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03/09/2026
शीर्षक : तालियों का खेल और हमारी ज़िंदगी(तालियाँ रुकने के बाद ही असली ज़िंदगी शुरू होती है… खुद के लिए जीने का समय तभी आ...
05/04/2026

शीर्षक : तालियों का खेल और हमारी ज़िंदगी
(तालियाँ रुकने के बाद ही असली ज़िंदगी शुरू होती है… खुद के लिए जीने का समय तभी आता है)

इंसान बड़ा ही मज़ेदार प्राणी है।
वह खुद के लिए कम और दूसरों से “वाह!” सुनने के लिए ज़्यादा जीता है। मतलब क्या, तो खुद को चाय कैसी लगती है इससे ज़्यादा खुशी तब होती है जब पड़ोसी कह दे—“चाय तो कमाल की है!”

हम पूरी ज़िंदगी तालियों के पीछे भागते रहते हैं।
कोई पीठ थपथपा दे तो लगता है—“बस! अब तो हम कुछ बन गए।”
लेकिन मज़े की बात देखिए, यही ताली बजाने वाले लोग अगले ही दिन आपको देखकर कहते हैं—“कहीं देखा है आपको…”

ज़रा मृत्यु का उदाहरण लीजिए—
कोई चला जाता है, तो पहले दो दिन सब भावुक होते हैं। तीसरे दिन चाय में चीनी कम हो जाए तो बात बदल जाती है। और हफ्ते भर में तो “कौन?” भी पूछा जाता है!
यानि जिनके लिए हम जीते हैं, वे हमें भूलने की तैयारी पहले से ही किए बैठे होते हैं।

यह दुनिया बड़ी ईमानदार है—
तालियाँ देती है, लेकिन हमेशा नहीं।
आज सिर पर बिठाती है, कल नीचे उतार देती है।
दुनिया का प्यार भी मौसमी सब्ज़ी जैसा है—कभी ताज़ा, कभी सड़ा हुआ!

तो करना क्या है?

सीधी सी बात है—
खुद के लिए जीना है।
जैसा मन करे वैसा जीना है।
आत्मसम्मान को तालियों से ऊपर रखना है।

जब इंसान खुद के लिए जीना सीख जाता है, तो “लोग क्या कहेंगे?” वाली बीमारी ठीक हो जाती है।
और एक बार यह बीमारी चली गई, तो इंसान शांत हो जाता है—क्योंकि उसे किसी की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं रहती।

विजयभास्कर के अंतरमन से कहें तो—
तालियाँ मिलें तो अच्छा है, लेकिन उनके बिना भी जीना आना चाहिए।
क्योंकि अंत में, जब दर्शक चले जाते हैं, तब भी जो मंच पर खड़ा रहता है—वही सच्चा कलाकार होता है!

© विजयभास्कर | शब्द मेरे, स्वत्व मेरा, अधिकार भी मेरा।

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26/02/2026

श्री गजानन विजय ग्रंथ — अध्याय 21 का सारांश
(श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति से किया गया “श्री गजानन विजय” का पाठ जीवन में सुख, शांति और कृपा का प्रकाश लाता है।)

इस अध्याय के प्रारंभ में दासगणु भगवान गणेश, माता सरस्वती और गुरुजन को नमन कर विश्वव्यापक ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी चिंता दूर करें और उन्हें अपने चरणों में स्थान दें। इसके बाद वे “श्री गजानन विजय” ग्रंथ के अंतिम एवं कळस अध्याय का कथन आरंभ करते हैं।

इस अध्याय में श्री स्वामी समर्थ गजानन महाराज की विभिन्न लीलाओं और चमत्कारों का संक्षिप्त उल्लेख किया गया है। मंदिर निर्माण के समय गिरे हुए मजदूर का प्राणरक्षण, जयपुर की एक स्त्री को पिशाच बाधा से मुक्ति, नाईक के प्राणों की रक्षा — ऐसी अनेक कृपा कथाएँ वर्णित हैं।

