17/01/2021
Dear तुम,
जब घर से निकलता हूँ तो देखता हूँ खिड़की की ओर तुम्हारी, फिर मेरी नज़र धीरे-धीरे पहुँच जाती है तुम्हारे घर की छत पर जहाँ पिछली रात आई थीं तुम इशारों में बात करने मुझसे, ये कहने की तुम्हें जरूरी हूँ मैं, काश ये हक़ीक़त होती, हाँ ये बस ख़्याल हैं मेरे, वो ख़्याल जो कभी शायद हक़ीक़त का रंग ओढ़ आ जाएं मेरे जीवन को खुबसूरत बनाने,
कुछ कहना है तुमसे आज बहुत याद आ रही हो तुम, जाने क्यों पर सच कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा काश तुम पास बैठी होती, तो एक पल को तुम्हारी गोद में सिर रख कर सो लेता गर नींद न पड़ती आँखों में फिर भी सुकूँ मिलता मन को, तुम्हारे पास होने का सुकूँ ।
जानती हो तुम मुझे दोपहरें बिल्कुल नही भातीं, इसमें वो सुबह नज़र नहीं आती जिंसमे तुम थी मेरे साथ मेरे हर कदम पर, वो शामें नहीं दिखती जहाँ छत की मुंडेर पर हम दोनों साथ होते हैं । हम तारे नहीं गिनते, एक दूजे की आंखों से पढ़ते है एक दूजे को फिर मेरे सानों पर तुम अपना सिर रख आँखें मूंद लेती हो और गुनगुनाती हो कोई अनसुनी सी धुन, जिन पर लिख देता हूँ मैं अनसुने से बोल, और बन जाता है एक गीत जीसमें रच देते है हम अपनी मोहब्बत के खुबसुरत हिस्से को तुमसे जुड़ कर जीना सीखा है मैंने हूँ ही नहीं कहता,मेरी तुम ।
तुम्हारा-मैं
(तुम धागा बन जाओ मेरे हाथों को थाम सी दो खुद में मुझे )
"when you come"
"promise me"
"You never let me go"_
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