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06/03/2026

दो आदमी जिनसे हमारी न बहुत मित्रता है और न ही बहुत बिगाड़, वो आपस में लड़ते लड़ते हमारे घर के बगल में आ जाएँ तो हम क्या किसी एक आदमी के पक्ष में खड़े हो जाएँगे?
हमें कुछ कहना होगा तो दोनों को कहेंगे कि लड़ाई मत करो, लेकिन उन्होंने लड़ाई करने की कसम खा रखी है तो हम बीच में क्यों पड़ेंगे? हाँ, यदि किसी के कारण हमारे घर में तोड़ फोड़ होने की आशंका मचेगी तो उसे ज़रूर तोड़ने की तैयारी रखनी होगी।

रुस चीन ईरान बनाम अमेरिका यूरोप इसराइल गल्फ का यह युद्ध भारत का युद्ध नहीं है। जिसका यह युद्ध है वह लड़े। हम अधिक से अधिक लड़ाई से पहले लोगों को यह कह सकते हैं कि युद्ध किसी के फायदे का नहीं हैं और लोग लड़ रहे हो तो जो मारा जा रहा है उसका हालचाल ले सकते हैं, वह भी तब जब उससे अपना आगे के लिए फ़ायदा हो। जिसकी हार तय दिख रही हो, उससे एक सेफ डिस्टेंस बनाकर चलिए, हाँ मानवता के नाते उसका मजा भी मत लीजिए, शांति रखिए।

आप अमेरिका से न दूरी बना सकते हैं और न अत्यधिक निकटता। इसी तरह इजराइल से आप ऐतिहासिक निकटता तो कुछ कॉमन ग्राउंड पर महसूस कर सकते हैं लेकिन उसका अपना अस्तित्व ख़ुद अमेरिका पर टिका है। रूस हमें हमारा मित्र तो लगता है लेकिन वह ख़ुद चीन के साथ रहता है। हम चीन के साथ मित्रता के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन ऐसे समय में जबकि देश तीव्र गति से आर्थिक विकास कर रहा है तब हम अनावश्यक कोई तनाव भी नहीं चाहते। हमारा एक खुला शत्रु है और वह है पाकिस्तान, हमें उससे दोस्ती नहीं रखनी है, दुश्मनी रखनी है, उसे नष्ट करने के लिए जो प्रयास करना है, करना चाहिए, यह एक मात्र स्पष्ट बात है। बाकी सब कुछ ब्लैक एंड वाइट नहीं है।

उससे आगे की बात यह है कि हमें किसी नेता अथवा रेजिम से दोस्ती नहीं रखनी चाहिए, हमें उस राष्ट्र से दोस्ती रखनी चाहिए तब जाकर वह दोस्ती टिकती है। भारत ने अपनी दोस्ती अफ़ग़ान राष्ट्र से निभाई, हामिद करज़ई की सत्ता गई, तालिबान आया, थोड़ा ऊपर नीचे होने के बाद सब कुछ फिर से ठीक हो गया। ईरान में भी एक सत्ता जायेगी, दूसरी आएगी, अथवा वहीं बनी रहेगी, उससे हमारा कोई लेना देना नहीं होना चाहिए। यदि वह राष्ट्र हमारे लिए महत्व का है तो जो भी आयेगा, उसके साथ एडजस्टमेंट बन जाएगा। इसलिए जो है अथवा जो आ सकता है, उन दोनों में से किसी का पक्ष नहीं लेना है। इसलिए यदि खुले युद्ध में दो देश एक दूसरे के सैन्य प्रतिष्ठान पर, एक दूसरे के सैनिकों पर हमला करें तो शांत रहिए और यदि यह हमला आम नागरिकों पर हो तो उस पर आप दुख जताइए। यहीं नीति अमेरिका, इसराइल, गल्फ, रूस, यूक्रेन, ईरान सबके साथ रखिए, पाकिस्तान को छोड़कर।

मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि भारत बिलकुल इसी दिशा में चल रहा है। बल्कि एक कदम आगे चल रहा है और ये भी देख रहा है कि इस युद्ध के दौरान हम अपना आर्थिक हित कैसे साध सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कुछ दिनों में थोड़ा आर्थिक संकट आए लेकिन वह कुछ ही दिनो में एडजस्ट हो जाएगा। यह भी संभव है कि चीन जिस तरह से वेनेजुएला और ईरान में अपनी स्थिति को देखकर अंदर ही अंदर परेशान है, वह इसका बदला अमेरिका से लेने के बजाय कुंठा में भारत से लेने का प्रयास करे। ऐसे में भारत पाकिस्तान सीमा पर कुछ अनहोनी एक दो महीने के करने का प्रयास हो सकता है। अमेरिका ने चीन को यह भी बता दिया है कि वह अमेरिका से मुकाबला करने की कोशिश गलती से भी न करे। ऐसे में चीन अपना मुक़ाबला लांग टर्म के भारत के साथ देख सकता है, ख़ासकर लगभग सभी महत्वपूर्ण ब्लॉक्स के साथ भारत के समझौते के भरमार के बाद।

