24/08/2022
https://thelegalconcept.com/index.php/2022/08/24/bilkis-bano-the-2002-gang-rape-victim/
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BILKIS BANO ,”The 2002 Gang R**e Victim” – The Legal Concept
BILKIS BANO ,”The 2002 Gang R**e Victim” by Mohammad Alam · August 24, 2022 Spread the love On February 28, 2002, Bilkis fled her village, Radhikpur in Dahod district, after violence erupted in the state in the aftermath of the previous day’s incident at Godhra station, in which the Sabarmati...
07/06/2022
https://thelegalconcept.com/index.php/2022/06/07/the-uttar-pradesh-public-service-commission/
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The Uttar Pradesh Public Service Commission? – The Legal Concept
The Uttar Pradesh Public Service Commission? by Mohammad Alam · June 7, 2022 Spread the love 1–Historical Perspective of UPPSC-: The first Public Service Commission was set up on October 1st, 1926. However, its limited advisory functions failed to satisfy the people’s aspirations and the contin...
14/09/2021
hey
frnd we r going to start a judicial preparation mini quiz on evryday at 9 pm
if r u ready plz comment in box and share as much as possible....
The topper name will be Published on evry sunday eveing👍
Please share it
04/05/2021
*LEGAL MAXIM*
*Eaxcutio juris non habet injuriam*
*LITERAL MEANING:* The ex*****on of the process of the law does no injury.
*EXPLANATION* All courts of law will take care that the process of the court is not made use of for the purpose of oppression and injustice; though he is not to be considered oppressive and unjust who merely avails himself thereof to obtain his legal rights, however rigorous the remedy may seem to be; and all are alike entitled to use the means which the law has provided for enforcing their legitimate rights. It is not the use, but the abuse of the process of law which makes an injury, and the misuse of the process of the law is a question of damages merely between the parties.
*CASE LAWS:*
1. Gibbons v. Alison, 8 C. B. 185
01/10/2020
चेबरोलू लीला प्रसाद एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (22 अप्रैल 2020 वाद का निर्णय)
इस मामले का निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जहां भी 100% आरक्षण है, वहां पर वह आरक्षण असंवैधानिक है । अब समय आ गया है कि आरक्षण बढ़ाने की जगह आरक्षण की समीक्षा की जाए क्योंकि जो लोग 70 बरस से आरक्षण ले रहे हैं और अगर आज भी आरक्षण के बलबूते पर ही आगे बढ़ रहे हैं, यह सर्वथा अनुचित है ।
मामले का प्रारंभ सन् 2000 से हुआ, जब आंध्र प्रदेश सरकार ने अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में शिक्षकों की भर्ती के लिए वैकेंसी निकाली । जितनी भी सीट थी, वह सब की सब अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के लिए रिजर्व कर दी गयी थी ।
मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा तो आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार के इस निर्णय को उचित माना और भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया ।
हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ पिटिशनर सीएल प्रसाद सुप्रीम कोर्ट गये । सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की संवैधानिक पीठ का गठन किया और 13 फरवरी 2020 को इस मामले का निर्णय सुरक्षित अपने पास रख लिया । इस पीठ की अध्यक्षता जस्टिस अरुण मिश्रा ने की । 22 अप्रैल 2020 को वाद का निर्णय जस्टिस अरुण मिश्रा साहब की बेंच ने सुनाया ।
पीठ ने आंध्र प्रदेश राज्यपाल द्वारा जारी किए गए उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के लिए 100% आरक्षण की पुष्टि की गई थी । साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सरकारों पर जुर्माना भी लगाया ।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि जो परिवार 70 साल से आरक्षण ले रहे हैं, उनको आगे आरक्षण नहीं मिलना चाहिए ।
पिटिशनर ने आंध्र प्रदेश राज्यपाल के इस निर्णय को भेदभाव पूर्ण बताते हुए संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताया था ।
सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय देते हुए इंदिरा साहनी वाले निर्णय को भी स्पष्ट किया और कहा कि 1992 में दिए गए उस निर्णय में स्पष्ट कहा गया है कि 50% से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता ।
पीठ ने कठोर शब्दों में सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि जब संविधान लागू होने पर आरक्षण की व्यवस्था केवल 10 वर्षों तक की गई थी तो बार-बार आरक्षण 10 वर्षों तक क्यों बढ़ा दिया जाता है ? क्या इस नवीनीकरण के खिलाफ सरकार ने कोई सुरक्षात्मक उपाय किए हैं ? पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं जस्टिस मिश्रा ने सरकार से पूछा कि 70 सालों से आरक्षण मिल रहा है लेकिन फिर भी लोग पिछड़े क्यों बने हुए हैं ?
