Bal Sanskar Kendra Ambikapur

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27/12/2025

4 day 4 Shivir

Bal Sanskar Kendra Ambikapur

कहानी: तुलसी पूजन दिवस की सुबहसर्दियों की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी। तुलसी चौरे के पास रखी दीपक की लौ हवा में थरथरा ...
20/12/2025

कहानी: तुलसी पूजन दिवस की सुबह

सर्दियों की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी। तुलसी चौरे के पास रखी दीपक की लौ हवा में थरथरा रही थी। रिया हाथ में फूलों की थाली लेकर बाहर आई।

“दादी, आज तुलसी पूजन क्यों करते हैं?” रिया ने जिज्ञासा से पूछा।

दादी मुस्कराईं, “बेटा, आज तुलसी पूजन दिवस है। तुलसी माँ को विष्णु भगवान का प्रिय माना जाता है। ये हमें शुद्धता, स्वास्थ्य और संस्कार सिखाती हैं।”

रिया ने तुलसी के पत्तों को ध्यान से देखा, “पर दादी, एक पौधा हमें इतना कुछ कैसे सिखा सकता है?”

दादी ने दीपक ठीक करते हुए कहा, “क्यों नहीं? देखो, तुलसी हर मौसम में हरी रहती है। वो हमें सिखाती है—मुश्किलों में भी उम्मीद कैसे रखी जाती है।”

उसी समय पापा भी आ गए। उन्होंने अगरबत्ती जलाते हुए कहा, “और वैज्ञानिक रूप से भी तुलसी बहुत लाभकारी है। ये हवा को शुद्ध करती है और बीमारियों से बचाती है।”

माँ ने रिया के हाथ में जल का लोटा दिया, “आओ, पहले जल चढ़ाओ और मन में अच्छा संकल्प लो।”

रिया ने आँखें बंद कीं और बोली, “तुलसी माँ, मुझे अच्छा इंसान बनना सिखाइए।”

दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, “बस यही सबसे बड़ा पूजन है, बेटा।”

पूजा के बाद सबने प्रसाद लिया। रिया बोली, “दादी, आज से मैं रोज़ तुलसी को जल दूँगी।”

दादी हँसते हुए बोलीं, “तभी तो तुलसी पूजन दिवस मनाने का अर्थ पूरा होगा।”

आँगन में शांति थी, और तुलसी के पत्ते हवा में हल्के-हल्के हिल रहे थे—जैसे रिया के संकल्प को आशीर्वाद दे रहे हों।

16/12/2025

25 December - Reality.....

10/10/2025

Rishi Prasad
October month

**"संस्कारों की दीपशिखा"**  छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में **नेहा** नाम की एक सरल, शांत और संवेदनशील लड़की रहती थी। उस...
06/08/2025

**"संस्कारों की दीपशिखा"**
छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में **नेहा** नाम की एक सरल, शांत और संवेदनशील लड़की रहती थी। उसकी उम्र महज 22 साल थी, लेकिन उसकी सोच और समर्पण किसी तपस्विनी से कम न था।

नेहा की सबसे प्रिय चीज़ थी – बच्चों को अच्छे संस्कार देना। उसने अपने घर के एक छोटे से कमरे को प्रेमपूर्वक बाल संस्कार केंद्र में बदल दिया था। वहां वो रोज़ गांव के बच्चों को बुलाकर उन्हें **ध्यान, प्राणायाम, योग**, और सबसे बढ़कर **मानवता और नैतिकता की शिक्षाएं** देती थी।

✨ बच्चे उसे "दीदी" कहकर पुकारते थे।

हर दिन सुबह की पहली किरणों साथ, वो बच्चों को गोद में लेकर कहानियां सुनाती — रामायण की, महात्मा गांधी की, झांसी की रानी की। बच्चें मंत्रमुग्ध होकर उसे सुनते।

किंतु, घर के हालात कुछ और ही थे...

उसके पिता, एक किसान थे। उन्हें यह सब "फालतू का काम", "समाज क्या कहेगा" और "इससे घर नहीं चलता" जैसी बातों से परेशानी थी। मां भी चुपचाप कह दिया करती,
**"नेहा, ये सब छोड़कर सिलाई सीख ले, शादी करेगा कोई भी तो पूछेगा – कमाती क्या है?"**

नेहा हर बार चुप रह जाती... लेकिन उसके अंदर कहीं एक आग सुलग रही थी।

उसकी आंखों में सपना था – **"अगर बचपन बदलेगा, तो भारत बदलेगा..."**
वो जानती थी, बदलाव तुरंत नहीं आता, पर बीज डालना जरूरी होता है।

एक दिन उसके पापा ने बहुत डांटा, बाल संस्कार केंद्र बंद करने की धमकी दी और बच्चों को घर आने से मना कर दिया।

उस रात नेहा बहुत रोई। लेकिन जब सुबह आई, तो उसने एक निर्णय लिया।

एक छोटी सी छत पर उसने सफेद चादर बिछाई, पास के पेड़ से कुछ रंग-बिरंगे कपड़े टांगे और वहीं **"खुले आसमान के नीचे" संस्कार केंद्र** शुरू कर दिया।

गाँव के बुज़ुर्ग पहले हंसे... फिर गौर से देखने लगे।
देखा – बच्चें अनुशासन से बैठते हैं, ध्यान करते हैं, संस्कृत में श्लोक बोलने लगे हैं।

धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी।
नेहा के संस्कार केंद्र की बात जिला स्तर तक पहुंची।
एक समाजसेवी संस्था ने उसे एक certificate और कुछ आर्थिक सहायता दी।
अब नेहा के घरवालों की आँखों में भी गर्व की चमक थी।

पिता, जो कभी विरोधी थे, अब खुद सबसे कहते —
**"हमारी बेटी संत जैसी सेवा करती है..."**

नेहा आज भी एक साधारण घर में रहती है, लेकिन उसके संस्कारों से निकले बच्चे कहीं डॉक्टर बन रहे हैं, कहीं योगाचार्य तो कहीं समाजसेवी।

संसार भले ही बड़ा बदलाव खोजता हो,
लेकिन नेहा जैसे लोग चुपचाप बीज बोते हैं – संस्कारों के, सत्य के, सेवा के।

एक लड़की ने हार नहीं मानी...
उसके संस्कार ही उसका साहस बन गए।

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