Neeraj Dwivedi

Neeraj Dwivedi

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कोई न रहे शिक्षा से वंचित

25/06/2023

लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली।
चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है।

पिता सेना में कर्नल के पद से रिटार्यड हुए । वे लखनऊ के एक पॉश कॉलोनी में अपनी पत्नी के साथ रहते थे। उनके दो बेटे थे। जो सुदूर अमेरिका में रहते थे। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि माता-पिता ने अपने लाड़लों को पालने में कोई कोर कसर नहीं रखी। बच्चे सफलता की सीढ़िंया चढते गए। पढ़-लिखकर इतने योग्य हो गए कि दुनिया की सबसे नामी-गिरामी कार्पोरेट कंपनी में उनको नौकरी मिल गई। संयोग से दोनों भाई एक ही देश में,लेकिन अलग-अलग अपने परिवार के साथ रहते थे।

एक दिन अचानक पिता ने रूंआसे गले से बेटों को खबर दी। बेटे! तुम्हारी मां अब इस दुनिया में नहीं रही । पिता अपनी पत्नी की मिट्टी के साथ बेटों के आने का इंतजार करते रहे। एक दिन बाद छोटा बेटा आया, जिसका घर का नाम चिंटू था।

पिता ने पूछा चिंटू! मुन्ना क्यों नहीं आया। मुन्ना यानी बड़ा बेटा।पिता ने कहा कि उसे फोन मिला, पहली उडान से आये।

धर्मानुसार बडे बेटे का आना सोच वृद्व फौजी ने जिद सी पकड़ ली।

छोटे बेटे के मुंह से एक सच निकल पड़ा। उसने पिता से कहा कि मुन्ना भईया ने कहा कि, "मां की मौत में तुम चले जाओ। पिता जी मरेंगे, तो मैं चला जाऊंगा।"

कर्नल साहब (पिता) कमरे के अंदर गए। खुद को कई बार संभाला फिर उन्होंने चंद पंक्तियो का एक पत्र लिखा। जो इस प्रकार था-

प्रिय बेटो

मैंने और तुम्हारी मां ने बहुत सारे अरमानों के साथ तुम लोगों को पाला-पोसा। दुनिया के सारे सुख दिए। देश-दुनिया के बेहतरीन जगहों पर शिक्षा दी। जब तुम्हारी मां अंतिम सांस ले रही थी, तो मैं उसके पास था।वह मरते समय तुम दोनों का चेहरा एक बार देखना चाहती थी और तुम दोनों को बाहों में भर कर चूमना चाहती थी। तुम लोग उसके लिए वही मासूम मुन्ना और चिंटू थे। उसकी मौत के बात उसकी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने लिए मैं था। मेरा मन कर रहा था कि काश तुम लोग मुझे ढांढस बधाने के लिए मेरे पास होते। मेरी मौत के बाद मेरी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने के लिए कोई नहीं होगा। सबसे बड़ी बात यह कि मैं नहीं चाहता कि मेरी लाश निपटाने के लिए तुम्हारे बड़े भाई को आना पड़े। इसलिए सबसे अच्छा यह है कि अपनी मां के साथ मुझे भी निपटाकर ही जाओ। मुझे जीने का कोई हक नहीं क्योंकि जिस समाज ने मुझे जीवन भर धन के साथ सम्मान भी दिया, मैंने समाज को सभ्य नागरिक दिये। हाँ अच्छा रहा कि हम अमरीका जाकर नहीं बसे, सच्चाई दब जाती।

मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे मैडल तथा फोटो बटालियन को लौटाए जाए तथा घर का पैसा नौकरों में बाटा जाऐ। जमापूँजी आधी वृद्ध सेवा केन्द्र में तथा आधी सैनिक कल्याण में दी जाऐ।
तुम्हारा पिता

कमरे से ठांय की आवाज आई। कर्नल साहब ने खुद को गोली मार ली।

- कुमार गौरव

31/03/2023
25/03/2023

Dogs never bite me. Just humans

16/03/2023

गीता दर्शन पर ओशो की व्याख्या अद्भुत है , यदि आप पुस्तक पढ़ना पसंद करते हैं और आप गीता अध्ययन कर चुके हैं तो ये पुस्तकें जरूर पढ़ें ।

