नमस्कार,
'हस्ताक्षर' वेब पत्रिका अपना 39 वाँ अंक (जून 2018) *महिला ग़ज़लकार अंक* के रूप में प्रकाशित कर रहा है।
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के. पी. अनमोल
8006623499
हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
हिंदी साहित्य के विद्याथियों तक साहि?
19/10/2017
सर सय्यद अहमद ख़ान की महबूबा थी उनकी 'क़ौम'
सर सय्यद अहमद ख़ान की 200वीं जयंती अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बड़े धूम-धाम से मनाई गई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में रहते हुए अब तक मैंने सर सय्यद अहमद ख़ान के बारे में जो भी थोड़ा-सा जाना और समझा है, उसे आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।
हिंदुस्तान के इतिहास के सर सय्यद अहमद ख़ान का नाम ऐसे व्यक्तियों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी क़ौम के उत्थान के लिए अपना तन, मन, धन सब न्योछावर कर दिया।
सन 1857 की क्रांति के बाद जैसी दुर्दशा भारतवासियों की हुई थी उससे उभरपाना ख़ुद एक क्रांति से कम नहीं था। भारतीयों के पास अंग्रेजों का सामना करने के लिए ना तो पर्याप्त हथियार थे, ना ही धन और ना ही शिक्षा। जिसके बलबूते पर हम उनका सामना कर पाते। सामना करना तो दूर की बात है उनसे छुपकर ख़ुद को बचा पाना बहुत मुश्किल काम था। 57 की लड़ाई में अंग्रेज़ फ़ौज ने सर सय्यद के घर को भी तहस नहस कर दिया था और जो कुछ भी मिला उसे लूटकर ले गए। उनके मामू और मामुजाद भाई का भी अंग्रेज़ों ने क़त्ल कर दिया था और ना जाने कई सगे-संबंधियों, दोस्तों को मौत के घाट उतार दिया। उनकी माँ अंग्रेज़ों से ख़ुद को बचाने के लिए कई दिन तक तबेले में भूखी छिपी रही, भूख और प्यास की वजह से उसी तबेले में उन्होंने आख़िरी सांस ली।
57 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों की ग़लतियों का अहसास कराने के लिए उन्होंने अपने दोस्तों के मना करने के बावजूद 'असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद' नामक किताब लिख डाली। जिसके बाद अंग्रेज सरकार द्वारा उनपर मुक़दमा कर दिया गया। पुस्तक में उठाए गए मुद्दे इस प्रकार हैं -
1. अंग्रेज़ी सरकार भारतीय जनता के मनोभवों का ध्यान किये बिना एक मुद्दत से उनके दिलों में बग़ावत भर रही थी।
2. अंग्रेज़ी सरकार जो विदेशी है और जिसके रस्म-रिवाज़, खानपान, रहन-सहन इत्यादि हिंदुस्तानियों से भिन्न हैं, उसके लिए अपेक्षित था कि वह सरकारी प्रशासन में भारत के प्रतिनिधियों की मदद लेती और कम से कम विधायिका काउंसिल में भारतवासियों को यथोचित स्थान देती।
3. अँग्रेजी सरकार को हिंदुस्तानियों की पीड़ा और कष्ट का तनिक भी अहसास नहीं था। उनका दुःख-दर्द प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था और सरकार सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कहती थी। जनता में सरकार की इस अमानुषी प्रवृति की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।
4. सीधे सादे हिंदुस्तानियों को कभी लालच देकर और कभी धमकी से ईसाई बनाने की पादरियों की कोशिश सरासर ग़लत थी। इससे जनता में ज़बरदस्त नाराज़गी पैदा हुई। 1855 में पादरी एडमंड ने राजधानी कलकत्ता से इस आशय की चिट्ठी प्रकाशित की कि भारत में ब्रिटिश राज्य पूरी तरह जम चुका है इसलिए हिंदुस्तानियों को चाहिए कि वे ईसाई धर्म स्वीकार कर लें। इस चिट्ठी से जनता में आक्रोश की लहर तेज़ हो गई।
5. निसंदेह हिंदुस्तानियों को शिकायत है कि सरकार ने उन्हें तरह तरह से अपमानित किया है। एक भद्र और शरीफ़ हिंदुस्तानी की एक साधारण से अंग्रेज के सामने इतनी इज़्ज़त भी नहीं है जितनी एक साधारण यूरोपियन की एक बड़े ड्यूक के सामने है।
इस पुस्तक का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए वे स्वयं लिखते हैं कि "अभी महाविद्रोह की राजनीति ठंडी नहीं पड़ी थी कि मैंने एक पुस्तक क़ौम की बेगुनाही साबित करने के उद्देश्य से लिखी जो 'कॉज़ेज़ ऑफ इंडियन रिवोल्ट' के नाम से थी। ..."
