विधि-वार्ता

विधि-वार्ता Lᴇᴀʀɴ Aʙᴏᴜᴛ Tʜᴇ Vᴀʀɪᴇᴛʏ Oғ Lᴀᴡ ᴀɴᴅ Jᴜꜱᴛɪᴄᴇ Not Available

BNSBNSSBSA
11/11/2025

BNS
BNSS
BSA

03/08/2025

महत्वपूर्ण केस लॉज़ (Case Laws related to Maintenance – CrPC 125 / BNSS 144)

• Mohd. Ahmed Khan versus Shah Bano Begum (1985) 2 SCC 556

तथ्य:
शाह बानो, तलाकशुदा मुस्लिम महिला थी, जिसे पति ने तलाक दे दिया और फिर Maintenance नहीं दिया।

निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 (अब BNSS 144) धर्म से ऊपर है और कोई भी पत्नी, चाहे किसी भी धर्म की हो, Maintenance की हकदार है अगर वह खुद का पालन नहीं कर सकती।

उपलब्धि: यह केस महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार का ऐतिहासिक आधार बन गया।

• Chaturbhuj versus Sita Bai (2008) 2 SCC 316

तथ्य:
पति का दावा था कि पत्नी की कमाई है, इसलिए Maintenance नहीं देना चाहिए।

निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी के पास कोई स्थायी या पर्याप्त आय नहीं है, तो वह Maintenance की हकदार है।

स्पष्टीकरण: सिर्फ नाममात्र की कमाई होने से Maintenance रोका नहीं जा सकता।

• Bhuwan Mohan Singh versus Meena (2015) 6 SCC 353

तथ्य:
पति जानबूझकर मुकदमा टालता रहा और Maintenance नहीं दिया।

निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Maintenance की कार्यवाही को जल्द निष्पादित करना ज़रूरी है, ताकि पत्नी की गरिमा और जीवन सुरक्षित रहे।

BNSS में उपधारा (2) इसी सोच पर आधारित है (60 दिन में आदेश देने की बात)।

• Rajnesh versus Neha (2020) 12 SCC 823

तथ्य:
Maintenance की रकम निर्धारण में कई समस्याएं थीं — पति की आय नहीं बताई जा रही थी।

निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों को आय-अर्थ संबंधित खुलासा (Affidavit) देना होगा।
कोर्ट ने Maintenance की गणना के लिए Guidelines जारी किए।

महत्वपूर्ण केस, BNSS 144 में रकम निर्धारण में इसका असर रहेगा।

• Kirtikant D. Vadodaria versus State of Gujarat (1996) 4 SCC 479

निर्णय:
सौतेली मां को Maintenance का हक नहीं है, जब तक कि उसने पालन-पोषण नहीं किया हो।

विधि-वार्ता
Shailendra Pandey

02/08/2025

धारा 144: पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का आदेश

उद्देश्य:

अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी, संतान (वैध या अवैध) या माता-पिता का भरण-पोषण करने में असफल रहता है, तो मजिस्ट्रेट उसे भरण-पोषण का आदेश दे सकता है।

• उपधारा (1): भरण-पोषण का आदेश

यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त आय होने के बावजूद:

अपनी पत्नी (जो खुद का पालन नहीं कर सकती),

अपनी संतान (जो खुद का पालन नहीं कर सकती, चाहे वह वैध हो या अवैध),

अपंग बालिग संतान (जो शारीरिक या मानसिक असमर्थता के कारण खुद का पालन नहीं कर सकती),

या अपने माता-पिता का पालन नहीं करता है,

तो प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से भरण-पोषण के लिए आदेश दे सकता है।
मजिस्ट्रेट यह आदेश मासिक भरण-पोषण के रूप में दे सकता है।

विशेष प्रावधान:

यदि महिला विवाहित है और उसके पति के पास पर्याप्त आय नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उसके पिता से भरण-पोषण का आदेश दे सकता है।

मजिस्ट्रेट कार्यवाही के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और कार्यवाही के खर्च के लिए आदेश दे सकता है।

• उपधारा (2): भरण-पोषण का भुगतान

भरण-पोषण का भुगतान आदेश की तिथि से होगा, या यदि आदेश से पहले आवेदन किया गया हो, तो उस आवेदन की तिथि से।

• उपधारा (3): आदेश का उल्लंघन

यदि कोई व्यक्ति आदेश का पालन करने में विफल रहता है, तो मजिस्ट्रेट उसे:

विवरण के लिए गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है।

एक माह तक कारावास की सजा दे सकता है।

महत्वपूर्ण शर्तें:

आवेदन किए जाने के एक वर्ष के अंदर ही वसूली के लिए वारंट जारी किया जा सकता है।

यदि पति ने पत्नी को अपने साथ रहने का प्रस्ताव दिया है, और पत्नी ने कोई उचित कारण नहीं बताया, तो मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकता है।

स्पष्टीकरण:

