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14/12/2025

राजा श्‍वेत की कथा - दान न करने से कैसी दुर्गति होती हैं
श्रीरघुनंदन राम, महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुँचे।

शम्बूक वध का समाचार सुनकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुये और उन्होंने विश्‍वकर्मा द्वारा दिया हुआ एक दिव्य आभूषण श्रीराम को अर्पित किया।

वह आभूषण सूर्य के समान दीप्तिमान, दिव्य,विचित्र तथा अद्‍भुत था। उसे देखकर श्रीराम ने महर्षि अगस्त्य से पूछा,"मुनिवर!

विश्‍वकर्मा का यह अद्‍भुत आभूषण आपके पास कहाँ से आया? जब यह आभूषण इतना विचित्र है तो इसकी कथा भी रोचक होगी। यह जानने का, मेरे मन में कौतूहल हो रहा है।

" श्रीराम की जिज्ञासा और कौतूहल को शान्त करने के लिये महर्षि ने कहा,"प्राचीन काल में एक बहुत विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ था, परन्तु उस वन में कोई प्राणी-पशु-पक्षी तक नहीं रहता था।

उसमें एक मनोहर सरोवर भी था। उस स्थान को पूर्णतया एकान्त पाकर, मैं वहाँ तपस्या करने के लिये चला गया था। सरोवर के चारों ओर चक्कर लगाने पर मुझे एक पुराना विचित्र आश्रम दिखाई दिया। उसमें भी तपस्वी नहीं था। मैंने रात्रि वहीं विश्राम किया। जब मैं प्रातःकाल स्नानादि के लिये सरोवर की ओर जाने लगा तो मुझे सरोवर के तट पर हृष्ट-पुष्ट निर्मल शव दिखाई दिया।

मैं आश्‍चर्य से वहा बैठ कर उस शव के विषय में विचार करने लगा।

थोड़ी देर पश्‍चात् वहाँ एक दिव्य विमान उतरा, जिस पर एक सुन्दर देवता विराजमान था।

उसके चारों ओर सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलंकृत अनेक अप्सराएँ बैठी थीं। उनमें से कुछ उन पर चँवर डुला रही थीं।

फिर वह देवता सहसा विमान से उतर कर, उस शव के पास आया और उसने मेरे देखते ही देखते, उस शव को खाकर फिर सरोवर में जाकर हाथ-मुँह धोने लगा।

जब वह पुनः विमान पर चढ़ने लगा तो मैंने उसे रोककर पूछा कि हे तेजस्वी पुरुष! आपका यह देवोमय सौम्य रूप और यह घृणित आहार? मैं इसका रहस्य जानना चाहता हूँ।

मेरे विचार से आपको यह घृणित कार्य नहीं करना चाहिये था।

"मेरी बात सुकर वह दिव्य पुरुष बोला कि मेरे महा-यशस्वी पिता विदर्भ देश के पराक्रमी राजा थे। उनका नाम सुदेव था। उनकी दो पत्‍नियाँ थीं, उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुये। एक का नाम था श्‍वेत और दूसरे का सुरथ। मैं श्‍वेत हूँ। पिता की मृत्यु के बाद, मैं राजा बना और धर्मानुकूल राज्य करने लगा। एक दिन मुझे अपनी मृत्यु की तिथि का पता चल गया और मैं सुरथ को राज्य देकर इसी वन में तपस्या करने के लिये चला आया।

दीर्घकाल तक तपस्या करके मैं ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ,परन्तु अपनी भूख-प्यास पर विजय प्राप्त न कर सका। जब मैंने ब्रह्माजी से कहा तो वे बोले कि तुम मृत्युलोक में जाकर अपने ही शरीर का नित्य भोजन किया करो।

यही तुम्हारा उपचार है क्योंकि तुमने किसी को कभी कोई दान नहीं दिया, केवल अपने ही शरीर का पोषण किया है। ब्रह्मलोक भी तुम्हें, तुम्हारी तपस्या के कारण ही प्राप्त हुआ है। जब कभी महर्षि अगस्त्यत उस वन में पधारेंगे तभी तुम्हें भूख-प्यास से छुटकारा मिल जायेगा। अब आप मुझे मिल गये हैं, अतएव आप मेरा उद्धार करें और मेरा उद्धार करने के प्रतिदान स्वरूप यह दिव्य आभूषण ग्रहण करें। यह आभूषण दिव्य वस्त्र, स्वर्ण, धन आदि देने वाला है। इसके साथ मैं अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ आपको समर्पित कर रहा हूँ। मेरे आभूषण लेते ही राजर्षि श्‍वेत पूर्णतः तृप्‍त होकर स्वर्ग को प्राप्त हुये और वह शव भी लुप्त हो गया।

