23/03/2024
17वें सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यान की कुछ झलकियाँ :
संख्या और सत्ता
चुनावतंत्र के युग में वैधता के बदलते स्वरूप :
"चुनावतंत्र में संख्या (बहुसंख्यक का मत) का महत्व सत्ता प्राप्ति है, इससे श्रेष्ठता का कोई रिश्ता नहीं होता ।...सत्ता केवल निषेधक शक्ति ही नहीं होती बल्कि वह उत्तेजक भी होती है, यह कई प्रकार के कर्त्तापन को उकसाती है ....।"
-सतीश देशपांडे
व्याख्यान का एक अंश टीप टोकरी में दिए गए लिंक को खटका कर सुना जा सकता है :
[पूरा व्याख्यान हम पपक्षधरके अगले अंक में प्रकाशित करेंगे । ]
[तस्वीरें AAmit Mishraकैमरे से]
20/03/2024
हम एक ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जिसमें नफ़रत और पूजा, ये दो ही विकार हमारे मानस को सक्रिय और संचालित करते दिखते हैं । जबकि ये दोनों ही प्रगतिविरोधी होते हैं । और इस अर्थ में समाज विरोधी भी । सत्यप्रकाश मिश्र व्यक्ति पूजा के समर्थक नहीं रहे और नफ़रत के पोषक और प्रचारक तो कतई नहीं । पारस्परिकता में उनका अटूट विश्वास था । हम जानते हैं कि पारस्परिकता में कृतघ्नता की जगह कृतज्ञता का मूल्य होता है । समाज इसी पारस्परिकता से बनते और विकसित होते हैं । व्यक्तिगत गिले-शिकवे सापेक्षिक होते हैं, इसलिए अवसररानुकूल होते हैं ।
सत्यप्रकाश मिश्र ने इलाहाबाद में अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश में लगभग 40-50 सालों तक बहुविध सक्रिय रहते हुए उसे न केवल सक्रिय बनाए और जिलाए रखा, बल्कि एक समय में उसे राष्ट्रीय पटल पर जीवंत किया । इलाहाबाद उनमें इस तरह रचा-बसा था कि बिना इलाहाबाद के वो कहीं और रम नहीं सकते थे । जापान विजिटिंग प्रोफ़ेसर होकर गए, 4 महीने के भीतर ही सब कुछ छोड़छाड़ कर चले आए ।
हम चाहते तो सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला को दिल्ली से कर सकते थे । हमारे लिए सुविधाजनक भी होता । पर, जिसके भीतर इलाहाबाद को लेकर इतनी गहरी तड़प थी, जिससे उसे इस कदर इश्क़ था कि वह इलाहाबाद को किनारे कर कुछ सोच ही नहीं सकता था, उसकी स्मृति में होने वाले व्याख्यान को भला कैसे इलाहाबाद से अन्यत्र करने की हम सोच सकते हैं ।
इस बार का 17 वां व्याख्यान 21 मार्च 2024 को होने जा रहा है । आप सब आएंगे तो हमें, उन सबको जो किसी न किसी रूप में इस व्याख्यानमाला से जुड़े हैं और आप सब जो सत्यप्रकाश जी से जुड़े हैं, साथ होकर अच्छा लगेगा । आइये आपका हमें इंतज़ार रहेगा ।
(सत्यप्रकाश जी का यह स्केच शिरीष भाई के सौजन्य से)
16/01/2023
*अपनी ख़बर कुछ भी नहीं*
शम्अ' है गुल भी है बुलबुल भी है परवाना भी,
रात की रात ये सब कुछ है सहर कुछ भी नहीं ।
सब की है तुम को ख़बर अपनी ख़बर कुछ भी नहीं ।
आज मेरे गुरु और मेंटर प्रसिद्ध आलोचक सत्यप्रकाश मिश्र का जन्मदिन है । सत्यप्रकाश मिश्र यदि आज होते तो 77 के होते | आज उनका 78वाँ जन्मदिन है | सत्यप्रकाश मिश्र के पास समाज और साहित्य को देखने और समझने का एक बेहद मानवीय दृष्टिकोण था जिसमें वे साहित्य की भूमिका को लेकर साफ़ और स्पष्ट थे | वे हमेशा कहते थे कि, "जिस प्रकार हम केवल वोट देकर लोकतंत्र की चिंता दूसरों पर नहीं छोड़ सकते उसी तरह साहित्य केवल 'गलत' पर उँगली मात्र रखकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता |" वे अपने एक सम्पादकीय में लिखते हैं कि, ""साहित्य का कार्य अगर केवल 'विरेचन' मात्र हो जाएगा तो उससे कुछ आलोड़न-विलोड़न होने वाला नहीं, वह तो एक तरह से यथास्थिति को बनाये रखने का ढंग भर है |" विचारों से वे लोहियावादी थे | वे नए से नए साहित्य और विचार के गहन अध्येता थे | उनकी समरण-शक्ति बेजोड़ थी | इलाहाबाद में जिन लोगों ने उन्हें उनकी कक्षाओं में, संगोष्ठियों और बहसों में सुना है वे उनकी बेबाक वक्तृता से परिचित हैं | आत्म -विश्वास सजग सधी हुई दृढ़-बुलंद आवाज़ अनायास ही एक अनुशासन कायम कर देती थी | सत्यप्रकाश जी जितना बाहर से कठोर दिखते थे अन्दर से उतने ही नरम-दिल इंसान थे | येन-केन-प्रकारेण आपकी मदद के लिए तैयार, वह भी बिना आपको इसका एहसास कराये | ऐसे लोगों की नस्ल ही अब ख़त्म होती जा रही है | आज हम अपने गुरु (और पापा) की 78वीं वर्षगाँठ मनाते हुए उन्हें शिद्दत से याद कर रहे हैं | स्व.