यदि पति ने दूसरी महिला से विवाह किया हो या रखैल रखी हो, तो पत्नी को अपने पति के साथ न रहने के लिए सिर्फ यही कारण पर्याप्त माना जाएगा।

• उपधारा (4): पत्नी की अपात्रता

पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलेगा यदि वह:

व्यभिचार करती हो,

बिना उचित कारण के अपने पति के साथ नहीं रहती हो,

या दोनों पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग रहते हों।

• उपधारा (5): आदेश की निरस्तीकरण

यदि यह सिद्ध हो जाए कि पत्नी व्यभिचार कर रही है, बिना उचित कारण के पति के साथ नहीं रह रही है, या दोनों पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग रहते हैं, तो मजिस्ट्रेट भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर देगा।

महत्वपूर्ण बिंदु:

• आदेश देने वाला- प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
• पात्र व्यक्ति- पत्नी, संतान, माता-पिता
• भरण-पोषण की राशि- मासिक, मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित
• अंतरिम भरण-पोषण- कार्यवाही के दौरान अस्थायी भुगतान
• अपात्रता- व्यभिचार, पति के साथ न रहना, आपसी सहमति से अलगाव
• वसूली का तरीका- गिरफ्तारी, एक महीने तक कारावास

- विधि-वार्ता
Shailendra Pandey

05/07/2025

POCSO ACT की धारा 14 एवं 15

• धारा 14– अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक के उपयोग के लिए दंड

मुख्य बिंदु:
• कोई व्यक्ति यदि किसी बालक या बालकों का अश्लील प्रयोजन के लिए उपयोग करता है, तो:

सजा: 5 साल तक की कैद (जो 7 साल तक बढ़ सकती है) और जुर्माना।

• यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध में सक्रिय भाग लेता है, जैसे किसी बालक को अश्लील प्रयोजन के लिए उपलब्ध कराना।

उन पर संबंधित धाराओं (धारा 3, 5, 7, 9) के अनुसार दंड लगेगा।

• यदि कोई अन्य अपराध बनता है तो धारा 4, 6, 8, 10 के अनुसार अतिरिक्त दंड लगेगा।

• धारा 15– बालकों को संलिप्त करने वाली अश्लील सामग्री के भंडारण के लिए दंड

मुख्य बिंदु:
• कोई व्यक्ति यदि बालक से जुड़ी अश्लील सामग्री को संग्रहीत करता है या उसका उत्पादन करता है या वितरित करता है:

सजा: 5 साल तक की कैद (जो 7 साल तक बढ़ सकती है) और जुर्माना (5,000 रुपये से कम नहीं)।

• कोई व्यक्ति यदि ऐसी सामग्री का रिपीटिंग में प्रयोग करता है, प्रचार करता है या वितरित करता है:

सजा: 3 साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों।

• कोई व्यक्ति यदि वाणिज्यिक उद्देश्य से या वित्तीय लाभ के लिए भंडारण करता है:

सजा: 5 साल तक की कैद (जो 7 साल तक बढ़ सकती है) और जुर्माना।

• सारांश:
इन धाराओं का उद्देश्य बालकों को अश्लील गतिविधियों में इस्तेमाल होने से बचाना है। दोषी पाए जाने पर कठोर दंड और जुर्माना का प्रावधान है।

विधि-वार्ता
Shailendra Pandey

03/07/2025

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023

धारा 116 – गंभीर चोट (Grievous Hurt)

यह धारा बताती है कि कौन-कौन सी चोटें 'गंभीर चोट' कहलाएंगी।

मुख्य बिंदु:
• नपुंसक बनाना (Emasculation), या
• आंख की स्थायी दृष्टि समाप्त होना (एक या दोनों आंखें), या
• कान की स्थायी सुनने की क्षमता समाप्त होना (एक या दोनों कान), या
• किसी अंग या जोड़ का स्थायी रूप से नष्ट होना, या
• किसी अंग या जोड़ की शक्ति का स्थायी नष्ट या कमजोर होना, या
• सिर या चेहरे का स्थायी विकृत होना, या
• हड्डी या दांत का टूटना या खिसक जाना, या
• ऐसी कोई चोट जो –

• जानलेवा हो, या
• 15 दिनों तक तेज शारीरिक पीड़ा दे, या
• सामान्य कार्य में असमर्थ कर दे।

उद्देश्य: गंभीर चोटों को परिभाषित करना ताकि कानूनन दंड निर्धारित हो सके।

धारा 117 – स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना (Voluntarily causing Grievous Hurt)

यह धारा ऐसी गंभीर चोट जानबूझकर या जान-बूझकर जोखिम लेकर पहुंचाने पर लागू होती है।

मुख्य प्रावधान:

• साधारण गंभीर चोट पहुंचाना:
सजा: 7 वर्ष तक कारावास + जुर्माना।

• स्थायी विकलांगता या कोमा जैसी अवस्था (Persistent Vegetative State):
सजा: 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास (पूरे जीवन काल तक)।