बाद में इस पुस्तक का असर अंग्रेज़ सरकार पर पड़ा। 1861 में अनेक हिंदुस्तानियों को विधायिका काउंसिल के सदस्य मनोनीत किये गए। सर सय्यद ने भारतवासियों को प्रशासन में उच्च पद न दिए जाने की भी शिकायत की थी। ब्रिटिश सरकार ने उनकी बात पर विचार किया और 1862 ई. में पहली बार किसी भारतीय के रूप में श्री शंभुनाथ हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए।
57 का लड़ाई ने सर सय्यद को पूरी तरह से झकझोर दिया था। यह उनके जीवन का एक ऐसा मोड़ था जहाँ सर सय्यद ने क़ौम की भलाई के लिए क़दम उठाए। सर सय्यद अपनी क़ौम के लिए इतने फ़िक्र-ओ-मंद थे कि कमउम्र में ही उनके सर के और दाढ़ी के बाल सफ़ेद हो गए थे। इतिहास दो व्यक्तियों का नाम लिया जाता है, जिनके कमउम्र में ही बाल सफ़ेद हो गए थे। एक बादशाह शाहजहां और दूसरे सर सय्यद अहमद ख़ान। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि बादशाह शाहजहाँ की महबूबा थी उनकी बीवी 'मुमताज़' और सर सय्यद अहमद ख़ान की महबूबा थी उनकी 'क़ौम'।
सर सय्यद के लिए 'क़ौम' शब्द किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं था बल्कि पूरे हिंदुस्तान की जनता के लिए था। अपनी इस क़ौम की भलाई के लिए उन्होंने जो भी पहल की उसमें उनके हिंदू मित्रों ने भी बख़ूबी साथ दिया।
सर सय्यद का मानना था कि किसी भी क़ौम की उन्नति के लिए उसका शिक्षित होना अति आवश्यक है। अंग्रेज़ों की शिक्षा से, उनकी प्रगति से, उनकी सक्रियता से वह भलीभाँति परिचित थे। इसलिए हमें उनके बराबर पहुँचाने के लिए उनका सामना करने के लिए इस सोई हुई क़ौम को जोश से नहीं दिमाग़ से काम लेने की सलाह देते रहे। सर सय्यद ने वहाँ की तालीम, वहाँ के पुस्तकालय, वहाँ के विश्वविद्यालयों के बारे में जानने के लिए इंग्लिशतान का सफ़र किया। भारत में कई जगह पर छोटे छोटे स्कूल्स बनाने के साथ ही अलीगढ़ में साइंटिफिक सोसाइटी बनाने का निर्णय लिया, जिसमें अंग्रेजी पुस्तकों का अनुवाद उर्दू में किया जाता था जिसे भारतवासी अंग्रेज़ी शिक्षा और उनकी सोच से अवगत हो सकें।
आगे चलकर उनके प्रयासों और मित्रों के सहयोग से उन्होंने अलीगढ़ में 'मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल' कॉलेज की स्थापना 1875 ई. में की, जहाँ छात्रों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके रहने के लिए छात्रावास की भी सुविधा थी। लड़कों की शिक्षा के साथ ही सर सय्यद लड़कियों को भी शिक्षा देने के पक्षपाती थे और उन्होंने लड़कियों के लिए भी स्कूल्स और कॉलेजेज बनवाए। अलीगढ़ का अब्दुल्ला हॉल भारत के एक बड़े गर्ल्स कॉलेज के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ दुनियाभर से लड़कियाँ आकर तालीम हासिल करती हैं। मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज आगे चलकर 1920 ई. में 'अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी' एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। जिसमें पहले स्नातक 'श्री ईश्वरीप्रसाद' और पहले परास्नातक 'श्री अंबा प्रसाद' हुए थे।
सर सय्यद अहमद ख़ान ने जो पौधे 1857 की बाद लगाये है वे उनसे कई बड़े बड़े दरख़्त बने और जो हमारे ऊपर सर सय्यद का आशीर्वाद बनकर छाए हुए हैं।
