11/09/2026
सुप्रीम कोर्ट ने BNS की धारा 69 के बारे में बताया: शादी का असली वादा तोड़ने पर धोखे से सेक्स का अपराध नहीं बनता
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज FIR रद्द की। इस धारा में धोखे से (जैसे शादी का झूठा वादा करके) सहमति लेकर सेक्स करने को अपराध माना गया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत से ही पता चलता है कि यह धोखे से बहला-फुसलाकर बनाया गया संबंध नहीं, बल्कि आपसी सहमति से बना संबंध था। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की माँ की इजाज़त न होने के कारण शादी से इनकार करना धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार करते हुए 'दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। याचिकाकर्ता (अपीलकर्ता/आरोपी) पर BNS की धारा 69 के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता से शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में अपनी माँ की असहमति का हवाला देते हुए वादे से मुकर गया। इसके बाद हाई कोर्ट ने उसके खिलाफ मामला रद्द करने की याचिका खारिज की।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि हाईकोर्ट ने 'दीपक गुलाटी' मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया, "यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए कि संबंधित समय पर, यानी शुरुआती चरण में ही, आरोपी का पीड़िता से शादी करने का अपना वादा निभाने का कोई इरादा नहीं था। बेशक, ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब अच्छे इरादे रखने वाला व्यक्ति भी कई अपरिहार्य कारणों से पीड़िता से शादी न कर पाए। भविष्य की किसी अनिश्चित तारीख के लिए किए गए वादे को पूरा न कर पाना - जब इसके कारण उपलब्ध सबूतों से स्पष्ट न हों - हमेशा 'तथ्य की गलतफहमी' (Misconception of Fact) नहीं माना जा सकता।"
"तथ्य की गलतफहमी" (Misconception of Fact) के दायरे में आने के लिए उस तथ्य का तुरंत संबंध होना ज़रूरी है। ऐसी स्थिति में लड़की के काम को पूरी तरह से माफ़ करने और दूसरे व्यक्ति पर आपराधिक ज़िम्मेदारी डालने के लिए IPC की धारा 90 का सहारा नहीं लिया जा सकता, जब तक कि अदालत को यह यकीन न हो जाए कि शुरू से ही आरोपी का उससे शादी करने का कोई इरादा नहीं था। बता दें, भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC, जो अब BNS की धारा 28 है) की धारा 90 डर या गलतफहमी में दी गई सहमति से संबंधित है।