16/06/2023
रूप से कह दो कि देखे दूसरा घर -
मैं ग़रीबों की जवानी हूँ,मुझे फ़ुर्सत नहीं है
बचपने में मुश्किलों की गोद में पलती रही मैं
धुएँ की चादर लपेटे,हर घड़ी जलती रही मैं,
ज्योति की दुल्हन बिठाये,ज़िंदगी की पालकी में-
साँस की पगडंडियों पर,रात दिन चलती रही मैं,
वे ख़रीदें स्वप्न,जिनकी आँख पर सोना चढ़ा हो-
मैं अभावों की कहानी हूँ,मुझे फ़ुर्सत नहीं है।।
(देवीप्रसाद शुक्ल राही )