यह युद्ध भारत का नहीं है। कोई भी देश सिवाय पाकिस्तान के हमारा शत्रु नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें उन देशों की सरकार अथवा रेजिम के बजाय उन देशों के नागरिकों के साथ खड़ा रहना चाहिए। बार बार ऐसी स्थिति आए भी कि हमें युद्ध में शामिल होना पड़ सकता है तब भी उससे हर कीमत पर दूरी बनाना जब तक कि मामला पाकिस्तान का न हो। पाकिस्तान से भी यदि अगले एक दो महीनो में ऐसी स्थिति बनी तो भी नियंत्रित रूप से अटैक करना, अपना शत्रु समाप्त करना और आगे बढ़ना, यही भारत की नीति होनी चाहिए, ध्यान रखें नीतियां भूतकाल के अनुभवों से प्राप्त किंतु भविष्य के लिए 'वर्तमान की क्रिया' होती हैं।
.C. Pandey

03/03/2026

ईरान, इजरायल और अमेरिका की दुश्मनी की यह कहानी 1970 के दशक में शुरू होती है, जब आज के ये कट्टर दुश्मन वास्तव में सीक्रेट पार्टनर हुआ करते थे। उस दौर में ईरान के शाह और इजरायल के बीच खुफिया हथियारों और मिसाइलों की साझेदारी चला करती थी। लेकिन 1979 की 'इस्लामी क्रांति' ने पूरे मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति (geopolitics) को पलट कर रख दिया। शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया गया और अयातुल्ला खुमैनी के शासन में आते ही एक नई विचारधारा ने जन्म लिया, जिसके तहत रातों-रात अमेरिका को "बड़ा शैतान" और इजरायल को "छोटा शैतान" घोषित कर दिया गया।
क्रांति के बाद जब अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तो ईरान ने सीधे युद्ध में उतरने के बजाय 'प्रॉक्सी वॉर' (छद्म युद्ध) की रणनीति अपनाई। अपने दुश्मनों को घेरने और अपना सामरिक दबदबा बढ़ाने के लिए ईरान ने लेबनान में हिजबुल्लाह और फिलिस्तीन में हमास जैसे समूहों को खड़ा किया और उन्हें भारी फंडिंग दी। इसके साथ ही, सीरिया में बशर अल-असद की सरकार को गिरने से बचाकर ईरान ने इराक से लेकर लेबनान तक अपना एक मजबूत नेटवर्क स्थापित कर लिया। इन्हीं छद्म युद्धों के बीच ईरान के तेजी से बढ़ते परमाणु कार्यक्रम ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी। तनाव कम करने के लिए 2015 में बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ एक ऐतिहासिक न्यूक्लियर डील (JCPOA) हुई, जिससे इजरायल बुरी तरह चिढ़ गया। 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील को तोड़कर ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए, जिसके जवाब में ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम तेज कर दिया और वहीं इजरायल ने ईरान के टॉप न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की खुफिया हत्याएं करवानी शुरू कर दीं।
यह गुप्त युद्ध तब एक सीधे टकराव की ओर बढ़ गया, जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल पर भयानक हमला किया। इजरायल ने इस हमले के पीछे की असली ताकत ईरान को माना और पूरे मिडिल ईस्ट का नक्शा बदलने की ठान ली। इजरायल की आक्रामक रणनीतियों के चलते दिसंबर 2024 में सीरिया में असद सरकार गिर गई। इस एक घटना ने ईरान और हिजबुल्लाह के सीधे कनेक्शन को हमेशा के लिए तोड़ दिया, जिससे ईरान की बाहरी ताकत काफी कमजोर पड़ गई। इसके बाद 2026 की शुरुआत ईरान के लिए और भी चुनौतीपूर्ण रही। जनवरी 2026 में ईरान में भयंकर आंतरिक विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, जिन्हें सरकार ने बेहद क्रूरता से कुचल दिया।
लगातार कमजोर पड़ते ईरान के साथ ओमान की मध्यस्थता से फरवरी 2026 के अंत में एक शांति डील लगभग पक्की हो ही गई थी कि कहानी ने अपना आखिरी और सबसे खौफनाक मोड़ लिया। अमेरिका और इजरायल ने ईरान में तख्तापलट (Regime Change) करने के स्पष्ट मकसद के साथ उसके टॉप लीडर्स और मिलिट्री बेस पर अब तक का सबसे बड़ा हमला कर दिया। इस विनाशकारी हमले का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक परिणाम यह हुआ कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। खामेनेई की मौत ने ईरान के भीतर एक बहुत बड़ा सत्ता का शून्य (power vacuum) पैदा कर दिया, जिसने तख्तापलट की कोशिशों की आग में घी का काम किया। शांति की वह उम्मीद अब एक आर-पार की जंग में बदल चुकी थी। अपने सर्वोच्च नेता की मौत और वजूद पर आए इस अभूतपूर्व संकट के जवाब में ईरान ने भी बैलिस्टिक मिसाइलों की बारिश कर दी। दशकों से जो लड़ाई परदे के पीछे से लड़ी जा रही थी, वह आज एक सीधे महायुद्ध में बदल चुकी है।

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