08/12/2025

वैदिक परंपरा के प्रारंभिक उदय से ही, ऋषियों ने श्वास को मात्र जैविक आवेग के रूप में नहीं, बल्कि एक दिव्य संकेत के रूप में पहचाना, जो शिव द्वारा मानव शरीर में अंकित एक सूक्ष्म शास्त्र है। शिव स्वरोदय, जो महादेव के पार्वती को दिए गए प्रत्यक्ष निर्देश से जुड़ा हुआ है, यह प्रकट करता है कि प्रत्येक नासिका में श्वास की दिशा और प्रवाह शुभता, स्वास्थ्य, भाग्य, आंतरिक मनोदशाओं, बाहरी सफलता और यहां तक कि क्रियाओं को आकार देने वाली छिपी हुई ऊर्जाओं की भविष्यवाणी कर सकता है। यह पवित्र अनुशासन योगिक विज्ञानों में मुकुटमणि के समान है, क्योंकि यह शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, प्राण-शक्ति और ब्रह्मांडीय लय की गतिविधियों को आत्म-नियंत्रण के एक प्रकाशमान मार्ग में एकीकृत करता है। प्राचीन द्रष्टाओं ने कहा कि प्राण और मन अविभाज्य जुड़वां हैं, और जहां एक जाता है, दूसरा अनिवार्य रूप से उसका अनुसरण करता है। जब प्राण-वायु का प्रवाह स्थिर और परिष्कृत हो जाता है, तो मन पर स्वाभाविक रूप से नियंत्रण प्राप्त होता है, जो स्पष्टता, सहज ज्ञान और एक ऐसी अवस्था की ओर ले जाता है जहां महाप्राण की गहरी धाराएं स्वयं प्रकट होती हैं। इस समझ में स्थापित योगी हर अनुभव के सार को उसी प्रकार समझता है जैसे एक दीपक अंधेरे कमरे में छिपी वस्तुओं को प्रकट करता है, और ग्रंथ घोषणा करते हैं कि स्वर की विद्या से बड़ा कोई खजाना, साथी या रक्षक नहीं है।

परंपराएं बताती हैं कि महान ऋषि गोरखनाथ ने कभी किसी शिष्य की दीक्षा नहीं दी, किसी राजा से मुलाकात नहीं की, कोई यात्रा नहीं की या यहां तक कि पानी भी नहीं पिया बिना उस क्षण के सक्रिय स्वर का निरीक्षण किए, और क्योंकि उनकी क्रियाएं ब्रह्मांडीय समय के साथ पूर्णतः संरेखित थीं, यहां तक कि शासक भी उनके सामने श्रद्धा से झुकते थे। शिव पुराण इस सत्य को प्रतिध्वनित करता है कि जो श्वास की लय के साथ सामंजस्य में चलता है, वह स्वयं ब्रह्मांड की लय के साथ सामंजस्य में चलता है।

प्रत्येक मनुष्य एक दिन में लगभग इक्कीस हजार बार श्वास लेता है, और उपनिषद इस संख्या को सोहम मंत्र की निरंतर आंतरिक जप की पवित्र स्मृति के रूप में चित्रित करते हैं। श्वास जितनी धीमी होती है, जीवन काल उतना ही लंबा होता है; तेज श्वास जीवन शक्ति को कम करती है, जबकि धीमी श्वास उसे संरक्षित करती है। इस प्रकार, योगी अपनी श्वास को परिष्कृत करके अपने भाग्य को परिष्कृत करते हैं। अधिकांश लोग यह नही जाणते कि श्वास कभी दोनों नासिकाओं में समान रूप से नहीं बहती। इसके बजाय, यह लयबद्ध चक्रों में बदलती है—बाईं नासिका (इड़ा) से, फिर दाईं (पिंगला) से, और कभी-कभी दोनों (सुषुम्ना) से। ये वैकल्पिक धाराएं स्वर कहलाती हैं, और किसी विशेष नासिका में उनकी उपस्थिति उदय के रूप में जानी जाती है। इस सूक्ष्म गति का निरीक्षण सीखना स्वरोदय विज्ञान की आधारशिला बनता है।

बाईं नासिका, इड़ा, चंद्रमा से संबंधित, शीतल, सहज और पोषणकारी गुणों को व्यक्त करती है, जो मानसिक स्पष्टता से जुड़े हैं। दाईं नासिका, पिंगला, सूर्य से संबंधित, गर्म, गतिशील और बलपूर्ण है, जो शारीरिक शक्ति और निर्णायक क्रियाओं पर शासन करती है। जब श्वास दोनों नासिकाओं से बहती है, तो सुषुम्ना सक्रिय हो जाती है, जो ध्यान, धारणा और ऊंची अनुभूति को स्वाभाविक रूप से उभरने देती है। अभ्यासी को सलाह दी जाती है कि किसी भी क्रिया की शुरुआत से पहले सक्रिय स्वर का निरीक्षण करे, और यदि वह कार्य की प्रकृति से मेल नहीं खाता, तो सक्रिय नासिका की ओर लेटकर विपरीत नासिका को खोल सकता है।