ान
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
05/10/2017
14/09/2017
"अगर ज़ुबाँ के नाम पर होगी नीयत नेक।
हिंदी-उर्दू को तभी समझ सकेंगे एक।।"
"हिंदी दिवस हिंदी भाषा का जश्न मनाने का दिन नहीं बल्कि हिंदी की जो सतत परंपरा चली आ रही है उसका लेखा-जोखा तय करने का, उसके भविष्य के बारे में सोचने का दिन है"- प्रो. शंभुनाथ तिवारी
आज बड़े ज़ोर-शोर से भारत के सभी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, एवं हिंदी संस्थानों में हिंदी दिवस के अवसर पर कार्यक्रमों के आयोजन हुए और हिंदी सप्ताह का शुभारंभ हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थान के बड़े विभागों में शामिल हिंदी विभाग में भी राजभाषा (हिंदी) कार्यान्वयन समिति, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ की तरफ़ से एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन हुआ। जिसमें यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. तारिक़ मंसूर अध्यक्ष के तौर पर शामिल हुए। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. प्रदीप श्रीधर (निदेशक, के. मुं. हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा) शामिल हुए।
प्रो. प्रदीप श्रीधर ने हिंदी भाषा की उन्नति, उसके विस्तृत होते हुए क्षेत्र के बारे में बताते हुए ये भी कहा कि कहाँ-कहाँ और किन कारणों से हिंदी का स्तर नीचे आया है।
मेरी अपनी समझ और राय में किसी भी चीज़ का विरोध उसे और ऊँचा उठा देता है। हम इन सब बातों को लेकर अगर विरोध की जगह हिंदी के महत्व को समझकर इसे अपनी जीवनचर्या और व्यवसाय में प्रयोग कर रहे होते तो स्थिति कुछ और होती। कहा जाता है कि हिंदी को लेकर राजनीति भी रही है। तो क्यों नहीं हमने हिंदी में उसका निवारण सोचा, अगर राजनीति हुई तो राजनीति का जवाब राजनीति से क्यों नहीं दिया। मगर हम ही हीनभावना लेकर पीछे हट गए, जिससे और लोगों का आगे आना स्वाभाविक हो गया।
हम आज हिंदी सप्ताह मना रहे हैं। हिंदी पर व्याख्यान करवा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा के विकास में संगोष्ठियों की ज़रूरत पड़ती है क्या ...... ???
अंग्रेजी भाषा की उन्नति के पीछे अंग्रेजी देश के वासियों के श्रम छिपा हुआ है। फिर चाहे वे राजनीति करके इसे स्थापित करें या ईमानदारी से। हम तो इतने पीछे चले गए कि हमने आपसी बोलचाल की भाषा को ही छोटा समझा। तर्क, बातचीत से दूर होते चले गए। फिर राजनीति तो करेगा ही कोई न कोई। अगर हम राजनीति नहीं करेंगे तो कोई हमारे ऊपर राजनीति करेगा। हुआ भी वही......।।
जिससे अंग्रेजी आज हर क्षेत्र में अपनी धाक जमाए हुए। हिंदी के शोध प्रबंध भी अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं। अंग्रेजीवाले आज भी परिश्रम कर रहे हैं और हम क्या कर रहे हैं ....... विरोध, वो भी सिर्फ बातों से।
विरोध से कभी कोई चीज़ नीचे नहीं गिरती, बल्कि उसे नीचा करने के लिए खुद को ऊँचा उठाना पड़ता है। "ठीक उसी तरह जिस तरह किसी रेखा को बिना मिटाए छोटी करने के लिए उससे बड़ी रेखा खींचना।"
