07/09/2025
RAdhikA
बक्त चाहे जैसा भी हो।लेकिन उसकी एक ख़ूब
07/09/2025
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गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥१-३०॥
मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और मेरी त्वचा जल रही है। मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है॥30॥
My bow, Gandeev is slipping from my hand and skin is burning. I am not able to even stand erect, my mind is swirling.॥30॥
अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥१-२८॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥१-२९॥
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! यहाँ मैं युद्ध के अभिलाषी स्वजनों को ही देखता हूँ। मेरे अंग शिथिल हुए हो रहे हैं और मुख सूख रहा है और मेरे शरीर में मेरा शरीर काँप रहा है और रोएं खड़े हो रहे हैं॥28-29॥
Arjun said – O Krishna! I only see my relatives here, wishing to fight us. My body is becoming weak, mouth dry, my body is trembling with hair erect.॥28-29॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥१-२७॥
उपस्थित उन सभी बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा-युक्त होकर शोक करते हुए यह बोले -॥27-28॥
Seeing his relatives all over there, Arjuna felt compassion and became sad. He said-॥27-28॥
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन् पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥१-२६॥
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित पिता(ताऊ-चाचा), पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, ससुर और सुहृदों को देखा॥26-27॥
Then Arjun saw his uncles, grand father, teachers, maternal uncle, brothers, sons and grand sons, in-laws and well-wishers in both the armies.॥26॥
गुडाकेश-(मोह) निद्रा को जीतने वाला) अर्थात् अर्जुन हृषीकेश-सबके शरीर के मध्य, हृदय में स्थित और उसके स्वामी श्रीकृष्ण
Gudakesh – One who has control over his sleep(of delusion), here Arjun.
Hrushikesh – Present in heart(middle portion of body) of everyone, here or anywhere Lord Sri Krishna.
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥१-२४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥१-२५॥
संजय बोले – अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया और कहा – हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन कौरवों, प्रमुख रूप से भीष्म और द्रोणाचार्य तथा सम्पूर्ण राजाओं को देखो॥24-25॥
Sanjay said: The Lord Krishna, when told like this by Arjuna,
positioned the chariot in the middle of the armies and told him – O Parth, see these great warriors of Kuru clan mainly Bheeshma and Drona and all other kings.॥24-25॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे र्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥१-२३॥
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय चाहने वाले जो राजा युद्ध की इच्छा से इस सेना में आए हैं, उनको मैं देखना चाहूँगा॥23॥
I want to see these Kings who have come here to help evil minded Duryodhan, with a wish to fight against us.॥23॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम स्मिन् रणसमुद्यमे॥१-२२॥
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में स्थित इन विपक्षी योद्धाओं का निरीक्षण न कर लूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है॥22॥
Till I observe all these warriors ready for the battle and decide whom I should fight myself.॥22॥
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