स्वरोदय यह भी सिखाता है कि श्वास की प्रधानता चंद्र दिनों से मेल खाती है, जो प्राण, चंद्र और ब्रह्मांडीय समय के बीच गहन संबंध को दर्शाता है। श्वास एक घंटे के चक्रों में बहती है, और प्रत्येक चक्र में पांच तत्व निश्चित अनुपात में प्रकट होते हैं—पृथ्वी बीस मिनट के लिए, जल सोलह के लिए, अग्नि बारह के लिए, वायु आठ के लिए और आकाश चार के लिए। दर्पण पर श्वास का निरीक्षण करके, योनि-मुद्रा के दौरान सूक्ष्म आंतरिक रंगों को नोट करके, जीभ पर नाजुक संवेदनाओं का स्वाद लेकर, निःश्वास की लंबाई महसूस करके या किसी विशेष चक्र में सक्रियता को पहचानकर, अभ्यासी यह पहचानता है कि कौन सा तत्व सक्रिय है।

जब पृथ्वी प्रधान होती है, तो शरीर स्थिर हो जाता है और उपचार ऊर्जाएं उभरती हैं, जो मूलाधार के पीले वर्ग से जुड़ी हैं और बीज लं से। जल भावनात्मक संतुलन और तरलता लाता है, जो स्वाधिष्ठान के सफेद अर्धचंद्र से जुड़ा है और बीज वं से। अग्नि परिवर्तन और पाचन शक्ति को उत्तेजित करती है, जो मणिपूर के लाल त्रिकोण से चिह्नित है और बीज रं से। वायु हल्कापन और स्वतंत्रता प्रदान करती है, जो अनाहत के हरे षट्कोण से जुड़ी है और बीज यं से। आकाश सूक्ष्म ज्ञान और सहज अनुभूति को जागृत करता है, जो विशुद्ध के नीले विस्तार से जुड़ा है और बीज हं से। छह महीने की निरंतर निरीक्षण से इन तात्विक धाराओं पर महारत प्राप्त होती है।

उचित स्वर के अंतर्गत की गई क्रियाएं शुभ फल देती हैं। इड़ा पोषणकारी, आंतरिक, सृजनात्मक, उपचारकारी और भक्तिमय क्रियाओं का समर्थन करती है साथ ही पश्चिम या दक्षिण की ओर यात्राओं का। पिंगला मुखर, शारीरिक, बाहरी या चुनौतीपूर्ण क्रियाओं को सशक्त बनाती है और पूर्व या उत्तर की ओर यात्राओं को। सुषुम्ना ध्यान, मंत्र और उच्च साधना के लिए आरक्षित है और सांसारिक कार्यों के लिए नहीं है। सामंजस्य और शुभ भाग्य के लिए, व्यक्ति को सूर्योदय से पहले जागना चाहिए, आंखें खोलते ही सक्रिय स्वर की पहचान करनी चाहिए, उसी ओर के हथेली से चेहरे को धीरे से रगड़ना चाहिए और उसी ओर के पैर से जमीन पर कदम रखना चाहिए, जिससे व्यक्ति की आभा श्वास के शासक तत्व से संरेखित हो जाती है।

स्वरोदय अंततः सिखाता है कि श्वास शिव का गुप्त लिपि है, एक जीवंत भविष्यवक्ता जो भाग्य, समय, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक दिशा को प्रकट करता है। प्राण की महारत मन की महारत बन जाती है, और मन की महारत जीवन की महारत बन जाती है। प्राचीन योगी इस विज्ञान का उपयोग आध्यात्मिक उन्नति, समृद्धि, महत्वपूर्ण क्रियाओं के समय निर्धारण और सूक्ष्म ऊर्जाओं में अंतर्दृष्टि के लिए करते थे। अनुशासित निरीक्षण के माध्यम से, व्यक्ति धीरे-धीरे शिव की ब्रह्मांडीय श्वास से संरेखित होता है और साधारण जागरूकता से स्पष्टता, उद्देश्य और आंतरिक जागरण के जीवन की ओर बढ़ता है।

ॐ नमः शिवाय 🙏🙏🙏

Photos from Anything, Anywhere & Anytime's post 01/12/2025

#नमस्ते_सभी_को_इसे_पढ़िएगा_जरूर 🙏
मैं वही लड़का हूँ जिसे आपने इस वीडियो में देखा। मेरा नाम ऋषभ है और मैं आपसे “मैनिफेस्टेशन” नाम के एक शब्द के बारे में बात करना चाहता हूँ, जिसका मतलब होता है। किसी चीज़ के सच होने की गहरी इच्छा।

2014 वह साल था जब मैंने पहली बार इस पल को अपने लिए मैनिफेस्ट किया था… यह जो 30 सेकंड की छोटी-सी क्लिप आप देख रहे हैं इसमें मेरी पूरी ज़िंदगी समाई हुई है। माफ़ कीजिए अगर मैं घबराया हुआ नहीं दिख रहा बल्कि यह मेरे अंदर जमा भावनाओं का सैलाब है। क्योंकि मैं इस पल का 11 साल से इंतज़ार कर रहा था। हाँ, आपने सही पढा़ जी पूरे 11 साल।

सोचिए, आप इतने सालों तक इस पल की तैयारी करते हैं खुद से कहते हैं कि न रोना है, न ज़्यादा खुश दिखना है, न भावुक होना है… लेकिन जब मैंने उसे ऐल के रास्ते चलते देखा तो मैं यक़ीन ही नहीं कर पाया कि यह सच है या मैं अब भी सपना देख रहा हूँ।

