PPCL-"Civil Service Current Affairs"

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IAS/PCS/SSC

05/09/2017

मेरे जीवन मे आने वाले समस्त शिक्षकों को सादर नमन एवं कोटिशः धन्यवाद ,प्रथम शिक्षिका मेरी माता जिन्होंने मुझे चलना , बोलना सिखाया
। मेरे पिता जिन्होंने अनुशासन,नियमबद्धता ,एवं महत्वाकांक्षा दी । समाज मे रहना सिखाया । तत्पश्चात दादाजी जिन्होंने कहा-घूंघट डाल कर रानी लक्ष्मीबाई युद्ध नही जीत सकती थी अर्थात यदि सपने बड़े हो तो हिचकिचाहट का त्याग करो ,लक्ष्यप्राप्ति में जो उचित हो वह करो ,बिना भय के । फिर मुझे अक्षर ज्ञान कराया,जिन्होंने पढ़ना लिखना सिखाया ,जिन्होंने पुस्तकीय ज्ञान दिया मेरी विद्यालय की शिक्षिकाएं । साथ ही वे सभी जो मेरे विरोधी रहे उनसे भी मैने कुछ न कुछ सीखा ही ,वे जो मेरी निंदा करते थे पर उनसे भी मैंने सीखा उन्हें भी धन्यवाद । वे लोग जो मेरे साथ बुरा बर्ताव किये ,मुझे कड़वाहट दी उन्हें तो शत शत नमन उनकी वजह से मेरा लक्ष्य तय हुआ ।आज भी थोड़ा सा शिथिल पड़ते ही उनका स्मरण फिर नव ऊर्जा का कार्य करता है । वे भी धन्यवाद के पात्र है जिन्होंने मेरी सरलता का लाभ उठाया ,और सहज विश्वास करने की मूर्खता से बाहर निकाला ।
वे सभी बुरे अवसर,बुरे लोग ,जो मेरे जीवन मे आये जिसका दुःख कभी हुआ ,परन्तु विचार करने पर पाया वो सभी मेरे शिक्षक ही थे अतः उन्हें भी धन्यवाद । तत्पश्चात सप्रेम नमन मेरे वे मित्र जो मुझमे उत्साह भरते है ,वे सभी जो मुझसे प्रेम करते है ,जो मेरी कमियों को दूर करने का प्रयास करते है । साथ ही उन सोशल मीडिया के मित्रो को भी ,जिनसे प्रतियोगी परीक्षा से सम्बंधित जानकारी वा सहयोग मिला ,मिल रहा है । एक बार फिर मेरे जीवन के सभी शिक्षकों को सादर नमन एवं कोटिशः धन्यवाद ।

01/09/2017

भारतीय राष्ट्रीयता क्या है ?
हाल ही में भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमारे राजनैतिक और सांस्कृतिक जगत को शोधित एकांतिकता ने अपने आधिपत्य में ले लिया है। उनका इशारा शायद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी की ओर था। यहाँ जानने वाली बात यह है कि आर एस एस कोई ऐसी नई संस्था नहीं है, जिसकी विचारधारा से देश की जनता अपरिचित हो, और न ही भाजपा कोई ऐसा राजनैतिक दल है, जो पहली बार सत्ता में आया हो।
गैार करने की बात है कि 1967 में भी भाजपा ने सीपीआई के साथ मिलकर सरकार का गठन किया था। ऐसे कई अवसर आए हैं, जब उसने अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई है।
श्री अंसारी का कथन भारत की एकता और उसकी सभ्यता की आधारभूत विचारधारा के विरूद्ध पश्चिम राष्ट्रवाद के विचार से प्रभावित लगता है। भारतीय राष्ट्रीयता का सूत्र ‘‘अथर्ववेद’’ के ‘पृथ्वी सूक्त’ में मिलता है, जो घोषित करता है कि ‘यह धरा हमारी माता है, और हम इसके पुत्र हैं।’ यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रीयता को चरमपंथियों ने अपना झूला समझ लिया और मजे से उसमें झूलते रहे।
दूसरे, हमारी संविधान सभा में धर्मनिरपेक्षता एवं राष्ट्रीयता को लेकर हुई चर्चाओं की बात भी गौर करने लायक है, क्योंकि यह हमारी राष्ट्रीयता का आधार है और यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी दृष्टिकोण है। इस संदर्भ में बिहार के ताजमुल हुसैन के शब्द गौर करने लायक हैं। उन्होंने कहा था कि ‘भारत के संदर्भ में अल्पसंख्यक की अवधारणा अनुचित है, क्योंकि भारतीय इतिहास में बहुसंख्यक वर्ग ने कभी अत्याचार नहीं किया है।’
इसी प्रकार संविधान सभा के उप सभापति एच.सी.मुखर्जी ने भी चेतावनी दी थी कि ‘धर्म के नाम पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देना, ‘‘एक जन, एक राष्ट्र’’ की भावना पर आघात करना होगा।’ परन्तु स्व्तंत्रता के पश्चात् भारतीय राजनीति ने ‘‘एक जन, एक राष्ट्र’’ के सिद्धांत की उपेक्षा करते हुए पश्चिमी परिभाषाओं एवं अनुभवों को अपनाना प्रारंभ कर दिया।
अनेकता या बहुलवाद के नाम पर मिलने वाले विशेषाधिकारों का केवल लाभ उठाकर धर्मनिरपेक्षता एवं राष्ट्रीयता की रक्षा नहीं की जा सकती। इसकी रक्षा तभी की जा सकती है, जब प्रत्येक समुदाय बराबर से नवीनता एवं बहुसंस्कृतिवाद के विचार को सुदृढ़ करने के लिए तैयार खड़ा हो। मुस्लिम आक्रमणों के दौरान हिन्दुओं ने भी असहिष्णुता सही है। सांस्कृतिक राष्ट्रीयता तो अनेकता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले प्रजातंत्र पर आधारित है। वह इसकी राह में रोड़ा नहीं है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से पहले भी सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की विचारधारा के अनेक समर्थक रहे हैं, जिनमें अरविंद घोष, बी.सी.पाल, बाल गंगाधर तिलक तथा लाला लाजपत राय आदि थे। आधुनिक भारत के सूत्र कहीं-न-कहीं हमारे प्रगतिवादी प्राचीन इतिहास एवं सांस्कृतिक-बौद्धिक विरासत से जुड़े हैं। सन् 1948 में अलीगढ में नेहरूजी द्वारा दिए गए एक भाषण में भी ऐसी ही झलक दिखाई पड़ती है। उन्होंने कहा था-‘‘मैं अपने पूर्वजों के लिए गौरवान्वित महसूस करता हूँ, जिन्होंने भारत को सांस्कृतिक एवं बौद्धिक प्रतिष्ठा दी। क्या आपको लगता है कि आप भी इसका हिस्सा हैं और यह आपका भी उतना ही है, जितना कि मेरा है। या फिर आप इससे बेगाना महसूस करते हैं?’’
स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे भारत के मुस्लिम बौद्धिक वर्ग ने नेहरूजी द्वारा उठाए प्रश्नों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। उन्होंने ताजमुल हुसैन जैसे नेताओं की भूमिका को अल्पसंख्यकों के अधिकारों का विनाशक बताना शुरू कर दिया। हामिद अंसारी जैसे लोग बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक के भेद के अधीन जीने वाले लोग हैं। वे इसी को धर्मनिरपेक्षता के लिए अनिवार्य मानते हैं, जबकि आरएसएस हमारे राष्ट्र के इतिहास को ध्यान में रखते हुए इस भेद को अपमानजनक मानता है। यहाँ कार्लटन हे के विचार उद्धृत किए जा सकते हैं कि ‘किसी राष्ट्र को उसकी छाप, उसका चरित्र, उसकी वैयक्तिकता उसकी अपनी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक ताकतों से मिलती है।’ अतः भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अनुदार कहना वर्षों से एकत्रित किए गए उसके मूल्यों का अवमूल्यन करना है।