70 सालों से एक विशेष वर्ग को आरक्षण मिल रहा है लेकिन फिर भी वह वर्ग समाज में आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा है ? जब एक विशेष वर्ग को आरक्षण अनुसूची में डाल देते हैं तो उसे निकालने के उपाय क्यों नहीं किए जाते ? क्या वह हमेशा ही आरक्षण का लाभ लेता रहेगा ? क्या एक परिवार का पुत्र, फिर उसका पुत्र, फिर उसका पुत्र इसी तरह लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेता रहेगा ? वह लगातार पीढ़ियों में आरक्षण का लाभ लेकर जनता के सम्मान नेतृत्व में कार्य करते हैं तो क्या वह फिर भी पिछड़े ही बने हुए हैं ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम आदिवासी संस्कृति को बरकरार रखना चाहते हैं और आरक्षण भी देना चाहते हैं । क्या इस आरक्षण से आदिवासियों की स्थिति में कोई सुधार हुआ है या उनकी स्थिति पहले जैसी ही है । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि पिछले दो दशकों में मिले हुए आरक्षण कि सुप्रीम कोर्ट को पूरी रिपोर्ट सौंपी जाए ।
28/07/2020
💟👉सर्वोच्च न्यायालय का गठन, कार्य व शक्तियाँ📚
👉कोई भी समाज बिना विधायी व्यवस्था के रह सकता है यह बात तो समझ में आ एकता है, परन्तु किसी ऐसे समय राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसमें न्यायापालिका या न्यायाधिकरण की कोई व्यवस्था न हो ।’’ भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का उच्चतम् न्यायालय है, यह भारतीय न्याय व्यवस्था की शीर्षक संख्या है। किसी भी सरकार की श्रेष्ठता उसकी न्याय व्यवस्था की श्रेष्ठता पर निर्भर करती है संघात्मक व्यवस्था में संघ और राज्य सरकारों को अपनी नर्धारित सीमाओं में रहकर ही कार्य करना पड़ता है इस प्रकार न्यायपालिका आज व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य व्यक्ति और राज्य के मध्य, राज्य और राज्य के मध्य, संघ एवं राज्य के मध्य उत्पन्न विवादों का निर्णय ही नहीं करती अपितु वह मौलिक अधिकारों के रक्षक और संविधान के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। इसकी उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए लार्ड ब्राइस ने लिखा है’’ यदि न्याय का दीपक अधेरे में बझु जाये तो अँधेरा कितना होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।’’
👉भारतीय संविधान द्वारा भारत में संधीय शासन की व्यवस्था की गयी है जिसके अन्तर्गत संघ एवं राज्यों के लिये न्याय पालिका का संगठन पृथक-पृथक न होकर सम्पूर्ण देश की एकीकृत एवं संगठित न्याय व्यवस्था है। उच्चतम् न्यायालय देश का सर्वोच्च एवं अंतिम न्यायालय है, जिसके अधीन राज्यों के उच्च न्यायालय एवं उच्चन्यायालयों के अधीन अन्य अधीनस्त न्यायालय है इस प्रकार भारत के समस्त न्यायालय एक कड़ी के रूप में बँधे हुए है।
💟👉सर्वोच्च न्यायालय का गठन
❣️न्यायाधीशो की संख्या
👉उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो की संख्या अधिनियम 1985 के द्वारा वर्तमान में न्यायाधीशों की संख्या कुल 26 है जिसमें 01 मुख्य न्यायाधीश एवं 25 अन्य न्यायाधीश होते है।
❣️न्यायाधीशो की नियुक्ति
👉संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, नियुक्ति करने से पूर्व वह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से परामर्श ले सकता है। जिनसे परामर्श लेना आवश्यक समउच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर करता है। संविधान के द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किये जाने की व्यवस्था है परंतु व्यवहार में इन नियुक्तियों का निर्णय प्रधानमंत्री द्वारा लिया जाता है और राष्ट्रपति उसके परामर्श से कार्य करता है।
❣️न्यायाधीशो की योग्यताएँ
👉संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के लिये निम्नांकित योग्यताएँ अपेक्षित है।
👉भारत का नागरिक हो।
👉जिसकी आयु 65 वर्ष से कम हो