•पांच या अधिक व्यक्तियों द्वारा चोट पहुंचाना:
यदि जाति, धर्म, लिंग, भाषा आदि के आधार पर हमला हुआ है।
सजा: हर दोषी को 7 वर्ष तक कारावास, जुर्माना।

•उद्देश्य: गंभीर चोट जानबूझकर पहुंचाने वालों को सख्त सजा देना।

महत्वपूर्ण बातें – गिरफ्तारी और जमानत:

• ये अपराध संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) माने जाते हैं।
• ऐसे मामलों में पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है।
• यह जमानती/अजमानती (Bailable/Non-Bailable) स्थिति चोट की गंभीरता पर निर्भर करेगी —

सामान्य गंभीर चोट – प्राय: जमानती।

विकलांगता/कोमा/घृणित समूह हमला – प्राय: अजमानती।

• महत्वपूर्ण केस लॉ संदर्भ

• Virsa Singh versus State of Punjab (AIR 1958 SC 465)
मुद्दा: गंभीर चोट के लिए जानबूझकर चोट पहुंचाना आवश्यक नहीं कि परिणाम जानबूझकर हो — चोट पहुँचाने की मंशा या जानकारी पर्याप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – चोट के प्रकार और उसके परिणाम को देखकर धारा लागू होती है।

State of M.P. versus (2005)
मुद्दा: चोट कितनी गंभीर है, यह मेडिकल रिपोर्ट और चोटों की प्रकृति पर निर्भर करता है।

Shailendra Pandey
विधि-वार्ता

25/06/2025

अन्वेषण की परिभाषा BNSS 2023 की धारा 2(l) एवं पूर्ववर्ती संहिता की धारा 2(h) Cr.P.C में दी गई है।

“अन्वेषण” का अर्थ:
जब कोई अपराध होता है, तब पुलिस अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति, जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत किया गया हो, अपराध से जुड़े साक्ष्य जुटाने के लिए जो भी कानूनी कार्यवाही करता है, उसे "अन्वेषण" कहा जाता है।

उद्देश्य:

• यह पता लगाना कि क्या कोई अपराध वास्तव में घटित हुआ है?
• अपराध में कौन व्यक्ति संलिप्त है ?
• अभियोजन (Prosecution) के लिए आवश्यक साक्ष्यों का संग्रह करना।

कौन कर सकता है अन्वेषण ?

1. पुलिस अधिकारी, या
2. कोई अन्य व्यक्ति जिसे Magistrate द्वारा इस प्रयोजन हेतु अधिकृत किया गया हो।

अन्वेषण की प्रमुख प्रक्रियाएँ-

• FIR दर्ज करना – (धारा 173, BNSS)
• अपराध स्थल की जाँच
• गवाहों से पूछताछ – (धारा 180, BNSS)
• वस्तुओं की ज़ब्ती और तलाशी – (धारा 183–186, BNSS)
• फॉरेंसिक/डिजिटल साक्ष्य का संकलन
• आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाखिल करना – (धारा 193, BNSS)

महत्वपूर्ण निर्णय-

H.N. Rishbud v. State of Delhi (AIR 1955 SC 196)- सुप्रीम कोर्ट ने कहा “Investigation एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें FIR से लेकर चार्जशीट दाखिल करने तक के सभी चरण सम्मिलित हैं। यदि किसी चरण में विधिक त्रुटि हो, तो वह संपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।”

उदाहरण-

राम पर चोरी का संदेह होने पर पुलिस सबसे पहले FIR दर्ज करेगी, फिर घटनास्थल का निरीक्षण करेगी, CCTV फुटेज और गवाहों के बयान जुटाएगी। यदि पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो पुलिस धारा 193 BNSS के अंतर्गत आरोप-पत्र (चार्जशीट) न्यायालय में प्रस्तुत करेगी।

- Shailendra Pandey
अधिवक्ता उच्च न्यायालय
विधि-वार्ता

10/03/2025

भारतीय संविधान पर कुछ ऐतिहासिक मामले इस प्रकार हैं:

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)-
संविधान की मूल संरचना को परिभाषित किया और स्थापित किया कि न्यायपालिका संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध जाने वाले किसी भी संशोधन को पलट सकती है ।

मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978)-
यह स्थापित किया गया कि अनुच्छेद 21 के तहत "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया" का प्रभाव "कानून की उचित प्रक्रिया" के समान ही है।

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)-
1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर विचार किया गया

इंद्रा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ (1992)-
सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए आरक्षण की अनुमति दी गई, लेकिन ओबीसी के भीतर "क्रीमी लेयर" को बाहर करने की अवधारणा भी स्थापित की गई


एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)-
घोषणा की गई कि संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र संविधान की मूल संरचना हैं ।

मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985)-
मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ते के अधिकार को बरकरार रखा।

विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य-
कामकाजी महिलाओं के मौलिक अधिकारों को लागू किया गया।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (2014)-
ट्रांसजेंडर लोगों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी गई और सरकार को आदेश दिया गया कि वे उनके साथ अल्पसंख्यकों जैसा व्यवहार करें।

न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य-
निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में पुनः पुष्टि की गई।

10/03/2025

हिंदू विधि में कुछ ऐतिहासिक मामले इस प्रकार हैं - (Important Case Laws for all law exam)

सरला मुद्गल बनाम भारत संघ

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि किसी हिंदू द्वारा दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन करने से उसका विवाह स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।

सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार-
इस मामले में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई।

अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर-
सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी करता है तो वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25(iii) के तहत विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है।

गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य-
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

हरविंदर कौर बनाम हरमंदर सिंह चौधरी-
हरविंदर कौर ने वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत याचिका दायर की।

एनजी दास्ताने बनाम एस दास्ताने-
इस मामले में क्रूरता के आधार पर न्यायिक पृथक्करण का प्रावधान था।

नवीन कोहली बनाम कोहली-
पारिवारिक न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत दंपत्ति के बीच विवाह को रद्द करने का आदेश दिया।

10/03/2025

प्रश्न- उच्च न्यायालय के जज की नियुक्ति कौन करता है ?

उत्तर - भारत के राष्ट्रपति, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। राष्ट्रपति, इस काम को भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल से सलाह लेकर करते हैं।

प्रश्न- उच्च न्यायालय के जज को क्या पद से हटाया भी जा सकता है ?

हां, उच्च न्यायालय के जज को पद से हटाया जा सकता है। इसे हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। इस प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों की मंज़ूरी लेनी होती है. इसके बाद, राष्ट्रपति जज को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।

इस प्रक्रिया की प्रमुख बातेंः
जज को हटाने के लिए, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।

प्रस्ताव पारित होने के लिए, दोनों सदनों में एक ही संसदीय सत्र में बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।

प्रस्ताव पारित होने के लिए, दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।

प्रस्ताव पारित होने के बाद, इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
राष्ट्रपति, संसद के दोनों सदनों में पारित प्रस्ताव के आधार पर जज को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।

जज को हटाने के आधार-
जज के ख़िलाफ़ सिद्ध कदाचार या अक्षमता साबित होना।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में किसी सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही 4 बार शुरू की गई।

अनुच्छेद 124(4) और 124(5) के तहत, सुप्रीम कोर्ट (और हाई कोर्ट (अनुच्छेद 217 देखें) के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से उसके पद से हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति संसद के अभिभाषण के बाद निष्कासन आदेश जारी कर सकते हैं। न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव को संसद के प्रत्येक सदन के विशेष बहुमत द्वारा समर्थित होना चाहिए। विशेष बहुमत उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत होता है।

वी. रामास्वामी जे पहले न्यायाधीश थे जिनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी। 1993 में, प्रस्ताव लोकसभा में लाया गया था, लेकिन आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन जे ने 2011 में राज्य सभा द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था। वे पहले ऐसे न्यायाधीश थे जिन पर उच्च सदन द्वारा कदाचार के लिए महाभियोग लगाया गया था।

2015 में, राज्यसभा के 58 सदस्यों ने गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे.बी. पारदीवाला के खिलाफ “आरक्षण के मुद्दे पर आपत्तिजनक टिप्पणी” के लिए महाभियोग नोटिस पेश किया था।

2017 में, राज्यसभा सांसदों ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सी.वी. नागार्जुन रेड्डी जे. के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया।

मार्च 2018 में विपक्षी दलों ने CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए एक मसौदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए।

नोट : भ्रष्टाचार, भूमि हड़पने और न्यायिक पद के दुरुपयोग के आरोपों के बीच, सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरन जे.(जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्यसभा के सभापति ने एक न्यायिक पैनल गठित किया था,) ने जुलाई 2011 में अपने खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।

10/03/2025

सिविल प्रक्रिया संहिता की महत्वपूर्ण धाराएँ एवं आदेश-

नीचे दिए गए महत्वपूर्ण प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता सूचकांक, 1908 के अनुसार व्यवस्थित हैं।

प्रारंभिक [धारा 01-08]

धारा 1- संहिता की मूल बातें नोट करें, जैसे सीमा, प्रवर्तन तिथि, आदि।

धारा 2- सभी परिभाषाएँ पढ़ें लेकिन धारा 2, 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12, 14, 17, 19 को अधिक महत्व दें।

धारा 5- राजस्व न्यायालयों में सी.पी.सी. का अनुप्रयोग।

धारा 6- सी.पी.सी. में आर्थिक क्षेत्राधिकार।

भाग I – सामान्य मुकदमे [धारा 09-35बी] - सभी महत्वपूर्ण

भाग I मुकदमों से संबंधित है। यह सी.पी.सी. का आधार है, और इसलिए सभी प्रावधानों पर विस्तृत रूप से विचार किया जाएगा।