31/08/2017

आधारभूत परिवर्तन का दौर -
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल के तीन वर्षों में एक बात साफ उभरकर सामने आ चुकी है कि परिवर्तन इस सरकार का मूलमंत्र है। परन्तु ये परिवर्तन मात्र दिखावटी हैं या इनमें प्रतिमान विस्थापन की क्षमता है, यह बात देखने वाली है। समय के साथ इस सरकार की एक बात स्पष्ट होती जा रही है कि चाहे इसके द्वारा लाए गए परिवर्तन धरातल के स्तर पर बदलाव ला सकें या नहीं, परन्तु एक बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि ये वैचारिक स्तर पर परिवर्तन लाने वाले अवश्य हैं।
बी.जे.पी की पूर्व सरकारों ने भी नेहरूवादी विचारधारा पर काम किया था। परन्तु वर्तमान में स्थिति कुछ भिन्न है। नेहरूवादी विचारधारा का स्थान हिन्दुत्व के एक नए रूप ने ले लिया है। नए हिन्दुत्व की विचारधारा का प्रभाव भारत की घरेलू और विदेश नीतियों, विवाद-निराकरण और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
आधारभूत परिवर्तन की प्रकृति
अभी तक उदारवादी वामपंथी तथा नेहरूवादी विचारधारा का अनुकरण करने वाले लोग सामाजिक-राजनैतिक अनुक्रम का पारंपरिक रूप से उपभोग करते चले आ रहे थे। यह वर्ग लगातार राज्य का संरक्षण प्राप्त किए हुए था और सारी जनता की भी आस्था इसके प्रति समर्पित थी। परन्तु अब मामला उलट गया है। हिन्दुत्व की विचारधारा उफान पर है और बहुत से पारम्परिक उदारवादी वामपंथियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोना शुरू कर दिया है।
हमारे देश में अल्पसंख्यकों की भूमिका में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण न करने की नीति से यह सिद्ध होता है कि अल्पसंख्यकों को सामान्य नागरिकों की तरह ही रहना होगा। अन्यथा उन्हें द्वितीय श्रेणी नागरिकों की तरह देखा जाएगा।
इस नई हिन्दुत्व विचारधारा में घरेलू विवादों का समाधान जिस प्रकार वाक्पटुता और सैनिक नीतियों से करना शुरू किया गया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि यह मेल-मिलाप के संवेदनशील राजनैतिक दांवपेंचों से परे, राष्ट्र-निर्माण के लिए आक्रामक तरीके अपनाने से भी परहेज नहीं करेगी।
इस विचारधारा का प्रभाव प्रधानमंत्री की विदेश एवं सुरक्षा नीतियों में भी देखा जा सकता है। अपनी क्षमता और शक्ति का दिखावा, इस नए हिन्दुत्व की दीर्घस्थायी प्रकृति है। उसकी हर व्यवस्था में यह अधिक बढ़ती ही दिखाई देती है। चीन एवं पाकिस्तान के प्रति इसका दृष्टिकोण ही इसका प्रमाण है।
विचारधारा में आ रहे मौलिक परिवर्तन का प्रभाव सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन पर बहुत अधिक पड़ा है। यह ऐसा प्रभाव है, जो हमें असामान्य लगता है या शायद यह हमारे लिए नया है। परन्तु अपनी तरह के हिन्दू-धर्म रक्षकों द्वारा किसी मुसलमान की हत्या का जो प्रभाव हम पर पड़ रहा है, वह प्रभाव अपने आसपास फैली गरीबी और हमारी शर्मनाक जाति-व्यवस्था को देखकर क्यों नहीं पड़ता? ऐसा लगता है कि हम इसके आदी हो चुके हैं। हमने इसे ऐसे ही अपना लिया है। इसलिए यह गलत नहीं लगता।
कांग्रेस की उत्तराधिकारी सरकारों और यहाँ तक कि बाजपेयी सरकार ने भी हमारी उच्च शिक्षा एवं बुद्धिजीवी वर्ग पर चले आ रहे उदारवादी वामपंथी विचारधारा के प्रभाव का शमन करने के लिए कोई प्रयास नहीं किए, बल्कि वे उनके सहयोजक बने रहे। परन्तु वर्तमान सरकार ने इससे प्रतिरोध दिखाना प्रारम्भ कर दिया है।
मोदी सरकार की कश्मीर नीति में भी आधारभूत परिवर्तन की झलक मिलती है। पूर्व सरकारों ने कश्मीरियों को राजनैतिक सुलह के माध्यम से शांत रखने की कोशिश की थी। परन्तु वर्तमान सरकार ने कश्मीर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी के माध्यम से उन सब पर शिकंजा कसने की शुरूआत कर दी है, जो वहाँ आतंकवाद को पनपाने की जड़ बने हुए हैं। जबकि पहले की सरकारों ने इनका तुष्टिकरण किया है।
आधारभूत परिवर्तन के साथ ही उथल-पुथल, उलझन, असमंजस और असहजता के दौर स्वाभाविक रूप से आते हैं और आज हमें उसके प्रमाण मिल रहे हैं। चूंकि इन परिवर्तनों की प्रकृति धु्रवीकरण से संबंद्ध है, अतः इन सबके बीच वैचारिक मतभेद, क्षेत्रीय भिन्नता एवं छिटपुट झड़प होना वांछनीय सा है। अगर हमारे पारम्परिक विचारधारा के समर्थक इन परिवर्तनों को अवशोषित करके इनके अनुगामी बन जाएं, तो इन परिवर्तनों का प्रभाव कई गुना सकारात्मक हो सकेगा।