👉जो भारत के किसी उच्च न्यायालय अथवा दो या दो से अधिक न्यायालयो में कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश के पद पर रह चुका हो। अथवा किसी उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक वकालत कर चुका हो अथवा राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता (कानून का ज्ञाता) हो।
❣️शपथ ग्रहण
👉प्रत्येक न्यायाधीश को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष अपने पद की शपथ लेनी होती है।
❣️कार्यकाल
👉संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते है।
❣️महाभियोग की प्रक्रिया
👉कोई न्यायाधीश कार्यकाल पूरा होने से पहले भी त्यागपत्र दे सकता है। असाधारण स्थिति में किसी न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने से पहले भी अपदस्थ किया जा सकता है परन्तु इसके लिये निर्धारित प्रक्रिया को अपनाना होगा। अत: सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसकी अक्षमता व कदाचार के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है यदि संसद के दोनो सदन अलग अलग प्रस्ताव पारित कर दे जिसके लिये एक ही सत्र में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यो की कुल संख्या का 2/3 बहुमत होना आवश्यक है अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिये ऐसी प्रक्रिया का प्रयोग केवल एक बार किया गया है। परंतु फिर भी उसे हटाया नहीं जा सका क्योंकि संसद उस प्रस्ताव को पारित नही कर सकी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित है और कार्यपालिका उन्हे अपनी इच्छा अनुसार नहीं हटा सकती।
❣️वेतन एवं भत्ता
👉न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते संसद द्वारा निश्चित किये जाते है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 33,000.00 (तैतीस हजार) मासिक वेतन एवं 1250.00 रूपये (बारह सौ पचास) मासिक भत्ता एवं अन्य न्यायाधीशो को 30,000. 00(तीस हजार) मासिक एवं 750 (सात सौ पचास) रूपये मासिक भत्ता प्राप्त होता है। इसके अलावा नि:शुल्क आवास आने जान के लिये वाहन एवं 150 लीटर पेट्रोल की सुविधा भी मिलती है।
❣️न्यायालय का स्थान
👉भारत का उच्चतम न्यायालय दिल्ली में स्थित है।
❣️न्यायाधीशों पर प्रतिबंध
👉सेवानिवृत्ति होने के पश्चात उच्चतम न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी न्यायालय में अथवा अन्य पदाधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता।
❣️उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ व कार्य
👉सर्वोच्च न्यायालय का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण भारत होने के कारण इसकी शक्तियाँ बहुत विस्तृत एवं व्यापक है इसके निर्णय देश के समस्त न्यायालयो को मान्य होते है। इनकी शक्तिर्यो एवं कार्यो को निम्नांकित शीर्षक के अन्तर्गत विभाजित कर अध्ययन कर सकतें है।
❣️प्रारंभिक क्षेत्राधिकार
👉अनुच्छेद 131 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को कुछ मुकदमो पर प्रारंभिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है प्रांरभिक क्षेत्राधिकार का अर्थ है कि ये मुकदमें सीधे उच्चतम न्यायालय में लाए जा सकते है और इन्हे पहले किसी छोटे न्यायालय में ले जाने की आवश्यकता नहीं है। प्रांरभिक क्षेत्राधिकार को दो भागो में विभाजित किया जा सकता है-
1. संघ तथा राज्यो से संबधित
2. मौलिक अधिकारो से संबधित
💟👉संघ तथा राज्यो से संबंधित विवाद
👉इसमें वे विवाद आते हैं जिनका निणर्य केवल उच्चतम न्यायालय ही कर सकता है जैसे-
👉भारत सरकार (केन्द्र सरकार) तथा एक या अधिक राज्यो के बीच का विवाद।
👉एक पक्ष केन्द्र सरकार और एक या कुछ राज्यों का हो तथा दूसरा पक्ष एक या अनेक राज्यों का हो।
👉दो या दो से अधिक राज्यों के वैध अधिकार के प्रश्न का विवाद।
💟👉मौलिक अधिकारो से संबंधित विवाद