सत्यप्रकाश मिश्र 'भेड़ियाधसान' 'वानर सत्ता' और 'कनकौवा उड़ाने' की प्रवृत्ति को भारतीय समाज के लिए अत्यंत ही घातक मानते थे । रचना और आलोचना को वे इन प्रवृत्तियों के प्रतिरोध के रूप में देखने के समर्थक थे । आज वे नहीं हैं, उनकी याद और अधिक आ रही है । आज वे होते तो देखते कि ये प्रवृत्तियाँ समाज में और अधिक जड़ता के साथ अपनी जड़ें पसार रही हैं । उनकी स्मृति को नमन । सत्यप्रकाश जी की स्मृति में हर साल होने वाली 'सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला' का 16वां व्याख्यान इलाहाबाद में 27 मार्च को होगा । इस बार का व्याख्यान दलित कथाकार और चिंतक शरण कुमार लिंबाले जी देंगे । इस व्याख्यानमाला के अंतर्गत अब तक नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, मैनेजर पांडेय, हरबंस मुखिया, राधावल्लभ त्रिपाठी, आलोक राय, सुधीर चन्द्र, निर्मला जैन, अशोक वाजपेयी, कृष्ण कुमार, अरुण कमल, राजेन्द्र कुमार, अभय कुमार दुबे, आदित्य निगम, नंदकिशोर आचार्य के व्याख्यान हो चुके हैं । ये सभी व्याख्यान पक्षधर में प्रकाशित हैं और 2020 तक के 13 व्याख्यानों की किताब ‘विचार के वातायन’ नाम से सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है ।
13/01/2021
प्रोफ़ेसर सत्यप्रकाश मिश्र की स्मृति में हर साल होने वाले स्मृति व्याख्यान के 14 वें व्याख्यान में आपकी उपस्थिती सादर प्रार्थित है ।
22/03/2017
स्मृति : प्रोफ़ेसर सत्यप्रकाश मिश्र
सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला का 10 वाँ व्याख्यान, 26 मार्च 2017 को अपराह्न 2.00 बजे, इलाहाबाद संग्रहालय, इलाहाबाद में ।
सत्यप्रकाश मिश्र एक कुशल अध्यापक, प्रखर वक्ता, निर्भीक आलोचक, सजग सम्पादक साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के कर्ता-धर्ता और इन सबसे अलहदा वे एक बहुत ही बेहतर इंसान थे | मित्रता और शत्रुता दोनों को बेहद ईमानदारी से जीने वाले पाक-साफ़ मनुष्य | जिससे मित्रता की उसे ताजीवन किसी भी कीमत पर निभाया | वैसे शत्रु उनके कम थे, नहीं के बराबर थे | पर वे कईयों के इर्ष्या जनित शत्रु-भाव के आलंबन थे | व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था | व्यापक अध्ययन, तीक्ष्ण मेधा, अकाट्य स्मृति और इन सबके सहयोग से निष्पन्न विचार-सजग तार्किक विवेक सत्यप्रकाश जी की आलोचना की विशिष्टता है | उनका आलोचनात्मक विवेक लगातार इसकी तस्दीक करता चलता है, एक उदहारण - " बौद्धिकता या आलोचना पर्याय नहीं हैं और न आलोचना बौद्धिकता का एकमात्र लक्षण है परन्तु बौद्धिकता की एक पहचान के रूप में अवश्य है | बौद्धिक वह तभी बनती है जब उसमें गहरी मानवीय चिंता, आत्मस्थ चिन्तनशीलता और वस्तुपरकता हो | मूल्यहीन बौद्धिकता बाँझ होती है | किन्तु अपनी दृष्टि और सोच पर ही बल देने की बौद्धिक आदत भी जड़ता और अधिनायकवाद को पनपाती है | आलोचना का महत्व इसलिए भी और अधिक बढ़ जाता है | यह मानना कि मानव हित में केवल बौद्धिक व्यक्ति ही सोच सकता है, सांस्कृतिक छल है | बल्कि इतिहास में इसके विपरीत भी प्रमाण देखे जा सकते हैं | दरअसल, मानव हित के बारे में सोचते हुए मानवीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर चौकन्ना रहना बौद्धिक काम है |" ( कृति-विकृति-संस्कृति- सत्यप्रकाश मिश्र ) | स्वर्गीय सत्यप्रकाश की स्मृति को नमन | उनकी स्मृति में हर साल आयोजित व्याख्यानमाला का 10 वाँ व्याख्यान 26 मार्च 2017 को इलाहाबाद में | समय निकाल कर कार्यक्रम में जरूर आएँ | आपको अपने साथ पाकर हमें खुशी होगी ।
सचिव
विनोद तिवारी
सत्यप्रकाश मिश्र साहित्य संस्थान