कहते हैं हिंदी पढ़नेवालों को अन्य विषयों से पढ़ाई करनेवालों की अपेक्षा जल्दी रोज़गार नहीं मिलता, तो हिन्दीवाले अन्य की अपेक्षा उतनी मेहनत और लगन से पढ़ाई के प्रति समर्पित भी तो नहीं होते।
मेरे शब्दों से स्पष्ट है कि मेरा किसी भी भाषा से कोई विरोध नहीं है। जो आगे बढ़ा है या बढ़ रहा है, वो उसकी मेहनत, लगन और वहाँ के जन की एकता परिणाम है। हमें आगे आना है तो मेहनत करना सीखना होना और उससे भी पहले एक होना।
हमारे विभागाध्यक्ष प्रो. अब्दुल अलीम सर का मैं तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने लोगों को साहित्यिक मंच दिया, जहाँ बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं। ये सोच इन्हीं कार्यक्रमों की बदौलत उपजी। आशा है कि अब हम आगे बढ़ रहे हैं।
ान
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
13/09/2017
शोध समिति, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय, अलीगढ़
समाचार
शोध समिति के तत्वाधान में दिनांक 12/09/17 को शोधार्थी पत्र -वाचन के अन्तर्गत, विभाग के शोधार्थी आज़र ख़ान और सगीर अहमद ने अपने पत्र प्रस्तुत किये। जिसमें 'आज़र ख़ान' के पत्र का विषय था, 'नागार्जुन की कविताओं में प्रकृति का स्वरूप' और 'सगीर अहमद' के पत्र का विषय था 'उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श की उपयोगिता एव आवश्यता'। कर्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक और चिंतक प्रो. प्रदीप सक्सेना जी ने की। कार्यक्रम का संचालन प्रतिभा भारद्वाज ने किया। कार्यक्रम के अन्तर्गत ही विभागाध्यक्ष ने समिति के पूर्व पदाधिकारियों तथा जिन शोधार्थिओ ने सत्र 2016-17 में पत्र -वाचन किया उनको प्रमाण पत्र प्रदान किये और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
पत्र-वाचन के बाद पत्रों पर टिप्पणी यज्ञदेव शर्मा और विकास कुमार ने की तथा अन्य शोधार्थियों ने भी अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की। इसी कड़ी में समिति सह-प्रभारी प्रो. कमलानंद झा जी ने पत्रों पर अपने आलोचनात्मक विचार रखते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की एवं 'आज़र खान' और 'सग़ीर अहमद' के शोधपत्रों की सराहना की साथ ही ये आशा जताई कि भविष्य में हिंदी विभाग और अधिक सक्रियता की तरफ जाएगा। कर्यक्रम के अंत में वरिष्ट आलोचक प्रो. प्रदीप सक्सेना जी ने नागार्जुन के प्रकृति चित्रण एवं उत्तर औपनिवेशिक विमर्श पर अपने विचार प्रस्तुत किए तथा सभी शोधार्थियों कोे सवाल करने के लिए सुझाव दिए। अंत में धन्यवाद ज्ञापन दीबा ने किया।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो.अब्दुल अलीम, शोध समिति के प्रभारी प्रो. मेराज अहमद, सह- प्रभारी प्रो.कमलानंद झा, प्रो .आशिक अली, प्रो .शम्भूनाथ तिवारी, प्रो. इफ्फत असगर, डॉ. शगुफ्ता नियाज, डॉ. जावेद आलम, डॉ गुलाम फरीद साबरी, डॉ शहवाज़ अली खान, डॉ. दीपशिखा, डॉ राहिला रहीस, डॉ वाजिद खान, नीलोफर उस्मानी, शोध-समिति के सभी समिति के सदस्य तथा सभी शोधार्थी उपस्थित थे।
अमान अहमद और मनीष कुमार
मीडिया प्रभारी
शोध - समिति (हिंदी विभाग)
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
अलीगढ़
06/01/2017
विश्व पुस्तक मेला 2017
स्टाल नंबर 235, हॉल नंबर 12A