👉संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के द्वारा नागरिको के मौलिक अधिकारो की रक्षा करने के लिये उच्चतम न्यायालय को समुचित कार्यवाही की शक्ति प्रदान की गयी है। मौलिक अधिकारो की रक्षा के लिये उच्चतम न्यायालय के द्वारा पाँच प्रकार के लेख जारी किये जा सकते है।
❣️बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेखी- इसका शाब्दिक अर्थ है- हमें शरीर चाहिए (let us have the body)- यदि किसी व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार करती है तो उसे सामान्यत: 24 घटें के भीतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। यदि पुि लस ऐसा नहीं करती अथवा कोई व्यक्ति किसी का अपहरण कर लेता है तो न्यायालय में बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की जा सकती है। न्यायालय संबंधित के विरूद्ध बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख जारी करते हुए कहती है कि उस व्यक्ति को सशरीर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाय।
❣️परमादेश लेख - इसका अर्थ ‘‘हम आदेश देते है’’ (we command) इसके अन्तर्गत न्यायालय किसी व्यक्ति या संस्था को काम करने का आदेश देती है।
❣️प्रतिषेध लेख - यह परमादेश लेख का विपरीत है परमादेश में काम करने का आदेश दिया जाता है जबकि प्रतिषेध लेख जारी कर काम करने के लिये मना किया जाता है।
❣️उत्प्रेषण लेख - इसका अर्थ है ‘पूर्णतया सूचित कीजिए’ (Be fully informed)। यदि अधीनस्थ न्यायालय में कोई मामला विचाराधीन है और उच्च स्तर का न्यायालय यह समझता है कि प्रकरण महत्वपूर्ण है। अतएव उसे स्वयं उस प्रकरण पर सुनवाई करना चाहिए तो वह उच्च स्तर का न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय के लिये यह लेख जारी करते हुए उस प्रकरण के बारे में सम्पूर्ण दस्तावेज आदि अपने पास मगा लेता है और प्रकरण पर स्वयं सुनवाई करता है।
❣️अधिकार पृच्छा लेख- इसका अर्थ है कि ‘किस अधिकार से (By which authority)। इसके अनुसार न्यायालय किसी व्यक्ति को एक पद ग्रहण करने से रोकने के लिये एक निषेध आज्ञा जारी कर सकता है और उक्त पद के रिक्त होने की तब तक के लिये घोषणा कर सकता है जब तक कि न्यायालय द्वारा कोई निर्णय न हो जाय। आदेश का तात्पर्य है कि ‘‘ आप इस पद पर किस अधिकार से पदस्थ हैं।’’ इस प्रकार उच्चतम न्यायालय नागरिको के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।
💟👉अपीलीय क्षेत्राधिकार
👉उच्चतम न्यायालय देश का अंतिम अपीलीय न्यायालय है उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालयो के विरूद्ध चार प्रकार की अपीलें सुनने की शक्ति प्राप्त है।
❣️संवैधानिक अपीलें
👉संवैधानिक मामले न तो दीवानी झगडे होते है और न ही फौजदारी अपराध। यह ऐसा मुकदमा है जिसके कारण संविधान की भिन्न भिन्न प्रकार से व्याख्या करना होता है विशेषकर मौलिक अधिकारो से सबंधित व्याख्या अथवा अर्थ निकालना ऐसे मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में केवल तभी हो सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामला संवैधानिक मामलो से संबंधित है।
❣️दीवानी अपीलें
👉संपत्ति विवाह धन समझौते या किसी सेवा संबंधी झगडो के मामले दीवानी मुकदमें कहलाती है। यदि किसी दीवानी मामलो में लाके महत्व का कोई ऐसा प्रमुख कानूनी बिन्दु है जिसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वांछित है तो उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। 1972 के 30 वें संशोधन के अनुसार धनराशि (बीस हजार से अधिक की राशि का विवाद) का बंधन हटा दिया गया है अर्थात दीवानी अपील के लिये कोई निम्नतम राशि निर्धारित नहीं है।
❣️फौजदारी अपीलें
👉संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार उच्च न्यायालयों के निणर्य के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में उन फौजदारी विवादो की अपील की जा सकती है। जबकि-
