06/12/2025
6 दिसंबर का वो दिन जब सूरज ने आँसू पी लिए
दिल्ली का सर्द मौसम था, पर उस सुबह हवा में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी,
26 अलीपुर रोड के छोटे-से मकान में बाबासाहेब ने आख़िरी साँस ली,
डॉक्टरों ने कहा डायबिटीज़ और हृदय गति रुकने से ऐसा हुआ
पर हम जानते हैं, सच क्या हैं,
बाबासाहब मरे नहीं थे वे थक गए थे इसलिए आराम करना चाहिते थे,
एक अकेला इंसान सदियों की जंजीरें तोड़ते-तोड़ते थक गया था उन्होंने कभी शिक़ायत नहीं की,
जब लोग कहते, “बाबा, आप आराम कर लीजिए”,
तो वे हँसकर कहते
“मैं आराम तब करूँगा जब मेरा आख़िरी दलित भाई-बहन भी गरिमा के साथ जीने लगेगा।”
वह आराम उन्हें आज तक नहीं मिला। उनके बिस्तर के पास टेबल पर तीन चीजें बिखरी पड़ी थीं –
1. अधूरा लिखा हुआ “The Buddha and His Dhamma” का अंतिम पन्ना
2. एक नीली स्याही की कलम, जिससे उन्होंने संविधान के आखिरी शब्द लिखे थे
3. माई साहब (सविता अम्बेडकर) का हाथ – जो अब तक गर्म था, पर बाबासाहब का हाथ ठंडा पड़ चुका था।उसी रात लाखों लोग चुपचाप चौपाटी पहुँचे।
कोई रो नहीं रहा था – सबकी आँखें सूखी थीं।
जैसे रोने का हक भी कोई छीन ले गया हो।
दादर की समुद्र-किनारे चिता जली।
लकड़ियाँ जल रही थीं, पर जल रहा था पूरा हिंदुस्तान का अन्याय।
और राख बनकर उड़ गया वह इंसान जिसने कभी कहा था –
“मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरी मजबूरी थी।
मैं हिंदू के रूप में मरना नहीं चाहता, यह मेरा अधिकार है।”
हर 6 दिसम्बर को सूरज देर से निकलता है।
जैसे पूछता हो –
“तुमने मेरे भीम को क्या दिया?
वह जो तुम्हें समानता का संविधान देकर गया,
तुम उसे कितना जी रहे हो? ”इसलिए महापरिनिर्वाण दिवस पर हम केवल फूल नहीं चढ़ाते बल्कि हम आईना देखते हैं।
और खुद से तीन सवाल पूछते हैं –
1. क्या हम अभी भी जाति पूछते हैं?
2. क्या हमारा आरक्षण सिर्फ नौकरी तक सिमट गया, या गरिमा तक पहुँचा?
3. क्या हम बाबासाहब की लिखी हुई किताबें पढ़ रहे हैं, या सिर्फ उनकी मूर्तियों पर माला चढ़ा रहे हैं? बाबासाहब कहीं गए नहीं हैं।
वे हमारे अंतर्मन में अभी भी जीवित हैं –
हर उस बच्चे में जो स्कूल में अलग नहीं बिठाया जाना चाहता,
हर उस नौजवान में जो नौकरी के फॉर्म में “जाति” कॉलम खाली छोड़ देता है,
हर उस औरत में जो कहती है – “मुझे मेरे पिता की नहीं, अपनी पहचान चाहिए।”
जब तक एक हमारे साथ ऊँच-नीच के नाम पर भेदभाव होता रहेगा, तब तक बाबासाहब का परिनिर्वाण पूरा नहीं होगा।
उनका निर्वाण तभी होगा जब हमारा समाज सचमुच समता का समाज बन जाएगा।
इसलिए रोइए मत।
गुस्सा कीजिए।
सवाल कीजिए।
और फिर उठिए।
क्योंकि बाबासाहब ने हमें विरासत में आँसू नहीं, एक अधूरी क्रांति दी है उसे पूरा करना हमारा कर्तव्य है।
परमपूज्य बाबा साहब डॉ० भीमराव अम्बेडकर जी को कृतज्ञ राष्ट्र का शत्-शत् नमन 🙏🏻