और हाँ, माफ़ कीजिए अगर आपको निराश करूँ तो बता दूं कि मैं कोई सरकारी नौकरी वाला इंसान नहीं हूँ। मैं अपने परिवार के लिए काम करता हूँ और उन्हें एक बेहतर जीवन देना चाहता हूँ। मेरी कमाई अच्छी है, लेकिन उसने मुझे तब भी प्यार किया था जब मेरे पास कुछ नहीं था। वह मेरे कॉलेज के दिनों से अच्छे-बुरे, सुख-दुख, हर हाल में मेरे साथ खड़ी रही है। इसलिए आपकी राय… ज़्यादा मायने नहीं रखती।

मैं अभी 30 साल का हुआ हूँ और उसे एक दशक से भी अधिक समय से पूरे दिल से प्यार करता हूँ। यह मेरी ज़िंदगी का 1/3 हिस्सा है। और मैं दुआ करता हूँ कि आपको भी कोई ऐसा मिले जो आपको उसी तरह प्यार करे जैसे वह मुझे करती है लेकिन वैसा प्यार मिलना आसान नहीं है।

हम आपके कमेंट्स पढ़कर बहुत खुश होते हैं और सबके शुभकामनाओं के लिए दिल से धन्यवाद।
देखिए, मैं यह नहीं झुठला सकता कि मैं काला हूँ, और मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी नस्लभेद का सामना किया है। लेकिन बस एक बात का आग्रह रहेगा कि मेरे परिवार के बारे में बेमतलब की बातें न फैलाएँ। थोड़ी समझ रखिए। आपके लिए मैं शायद एक ‘साधारण काला आदमी’ हूँ, लेकिन अपनी पत्नी के लिए मैं दुनिया का सबसे अच्छा पति बनना चाहता हूँ।

धन्यवाद 🙏🙂

नोट- आपसे मैं शायद ही कभी कोई पोस्ट शेयर या पोस्ट करने के लिए कहता हूं अगर वह सामाजिक हित में जरूरी ना रही तो लेकिन इसे अपनी वाल पर पोस्ट कीजिए, शेयर कीजिए और उन दो कौड़ी के नफरती चिंटूओं को भी टैग कर ऋषभ जी का मैसेज उन तक पहुंचाइये जो पेज और मीम के नाम पर गंध मचा रखें हैं। उनका विरोध भी किया कीजिए मुझे लगता है आपने इसे पूरा पढा़ ही होगा। सोचिए आपके गंदे कमेंट और हाहाहाहाहा का किसी कम समझदार व्यक्ति या जोड़े पर क्या असर पड़ता होगा यह तो ऋषभ समझदार हैं कि वह इन दो कौड़ी के लोगों की मानसिकता समझते हैं।

अच्छा एक और जरूरी बात ऋषभ ही नहीं अगली बार किसी के लिए नस्ल भेद जैसी ओछी मानसिकता फैलाने वालों के ट्रेप में मत फंसिएगा, भावावेष में आकर आप सभी भी तुरंत बगैर सोचे समझे पोस्ट और स्टेटस लगा देते हैं। अगली बार हाहाहाहाहा मत कीजिएगा कृपया विरोध कीजिएगा।

Thanks to Ramakant Yadav for sharing this insightful message through this post 👍🏼😊👏🏼👏🏼👏🏼

01/12/2025

क्या श्रीराम का पिनाक को भंग करना उचित था...?

माता सीता के स्वयंवर के विषय में हम सभी जानते हैं। इसी स्वयंवर में श्रीराम ने उस पिनाक को सहज ही उठा कर तोड़ डाला जिसे वहाँ उपस्थित समस्त योद्धा मिल कर हिला भी ना सके। हालाँकि कई लोग ये पूछते हैं कि श्रीराम ने धनुष उठा कर स्वयंवर की शर्त तो पूरी कर ही दी थी, फिर उस धनुष को भंग करने की क्या आवश्यकता थी?

यदि आप मेरा दृष्टिकोण पूछें तो मैं यही कहूंगा कि उस धनुष की आयु उतनी ही थी। अपना औचित्य (देवी सीता हेतु श्रीराम का चुनाव) पूर्ण करने के उपरांत उस धनुष का उद्देश्य समाप्त हो गया। उसके उपरांत पिनाक का पृथ्वी पर कोई अन्य कार्य शेष नही था। कदाचित यही कारण था कि श्रीराम ने उस धनुष को भंग कर दिया।

वैसे यदि आप वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस का संदर्भ लें तो दोनों में एक ही चीज लिखी है - सीता स्वयंवर के समय श्रीराम द्वारा उस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के प्रयास में वो धनुष टूट गया। अर्थात मूल रामायण के अनुसार श्रीराम ने उस धनुष को जान-बूझ कर नही तोड़ा था अपितु प्रत्यंचा चढ़ाते समय वो अनायास ही टूट गया। भगवान परशुराम के क्रोधित होने पर श्रीराम उन्हें भी यही कहते हैं कि वो धनुष उनसे अनजाने में टूट गया।