16/03/2023

प्रयागराज के साथ-साथ दिल्ली में भी हमारी कक्षाएं शुरू हो गयी हैं । देश के आखिरी बच्चे तक शिक्षा पहुँचाने का संकल्प लिया है हमने , आशा है इस क्रांति में आप सबका सहयोग भी बना रहेगा ।

19/06/2022

नीलकंठ यात्रा

18/06/2022

कुछ समय प्रकृति के साथ

01/05/2022

मैंने प्राइम टाइम के अनगिनत एपिसोड में कहा है कि 'वे' आपके बच्चों को दंगाई बना रहे हैं। तब मेरा विश्वास था कि हर माँ-बाप और युवा भी, इतने स्वार्थी तो होते ही हैं कि अपना जीवन बर्बाद नहीं करेंगे।दंगाई नहीं बनेंगे लेकिन समाज ने मुझे ग़लत साबित किया। असल में ऐसा होने से कोई नहीं रोक सकता था। नफ़रत की विचारधारा की स्थापना राष्ट्र और धर्म के गौरव के बहाने आदर्श के रूप में प्रचलित कर दी गई है। इसके दो प्रकार के समर्थक हैं। अति सक्रिय समर्थक जो सड़कों पर उतरते हैं और सक्रिय समर्थक जो सोशल मीडिया से लेकर सामाजिक बैठकों में इसका समर्थन करते हैं। इसकी सामाजिक मान्यता इतनी बढ़ चुकी है कि कोई भी इसकी चपेट में आ सकता है और दंगाई बन सकता है।

यह बात केवल एक धर्म के लिए नहीं है। सभी धर्मों के लिए है। अयोध्या और गोरखपुर के केस में आपने देख लिया। यह भी मुमकिन है कि कोई बहुत पढ़ा लिखा और शांत मन वाला इसकी चपेट में आ जाए और कोई मानसिक रुप से बीमार व्यक्ति भी हथियार उठा ले। लेकिन, अब इसका विस्तार इतना बढ़ चुका है कि इस समंदर को थामना मुश्किल है और ख़ास कर तब जब हिन्दी प्रदेश के युवाओं को इसमें आनंद आने लगे और वह अपनी पहचान का हिस्सा बना ले। यही कारण है कि समय-समय पर धर्म को लेकर कोई न कोई मुद्दा खड़ा किया जाता है ताकि जो समाज तैयार किया गया है वह इसके पक्ष में लगातार उतरता रहे। उसे भी एक दिन का आराम नहीं दिया गया है। इसलिए, नहीं दिया जा रहा है क्योंकि इसकी रुपरेखा ही इस तरह से बनाई जाती है कि जो भी चपेट में आए, उसे कुछ और सोचने का मौक़ा न मिले। कश्मीर फाइल्स ख़त्म नहीं हुई कि यात्रा को लेकर विवाद हुआ, यात्रा ख़त्म नहीं हुई तो लाउडस्पीकर को लेकर झगड़ा होने लगा। विगत सात वर्षों में लोगों को इस स्तर का मूर्ख बना दिया गया है कि अब दंगा कराने के लिए कुछ नया नहीं सोचना पड़ता है। वही पुराना तरीक़ा जो सौ साल से आज़माया जा रहा है। लाउडस्पीकर को लेकर झगड़ा और मंदिर-मस्जिद के आगे मांस फेंक देना। धर्म ग्रंथों की बेअदबी कर देना अब भी लोग इन सब पर प्रतिक्रिया करते हैं और यक़ीन करते है कि ऐसा करने से दंगा हो जाएगा। इस मूर्खता से लड़ना असंभव होता जा रहा है।

एक पैटर्न और है। धर्म को लेकर जो युद्ध चलाया जा रहा है, उसमें आपको लगता होगा कि आप धर्म युद्ध में हैं। धर्म के लिए युद्ध कर रहे हैं। लड़ना ही धर्म के बारे में जानना है। जबकि ऐसा नहीं है। धर्म के नाम पर छोटा रास्ता लेने वालों को पता होना चाहिए कि नफ़रत के मुद्दों से धर्म के गौरव की स्थापना नहीं होती है। अगर आप वाक़ई धर्म को लेकर चिन्तित हैं तो अध्ययन कीजिए। बहुत सारे सुंदर ग्रंथ हैं, जिनके अध्ययन से आप ख़ुद को समृद्ध महसूस करेंगे।लेकिन, इसकी जगह लोग केवल लड़ने का बहाना खोज रहे हैं।उम्मीद है आप नफ़रत से दूर जाने का प्रयास करेंगे।