भाग II – निष्पादन [धारा 36-74]

धारा 38: यह प्रावधान करती है कि डिक्री किस न्यायालय द्वारा निष्पादित की जा सकती है।

धारा 39: डिक्री के हस्तांतरण से संबंधित है।

धारा 42: हस्तांतरित डिक्री को निष्पादित करने की न्यायालय की शक्ति से संबंधित है।

धारा 46: उपदेश

धारा 50: कानूनी प्रतिनिधि

धारा 51: निष्पादन का आदेश देने की न्यायालयों की शक्ति।

धारा 54: संपत्ति का विभाजन।

धारा 55: डिक्री के निष्पादन के लिए गिरफ्तारी और नजरबंदी।

धारा 56: फांसी के समय महिलाओं की गिरफ्तारी पर प्रतिबन्ध।

धारा 60: निष्पादन में कुर्क की जा सकने वाली संपत्ति (अत्यंत महत्वपूर्ण)

धारा 73: आय को डिक्रीधारकों के बीच समान रूप से वितरित किया जाएगा।

धारा 74: निष्पादन का प्रतिरोध।

भाग III – आकस्मिक कार्यवाही [धारा 75-78]

धारा 75: कमीशन जारी करने की न्यायालय की शक्ति; खंड (ए)-(जी) बहुत महत्वपूर्ण हैं।

धारा 77: अनुरोध पत्र।

भाग IV – विशेष मामलों में वाद [धारा 79-88]

धारा 79: केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध मुकदमे।

धारा 80: वाद संस्थित करने से पहले सरकार को नोटिस भेजा जाना।

धारा 82: सरकार के विरुद्ध डिक्री के निष्पादन से संबंधित है।

धारा 88: इंटरप्लीडर सूट- अवधारणा और उन्हें कब दायर किया जा सकता है।

भाग V – विशेष कार्यवाही [धारा 89-93]

धारा 89: पंच निर्णय, मध्यस्थता आदि के माध्यम से विवादों का निपटारा।

धारा 91 और 91: सार्वजनिक उपद्रवों और सार्वजनिक दान पर संक्षिप्त वाचन।

भाग VII – अपील [धारा 96-112]- सभी महत्वपूर्ण

धारा 96 से 112: सभी प्रावधान महत्वपूर्ण हैं। इन सभी को विस्तृत अवधारणाओं के साथ विस्तार से पढ़ें।

भाग VIII – संदर्भ, समीक्षा और संशोधन [धारा 113-115] - सभी महत्वपूर्ण

भाग 07 की तरह ये तीन खंड भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

भाग X – नियम [धारा 121-131]

धारा 122: उच्च न्यायालयों की नियम बनाने की शक्ति।

धारा 123: नियम समिति।

भाग XI – विविध [धारा 132-158]

धारा 132-135ए: कुछ वर्गों को छूट।

धारा 144: प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन।

धारा 148: न्यायालय द्वारा समय वृद्धि।

धारा 148ए: चेतावनी - अवधारणा और इसे कब दायर किया जाता है

धारा 151: न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ।

धारा 152: न्यायालय द्वारा आदेशों और डिक्री में संशोधन

धारा 153: न्यायालय की संशोधन की सामान्य शक्तियाँ।

CPC में महत्वपूर्ण ऑर्डर-

आदेश I - वादों के पक्षकार

आदेश II - सूट का फ्रेम

आदेश IV – मुकदमों की संस्था

आदेश V – समन जारी करना और उसकी तामील करना

आदेश VI – सामान्यतः दलीलें

आदेश VII – वादपत्र

आदेश VIII – लिखित विवरण, सेट-ऑफ और प्रति दावा

आदेश IX - पक्षों की उपस्थिति और गैर-उपस्थिति का परिणाम

आदेश X – न्यायालय द्वारा पक्षों की जांच

आदेश XI – खोज और निरीक्षण

आदेश XIV - मुद्दों का निपटारा और कानून के मुद्दों या सहमत मुद्दों पर मुकदमे का निर्धारण

आदेश XV - प्रथम सुनवाई पर मुकदमे का निपटारा

आदेश XVII – स्थगन

आदेश XX – निर्णय और डिक्री (20)

ऑर्डर XXA – लागत

आदेश XXI – आदेशों और आदेशों का निष्पादन (केवल इन भागों को कवर करें)

डिक्री के तहत भुगतान (नियम 01-02)

डिक्री निष्पादित करने वाली अदालतें (नियम 03-09)

निष्पादन पर रोक (नियम 26-29)

निष्पादन का तरीका (नियम 30-36)

सिविल जेल में गिरफ्तारी और नजरबंदी (नियम 37-40)।

संपत्ति की कुर्की (नियम 41-57)