यदि कोई उच्च न्यायालय निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त घोषित किए गए व्यक्ति को मृत्युदंड सुना दे तो ऐसे व्यक्ति को इस निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।
👉यदि कोई उच्च न्यायालय किसी निचली अदालत से किसी मुकदमे को अपने यहां मंगा ले और उस व्यक्ति को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड सुना दे तो ऐसे मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। ऐसी स्थिति में भी अधिकार स्वरूप और उच्च न्यायालय से बिना किसी प्रमाणपत्र के अपील दायर की जा सकती है।
उपरोक्त दो स्थितियों के अतिरिक्त भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि कोई उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे कि मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने योग्य है।
❣️विशिष्ट अपीले
👉सर्वोच्च न्यायालय सैनिक न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध अपील नही सुन सकता। इस अपील को छोड़कर भारत स्थित किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी विवाद में दिये गये निर्णय के विरूद्ध अपील करने की विशेष अनुमति प्रदान कर सकता है।
❣️परामर्शदायी क्षेत्राधिकार
👉 संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार इस अधिकार का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने का अधिकार है यदि उससे परामर्श मांगा जाए। मंत्रणा संबंधी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत राष्टप्र ति किसी भी कानून सबंधी अथवा लोक महत्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिये बाध्य नहीं है। दूसरी ओर यदि परामर्श या मत भेज दिया जाए तो उसे मानना या ना मानना राष्टप्रति के लिये भी बाध्यकारी नही है। आज तक जब भी सर्वोच्च न्यायालय ने कोई परामर्श दिया है राष्ट्रपति ने उसे सदैव स्वीकार किया है। आयोध्या में जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी उस स्थान पर पहले मंदिर था या नहीं जब इस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय मांगी गई तो उसने अपनी राय देने से इंकार कर दिया था।
❣️न्यायिक पुनरावलोकन संबंधी अधिकार
👉यदि संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून या कार्यपालिका द्वारा किया गया कोई कार्य अथवा कोई आदेश संविधान के विरूद्ध है तो सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करते हुए ऐसे कानून कार्य अथवा आदेश को अवैध घोषित कर देता है। इसी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के कारण सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक कहा जाता है।
❣️संविधान की व्याख्या संबंधी अधिकार
👉संविधान के अनुच्छेदो से संबंधित विवादास्पद प्रश्नों के निर्णय के लिये उच्चतम न्यायालय को उन अनुच्छेदो की व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त है।
💟👉अभिलेख न्यायालय
👉संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय पर अभिलेख न्यायालय है क्योंकि उसकी समस्त कार्यवाहिया एवं निर्णय लिखित रूप में हाते े है और प्रकाशित किये जाते है जिन्हें अभिलेख के रूप में रखा जाता है। इन अभिलेखो को आवश्यकतानुसार भविष्य में अधीनस्थ न्यायालयों के समक्ष उदाहरण या नजीर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
❣️अन्य अधिकार
👉सर्वोच्च न्यायालय को उपर्युक्त अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार भी प्राप्त है।
👉वह अपने अधीनस्थ न्यायालयों के कार्य की जांच कर सकता है।
👉उसे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्ते निर्धारित करने के अतिरिक्त उनके पदोन्नति एवं उनको पदच्युत करने की शक्ति भी प्राप्त है।
👉न्यायालय की अवमानना करने वाले किसी भी व्यक्ति को दण्डित करने की शक्ति भी उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है।