19/08/2017

1). In India GST came effective from July 1st, 2017. India has chosen _________ model of dual – GST.
a) USA
b) UK
c) Canadian
d) China
e) Japan
Answer: (C).

2). How many countries have dual – GST model?
a) 5
b) 8
c) 10
d) 14
e) None of these
Answer: (E). Till now Canada only has dual GST model but now India also started to use dual-GST model.

3). Which of the following country is the first one to implement GST?
a) USA
b) France
c) China
d) Switzerland
e) Germany
Answer: (B). France implemented GST in 1954.

4). Around how many countries adopted GST?
a) 90
b) 120
c) 140
d) 160
e) 200
Answer: (D).

5). Which of the following country has the maximum GST tax slab?
a) Greece
b) China
c) USA
d) Australia
e) India
Answer: (E). India has the maximum tax slab (28%) compared to other countries.

6). Which of the following country has the second highest tax slab?
a) Australia
b) Netherland
c) Argentina
d) Ireland
e) South Korea
Answer: (C). Argentina has the second highest tax slab 27%

7). Indian GST model has _________rate structure.
a) 3
b) 4
c) 5
d) 6
e) 2
Answer: (B). In India GST model has 4 rate structure. They are 5%, 12%, 18% and 28%

8). How many types of taxes will be in Indian GST?
a) 2
b) 3
c) 4
d) 5
e) 6
Answer: (B). Central GST (CGST), State GST (SGST) and IGST are three types of taxes.

9). What does “I” stands for in IGST?
a) International
b) Internal
c) Integrated
d) Intra
e) Innovation
Answer: (C).

10). The tax IGST charged by _________Government.
a) Central
b) State
c) Concerned department
d) Both a and b
e) All a, b and c
Answer: (A).

11). The maximum rate prescribed under IGST is _________.
a) 5%
b) 12%
c) 18%
d) 28%
e) No such limit
Answer: (D).

12). In India GST was first proposed in _________.
a) 1993
b) 1996
c) 1999
d) 2000
e) 2002
Answer: (D).

13). GST is a _________ based tax on consumption of goods and services.
a) Duration
b) Destination
c) Dividend
d) Development
e) Destiny
Answer: (B). main objective of GST is eliminate excessive taxation

14). GST comes under which amendment bill?
a) 118
b) 120
c) 122
d) 115
e) 129
Answer: (C).

15). Under which Act GST was introduced?
a) 100
b) 101
c) 102
d) 103
e) 104
Answer: (B)

16). GST council formation based on Article number _________.
a) 279A
b) 289A
c) 266A
d) 255A
e) 286A
Answer: (A)

17). The headquarters of GST council is _________.
a) Mumbai
b) New Delhi
c) Ahmadabad
d) Hyderabad
e) Lucknow
Answer: (B).