हालांकि यदि आप पिनाक के इतिहास के बारे में पढ़े, जिसका वर्णन विष्णु पुराण और शिव पुराण, दोनों में विस्तार से दिया गया है, तो इस धनुष के भंग होने का वास्तविक कारण आपके समझ मे आ जाएगा। इसके पीछे एक पौराणिक कथा छिपी है जिसके अनुसार समय आने पर पिनाक को भंग होना ही था और वो भी भगवान विष्णु के द्वारा ही।

इस कथा के अनुसार भगवान शंकर का धनुष पिनाक और भगवान नारायण का धनुष श्राङ्ग, दोनों का निर्माण स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने किया था। एक बार इस बात पर चर्चा हुई कि दोनों धनुषों में से श्रेष्ठ कौन है। तब ब्रह्मदेव की मध्यस्थता में भोलेनाथ और श्रीहरि में अपने-अपने धनुष से युद्ध हुआ। हर और हरि के युद्ध का परिणाम तो भला क्या निकलता किन्तु उस युद्ध में श्रीहरि की अद्भुत धनुर्विद्या देखने के लिए महादेव एक क्षण के लिए रुक गए।

युद्ध के अंत में दोनों ने ब्रह्मा जी से निर्णय देने को कहा। शिवजी और विष्णुजी धनुर्विद्या में अंतर बता पाना असंभव था। किन्तु कोई निर्णय तो देना ही था इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा कि चूंकि महादेव युद्ध मे एक क्षण रुक कर नारायण का कौशल देखने लगे थे, इसी कारण श्राङ्ग पिनाक से श्रेष्ठ है। ये सुनकर महादेव बड़े रुष्ट हुए और उन्होंने उसी समय पिनाक का त्याग कर दिया। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि अब आप ही इस धनुष का नाश करें। महादेव की इच्छा का मान रखते हुए श्रीहरि ने कहा कि समय आने पर वे उस धनुष को भंग करेंगे।

भगवान शंकर द्वारा त्याग दिए जाने के पश्चात वो धनुष कुछ समय तक ब्रह्मा जी के पास ही रहा। बाद में उन्होंने उसे वरुण को दे दिया। वरुण देव ने पिनाक को देवराज इंद्र को रखने को दिया। बाद में इंद्र ने उस धनुष का दायित्व मिथिला के तत्कालीन राजा देवरात को दिया। यही देवरात मिथिला नरेश जनक के पूर्वज थे। पीढ़ी दर पीढ़ी होता हुआ वो धनुष जनक को प्राप्त हुआ। पृथ्वी पर उसे "शिव धनुष" कहा गया। महर्षि वाल्मीकि ने मूल रामायण में इसे शिव धनुष ही कहा है जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसे पिनाक कहा है।

एक अन्य कथा के अनुसार जब नारायण और महादेव युद्ध के लिए तत्पर हुए तो उस समय एक आकाशवाणी हुई कि ये युद्ध संसार के कल्याण के लिए संकट है जिससे संसार का नाश हो जाएगा। इस पर श्रीहरि तो पहले की भांति धनुषबद्ध रहे किन्तु भगवान रूद्र ने आकाशवाणी सुन कर उसे पृथ्वी पर फेंक दिया। बाद में वही धनुष जनक के पूर्वज देवरात को प्राप्त हुआ।

कहते हैं कि एक बार माता सीता ने केवल ७ वर्ष की आयु में उस धनुष को उठा लाया था जिसे कोई हिला भी नही पाता था। तब राजा जनक ने ये प्रण किया कि वो उसी से सीता का विवाह करेंगे जो इस महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा। उधर भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित हो चुके थे। सीता स्वयंवर में श्रीराम रूपी नारायण ने महादेव की इच्छा को फलीभूत करने के लिए ही अंततः उस धनुष को भंग कर दिया। अर्थात वो महान धनुष महादेव की इच्छा से ही भंग हुआ, सीता स्वयंवर तो केवल निमित्त मात्र था।

वास्तव में ये घटना सृष्टि के उस नियम को भी प्रतिपादित करती है जिसके अनुसार सृष्टि में कुछ भी अनश्वर नही है, चाहे वो मनुष्य हो अथवा वस्तु। समय पूर्ण होने पर सबका नाश होना अवश्यम्भावी है, यही सृष्टि का अटल नियम है। जय श्री हरिहर।

28/11/2025

महाराज जनक ने किसी भी राजा महराजा को निमंत्रण नही भेजा था।

एक सूचना प्रसारित कराई थी की जो भी वीर धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढाकर तोड़ देगा जनकनंदिनी उसकी भार्या बनेगी.........

कुछ ऋषि मुनी थे जिनको निमंत्रण भेजा गया था जैसे महर्षि श्री बिश्वामित्र।

दशरथ जी देव इक्ष्वाकु कुल से थे अस्तु अयोध्या मे मुनादी नही गयी थी धनुष यज्ञ की।

प्रभु राम और लक्ष्मण बिश्वामित्र के पास यज्ञ रक्षा के लिए गये थे, इनका भी स्वयंवर से कोई हेतुक नही था।

अब दोनो युवराज मिथिला इसलिए गये की गुरू बिश्वामित्र के साथ थे personal SPG के तहत......