👉उसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लाके सभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री सहित भारतीय संघ के अन्य पदाधिकारियों के चुनाव में उत्पन्न विवादों में भी निर्णय देने का अधिकार प्राप्त है।
👉अत: स्पष्ट है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार व शक्तियाँ अत्यधिक व्यापक है और वह अपनी इन्हीं शक्तियों के द्वारा व अपनी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायप्रणाली द्वारा न्याय प्रदान करके लोकतंत्र के प्रति नागरिकों में विश्वास की भावना उत्पन्न करता है, जो सफल लोकतंत्र का मुलधार है।
💟👉उच्चतम न्यायालय का महत्व
👉उच्चतम न्यायालय की आवश्यक्ता एवं महत्व के विषय में भारत के भूतपूर्व महान्यायवादी श्री. एम. सी. सीतलवाड ने कहा है। ‘‘उच्च्तम न्यायालय संघ एवं राज्य सरकारो के पारस्परिक विवादो का निपटारा एवं संविधान का स्पष्टीकरण करेगा। नागरिको के मौलिक अधिकारो की रक्षा एवं जनता के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को व्यवहारिक रूप प्रदान करेगा।’’ सर्वोच्च न्यायालय के महत्व को मुख्य रूप से निम्नांकित शीर्षक के अन्तर्गत विभाजित किया जा सकता है।
मौलिक अधिकारो के संरक्षक के रूप में- सर्वोच्च न्यायालय नागरिको को प्राप्त मौलिक अधिकारो का सरंक्षक भी है। यदि कार्यपलिका किसी व्यक्ति के अधिकारो का हनन कर ती है तो न्यायालय लेख जारी करके उस व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की रक्षा करता है। इसके अलावा संसद या विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये ऐसे कानूनो को न्यायालय अवैध घोषित कर देता है जो नागरिको के मौलिक अधिकारो का हनन करते हैं।
संविधान के संरक्षक के रूप में- संविधान के सरं क्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय केन्द्र (संसद) एवं राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये कानूनों को अवैध घोषित करता है जो संविधान के विरूद्ध होते हैं।
❣️चुनाव याचिकाओं की सुनवाई- न्यायपालिका में राज्यो एवं केन्द्रीय क्षेत्रों के प्रत्याशी चुनाव याचिकाएँ दायर करते है।। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय अपनी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र न्यायप्रणाली के द्वारा न्याय पद्रान करके लोकतंत्र के प्रति नागरिको में विश्वास की भावना उत्पन्न करता है।
💟👉जनहित याचिका
👉प्रारंभिक दौर में सर्वोच्च न्यायालय सहित न्यायपालिका केवल उन्हीं के मुकदमे सुनने के लिये स्वीकार करती थी जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होते थे। यह केवल मूल तथा अपील संबंधी अधिकार क्षेत्र के ही मुकदमे सुनती थी और उन पर फैसला सुनाती थी। परंतु बाद में न्यायपालिका जनहित याचिकाओ पर आधारित मुकदमे भी सुनने लगी। इसका अभिप्राय यह है कि वे लागे भी जिनका किसी मामले से कोई सीधा संबधं नहीं है न्यायालय में कोई जनहित का मामला ला सकते है। यह न्यायालय का विशेषाधिकार है कि वह उस जनहित याचिका को स्वपीकार करे या न करे। जनहित याचिका की अवधारण को न्याय मूर्ति पी एन भगवती ने शुरू किया था। जनहित याचिका अब इसलिए महत्वपूर्ण बन गई है क्योंकि इससे समाज के निर्धन तथा कमजोर वर्गो को सुगमता से न्याय मिलने लगा है। पत्रकारों वकीलों तथा समाज सेवको यहां तक की समाचार पत्रों की रिपोर्टो के आधार पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक जनहित याचिकाएं स्वीकार की है।
27/07/2020
◆◆ CONSUMER PROTECTION ACT, 2019◆◆
===========================
1.चर्चा में क्यों ?
2.कानून की मुख्य विशेषताएं
3.केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण
4.उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग (CDRC)
5.सीडीआरसी का अधिकार क्षेत्र
6.कॉमर्स प्लेटफार्मो पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का प्रभाव
7.CCPA के कार्य
●
चर्चा में क्यों ?