रामचंद्र पाटील को स्वामी ने गोसावी रूप में दर्शन देकर मठ के कार्यभार की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें उपदेश दिया कि संतों का अपमान न करें, सबको समान मान दें, द्वेष न रखें और धर्मकार्य सावधानी से करें। स्वामी ने भक्तों की रक्षा, मार्गदर्शन और संकट निवारण की अनेक घटनाओं का भी स्मरण कराया है।

इसके पश्चात प्रथम से बीसवें अध्याय तक की प्रमुख घटनाओं का सार प्रस्तुत किया गया है — स्वामी का शेगांव आगमन, भक्तों को दर्शन, रोग निवारण, चमत्कार, लोकमान्य तिलक से संबंधित प्रसंग, पंढरपुर यात्रा तथा समाधि लीला।

समाधि के पश्चात भक्तों द्वारा मठ और धर्मशाला निर्माण, शतचंडी यज्ञ और वऱ्हाड प्रदेश पर स्वामी की कृपा का वर्णन है। साथ ही यह भी बताया गया है कि जब भक्तों की निष्ठा कम होती है, तब विपत्ति और दुष्काल का अनुभव होता है।

अंत में दासगणु कहते हैं कि इस ग्रंथ का वर्ष में कम से कम एक बार पारायण करना चाहिए। श्रद्धा से पाठ करने पर मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, दुःख और चिंता दूर होती है तथा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह ग्रंथ स्वामी की प्रेरणा से लिखा गया है और उनके चरणों में समर्पित है।
(विजयभास्कर)
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19/02/2026

श्री गजानन विजय ग्रंथ – अध्याय २० : सारांश

समाधि के पश्चात भी अखंड जागृत रहने वाली कृपा…
भक्तों की पुकार पर तुरंत धाव कर आने वाले समर्थ स्वामी गजानन! अध्याय २० हमें यह संदेश देता है — जहाँ श्रद्धा अडिग होती है, वहाँ स्वामी की कृपा अटल होती है।

इस अध्याय में श्री स्वामी गजानन महाराज की समाधि के बाद भी उनकी कृपा, चमत्कार और भक्तों के संरक्षण के अनेक प्रसंगों का वर्णन है।

गणपत काठोडे ने स्वामी की समाधि पर अभिषेक और ब्राह्मण भोजन कराने का संकल्प किया। पत्नी के विरोध के बावजूद स्वामी ने स्वप्न में दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूर्ण करवाई। लक्ष्मण जावळे को परमहंस के रूप में मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और उसने स्वामी की पुण्यतिथि प्रारंभ की।

माधव मार्तंड जोशी शेगांव जाते समय बाढ़ में फँस गए; किंतु स्वामी का स्मरण करते ही उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। यादव गणेश सुभेदार को व्यापार में भारी नुकसान हुआ, तब स्वामी भिखारी के रूप में प्रकट होकर उसे आश्वस्त करते हैं और आगे उसका व्यापार उन्नति करता है।

डॉ. राजाराम कवर प्रसाद लिए बिना ही प्रस्थान कर गए, जिससे वे मार्ग भटक गए; परंतु स्वामी की कृपा से उन्हें सही मार्ग मिला। रतनसा का बीमार पुत्र नवस (मान्यता) से स्वस्थ हो गया। रामचंद्र पाटील की पुत्री चंद्रभागा और पत्नी के रोग भी समर्थ तीर्थ और समाधि-प्रदक्षिणा से दूर हो गए।

अंत में बाळाभाऊ के वैकुंठगमन तथा नारायण महाराज को स्वामी के स्वप्नादेश से शेगांव बुलाने का उल्लेख है। दासगणू महाराज ने इन सभी अनुभवों का वर्णन कर स्वामी की अनंत कृपाशक्ति को नमन किया है।

इस अध्याय का मुख्य संदेश:
स्वामी गजानन महाराज समाधि के पश्चात भी भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने, संकट दूर करने और श्रद्धा दृढ़ करने हेतु सदैव जागृत हैं। सच्ची श्रद्धा, नवस और निःस्वार्थ भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
(विजयभास्कर)
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