30/11/2025
अपने हाथों से सहजन के पेड़ लगाए थे और अब पत्तियों से पावडर बना लिया।
सहजन का पावडर (moringa powder)
हम किसानों को सहजन की सूखी पत्तियां dry leaves का ये बड़ी कंपनियां 120 रुपए से लेकर 150, 180 और बहुत अधिक हुआ तो 200 रुपए किलो इससे ज्यादा कीमत नहीं देती।
पर वहीं जब वो खुद 150 वाली सहजन पत्तियों का पाउडर बनाकर तैयार करते हैं तो उसकी कीमत 1000, 1500, 1800, 2000 रुपए किलो और इससे अधिक तय करते है, हां हम यह भी मानते हैं की कंपनियों का ट्रांसपोर्ट कास्ट, स्टाफ कास्ट, प्रोसेसिंग कास्ट, ब्रांडिंग कास्ट मार्केटिंग कास्ट, पैकेजिंग कास्ट यह सब आता होगा, पर वह कितना होगा कितने गुना ज्यादा हो सकता है, इतना बड़ा अंतर तो नहीं होगा। यानी किसान को बहुत कम और कस्टमर को बहुत अधिक, बीच का जो बड़ा प्रॉफिट है बड़ा मार्जिन है वो खुद।
किसान को तो 150 या 180 या बहुत ज्यादा 200 ही मिले 1 किलो के, जिसने सबसे ज्यादा मेहनत की और लागत लगाई, देख रेख की और कई किलो ताजी हरी पत्तियों को जब सुखाया 2,4 दिन तब जाकर 1 किलो तैयार हुईं powder बनाने लायक।।
हम ऐसे नहीं करते,,,, यानी जब तक हम किसान अपने खेत से उपजी चीजों का, फसलों का मूल्य संवर्धन यानी value eddition नहीं करेंगे तब तक हमें अपनी उपज, लागत और मेहनत की उचित कीमत नहीं मिलने वाली.
जब हम अपनी फसल खड़ी और कच्ची मार्केट, मंडी में देते हैं तो कीमत मार्केट और मंडी तय करती है, पर वही जब हम डायरेक्ट न बेचकर उनका कोई प्रोडक्ट बनाते हैं तो उसकी कीमत हम खुद तय करते हैं..
जैसे गेहूं, चना, सरसों, गन्ना, धान, धनियां, मिर्च, हल्दी या अन्य कुछ भी...
वहीं पर जब हम गेहूं से आटा बनाते हैं, चना से बेसन बनाते हैं, सरसों से तेल निकलते हैं, गन्ना से गुड और सिरका बनाते हैं, धान से चावल निकलते हैं, धनिया मिर्च हल्दी का पाउडर बनाते हैं. या ऐसे और भी फसलों से कोई प्रोडक्ट तैयार करते हैं तो उसकी कीमत हम तय करते हैं।
हां शुरुआत में किसानों को मार्केट में दिक्कत होगी थोड़ा समय लगेगा पर नामुमकिन नहीं है, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में काफी कुछ तैयार किया जाए,अलग-अलग फसलें उगाई जाए और उनका लोकल स्तर पर कोई ना कोई प्रोडक्ट तैयार किया जाए।
और इसमें सबसे ज्यादा किसानों के उन पढ़े-लिखे युवाओं को बच्चों को आगे आना चाहिए जो 8-10 हजार की नौकरी के लिए गुजरात, मुंबई,दिल्ली भटक रहे हैं, उनको प्रोडक्ट तैयार करने से लेकर ब्रांडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग का कार्य सम्हालना चाहिए।।
इसमें देश की एफपीओ FPO का भी काफी अच्छा रोल होता जा रहा है, पर बहुत कम FPO हैं, ज्यादातर फार्म मशीनरी बैंक ट्रैक्टर और कृषि यंत्रों के मिलने तक ही सीमित हो गई हैं, कुछ यह पो हैं जो किसानों के उत्पादन को किसी न किसी प्रोडक्ट में बदलकर उन्हें पैकेजिंग ब्रांडिंग और मार्केटिंग दे रही हैं.