्य भाव २ से ६ तक उतना धन नहीं देता जितना दिन का भाव ८ से १२ तक, प्रात: लग्न एवं शायं सप्तम का सूर्य मध्यम धन देता है।
दिन का जन्म, उत्तरायण का सूर्य भाग्य प्रवर्तक धन दाता है।
यह अग्नि ही सूर्य है। कुंडली के जिस भाव में सूर्य होता है वह भाव धन्य हो जाता है।ऐसा पाराशर श्रृषि का वचन है।
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