18). Who is the chairman of GST council?
a) President of India
b) Prime Minister
c) Finance Minister
d) RBI Governor
e) Finance secretary
Answer: (C). Arun Jaitley is the current chairman of GST council

19). _________ is GST Finance Ministers Panel Chairman.
a) Amit Mishra
b) Amit Malhodra
c) Amit Chandresekar
d) Amit Sastri
e) Amit kohli
Answer: (A). Amit Mishra (West Bengal Finance Minister) is the Finance Ministers Panel Chairman.

20). _________ is the first state to ratify GST bill.
a) Andhra Pradesh
b) Assam
c) Arunachal Pradesh
d) Bihar
e) Telangana
Answer: (B)

21). _________ is the first state that passed GST Bill.
a) Andhra Pradesh
b) Gujarat
c) Uttar Pradesh
d) Bihar
e) Telangana
Answer: (E).

22). GST threshold limit of North Eastern States is _________ lakh
a) 5
b) 10
c) 12
d) 15
e) 20
Answer: (B).

23). GST threshold limit of Normal States is _________ lakh
a) 12
b) 15
c) 20
d) 25
e) 30
Answer: (C).

24). The Central Board of Excise and Customs (CBEC) announced that every year _________ will be considered as GST Day.
a) April 1
b) March 1
c) June 1
d) July 1
e) January 1
Answer: (D)

25). Smart Phones will be taxed at _________ under GST.
a) 0%
b) 5%
c) 12%
d) 18%
e) 28%
Answer: (C).

26). Under GST, Insurance is taxed _________ percent.
a) 0%
b) 5%
c) 12%
d) 18%
e) 28%
Answer: (D).

27). Which of the following comes under sin tax?
a) Pan Masala
b) To***co
c) Alcohol
d) Both a and c
e) All a, b and c
Answer: (E).

28). A special purpose vehicle _________ has been launched to cater the needs of GST.
a) GSTC
b) GSTN
c) GSTM
d) GSTR
e) GSTS
Answer: (B). GSTN - Goods and Service Tax Network.

29). GSTN comes under which Act?
a) Banking Regulation Act 1949
b) RBI Act 1934
c) Indian Partnership Act, 1932
d) Limitation Act, 1963
e) Companies Act, 2013
Answer: (E).

30). Combined Stake of Central and State Government in GSTN is _________.
a) 20%
b) 25%
c) 49%
d) 51%
e) 100%
Answer: (C). The remaining 51% stake is divided among five financial institutions—LIC Housing Finance with 11% stake and ICICI Bank, HDFC, HDFC Bank and NSE Strategic Investment Corporation Ltd with 10% stake each.

31). What does N stands for in HSN?
a) Network
b) Nationalization
c) Nominee
d) Nomenclature
e) Nomination
Answer: (D). HSN - Harmonized System of Nomenclature. HSN code will be used for classifying under the GST regime.

32). Coal comes under which rate Structure?
a) 0%
b) 5%
c) 12%
d) 18%
e) 28%
Answer: (C).

14/08/2017

इज़राइल ने पहला पर्यावरण अनुसंधान सेटेलाईट ‘वीनस’ प्रक्षेपित किया

वीनस इज़राइल द्वारा प्रक्षेपित किया गया पहला पर्यावरण अनुसंधान सेटेलाईट है. इसे 02 अगस्त 2017 को फ्रेंच गुयाना से प्रक्षेपित किया गया.

वीनस नाम से इस सेटेलाईट को इज़राइल की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी तथा फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर स्पेस स्टडीज़ (सीएनईएस) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है.

वीनस को इस श्रेणी का विश्व का सबसे छोटा सेटेलाईट माना जा रहा है. यह मृदा, वनस्पति, जल, कृषि, पानी और वायु की गुणवत्ता और पर्यावरण के अन्य पहलुओं का अध्ययन करने के लिए वृहद क्षेत्रों का सर्वेक्षण और निगरानी करने के लिए तैयार किया गया है.

वीनस की मुख्य विशेषताएं

• वीनस माइक्रो-सेटेलाईट द्वारा वनस्पति और पर्यावरण निगरानी का कार्य करेगा.

• इसे वेगा प्लेटफार्म पर लॉन्च किया गया. इसका भार केवल 265 किलोग्राम है.

• वीनस ने पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने के लिए एक घंटा 37 मिनट एवं 18 सेकेंड का समय लिया. इसके अतिरिक्त इसने 720 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद सूर्य-सिंक्रनाइज़ कक्षा तक पहुंचने के दो दिन का समय लिया.

• इस सेटेलाईट द्वारा ली गयी तस्वीरें एक सप्ताह बाद पृथ्वी पर पहुचेंगी.

• यह सेटेलाईट अगले साढ़े चार वर्षों तक ऊपरी कक्षा में रहेगा इसके बाद यह निचली कक्षा में स्थानांतरित हो जायेगा.

• वीनस 48 घंटों में 29 बार घूर्णन पूरा करेगा.

• यह प्रत्येक दिन दर्जनों फोटो लेगा तथा प्रत्येक फोटो 730 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र को कवर करेगी.

• यह सेटेलाईट प्रत्येक दो दिन बाद उसी क्षेत्र की फोटो लेगा जिससे यह उस क्षेत्र के पर्यावरण में होने वाले बदलावों का पता लगा सकेगा.