आदेश XXII – पक्षकारों की मृत्यु, विवाह और दिवालियापन

आदेश XXIII – मुकदमों की वापसी और समायोजन

आदेश XXVI – कमीशन

आदेश ###II - नाबालिगों और विकृत मस्तिष्क वाले व्यक्तियों द्वारा या उनके विरुद्ध मुकदमा।

आदेश ###III – निर्धन व्यक्तियों द्वारा मुकदमे

आदेश ###V – इंटरप्लीडर

आदेश ###IX - अस्थायी निषेधाज्ञा और अंतरिम आदेश

आदेश XLI - मूल आदेशों के विरुद्ध अपील

आदेश XLII – अपीलीय डिक्री से अपील

आदेश XLIII – आदेशों से अपील।

आदेश XLV – सर्वोच्च न्यायालय में अपील

आदेश XLVI – निर्देश

ऑर्डर XLVII – पुनर्विलोकन

01/03/2025

प्रश्न - उन्मोचन और दोषमुक्ति में क्या अंतर है?

उतर -उन्मोचन और दोषमुक्ति में अंतर यह है कि उन्मोचन में अभियोग चलता रहता है, जबकि दोषमुक्ति में अभियोग खत्म हो जाता है।

उन्मोचन

उन्मोचन एक महत्वपूर्ण प्रावधान है।
उन्मोचन के ज़रिए अभियुक्त को बिना ठोस सबूत के न्यायिक जांच से बचाया जाता है।

उन्मोचन के ज़रिए अभियुक्त और न्यायालय को मुकदमे की लंबी प्रक्रिया से बचाया जाता है।
उन्मोचन के आदेश पारित करते समय न्यायालय को कारण बताने होते हैं।

दोषमुक्ति

दोषमुक्ति का मतलब है कि अभियुक्त को दोष नहीं माना गया।

दोषमुक्ति के बाद, उसी अपराध के लिए फिर से मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

दोषमुक्ति के बाद, अभियुक्त को दोबारा गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता ।

आरोप-मुक्ति की मांग करने के लिए, अभियुक्त उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले साक्ष्य का संदर्भ ले सकता है. अगर न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त कथित अपराध से बरी होने का हकदार है, तो वह अभियुक्त को आरोप-मुक्त कर सकता है।

16/10/2024

जानिए 2 या 2 से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) होने की स्थिति में मामले के ट्रायल पर क्या होता है असर...?

यदि मृतक के पास मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) करने के कई अवसर थे, मतलब कि यदि एक से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मौजूद है, तो उन्हें सुसंगत (Consistent) होना चाहिए।

मैक्ज़िम 'Nemo moriturus praesumitur mentire' मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) का आधार है, जिसका अर्थ है – "एक आदमी अपने निर्माता (भगवान) से अपने मुंह में झूठ लेकर नहीं मिलेगा।" मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) को 'Laterm Mortem' कहा जाता है, जिसका अर्थ है "मृत्यु से पहले के शब्द।" एक आपराधिक मामले में मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) को रिकॉर्ड करना बहुत महत्वपूर्ण कार्य है और मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) को रिकॉर्ड करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

यदि एक उचित व्यक्ति द्वारा मरने की घोषणा/मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) सावधानी से दर्ज किया जाता है, तो मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) के आवश्यक अवयवों को ध्यान में रखते हुए, इस तरह की घोषणा अपना पूर्ण मूल्य बनाए रखती है। मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) की स्वीकार्यता के बारे में न्यायिक सिद्धांत यह है कि ऐसा कथन इस तरह की परीस्थिति में दिया गया होता है, जब पार्टी/व्यक्ति मृत्यु के कगार पर होता है और जब उसके लिए इस दुनिया की हर उम्मीद खत्म हो जाती है, जब झूठ के लिए हर मकसद ख़त्म हो जाता है, और ऐसे में आदमी केवल सच बोलने के लिए सबसे शक्तिशाली विचार से प्रेरित होता है।

इन सब के बावजूद, साक्ष्य के इस प्रकार को अदालत द्वारा दिए जाने वाले वजन पर विचार करने में बड़ी सावधानी बरती जाती है, क्योंकि कई ऐसी परिस्थिति हो सकती है जो ऐसे कथन/बयान और उसकी सत्यता को प्रभावित कर सकती है। जिस स्थिति में एक व्यक्ति मृत्यु-शैया पर होता है, वह इतना गंभीर और निर्मल होता है और कानून में उसके बयान की सत्यता को स्वीकार करने का कारण है। यह कारण है कि ऐसे बयान के लिए शपथ और क्रॉस-परीक्षा (प्रति-परिक्षण) की आवश्यकताओं को भी उपयोग में नहीं लिया जाता है।