स्वयंवर प्रारंभ होने से पूर्व भट लोग Term and condition सामने रखते हैं, जिसे बाबा तुलसीदास ने अपने शब्दो मे कुछ यों कहा है..

सोइ पुरारि-कोदंड कठोरा।
राज-समाज आजु जेई तोरा॥

त्रिभुवन-जय-समेत बैदेही।
बिनहिँ बिचार बरह हठि तेही ।।

अर्थात

यहां बैठे राज समाज से यानी की सभी क्षत्रियों मे जो भी शिव जी के इस कठोर धनुष को तोड़ेगा, उसे तीनो लोको का विजेता मान लिया जाएगा, और बिना किसी हठ के जानकी जी उसका वरण कर लेंगी......

अब यहां वही अवसर था जहां मात्र एक action से भगवान श्री राम का परिचय दुनिया से होगा, एक evidence जो राम को भगवान और ब्रह्म स्थापित कर देगा।

उस सभा मे राजा महराजा यक्ष गंधर्व और कुछ देवता भी आए थे...

आगे की कथा आप जानते हैं!!

गुरू जी आज्ञा के बाद प्रभु राम ने microsecond मे धनुष को खंड खंड कर दिया....

और उस घटनाक्रम का वर्णन करते हुए बाबा तुलसीदास जी कहते हैं...

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें।
काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।
भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।

यानी की ये काम इतनी तेज हुआ की धनुष को लेते प्रत्यंचा चढाते किसी ने देखा भी नही लोग वही खड़े के खड़े रह गये, शायद यह इसलिए ऐसा हुआ को वो आंख सुरक्षित ही नही बचती जो यह घटना क्रम देख लेती।

भगवान ने धनुष के दो टुकड़े किए थे

प्रभु दोउ चापखंड मही डारे.........

चाप कहते हैं धनुष को दोउ खंड का आशय दो टुकड़ों से है और "मही" कहते हैं धरती को.......!!

ये धनुष नही दस हजार बाहुबलियों का अहंकार भंजन था....

राम के श्री राम की ओर स्थापित होने का का प्रमाण था.....

श्री राम के त्रिभुवन विजेता होने का प्रमाण था........

और वहीं दूसरी ओर एक बात प्रमाणित होती है की चतुरंगिणी सेना और त्रिभुवन अयोध्य नगरी के राजकुमारों के विवाह का अधिकार एक गुरू एक ब्राम्हण के पास था जिनने बिना "दशरथ" से पूछे बिना कौशल्या से पूछे उनके पुत्र को जानकी जू को सौंप दिया........

उधर पृथ्वी पाताल और स्वर्ग मे अयोध्यानाथ की कीर्ती फैल गयी...

महिं पाताल नाक जसु ब्यापा।
राम बरी सिय भंजेउ चापा॥
करहिं आरती पुर नर नारी।
देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥

सूरज उपाध्याय

27/11/2025

आजकल एक शादी चर्चा में है इंडियन क्रिकेटर स्मृति मंधना और सिंगर पलाश मुच्छल की।

आज एक दोस्त से फोन पर बात हुई उसने मज़ाक में कहा कि यार long distance relationship है।
स्मृति busy रहती है बाहर रहती है तो कर लेता होगा बात किसी से। एक आध गलती तो माफी कर देनी चाहिए। फिर उसने अपनी favourite line बोली कि लड़का है गलती हो जाती है।

मैंने उसे कहा यही गलती स्मृति करती तो क्या पलाश माफ कर देता?
या तुम कर देते अगर तुम्हारे वाली ने की होती?
उसने फिर बात पलट दी।

हमारे यहां लड़कों का बेवफ़ा होना एक सामान्य घटना है लड़कियों की बेवफ़ाई महापाप गुनाहे अज़ीम।
ख़ुद लड़कियां लड़कियों के लिए जजमेंटल रहती हैं।

सच तो ये है लड़कियां माफ़ कर देती हैं इसकी सबसे बड़ी वजह है या तो वो आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं होतीं या परिवार के दबाव की वजह से अलग नहीं हो सकती या फिर आख़िर में ही ऑप्शन होता है कि वो बेहद प्यार में हैं और चाहकर भी उसे छोड़ नहीं सकतीं तो गलती को माफ़ करके आगे बढ़ जाना चाहती हैं।

मुझे नहीं पता स्मृति मंधना और पलाश मुच्छल का मसला बेवफाई वाला है या कुछ और लेकिन अगर सभी भारतीय महिलाओं की आर्थिक स्थिति मज़बूत हो जाए और परिवार का दबाव न रहे तो यूरोप से ज़्यादा ब्रेकअप यहां होंगे।

मर्द अगर बेवफाई के मामले में zero tolerance रखता है तो मन से तो हर औरत आज भी सब कुछ बांट सकती है लेकिन अपना पसंदीदा मर्द नहीं।


Photos from Anything, Anywhere & Anytime's post 26/11/2025

मुकेश अंबानी के इस लड़के के विवाह में इसका खूब मजाक उड़ाया गया।

लेकिन अयोध्या प्राणप्रतिष्ठा में जब पत्रकार ने इससे पूछा की अयोध्या प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होकर कैसा महसूस कर रहे हो?

