VIJAY B. Deshmukh

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25/12/2025

अध्याय १३ का सारांश

गजानन विजय ग्रंथ के तेरहवें अध्याय में शेगांव में मठ निर्माण से जुड़ी घटनाएँ, सामाजिक भेदभाव पर समर्थ गजानन महाराज का स्पष्ट संदेश और उनकी करुणामयी लीलाओं का वर्णन मिलता है।
मठ के लिए वर्गणी (दान) इकट्ठा करते समय कुछ लोगों ने निंदा और कटु आलोचना की, परंतु सच्चे भक्तों ने श्रद्धा से दान दिया। समर्थ गजानन महाराज ने निंदकों की बातों से विचलित हुए बिना हँसते हुए भक्तों का उत्साह बढ़ाया।

रेत से भरी बैलगाड़ी पर महार जाति के गाड़ीवान के साथ बैठकर समर्थों ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए जाति–पाति या छुआछूत का कोई स्थान नहीं है। यह घटना समाज में समानता और मानवता का बड़ा संदेश देती है।

इस अध्याय में गंगा भारती गोसावी के गंभीर रोग से मुक्त होने, झ्यामसिंह के भंडारे में वर्षा द्वारा मिले संकेत, और पुंडलिक भोकरे के ग्रंथिक रोग से उद्धार जैसे प्रसंग आते हैं। इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि समर्थ गजानन महाराज की कृपा शरणागत भक्तों के कष्ट दूर करती है और उन्हें जीवन की सही दिशा दिखाती है।

जाति, अहंकार और दिखावे से परे ले जाने वाली
समर्थ गजानन की करुणा
चरणों में झुकते ही इंसानियत मिल जाती है।
विजय भास्करराव देशमुख
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18/12/2025

हिंदी सारांश (अध्याय १२)

(धन, आभूषण और प्रदर्शन से ऊपर
श्रद्धा, वैराग्य और गुरु-कृपा का मार्ग दिखाने वाले
श्री गजानन महाराज —
जहाँ सच्ची भक्ति से सूखा वृक्ष भी हरा हो जाता है। 🙏)

इस अध्याय में श्री गजानन स्वामी के वैराग्य, करुणा और शिष्य-परिक्षा का गहन वर्णन मिलता है। अकोला निवासी धनवान भक्त बच्चुलाल अगरवाला स्वामी की सेवा बड़े भाव से करता है और उन्हें आभूषण व दक्षिणा अर्पित करता है, किंतु स्वामी उन्हें अस्वीकार कर वैराग्य का आदर्श स्थापित करते हैं।
शिष्य पितांबर को समाज द्वारा उपहास और अपमान सहना पड़ता है, परंतु वह गुरु में अटूट श्रद्धा रखता है। उसकी प्रार्थना से सूखा आम का वृक्ष हरा हो जाता है, जो गुरुकृपा और सच्ची भक्ति का प्रतीक है।
अध्याय के अंतिम भाग में शेगांव की भूमि-समस्या, स्वामी का निर्लिप्त निर्णय और दासगणु महाराज द्वारा अध्याय का चरणार्पण आता है। यह अध्याय सिखाता है कि ईश्वर बाह्य वैभव में नहीं, बल्कि निष्कलंक श्रद्धा और समर्पण में निवास करते हैं।

गीत (विजयभास्कर शैली)

सोने की आभा छोड़ गए,
स्वामी सरल राह दिखा गए,
धन से नहीं, मन से पूजा
यह सच्चा उपदेश सुना गए।

हँसी मिली जब शिष्य को,
डगमगाया नहीं विश्वास,
गुरु नाम ही श्वास बना
और वही बना उसका प्रकाश।

सूखे वृक्ष में हरियाली
प्रार्थना की पहचान बनी,
कृपा वही फल देती है
जहाँ अहंकार की मृत्यु हुई।

इन सुरों में शीश झुकाता हूँ,
चरणों में खुद को विसर्जित कर,
गजानन की छाया में गाता
नम्र भक्त — विजयभास्कर।

विजय भास्करराव देशमुख

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30/10/2025
29/09/2025

"सत्य गा रहा हूँ, असत्य नाच रहा है; निर्णय और पीड़ा संगीत की लय पर बहकर चली जाती हैं। #विजयभास्करका_सत्यसंगीत"
कभी मेरा निर्णय ही मेरा #ईश्वर था — सच का पूरा राज्य।
और फिर मैं देखता रहा कि असत्य ने अपनी जुबानें खोलकर मेरा सच बाजार में बेच दिया — नीलाम कर दिया।
लोगों ने बोली लगाई: कुछ को #खुर्ची, कुछ को छोटा-सा पद, और कुछ को वाह-वाह;
किसी के पैरों तले धूल, किसी की जिद में रातें शांति से सो रही थीं — और वे खुश।