• प्रत्येक फोटो को 12 भिन्न सेंसरों की मदद से तथा अलग-अलग वेव लेंग्थ से लिया जायेगा. इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक फोटो में 12 अलग-अलग तरह का डाटा मौजूद रहेगा.

• वीनस में असंख्य रंगों की मौजूदगी के कारण यह उन तस्वीरों को भी ले सकेगा जिन्हें मानव आँखों द्वारा देखा नहीं जा सकता.
Source - Jagran Josh

14/08/2017

मुख्यमंत्री भारतीय राज्य की कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होता है। वह राज्य विधानसभा का नेता होता है।

इन्हें भी देखें: भारत के राज्यों के वर्तमान मुख्यमंत्रियों की सूची एवं भारत के राज्यों के वर्तमान राज्यपालों की सूची

नियुक्ति

मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत की जाती है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति या तो आम चुनाव के बाद करता है या फिर तब करता है, जब मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने के कारण या बर्ख़ास्त कर दिये जाने के कारण उसका पद रिक्त हो जाता है। आम चुनाव में किसी एक ही दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त हो जाये और उस दल का कोई निर्वाचित नेता हो, तब उसे मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करना राज्यपाल की संवैधानिक बाध्यता है। यदि मुख्यमंत्री अपने दल के आन्तरिक मतभेदों के कारण त्यागपत्र देता है, तो उस दल के नये निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया जाता है। चुनाव में किसी पक्ष के बहुमत प्राप्त न करने की स्थिति में या मुख्यमंत्री की बर्ख़ास्तगी की स्थिति में राज्यपाल अपने विवेक से मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और उसे नियत समय के अन्दर विधानसभा में बहुमत साबित करने का निर्देश देता है।

योग्यता

मुख्यमंत्री पद के लिए संविधान में कोई योग्यता विहित नहीं की गयी है, लेकिन मुख्यमंत्री के लिए यह आवश्यक है कि वह राज्य विधानसभा का सदस्य हो। इस प्रकार मुख्यमंत्री में राज्य विधानसभा के सदस्य की योग्यता होनी चाहिए। राज्य विधानसभा का सदस्य न होने वाला व्यक्ति भी मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि वह 6 मास के अन्तर्गत राज्य विधानसभा का सदस्य निर्वाचित हो जाये। 21 सितम्बर, 2001 को उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार किसी सज़ायाफ़्ता को मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य माना जाएगा।

कर्तव्य तथा अधिकार

राज्य मंत्रीपरिषद

मुख्यमंत्री के कर्तव्य तथा अधिकार निम्नलिखित हैं–

वह राज्य के शासन का वास्तविक अध्यक्ष है और इस रूप में वह अपने मंत्रियों तथा संसदीय सचिवों के चयन, उनके विभागों के वितरण तथा पदमुक्ति और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों एवं महाधिवक्ताऔर अन्य महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए राज्यपाल को परामर्श देता है।

राज्य में असैनिक पदाधिकारियों के स्थानान्तरण के आदेश मुख्यमंत्री के आदेश पर जारी किये जाते हैं तथा वह राज्य की नीति से सम्बन्धित विषयों के सम्बन्ध में निर्णय करता है।

वह राष्ट्रीय विकास परिषद में राज्य का प्रतिनिधित्व करता है।

मुख्यमंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है तथा सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त का पालन करता है। यदि मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य मंत्रिपरिषद की नीतियों से भिन्न मत रखता है, तो मुख्यमंत्री उसे त्यागपत्र देने के लिए कहता है या राज्यपाल उसे बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश कर सकता है।

वह राज्यपाल को राज्य के प्रशासन तथा विधायन सम्बन्धी सभी प्रस्तावों की जानकारी देता है।

यदि मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य ने किसी विषय पर अकेले निर्णय लिया है, तो राज्यपाल के कहने पर उस निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रख सकता है।

वह राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सलाह देता है।

पद विमुक्ति

सामान्यत: मुख्यमंत्री अपने पद पर तब तक बना रहता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास मत प्राप्त रहता है। अत: जैसे ही उसका विधानसभा में बहुमत समाप्त हो जाता है, उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए। यदि वह त्यागपत्र नहीं देता है, तो राज्यपाल उसे बर्ख़ास्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री निम्नलिखित स्थितियों में बर्ख़ास्त किया जा सकता है–

यदि राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा का अधिवेशन बुलाने तथा उसमें बहुमत सिद्ध करने की सलाह दे और यदि राज्यपाल के द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर मुख्यमंत्री विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के लिए तैयार नहीं हो, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्ख़ास्त कर सकता है।

यदि राज्यपाल अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता या राष्ट्रपति को अन्य स्रोतों यह समाधान हो जाए कि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति मुख्यमंत्री को बर्ख़ास्त करके राज्य का शासन चलाने का निर्देश राज्यपाल को दे सकता है।

जब मुख्यमंत्री के विरुद्ध राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो जाए और मुख्यमंत्री त्यागपत्र देने से इन्कार कर दे, तब राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्ख़ास्त कर सकता है।