तब मुकेश अंबानी का यह लड़का बोलता है कि मेरे पूर्व जन्मों के कोई पुण्य होंगे, तब जाकर प्रभु राम जी के प्राण प्रतिष्ठा में अयोध्या मुझे आने का अवसर मिला।

मित्रों आप इसके शब्दों पर गौर कीजिए, इतनी ऊंचाइयों पर जाने के बाद भी जड़ से जुड़े इसके भाव देखो, मित्रों यह सब में इसलिए लिख रहा हूं कि जहां दो पैसे आते ही लोग अपनी जड़ों को पिछड़ा और पाखंड कहने लगते हैं।

ऐसे में भारत के सबसे अमीर व्यक्ति का बेटा जब यह कहे की अयोध्या प्रभु राम जी की प्राण प्रतिष्ठा में आना मेरे पूर्व जन्मों का भाग्य है।

तो यह उन लोगों को सीखना चाहिए जो दो किताब पढ़ते ही और कुछ पैसे आते ही अपने आप को बहुत बड़ा होशियार समझ कर धर्म परंपराओं का मजाक उड़ाते हैं।

अयोध्या प्राण प्रतिष्ठा में देश के सारे सफल उद्योगपति हो, कलाकार हो, खिलाड़ी हो सब इतने भावुक मन से शामिल हुए जिसे देखकर लगता है गांव का गरीब हो या बहुत बड़ा उद्योगपति सब की आत्मा व्याकुल थी।

अपने रामलला को तंबू से भव्य मंदिर में देखने के लिए वाकई में राम भारत की आत्मा हैं।

ऐसा ही कुछ नजारा कल धर्मध्वजा आरोहण मे दिखा। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री जी की भावुकता उनके कांपते हाथो से देखी गई।

वहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष की ऑखे नम थी इस पल का साक्षी बनने के लिए।

बोलो सियावर रामचंद्र की जय।

24/11/2025

उस दिन जब उनकी मौत की झूठी खबर आई तब अगले दिनों सनी देओल paparazzi/ media पर गुस्सा करते नजर आए " शर्म नहीं आती ! ऐसी खबर फैलाते । " यह स्वाभाविक था। अगले दिनों में एक वीडियो में बॉबी भी उदास दिखाई दिए। उनकी आँखें नम रही। किसी भी संतान के लिए , अपने माता पिता को बुजुर्ग होते देखना, बीमार शरीर के साथ देखना दिन पर दिन कहीं न कहीं डराता है। एक उम्मीद टूटती है लेकिन वे उस नर्म स्पर्श को उस आशीष को अपने सिर पर हमेशा महसूस करते रहना चाहते है जिसकी छाया में पले हो। वे ख्याल में उन्हें खोने जैसी बात नहीं सोच सकते। दुखद है जीवन यात्रा कहीं खत्म होती ही है। ईश्वर परिवार को शक्ति दे 🙏🙏

#धर्मेन्द्र
श्रद्धांजलि 🙏🏻

06/11/2025

काली रात का रहस्य 🌑
​दिल्ली के पास एक पुरानी और वीरान हवेली थी जिसका नाम था 'भूत बंगला'। कहानियाँ थीं कि रात को वहाँ से अजीबोगरीब आवाज़ें आती हैं और जो भी अंदर जाता है, वह लौटकर नहीं आता।
​रोहन, एक युवा व्लॉगर, ने इन कहानियों को महज़ अफ़वाह समझा। प्रसिद्धि की लालच में, उसने अपने दो दोस्तों – प्रिया और अमित – के साथ वहाँ रात बिताने का फ़ैसला किया। वह अपने साथ कैमरा और टॉर्च लेकर गए।
​जैसे ही वे हवेली के दरवाज़े पर पहुँचे, ठंडी हवा का एक झोंका आया, जिससे पुरानी जंग लगी किवाड़ ज़ोर से चरमरा उठी। अंदर घुप अँधेरा था और हवा में एक अजीब सी सड़ांध थी।
​उन्होंने हॉल में कदम रखा। चारों तरफ़ धूल की मोटी परत जमी थी, और टूटी-फूटी कलाकृतियाँ डरावनी छायाएँ बना रही थीं। अचानक, प्रिया को लगा जैसे किसी ने उसका नाम फुसफुसाया हो। वह मुड़ी, लेकिन पीछे कोई नहीं था।
​"शायद यह महज़ हवा का धोखा है," रोहन ने बहाना बनाया, लेकिन उसकी आवाज़ में भी घबराहट थी।
​वे पहली मंज़िल की तरफ़ बढ़े। सीढ़ियाँ ऐसी आवाज़ कर रही थीं जैसे कोई बूढ़ा कंकाल चल रहा हो। ऊपर एक लंबा गलियारा था। तभी, अमित की टॉर्च की रोशनी एक पुराने आइने पर पड़ी। उस आइने में धूल और दरारें थीं, लेकिन एक पल के लिए, उन तीनों ने आइने के अंदर अपनी परछाइयों के ठीक पीछे एक चौथी धुंधली परछाईं देखी।
​तीनों की साँसें अटक गईं।
​रोहन ने भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद हो चुका था। उन्हें लगा कि उनका पीछा किया जा रहा है। गलियारे में अब उनके कदमों की आवाज़ के साथ, किसी के घिसटने की धीमी और भयानक आवाज़ भी आने लगी।
​अमित चीख़ा, "रोहन! मेरे कंधे पर देखो!"
​रोहन ने देखा, अमित की जैकेट पर मिट्टी से सना हुआ एक हाथ का पंजा छपा हुआ था। जबकि उस जगह पर कोई नहीं था!
​इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, कमरे की एक कोने से एक बूढ़ी औरत की डरावनी हँसी गूँजी। हँसी इतनी तेज़ थी कि उनके कानों में दर्द होने लगा। रोहन ने डर के मारे कैमरा ज़मीन पर पटक दिया। जब कैमरा टूटा, तो स्क्रीन पर अंतिम दृश्य कैद हुआ— एक ख़ून से लथपथ चेहरा जो तेज़ी से उनकी ओर बढ़ रहा था।
​अगले दिन, पुलिस को सिर्फ़ टूटे हुए कैमरा और तीन खाली जैकेट मिलीं, जिन पर मिट्टी के भयानक पंजों के निशान थे। भूत बंगले का रहस्य आज भी अनसुलझा है।