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20 जुलाई 2020 से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019, सम्पूर्ण देश में प्रभावी हो गया है।इसने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम -1986 को विस्थापित किया है।
● उपभोक्ता संरक्षण विधयेक, 2019 के मुख्य तथ्य : कानून की मुख्य विशेषताएं
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अधिनियम में उपभोक्ता की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो मूल्य देकर कोई वस्तु अथवा सेवा खरीदता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति फिर से बेचने के लिए अथवा वाणिज्यिक उद्देश्य से कोई वस्तु अथवा सेवा हस्तगत करता है तो वह व्यक्ति उपभोक्ता नहीं कहलायेगा।
अधिनियम में सब प्रकार के लेन-देन को शामिल किया गया है, जैसे – ऑफलाइन, ऑनलाइन, टेली शौपिंग, बहु-स्तरीय विपणन अथवा प्रत्यक्ष विक्रय।
अधिनियम में उपभोक्ताओं के कुछ मुख्य अधिकार बताये गये हैं :
i) जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक वस्तुओं एवं सेवाओं के विपणन से संरक्षण पाना।
ii) वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, कार्य क्षमता, शुद्धता, मानक तथा मूल्य से सम्बंधित सूचना पाना।
iii) प्रतिस्पर्धात्मक दामों पर कई प्रकार की वस्तुओं अथवा सेवाओं तक पहुँचना ।
iv) अन्यायपूर्ण अथवा बंधनकारी व्यापार प्रचलनों का समाधान माँगना।
अर्थात अधिनियम में छह उपभोक्ता अधिकारों को परिभाषित किया गया है :
1.सुरक्षा का अधिकार।
2.सूचना देने का अधिकार।
3.चुनने का अधिकार।
4.सुनने का अधिकार।
5.निवारण का अधिकार।
6.उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार।
● केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण
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अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार एक केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) गठित करेगी जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देना, सुरक्षित करना और लागू करना होगा।
CCPA के पास एक महानिदेशक के नेतृत्व में एक जांच विंग होगी , जो इस तरह के उल्लंघन की जांच या जांच कर सकती है।
यह प्राधिकरण उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, अन्यायपूर्ण व्यापारिक प्रचलनों तथा भ्रामक विज्ञापनों से सम्बंधित विषयों के लिए नियामक निकाय होगा। इस प्राधिकरण में एक अन्वेषण शाखा भी होगी जिसका प्रमुख एक महानिदेशक होगा जो इन उल्लंघनों के विषय में जाँच अथवा विवेचना कर सकेगा।
असत्य अथवा भ्रामक विज्ञापन के लिए CCPA निर्माता अथवा प्रचारकर्ता को 10 लाख रु. तक का आर्थिक दंड एवं दो वर्षो के कारावास का दंड लगाया जा सकता है। यदि कोई निर्माता अथवा प्रचारकर्ता ऐसा अपराध पुनः करता है तो उस पर 50 लाख रु. तक का आर्थिक दंड एवं पाँच वर्षो के कारावास का दंड लगाया जा सकता है।
● उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग (CDRC)
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अधिनियम में एक उपभोक्ता विवाद समाधान आयोगों (Consumer Disputes Redressal Commission – CDRCs) की अभिकल्पना भी है। ये आयोग राष्ट्रीय, राज्यीय तथा जिले के स्तर पर गठित होंगे। इन आयोगों के समक्ष कोई भी उपभोक्ता इन वस्तुओं के लिए शिकायत दायर कर सकता है –
1.अन्यायपूर्ण अथवा बंधनकारी व्यापारिक प्रचलन
2.दोषयुक्त वस्तु अथवा सेवा
3. अधिक अथवा छुपा हुआ दाम लगाना अर्थात ओवरचार्जिंग या भ्रामक चार्जिंग।
4. जीवन एवं सम्पत्ति के लिए हानिकारक वस्तुओं अथवा सेवाओं के विक्रय का प्रस्ताव।
अधिनियम में विभिन्न CDRCs के लिए अधिकार क्षेत्रों का वर्णन किया गया है। जिला-स्तरीय CDRC उन शिकायतों को देखेगा जिनमें सम्बंधित वस्तु एवं सेवा का मूल्य एक करोड़ रु. के अन्दर है। राज्य-स्तरीय CDRC उन शिकायतों को देखेगा जिनमें वस्तुओं अथवा सेवाओं का मूल्य एक करोड़ रु. से दस करोड़ रु. के बीच होगा। दस करोड़ रु. से अधिक मूल्य वाली वस्तु एवं सेवा की शिकायतें राष्ट्रीय CDRC द्वारा देखी जाएँगी।