मंत्रिपरिषद का गठन

मंत्रिपरिषद का गठन राज्यपाल के द्वारा किया जाता है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर वह मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। मंत्रिपरिषद में सामान्यत: उन्हीं व्यक्तियों को शामिल किया जा सकता है, जो राज्य विधानसभा या राज्य विधान परिषद के सदस्य हों, लेकिन विशेष परिस्थिति में मंत्रिपरिषद में ऐसे व्यक्तियों को भी शामिल किया जा सकता है, जो राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न हो। इस प्रकार नियुक्त किये गये मंत्रिपरिषद के सदस्य को विधनसभा या विधान परिषद का सदस्य 6 माह के अन्दर बनना आवश्यक है। यदि 6 माह के अन्दर वह विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं बन जाता है, तो उसके पद ग्रहण की तिथि से 6 माह की समाप्ति पर स्वत: उसका मंत्री पद रहना समाप्त हो जाता है। परन्तु संविधान में यह व्यवस्था नहीं दी गयी है कि ऐसा व्यक्ति इस्तीफ़ा देकर पुन: मंत्रिपरिषद का सदस्य बन सकता है या नहीं। सरकार ने इस अस्पष्ट प्रावधान का लाभ उठाते हुए उस व्यक्ति को पुन: मंत्रिपरिषद में शामिल कर लेते थे। अब 16 अगस्त, 2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए व्यवस्था दी कि विधायिका का सदस्य निर्वाचित हुए बिना कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक मंत्री पद धारण नहीं कर सकता। यदि इस व्यक्ति को छह महीने के बाद विधायिका के उसी सत्र में मंत्री पद पर दोबारा बहाल किया जाता है तो आवश्यक है कि वह चुनाव जीत कर सदन का सदस्य बने। यदि मंत्री पद पर आसीन गैर निर्वाचित व्यक्ति दिये गये छह महीने की अवधि में चुनाव जीतने में असफल रहता है और उस व्यक्ति को दुबारा मंत्री पद पर बहाल किया जाता है तो यह संविधान के 164(1) और 164(4) की योजना और भावना पर आघात होगा।

मंत्रिपरिषद का आकार

प्रारम्भ में संविधान में यह निर्धारित नहीं था कि राज्य मंत्रिपरिषद का आकार क्या होगा। इसका निर्धारण मुख्यमंत्री अपने विवेक से करता था। परन्तु 91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2004 के अनुसार यह निर्धारित कर दिया गया है कि राज्य मंत्रीपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या राज्य विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत अधिक नहीं होगी।

मंत्रीपरिषद की पदावधि

मंत्रिपरिषद तब तक कार्यरत रहता है, जब तक मुख्यमंत्री पद पर रहता है। मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने या बर्ख़ास्त होने से मंत्रिपरिषद का स्वत: ही विघटन हो जाता है।

14/08/2017

📰 हिंदू संपादकीय 📰

उपेक्षा की मजदूरी: गोरखपुर त्रासदी एक शीघ्र जांच और एक holisitic स्वास्थ्य देखभाल ओवरहाल की मांग

उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख रेफरल अस्पताल में कुछ दिनों की अवधि में 60 से ज्यादा बच्चों की मौत ने देश के विवेक को झटका लगाया है। यह पूरी तरह से रोके जाने वाली त्रासदी थी यह स्थापित करने के लिए स्वतंत्र जांच की जाएगी कि 7 अगस्त और 11 अगस्त के बीच गोरखपुर में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत क्यों हो गई। इस तरह की जांच से जांच की जानी चाहिए कि उन लोगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति का कितना नुकसान हुआ है, जो बेहद बीमार थे। लोगों की मृत्यु। यह कि दो घटनाएं पूरी तरह से असंबंधित नहीं थीं, अप्रत्यक्ष रूप से आपातकालीन ऑक्सीजन की आपूर्ति की मांग के साथ अप्रत्यक्ष रूप से पुष्टि हुई थी और राज्य सरकार ने कॉलेज के प्रिंसिपल को निलंबित कर दिया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का तत्काल दावा है कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कोई मौत नहीं हुई थी क्योंकि यह किसी भी प्रशासनिक जांच से छेड़छाड़ करेगी। आखिरकार, ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी ने बड़े अवैतनिक बिलों पर अस्पताल को नोटिस जारी किया था, संकट की चेतावनी दी थी। केवल एक उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की विश्वसनीयता होगी। कि राज्य सरकार द्वारा कोई सबक नहीं सीखा गया है और केंद्र उत्तर प्रदेश में विशेषकर पूर्वी जिलों में बीमारी और मृत्यु के निरंतर वार्षिक चोटियों से स्पष्ट है: डेटा बताता है कि जापानी एन्सेफलाइटिस, जो पिछले सप्ताह की मृत्यु के कई बच्चों को पीड़ित था, ने राज्य में 1 9 78 के बीच 10,000 से अधिक लोगों का दावा किया है, पहले प्रमुख प्रकोप के वर्ष, और 2005. उच्च मृत्यु के बाद के वर्षों में भी देखा गया है। लगभग दो दशकों तक गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सांसद के रूप में, श्री आदित्यनाथ महामारी से बहुत ही परिचित थे, जिसने अपने निर्वाचन क्षेत्र को अक्सर बार-बार बिगाड़ दिया था। पिछली राज्य सरकारों ने इस समस्या का समाधान करने के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन यह त्रासदी के प्रति श्री आदित्यनाथ का जवाब नहीं हो सकता।

