26/02/2026
श्री गजानन विजय ग्रंथ — अध्याय 21 का सारांश
(श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति से किया गया “श्री गजानन विजय” का पाठ जीवन में सुख, शांति और कृपा का प्रकाश लाता है।)
इस अध्याय के प्रारंभ में दासगणु भगवान गणेश, माता सरस्वती और गुरुजन को नमन कर विश्वव्यापक ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी चिंता दूर करें और उन्हें अपने चरणों में स्थान दें। इसके बाद वे “श्री गजानन विजय” ग्रंथ के अंतिम एवं कळस अध्याय का कथन आरंभ करते हैं।
इस अध्याय में श्री स्वामी समर्थ गजानन महाराज की विभिन्न लीलाओं और चमत्कारों का संक्षिप्त उल्लेख किया गया है। मंदिर निर्माण के समय गिरे हुए मजदूर का प्राणरक्षण, जयपुर की एक स्त्री को पिशाच बाधा से मुक्ति, नाईक के प्राणों की रक्षा — ऐसी अनेक कृपा कथाएँ वर्णित हैं।
रामचंद्र पाटील को स्वामी ने गोसावी रूप में दर्शन देकर मठ के कार्यभार की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें उपदेश दिया कि संतों का अपमान न करें, सबको समान मान दें, द्वेष न रखें और धर्मकार्य सावधानी से करें। स्वामी ने भक्तों की रक्षा, मार्गदर्शन और संकट निवारण की अनेक घटनाओं का भी स्मरण कराया है।
इसके पश्चात प्रथम से बीसवें अध्याय तक की प्रमुख घटनाओं का सार प्रस्तुत किया गया है — स्वामी का शेगांव आगमन, भक्तों को दर्शन, रोग निवारण, चमत्कार, लोकमान्य तिलक से संबंधित प्रसंग, पंढरपुर यात्रा तथा समाधि लीला।
समाधि के पश्चात भक्तों द्वारा मठ और धर्मशाला निर्माण, शतचंडी यज्ञ और वऱ्हाड प्रदेश पर स्वामी की कृपा का वर्णन है। साथ ही यह भी बताया गया है कि जब भक्तों की निष्ठा कम होती है, तब विपत्ति और दुष्काल का अनुभव होता है।
अंत में दासगणु कहते हैं कि इस ग्रंथ का वर्ष में कम से कम एक बार पारायण करना चाहिए। श्रद्धा से पाठ करने पर मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, दुःख और चिंता दूर होती है तथा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह ग्रंथ स्वामी की प्रेरणा से लिखा गया है और उनके चरणों में समर्पित है।
(विजयभास्कर)
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