27/08/2025

🪔 गणेश जी की सम्पूर्ण जन्म कथा

एक बार माता पार्वती जी स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने स्नान से पहले अपने उबटन (स्नान का लेप) की मिट्टी से एक सुंदर बालक बनाया। फिर उन्होंने उसमें प्राण फूँक दिए।
यह बालक उनका पुत्र बन गया।

माता पार्वती ने अपने पुत्र से कहा –
“बेटा, मैं स्नान करने जा रही हूँ। जब तक मैं वापस न आऊँ, तब तक कोई भी अंदर प्रवेश न कर पाए।”

बालक ने आज्ञा मानी और द्वार पर पहरा देने लगा।

कुछ समय बाद भगवान शिव वहाँ आए। वे अपने गृह में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन द्वार पर खड़े बालक ने उन्हें रोक दिया।

शिवजी ने कहा –
“मैं इस गृह का स्वामी हूँ, तुम मुझे कैसे रोक सकते हो?”

बालक ने दृढ़ता से उत्तर दिया –
“मेरी माता ने मुझे आदेश दिया है कि जब तक वे न आएँ, मैं किसी को भी अंदर नहीं जाने दूँ।”

यह सुनकर शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने कई बार समझाया, लेकिन बालक अपनी माता की आज्ञा के प्रति अटल रहा।

आखिरकार शिवजी और उस बालक के बीच भीषण युद्ध हुआ।
देवता और गण भी उस बालक को परास्त न कर सके। बालक में अद्भुत शक्ति थी।

अंत में, भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।
बालक भूमि पर निश्चल होकर गिर पड़ा।

जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और अपने प्रिय पुत्र को मृत पाया, तो वे क्रोधित और दुखी हो गईं।
उनके क्रोध से संपूर्ण सृष्टि कांपने लगी।

माता ने कहा –
“यदि मेरे पुत्र को जीवन न मिला, तो मैं समस्त सृष्टि का विनाश कर दूँगी।”

यह सुनकर सभी देवता भयभीत हो गए और उन्होंने माता पार्वती को शांत करने का प्रयास किया।
फिर सभी देवता शिवजी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे बालक को पुनर्जीवित करें।

भगवान शिव ने कहा –
“इस बालक को नया जीवन मिलेगा। उत्तर दिशा में जो पहला प्राणी दिखेगा, उसका सिर लाकर इस बालक के शरीर से जोड़ दो।”

भगवान शिव के गण उत्तर दिशा की ओर गए। उन्हें वहाँ एक हाथी दिखाई दिया।
उन्होंने उसका सिर लाकर बालक के धड़ से जोड़ दिया।

भगवान शिव ने बालक में प्राण फूँके और इस प्रकार वह पुनः जीवित हो गया।

माता पार्वती ने अपने पुत्र को पुनः जीवित देखकर प्रसन्नता प्रकट की।
तब सभी देवताओं ने आकर उस बालक को आशीर्वाद दिया।

भगवान शिव ने घोषणा की –
“आज से यह मेरा और पार्वती का पुत्र ‘गणेश’ कहलाएगा।
देवता, मानव और असुर – सभी कार्यों की शुरुआत सबसे पहले इसी की पूजा से होगी।
यह होगा प्रथम पूज्य।”

उस दिन से भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, सिद्धिदाता और प्रथम पूज्य के रूप में पूजा जाने लगा।

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✨ यही है गणेश जी की सम्पूर्ण जन्म कथा।



23/08/2025
23/08/2025

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