परंपरा और परिवर्तन
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पहला पन्ना :-
वर्तमान समाज बहुत तेज गति से बदल रहा है। खान-पान,पहनावा,भाषा,तकनीकी,सामाजिक सरोकार सब कुछ एकदम बदल जाने को आतुर हैं। मगर सब कुछ एक झटके में तो नहीं बदल सकता। अनंत काल से समय के साथ परिवर्तन होता आया है और आगे भी निरंतर होता रहेगा लेकिन परंपराओं का भी अचानक छूट जाना या छोड़ देना आसान नहीं है। एक तरफ़ जहां परम्पराएँ हमें हमारे अतीत से जोड़े रखती हैं, हमारी धरोहर हैं। तो वहीं दूसरी ओर परिवर्तन प्रगति के लिए नितांत आवश्यक है।
अब सवाल यह है कि परंपरा और परिवर्तन में कैसा सामंजस्य होना चाहिए। आज की युवा पीढ़ी (हमारे बाद) नवीन परिवर्तनों के साथ खुद को ज्यादा सहज पाती है। परम्पराएँ उन्हें प्रगति में बाधा के रूप में नज़र आती हैं। और वहीं हमसे एक पीढ़ी पहले के लोग जिनके लिए किसी भी प्रथाओं/परंपराओं को छोड़ने का मतलब पाप/अनैतिक कार्य करने जैसा है।
दरअसल यह दो पीढ़ियों का पीढ़ीगत अंतर है जिसमें उनके भाषा,मूल्य,विश्वास एवं जीवन शैली में बदलाव से दोनों पीढ़ियों के लोगों के विचारों में संघर्ष दिखाई देता है। जबकि न तो परिवर्तन की चाह पाप/अनैतिक है और न ही परंपराएं आधुनिकता या विकास में बाधक।
दूसरा पन्ना:-
फिर कभी...........🖋️
जन की बात : अन्तर्मन से
जन के मन की अन्तर्मन से
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