09/12/2019
क्या था नेहरू-लियाकत समझौता?
(संदर्भ: नागरिकता संशोधन विधेयक-2019)
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भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अलीखान के मध्य हुए समझोते को नेहरू लियाकत समझौता अथवा दिल्ली-समझौता के नाम से जाना जाता है।
यह समझौता 8 अप्रैल 1950 में हुआ था। इस समझौते पर 6 दिन तक दोनों देशों के प्रधामंत्रियों की बातचीत चली फिर इसमें हस्ताक्षर किये गये थे।
इस समझौते में दोनों देशों ने अपने-अपने देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने का वादा किया था। इसके अलावा शरणार्थियों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा का अाश्वासन दिया गया था। भविष्य में दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावनाओं को खत्म करने की बात भी कही गई थी।
समझौते के तहत दोनों देशों ने अल्पसंख्यक आयोग गठित किए थे। इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच नई दिल्ली में छह दिनों तक बातचीत हुई। इसके बाद भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री लियाकत अली खा़न ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
समझौते के अनुसार-
# प्रवासियों को ट्रांजिट के दौरान सुरक्षा दी जाएगी. वे अपनी बची हुई प्रॉपर्टी को बेचने के लिए सुरक्षित वापस आ सकते हैं।
# जिन औरतों का अपहरण किया गया है, उन्हें वापस परिवार के पास भेजा जाएगा. अवैध तरीके से कब्जाई गई अल्पसंख्यकों की प्रॉपर्टी उन्हें लौटाई जाएगी।
# जबरदस्ती धर्म परिवर्तन अवैध होगा, अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा के अधिकार दिए जाएंगे. दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह का प्रोपगेंडा नहीं चलाने दिया जाएगा.
# दोनों देश युद्ध को भड़ाकाने वाले और किसी देश की अखंडता पर सवाल खड़ा करने वाले प्रोपगेंडा को बढ़ावा नहीं देंगे.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विरोध-
केंद्रीय मंत्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस समझौते का विरोध किया था। मुखर्जी हिंदू महासभा के नेता थे. वे पैक्ट की शर्तों का खुलकर विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि पैक्ट, भारत की तरफ से मुस्लिम तुष्टिकरण की एक कोशिश है. साथ ही पाकिस्तान में हिंदुओं को ज्यादा खतरा है. उन्हें इससे कुछ फायदा नहीं होने वाला.