चूंकि अभियुक्त के पास जिरह की कोई शक्ति नहीं होती है, इसलिए अदालत द्वारा तमाम मामलों में यह जोर देकर कहा गया है कि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) इस तरह का होना चाहिए कि इसकी सत्यता और शुद्धता में अदालत के पूर्ण विश्वास को प्रेरित किया जाए। अदालत को, हालांकि, यह देखने के लिए हमेशा चौकस रहना चाहिए कि मृतक का बयान या तो टालमटोल करने या कल्पना के उत्पाद के परिणामस्वरूप तो नहीं था। अदालत को यह भी तय करना होता है कि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) देते वक़्त, मृतक होश में था और हमलावर को देखने और पहचानने का उसे अवसर था।

अब हम यह जानेंगे कि आखिर उन मामलों में अदालतों को मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) को किस तरह से देखना चाहिए, जहाँ 2 या 2 से अधिक ऐसे कथन रिकॉर्ड पर लाये जाएँ।

दो या दो से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) :

मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) निस्संदेह साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत स्वीकार्य है और चूँकि इसके तहत शपथ पर बयान नहीं दिया जा रहा है, जिससे इसकी सत्यता को जिरह द्वारा परखा जा सके, इसलिए न्यायालयों द्वारा उस कथन को सत्यता के रूप में स्वीकार करने से पहले बयान के लिए कड़ी से कड़ी जांच और सबसे करीबी जांच का प्रयास किया जाता है।

रशीद बेग बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (1974) 4 एससीसी 264, के मामले में मृतक के दो मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) दर्ज किये गए थे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों ही कथनों को खारिज करते हुए कहा था कि जहां मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) संदेहास्पद है, उस पर बिना किसी पुष्ट प्रमाण के कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

वहीँ, राम मनोरथ बनाम यूपी राज्य, (1981) 2 एससीसी 654 के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि जहां मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) दुर्बलता/कमी से ग्रस्त है, तो उसके आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती है।

अदालतों का सुसंगति (Consistency) पर रहता है जोर अमोल सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य, (2005) 5 एससीसी 468 के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष मामला मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) की स्वीकार्यता के संबंध में था।

उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया और यह माना कि हालांकि एक से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मौजूद थे, लेकिन दोनों के बीच अंतर नगण्य था। यह ध्यान दिया गया कि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) पदार्थ में सुसंगत था (आरोपी व्यक्तियों द्वारा जटिलता से मृतक व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के अर्थ में) और इसलिए, ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप के लिए कोई मामला नहीं बनता (ऐसा हाईकोर्ट ने माना)।

हालाँकि, माननीय उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय की खोज के साथ सहमति नहीं जताई और उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए, न्यायालय ने यह आयोजित किया कि एक से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) से सम्बंधित साक्ष्य की सराहना से संबंधित कानून अच्छी तरह से तय है। तदनुसार, यह मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) की बहुलता नहीं बल्कि उसपर किस हद तक भरोसा किया जा सकता है, यह अभियोजन के मामले में वजन जोड़ता है।

यदि एक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) स्वैच्छिक, विश्वसनीय और फिट मानसिक स्थिति में दिया जाती है, तो उसपर बिना किसी पुष्टि के भरोसा किया जा सकता है। कथन, पूर्ण रूप से संगत (Consistent) होने चाहिए। यदि मृतक के पास मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) करने के कई अवसर थे, मतलब कि यदि एक से अधिक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मौजूद है, तो उन्हें सुसंगत (Consistent) होना चाहिए।

हालांकि, अगर कुछ विसंगतियां मृत्युकालिक कथनों (Dying declarations) के बीच देखी जाती हैं, तो अदालत उन विसंगतियों की प्रकृति की जांच करती है, अर्थात् वे कितने आवश्यक हैं। विभिन्न मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) की सामग्री की जांच करते समय, ऐसी स्थिति में, अदालत आसपास के विभिन्न तथ्यों और परिस्थितियों के प्रकाश में उसी की जांच करती है।

हीरा लाल बनाम मध्यप्रदेश राज्य, (2009) 12 एससीसी 671 के मामले में दो मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) दर्ज किये गए थे। तहसीलदार द्वारा दर्ज किये गए पहले मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में, मृतक ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उसने खुद पर मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग लगाने की कोशिश की थी, लेकिन बाद के मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में, जिसे दूसरे नायब तहसीलदार द्वारा दर्ज किया गया था, एक विपरीत बयान दिया गया था।

उपरोक्त दो मृत्युकालिक कथनों (Dying declarations) के अलावा, ऐसा प्रतीत हुआ था कि पहले वाले मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) के दौरान डॉक्टर मौजूद थे। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की अपील को स्वीकार करते हुए और उसे दी गयी सजा को रद्द करते हुए यह कहा था कि ट्रायल कोर्ट और उच्च न्यायालय ने इस संभावना पर बेतुका निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्तों के रिश्तेदारों ने मृतक को ग़लत/झूठा मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) देने के लिए मजबूर किया होगा। उच्चतम न्यायालय ने यह भी देखा कि इस तरह के निष्कर्ष को सही ठहराने के लिए कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई थी।