दैनिक भास्कर ने अयोध्या में दंगा फैलाने की साज़िश में गिरफ़्तार हुए सात युवाओं के बारे में विस्तार से छापा है। सभी साधारण घरों के युवा है। इनमें से कई अपने माँ-बाप की परवाह तक नहीं करते। बेरोज़गार हैं या कम कमाते हैं लेकिन नफ़रत की दौलत से सराबोर हैं। महेश कुमार मिश्रा को मास्टर माइंड बताया जा रहा है। भास्कर ने लिखा है कि महेश कुमार मिश्रा पहले विश्व हिन्दू संगठन और बजरंग दल से जुड़ा था लेकिन बाद में उसने हिन्दू योद्धा संगठन बना लिया। ब्रिजेश पांडे, विमल पांडे, नितिन कुमार, प्रत्युष श्रीवास्तव, दीपक कुमार गौर और शत्रुध्न प्रजापति के घर और मोहल्ले तक जाकर भास्कर ने कई लोगों से बात की है।

इस रिपोर्ट को पढ़कर दुख हुआ कि दंगाई बनाने की मेरी बात सच होती जा रही है। मुझे लगा था कि ग़लत साबित होगी। इस नफ़रत से निकलना आसान नहीं है। युवाओं को इसमें मज़ा आए, शक्ति का अहसास हो इसके लिए डीजे म्यूज़िक का इस्तेमाल होने लगा है जिसके असर में भीड़ में शामिल युवाओं में कुछ कर गुज़रने का सौंदर्य जागता है। उन्हें लगता है कि वे गौरव की स्थापना जैसा महान काम कर रहे हैं और भारत को सोने की चिड़िया बना रहे हैं।

अगर हिन्दी प्रदेश के युवाओं ने धर्म के गौरव की आड़ में यही रास्ता चुना है तो क्या कर सकते हैं। एक और बार कह सकते हैं और कहेंगे ही कि नफ़रत के रास्ते पर मत चलिए।

- रवीश कुमार

21/03/2022

मेरा लेख प्रकाशित करने के लिए "यूनाइटेड भारत" का तहेदिल से शुक्रिया

18/12/2021

#सर्दी_के_सिपाही

ठंड की शरुआत हो चुकी है और इसी के साथ बेघर लोगों के लिए भोजन के साथ-साथ ठंड भी एक बड़ी समस्या है , पहली बार 2016 मे मैं ठंड की मध्यरात्रि में कई बार इलाहाबाद शहर को घूमकर देखा और पाया कि कम्बल तो दूर 4 डिग्री की ठंड में फुटपाथ में रह रहे लोगों के पास एक स्वेटर तक नही था । हद तो तब हुई जब हमने एक महिला को अपने 9 दिन के बच्चे के साथ हड्डी कंपा देने वाली ठंड में मात्र एक शॉल में रात काटते देखा , हमारे पास कुछ कम्बल थे जिसमे से एक हमने उस महिला को दे दिया और बाकी कुछ और जरूरतमंदों को , मगर जरूरत के अनुसार हमारे पास कम्बल काफी कम थे और लोग काफी ज्यादा , 25 दिसंबर (क्रिसमस) का दिन था हमने सेंट पॉल चर्च जो सिविल लाइन्स (इलाहाबाद) में है , वहाँ से कुछ कम्बल माँगे जो हमे मिल गए और फुटपाथ में रह रहे कुछ और लोगों तक हमने वो कम्बल पहुँचा दिये ।
और तब से लगातार पाँच वर्षों से हम ये काम कर रहे हैं और प्रयास ये रहता है कि ठंड से किसी की जान न जाये ।
आप जिस शहर में भी है कम से कम एक कम्बल तो किसी जरूरतमंद को दें या ऐसे किसी व्यक्ति को दें जो जरूरतमंद तक पहुंचा सके । यदि आप कम्बल नही दे सकते तो अपने पुराने गर्म कपड़े भी हम तक पहुंचा सकते हैं या आप हमें सूचित कर दें हम स्वतः आकर ले लेंगे
आपका एक गर्म कपड़ा इस ठंड किसी की जान बचा सकता है ।

नीरज कुमार - 6388973803 (दिल्ली)

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