घातक या अपंग रोगों की घटनाओं को कम करने के लिए मजबूत मेडिकल बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है, जिनकी सरकारें जल्दी से बना सकती हैं, अगर उनकी इच्छा होती है यू.पी. के मामले में, महामारी की जड़ें कमजोर सामाजिक निर्धारकों जैसे कि आवास और स्वच्छता में होती हैं, जो पारिस्थितिक परिवर्तनों के साथ मिलती हैं। एन्सेफलाइटिस चार दशक पहले सिंचाई और बांधों के निर्माण के विस्तार से संबंधित है, जिसके परिणामस्वरूप रोग बढ़ने वाली मच्छरों में वृद्धि हुई है। सूअरों और पक्षियों के निकटता वायरल ट्रांसमिशन मार्गों का निर्माण किया। केंद्र में जगह पर एक टीकाकरण कार्यक्रम और प्राथमिकता वाले जिलों में बाल चिकित्सा केन्द्रों की देखभाल के लिए एक प्रतिबद्धता है, लेकिन इनका महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं है। जिस तरह से यू.पी. के लिए एक विशेष आयोग का शुभारंभ करने के लिए भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद के लिए होगा, इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में माना जाएगा। केंद्र और राज्यों के लिए यह भी एक उचित क्षण है कि वे अपने खराब रिकॉर्ड पर विचार करें। वे अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं जैसे कि पड़ोसी थाईलैंड और कुछ अफ्रीकी देशों को सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए आगे बढ़ते हैं। ऐसी प्रणाली गैर-व्यावसायिक और लागतों को नियंत्रित करने के लिए विनियमित होनी चाहिए, जिससे चिकित्सकों, नैदानिक ​​और उपचार के लिए हर कोई सस्ती पहुंच प्रदान करे।

12/07/2017

विश्व के अधिकांश देश प्रजातंत्र और मांग पर ध्यान केन्द्रित करके अपनी सरकार चलाते हैं। लेकिन भारत में परिदृश्य कुछ भिन्न है। भारत की जनसंख्या में 20 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की संख्या 41 प्रतिशत के करीब है। यह भारत के लिए प्रजातांत्रिक सूद का काम कर रही है। 2020 तक तो भारत शायद विश्व के सबसे युवा देश के रूप में देखा जाने लगेगा। अगले तीन दशकों में भारत में कामकाजी लोगों की संख्या एक तिहाई बढ़ जाने की उम्मीद है, जबकि चीन और एशिया में यह 20 प्रतिशत कम हो जाएगी। लेकिन भारत को इस युवा पीढ़ी का लाभ तभी मिल सकेगा, जब वह इस वर्ग को उत्पादक कार्यों में लगा सके।

अभी तक की स्थिति
भारत सरकार के श्रमिक ब्यूरो के रोजगार व बेरोजगारी पर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत की युवा पीढ़ी को काम पर लगाने के लिए प्रतिवर्ष कम से कम एक करोड़ रोजगार उत्पन्न करने की आवश्यकता है। परन्तु 2012 से 2016 तक इस लक्ष्य की पूर्ति नहीं की जा सकी थी।

युवा पीढ़ी के फायदे और नुकसान
युवा पीढ़ी की अधिकता के साथ अगर रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध न हों, तो यह विनाशकारी हो सकता है। शिकागो काउंसिल में पत्रकार फरीद जकारिया ने कहा था कि ‘किसी देश या समाज में अस्थिरता या खतरा दिखाई देने पर यह देखा जाना चाहिए कि उस देश में युवा कितने हैं।’ उन्होंने फ्रेंच और ईरानी क्रांतियों के पीछे भी इसी तथ्य का हवाला दिया था।इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। आज भारत में अनेक आतंकवादी संगठन पैर फैलाते जा रहे हैं। आतंकवादरोधी अंतरराष्ट्रीय केन्द्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा नामक आतंकी समूह बहुत सक्रिय है। हालांकि अलेस्टर रीड के आकलन के अनुसार भारत में अलकायदा विफल हो चुका है, परन्तु यहाँ फैली बेरोजगारी, जो कि भविष्य में एक क्रांति का रूप ले सकती है, के कारण भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता को खतरा हो सकता है।

विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती भारत की अर्थव्यवस्था में अस्थिरता के कारण एशिया और पश्चिमी देशों में हलचल मच सकती है। जैसा कि चीन की गतिविधियों से साफ नजर आ रहा है कि वह एशिया में अपने प्रभुत्व को स्थापित करने और यहाँ से अमेरिकी जड़ों को उखाड़ फेंकने के लिए जुझारू है। ऐसे में एक भारत ही ऐसा देश है, जो चीन-पाकिस्तान के ‘‘वन बेल्ट वन रोड’’ के धु्रव से बाहर खड़ा होकर अमेरिका से हाथ मिलाने की हिम्मत कर रहा है और इस प्रकार चीन को तानाशाह बनने से रोक रहा है।दुर्भाग्यवश पश्चिमी देशों में हाल-फिलहाल में बदली नीतियों ने भारत की बेरोजगारी की समस्या को थोड़ा जटिल कर दिया है। इससे भारत का आई टी उद्योग दबाव में आ गया है। अगर स्थिति यही रही, तो हो सकता है कि भारत के इन आई टी उद्योगों को कर्मचारियों की बहुत ज्यादा छंटनी करनी पड़े। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को घरेलू नीतियों में तेजी से बदलाव लाने होंगे।

भारत के इतिहास में बेरोजगारी सदा ही अनसुलझी समस्या रही है। मोदी सरकार ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए पहले ही कुशल भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं चला दी हैं।दूसरी ओर ट्रंप सरकार के लिए भी एक द्वंद्व की स्थिति है। वह या तो भारत से अपने रिश्तों के माध्यम से एशिया पर पांव जमाए रखे या फिर अमेरिका को अमेरिकियों के लिए सीमित करके कुछ हजार नौकरियाँ बचा ले। भारत को अपनी भूमि पर ही रोजगार उत्पन्न करने के लिए मूलभूत सुधार करने होंगे। तभी बात बन सकती है।