Anang Prakashan (अनंग प्रकाशन) पर उपलब्ध पुस्तक 'शोध-समीक्षा : विविध परिदृश्य',
संपादक : Azar Khan (आज़र ख़ान)
16/12/2016
'हस्ताक्षर' दिसम्बर 2016 (अंक-21)
आवरण चित्र- प्रीति 'अज्ञात'
हस्ताक्षर
नया वर्ष, नए नोट....वही पुरानी उम्मीदें: प्रीति 'अज्ञात'
कविता-कानन
निदा नवाज़, डॉ. मनोहर अभय, कृष्ण सुकुमार, सुशील कुमार शैली, अपराजिता अनामिका
ग़ज़ल-गाँव
दरवेश भारती, ममता किरण, कमलेश श्रीवास्तव, नवीन मणि त्रिपाठी
गीत-गंगा
कृष्ण भारतीय, डॉ. तारा गुप्ता
कथा-कुसुम
ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश, दिलबाग विर्क, प्रेरणा गुप्ता, मधु शर्मा कटिहा, डॉ. शिल्पा कुमरावत
आलेख/विमर्श
पूर्वोत्तर भारत के लोकसाहित्य की विशेषताएँ: वीरेन्द्र परमार
मर्त्यलोक से ज्यादा बड़ा जीवन संसार: विनय मिश्र
सुषम बेदी के कथा साहित्य में वैवाहिक स्थितियाँ: डाॅ. प्रतिभा पाण्डेय
अज्ञेय कृत ‘अपने अपने अजनबी’ में चित्रित वैयक्तिक यथार्थबोध: निदा
छंद-संसार
मनोज जैन मधुर
ख़ास-मुलाक़ात
हमें प्रवासी ही नहीं, पराया साहित्यकार की संज्ञा देने को भी लोग तत्पर रहते हैं: सरन घई
मूल्यांकन
वर्तमान आधुनिक जीवन की अनेक विसंगतियों को बड़ी बारीकी से उकेरता संग्रह 'छोटी-सी आशा': डॉ. सीता शर्मा 'शीताभ'
ग़ज़ल की बात
के. पी. अनमोल
हायकु
अनिता मण्डा, प्रदीप कुमार दाश 'दीपक', विनोद कुमार दवे, संजय सनन
मुक्तक
अल्का चंद्रा
उभरते स्वर
रश्मि सिंह
बाल-वाटिका
राजपाल सिंह गुलिया
ज़रा सोचिए!
अति सर्वत्र वर्जयेत: प्रीति सुराना
अपने को पहचानना: निशा गुप्ता
जो दिल कहे
समग्रता में ही खुशियों की सर्वव्यापकता है: विजयानंद विजय
यादें!
ऊपरी चक्कर: वत्सला पाण्डेय
'अच्छा' भी होता है!
कौमी एकता, स्नेह-सद्भावना संग नेकी
पाठकीय
बाल-विशेषांक अनुपम, अद्वितीय और अनूठा अंक: शिवम यादव ‘खेरवार’
ख़बरनामा
अहमदाबाद (गुजरात) में 'मध्यांतर' का विमोचन
हाइकु दिवस समारोह का आयोजन एवं पुस्तक विमोचन
पत्रिका पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-
http://www.hastaksher.com/index.php?ankid=21
24/09/2016
मान्यवर/मित्रवर,
सूचित किया जाता है कि साहित्य सदन (त्रैमासिक ई-पत्रिका) का प्रवेशांक शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है।आप अपनी मौलिक रचनाएँ साहित्य की किसी भी विधा (आलेख/शोध आलेख, कविता, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा, बाल साहित्य, व्यंग्य, पुस्तक समीक्षा, फिल्म समीक्षा, अनुवाद आदि) में दिनांक 25/09/2016 तक अपने एक फोटो के साथ पत्रिका की ई.मेल - [email protected]om पर भेजकर रचनात्मक सहयोग करें।अधिक जानकारी के लिए 9452451825 पर संपर्क करें।
साहित्य सदन (त्रैमासिक ई-पत्रिका) के प्रवेशांक हेतु रचनाएँ आमंत्रित - मान्यवर/मित्रवर, सूचित किया जाता है कि साहित्य सदन (त्रैमासिक ई-पत्रिका) का प्रवेशांक शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है।आप अ...
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शोध-समीक्षा : विविध परिदृश्य इस पुस्तक का उद्देश्य समाज के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना है।
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Aligarh
202002