25/01/2026
दोस्तों, नमस्ते ! ☺️ हम सबको "राष्ट्रीय मतदाता दिवस और गणतंत्र दिवस" (हम भारत के लोग... ... ...) की बधाई !
प्रस्तुत है सुभाष चन्द्र बोस की जीवन-यात्रा से संबंधित श्रृंखला का तीसरा भाग-"नेता जी और आज़ाद हिंद फ़ौज" ... ...
दोस्तों, सुभाष चन्द्र बोस ने जहाँ एक ओर भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को उद्वेलित करने और उनमें 'गुलामी की बेड़ियों को तोड़ डालने की उत्कट इच्छा' जागृत करने के लिए 7 जनवरी,1942 को बर्लिन(जर्मनी) में "आज़ाद हिंद रेडियो" का आरम्भ किया, तो वहीं दूसरी ओर 4 अगस्त,1944 को 'रंगून रेडियो स्टेशन' से भावनात्मक अपील करते हुए महात्मा गांधी को "राष्ट्रपिता" की संज्ञा दी और कहा कि हम भारत के पवित्र मुक्ति-युद्ध में आपका आशीर्वाद चाहते हैं।
आज़ाद हिंद फ़ौज [INA:Indian National Army]
का "दिल्ली चलो" नारा और "जय हिन्द" भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया था। नेता जी ने जन-साधारण का आवाहन करते हुए कहा था, "स्वतंत्रता दी नहीं जाती, ली जाती है।"
भारतीय महिलाओं ने भी "भारत की आज़ादी" के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
INA में, जहाँ एक ओर 'कैप्टन लक्ष्मी सहगल' के नेतृत्व में एक महिला रेजीमेन्ट का गठन किया गया, तो वहीं दूसरी ओर Intelligence Wing की कमान Saraswathi Rajamani ने संभाल रखी थी।
स्पष्टतः INA भारत के लोगों के लिए एकता और वीरता का प्रतीक बन गई।
नवम्बर,1945 में जब ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर 'दिल्ली के लाल किले में' सार्वजनिक मुकदमा चलाने का निर्णय लिया तो निर्णय के विरोध में देशभर में तीव्र-प्रतिक्रिया हुई और पूरा देश इन सैनिकों के बचाव में खड़ा हो गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग से लेकर हिन्दू महासभा और सिख लीग तक सभी राजनीतिक दलों ने आज़ादी के दीवानों को रिहा कराने के लिए अप्रत्याशित एकता का परिचय दिया। प्रतिष्ठित वकील भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू, तेजबहादुर सप्रू, के.एन. काटजू, एवं आसफ अली ने बचाव पक्ष की ओर से वकालत की।
INA के युद्धबंदियों को रिहा कराने के लिए चलाये गये राष्ट्रव्यापी-आंदोलन ने न केवल राष्ट्रीय एकता का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया अपितु यह भी सिद्ध कर दिया कि अब भारतीयों के संबंध में कोई भी निर्णय लेने का अधिकार भारतीयों ने प्राप्त कर लिया है। ... ... ...
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