● अपील
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अनुचित अनुबंध के खिलाफ शिकायत केवल राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज की जा सकती है।
जिला CDRC की अपील राज्य CDRC द्वारा सुनी जाएगी। राज्य सीडीआरसी की अपीलें राष्ट्रीय सीडीआरसी द्वारा सुनी जाएंगी। अंतिम अपील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष होगी।
● सीडीआरसी का अधिकार क्षेत्र
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जिला सीडीआरसी उन शिकायतों का निपटारा करेगा जहां वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य एक करोड़ रुपये से अधिक नहीं है।
राज्य सीडीआरसी शिकायतों का निस्तारण करेगा जब मूल्य एक करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन 10 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है।
राष्ट्रीय सीडीआरसी द्वारा 10 करोड़ रुपये से अधिक की वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य वाली शिकायतों पर विचार किया जाएगा।
● मध्यस्थता
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यह अधिनियम उपभोक्ता आयोगों द्वारा मध्यस्थता के संदर्भ के लिए प्रदान करता है जहां प्रारंभिक समझौता होने की संभावना है और पक्ष इसके लिए सहमत हैं।
मध्यस्थता प्रकोष्ठों को उपभोक्ता आयोगों से जोड़ा जाना है। उपभोक्ता मध्यस्थता कोशिकाओं में आयोजित होने वाली मध्यस्थता।
अध्यक्ष और उपभोक्ता आयोग के सदस्य वाली चयन समिति द्वारा चयनित मध्यस्थों का पैनल ।
मध्यस्थता के माध्यम से निपटान के खिलाफ कोई अपील नहीं।
● ई-कॉमर्स प्लेटफार्मो पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का प्रभाव
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1.ई-कॉमर्स पोर्टल को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत नियमों के तहत एक मजबूत उपभोक्ता निवारण तंत्र स्थापित करना होगा ।
2.उन्हें उस मूल देश का भी उल्लेख करना होगा जो उपभोक्ता को उसके मंच पर पूर्व खरीद के चरण में सूचित निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाने के लिए आवश्यक है।
3.ई-कॉमर्स प्लेटफार्मो को भी अड़तालीस घंटों के भीतर किसी भी उपभोक्ता शिकायत की प्राप्ति को स्वीकार करना होगा और इस अधिनियम के तहत प्राप्ति की तारीख से एक महीने के भीतर शिकायत का निवारण करना होगा।
● उत्पाद की जिम्मेदारी
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एक निर्माता या उत्पाद सेवा प्रदाता या उत्पाद विक्रेता को दोषपूर्ण उत्पाद या सेवाओं में कमी के कारण हुई क्षति या क्षति की भरपाई के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
● CCPA के कार्य
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1.उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में जाँच एवं विवेचना करना तथा समुचित मंच पर मुकदमा दायर करना।
2.हानिकारक वस्तुओं या सेवाओं को वापस करने और चुकाए गये मूल्य को लौटाने के विषय में आदेश निर्गत करना एवं अधिनियम में परिभाषित अन्यायपूर्ण व्यापरिक प्रथाओं को बंद करना।
3.झूठा अथवा भ्रामक विज्ञापन बंद करने अथवा उसमें सुधार करने के लिए सम्बंधित व्यापारी/निर्माता/प्रचारकर्ता/विज्ञापनकर्ता/प्रकाशक को निर्देश निर्गत करना।
4.दंड लगाना, एवं उपभोक्ताओं को असुरक्षित वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रति सतर्क करने के लिए सूचनाएँ निर्गत करना।
According to prelims examination
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1.राष्ट्रीय बनाम राज्य आयोग बनाम जिला विवाद निवारण फोरम, उनकी रचनाएँ।
2.न्यायालयों और अपीलों का क्षेत्राधिकार, क्षेत्राधिकार।
3.क्या CCPA मुकदमे दायर कर सकता है ?
4.उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग- क्षेत्राधिकार।
5.एक राष्ट्रीय सीडीआरसी से अपील।
6.अधिनियम के तहत परिभाषित उपभोक्ता परिभाषा और अधिकार।