देखो — हर नीलामी एक खेल है, एक तमाशा; और तुम बेच रहे हो अपना #अस्तित्व।
क्या तुम नहीं जानते कि हर बेचा निर्णय तुम्हें अपने ही कष्ट का सौदा करता है?
जब निर्णय दिया गया — पीड़ा का बीज बो दिया गया। निर्णय बदलो, तो जीवन बदल जाता है।
यह कोई #न्यायालय नहीं जहाँ कोई बाहरी जज आए; यह तुम्हारी #अंतरात्मा की अदालत है — यहाँ तुम स्वयं ही आरोप और सार्थकता तय करते हो।

अब मेरे भीतर वही पुराना निर्णय फिर जागा है — पर यह अब हिंसक नहीं, यह निश्चय है।
मैं अपने सत्य को महफिल में गाऊँगा — सुर में, ताल में; और असत्य को नचाऊँगा, ताकि वह अपनी हँसी में खो जाए या स्वयं बुरा-नाम हो जाए।
क्यों? क्योंकि जिसने मेरा सत्य चुगली के बाजार में नीलाम किया, उसने अपने भीतर की कंजूसी और भय को दिखाया — उसे जगाने का यही उपाय है।

कमाल की बात है — जब तुम सच को संगीत बनाकर प्रस्तुत करते हो, तो सुनने वालों के कान बदल जाते हैं;
कठोरतम असत्य भी संगीत के समक्ष घुटन पाता है। संगीत न्याय है — वह किसी का पुकार नहीं, पर सत्य की एक मिशाल है।

और फिर याद रखना — यह कोई बदला नहीं, यह एक उपचार है।
मैंने दर्द को देखा, समझा कि वह निर्णय का फल है; मैंने देखा कि निर्णय बदला — तो #जीवन बदल गया।
यह बातें मैं नहीं कह रहा, मैं गा रहा हूँ — क्योंकि गाते वक्त सत्य ज़्यादा बुरा नहीं, ज़्यादा मुक्त होता है।

सुनो — तुम भी गा सकते हो। पर पहले अपना फैसला पहचानो।
और अंत में, यह सब मैंने इसलिए कहा क्योंकि विजयभास्कर ने दर्द को #ईश्वर के न्याय की तरह जाना, देखा और उसे गीत में बदल दिया।

कभी मेरा निर्णय ही मेरा ईश्वर था,
सच को चुगली के बाजार में नीलाम किया गया।
कुछ को खुर्ची, कुछ को छोटा पद मिला,
किसी के पैरों तले धूल छाई, और रातें चैन से सो रही थीं।

अब मैं अपने सत्य को महफिल में गाऊँगा,
सुर और ताल में असत्य को नचाऊँगा।
चाहे उसे ठेव लगे या वह बदनाम हो जाए,
#इंदू भूमि पर सत्य का दीपक मैं जलाऊँगा।

पीड़ा देखी मैंने, निर्णय का फल जान लिया,
जिन्होंने चुगली की, उनके सपनों को मैं तोड़ दूँगा।
जीवन बदल गया जब निर्णय बदला,
और अब विजयभास्कर के सुर में, सत्य ही मेरा साथी।
© विजयभास्कर
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14/09/2025

"हिंदी है हमारी शान, संस्कृति की पहचान।
आओ हिंदी दिवस पर गर्व से कहें – मुझे हिंदी से प्यार है! 🇮🇳 - विजयभास्कर

हिंदी दिवस हर साल १४ सितम्बर को मनाया जाता है।
सन् १९४९ में संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया और १४ सितम्बर १९५३ से यह दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। यह केवल संवाद का साधन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और एकता का प्रतीक है। हिंदी ने विभिन्न प्रांतीय बोलियों को अपने में समाहित कर एकता का सूत्र पिरोया है। आज हिंदी विश्वभर में लोकप्रिय हो रही है और कई देशों में इसके अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की गई है।

हिंदी भाषा दिवस परः

हिंदी भाषा भारत की पहचान है। इसके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एकता और भाईचारा स्थापित होता है।
हमारे साहित्य, कविता, शायरी, नाटक और फिल्मों के द्वारा हिंदी ने लोगों के दिलों में विशेष स्थान बनाया है।
आज के वैश्विक युग में अंग्रेज़ी का महत्व स्वीकार करना आवश्यक है, परंतु अपनी मातृभाषा का सम्मान बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है।
हिंदी भाषा हमें संस्कृति से जोड़ती है, परंपराओं को संजोती है और नई पीढ़ी को भारतीय मूल्य सिखाती है।
हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की सांस है।

🌹 हिंदी के महत्व पर शायरी 🌹

हिंदी से जुड़ी है अपनी पहचान,
यही है देश की मिट्टी की जान।
शब्दों में इसमें है गंगा की धार,
दिलों को जोड़ती है ये अपार।

हिंदी है संस्कृति की प्यारी डोर,
यही है प्रेम, यही है चितचोर।
विश्व में गूंजे इसका उज्ज्वल स्वर,
भारत की शान है हिंदी अमर।।
©️विजयभास्कर

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