15/02/2017

आईएएस टॉपिक-
31 दिसम्बर 2016 को बेंगलरू की सड़कें शायद औरतों के लिए सबसे भयावह बन गई थीं। नए साल की पूर्व रात्रि को वहाँ महिलाओं की शालीनता को जिस तरह से भंग किया गया, उससे पूरा देश विचलित हो गया था।
इस प्रकार की घटनाएं समय-समय पर विदेशों में भी घटित होती रही हैं। 2005 में मिस्त्र के तहरीर स्क्वायर में और 2015 में जर्मनी के कोलोन में भी ऐसी दुर्घटनाएं हुई हैं। लेकिन भारत जैसे देश में; जहाँ स्त्री को देवी का अवतार समझा जाता है तथा माँ, बहन एवं बेटी को इज्जत की नज़रों से देखा जाता है, वहाँ ऐसा होना लज्जाजनक एवं असहनीय है।दरअसल, अभी तक पुरूष नैतिक दायित्व के उस बोझ से परे एक ऐसी जिंदगी जीते आए हैं, जहाँ उनकी दूषित कामोउत्तेजना के लिए कभी उन्होंने सदाचार दिखाने की कोई जरूरत ही नहीं समझी। ख़ास तौर पर भारत में घटने वाली ऐसी घटनाओं के प्रति किशोरों से लेकर पुरूषों तक की संवेदना जोर नहीं मारती। ऐसा लगता है, जैसे ये उन्हें अपने दादा-परदादा से विरासत में मिला है कि वे नारी को सम्मान या उपभोग करने वाली वस्तु से अधिक कुछ न समझें।
हमारी करोड़ों की जनसंख्या में लगभग 58.6 करोड़ की जनसंख्या के प्रति अब राजनीतिक शक्तियों और आम जनता को जागृत होना होगा और नारी के सम्मान के लिए कमर कसनी होगी।
सबसे पहले तो हमारे परंपरागत पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढांचे और रूढ़िवादी सोच से अलग, पुरूषों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी, जो महिलाओं के प्रति संवेदनशील हो; एक ऐसी पीढ़ी; जो अपनी आगामी पीढ़ी को भी अपनी यह संवेदनशीलता विरासत में दे सके। यहाँ एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि यह संवेदनशीलता केवल पारिवारिक स्तर तक सीमित न रहकर समाजव्यापी हो।
यह बदलाव ऐसा हो, जो वैश्वीकरण से उपजी स्त्री-देह-व्यापार और उनके अश्लील चित्रण जैसी बुराइयों के खिलाफ लड़ाई न सही, लेकिन एक माहौल तैयार करने में सक्षम हो।
सरकार को चाहिए कि वह विद्यालयीन स्तर से ऐसी शिक्षा की शुरूआत करे, जिससे लिंग-भेद एवं यौन-हिंसा के प्रति घृणा की भावना पैदा की जा सके। लिंग आधारित संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए यह बेहतर हथियार हो सकता है।
हमारे देश में महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलों की संख्या को देखते हुए कड़े कानून बनाए जाने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। इस क्षेत्र में अपराध और हिंसा की भयावहता को देखते हुए कानून की पकड़ बहुत प्रभावी नहीं लगती। हांलाकि 2012 के दिल्ली गैंग रेप के मामले के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 354 में अनेक बदलाव किए गए हैं। इसकी मदद से ऐसे अपराधियों पर कड़ाई से शिकंजा कसा जा सका है।
अत्यधिक यौन-हिंसा वाले मामलों के लिए फास्ट ट्रैक न्यायालय एवं कठोरतम दंड का प्रावधान कुछ मददगार हो सकते हैं।
इन सबसे ऊपर, यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं के प्रति पुलिस और आम जनता के दृष्टिकोण को बदलने की सबसे ज्यादा जरूरत है। अगर भारत को सचमुच अपनी महिलाओं की सुरक्षा की चिंता है और उनके प्रति आदर-सम्मान की भावना है, तो सबसे पहले ऐसे अपराधों के बाद पुलिस की कार्यवाही पर कड़ी नज़र रखी जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जा सकता, तो अभी की तरह ही महिलाओं से संबंधित बहुत से अपराध न तो दर्ज हो पाएंगे या उनका स्वरूप बदलता रहेगा। पुरूषों की मनमानी यूं ही चलती रहेगी।
बदलते सामाजिक परिवेश में महिलाओं की शालीनता को भंग करने की हिम्मत करने वाली मानसिकता का खत्म होना बहुत जरूरी है। यौन-उत्पीड़न से बचने के लिए किसी महिला पर ‘शालीन‘ होने की शर्त को क्यों लादा गया है ? क्या किसी भी महिला को अपने कपड़ों, अपनी स्थिति, स्थान या अपने रवैये से परे सुरक्षित और मर्यादित रहने का हक नहीं है ? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर समझ में आता है कि जब तक हमारे बच्चे और युवा पुरूष अपनी पूर्व पीढ़ी से महिलाओं के सम्मान और मर्यादा की रक्षा करना नहीं सीखेंगे, तब तक हमारा देश समानतावादी नहीं कहा जा सकेगा।

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