बयान दर्ज करने वाले नायब तहसीलदार के साक्ष्यों की जांच की गई और उनके बयान से इस आशय के बारे में स्पष्ट हो गया कि जब वह बयान दर्ज कर रहे थे तब कोई और व्यक्ति मौजूद नहीं था। ऐसा होने के कारण, दो मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में स्पष्ट विसंगतियों को देखते हुए, अपीलकर्ता को दोषी ठहराना असुरक्षित माना गया था।
इसी प्रकार, आंध्र प्रदेश राज्य बनाम पी. खाजा हुसैन (2009) 15 एससीसी 120, के मामले में दो मृत्युकालिक कथन (Dying declarations) दर्ज किये गए।

पहला मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मजिस्ट्रेट द्वारा 02-8-1999 को सुबह 11:30 बजे दर्ज किया गया, जबकि दूसरा मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) हेड कॉन्स्टेबल द्वारा पहले मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) दर्ज होने के लगभग एक घंटे बाद दर्ज किया गया था। उच्च न्यायालय ने यह देखा कि मृतक को आग लगाने के तरीके के बारे में दोनों मृत्युकालिक कथनों (Dying declarations) में भिन्नता थी। वास्तव में, दो मरने की घोषणाओं को एक दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है और चूंकि अभियुक्त को अपराध के साथ जोड़ने के लिए कोई अन्य सबूत उपलब्ध नहीं था, इसलिए उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की सजा को रद्द कर दिया था।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलार्थी को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए यह कहा था कि इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि मजिस्ट्रेट द्वारा प्रथम मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) दर्ज किये जाने के कुछ समय बाद ही पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल द्वारा दूसरा मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) क्यों दर्ज किया गया? अदालत ने यह भी देखा था कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां दो मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) के बीच भिन्नता प्रकृति में तुच्छ हो। बल्कि, दोनों ही कथनों में मामले के परिदृश्य को अलग-अलग तरीके से वर्णित किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने नोट किया कि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में सुधार, मृतक की चोटों के अनुसार किए गए थे।

उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसके चलते उच्चतम न्यायलय ने उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया। हाल ही में, हाल ही में, अपील को निपटाते हुए जगबीर सिंह बनाम स्टेट एनसीटी दिल्ली (2019) 8 SCC 779 के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि जब कई मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मौजूद होते हैं, और प्रथम मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में आरोपी को शामिल नहीं किया जाता है लेकिन बाद के मृत्युकालिक कथन (Dying declaration), मृतक द्वारा अभियुक्त को आरोपी के रूप में शामिल किया जाता है, तो ऐसे मामले को प्रत्येक मामले के तथ्यों पर तय किया जाना चाहिए और न्यायालय को अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए कि वे रिकॉर्ड पर सामग्री की संपूर्णता में सावधानीपूर्वक जांच करे और अलग-अलग मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) जिस दशा में दिए गए, उसके आसपास की परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जाएँ।

इस मामले में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की पीठ ने, जहाँ मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) एकमात्र साक्ष्य वहां कौन से सिद्धांतों के आधार पर अदालतों द्वारा पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
उसे संक्षेप में समझाते हुए यह कहा: किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि केवल एक मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) के आधार पर की जा सकती है यदि वह मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) अदालत के आत्मविश्वास को प्रेरित करता है।

* यदि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) के बारे में कुछ भी संदिग्ध नहीं है, तो उसकी कोई भी पुष्टि आवश्यक नहीं हो सकती है; हाँ, इसमें कोई संदेह नहीं है कि अदालत को संतुष्ट होना चाहिए कि वह वास्तविक है; * अदालत को भी विश्लेषण करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर आना चाहिए कि मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) मृतक की कल्पना पर आधारित नहीं था।

इस संबंध में, अदालत को मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) की भाषा को संपूर्णता में देखना चाहिए।

* अपने सामने मौजूद सामग्री को ध्यान में रखते हुए (मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य दोनों के रूप में) अदालत को संतुष्ट होना चाहिए कि संस्करण वास्तविकता और सत्य के साथ संगत है, जिसे स्थापित तथ्यों से जोड़ा जा सकता है।

अंत में, जब अलग-अलग मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) होते हैं, तो यह कानून नहीं है कि अदालत को अनिवार्य रूप से उस बयान को प्राथमिकता देनी चाहिए जो कि आरोपी के अपराध की ओर इशारा करता है, और उस बयान को अस्वीकार करना चाहिए जो अभियुक्त को आरोपित नहीं करता है। बलकी वास्तव में वास्तविक बिंदु यह पता लगाना होना चाहिए कि आखिर किस मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) में सच्चाई है।

- Shailendra Pandey
विधि-वार्ता

Address

Ambedkar Nagar
224181

Telephone

+919528370690

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when विधि-वार्ता posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The School

Send a message to विधि-वार्ता:

Shortcuts

Share