09/12/2025
मेरी बेटी के ऊपर ये जुल्म मत करो। वो बेकसूर है। इसका कोई कसूर नहीं है। अब तुम्हारी बेटी का ही क्या धरा है? वो सांप आशिक है तुम्हारी बेटी पर। इसी की वजह से वो गांव में आता है। आज हम आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं जो आपके होश उड़ा देंगी। एक बूढ़ी औरत की जवान बेटी पर एक सांप आशिक हो गया। जिसके लिए वह गांव में आया और फिर देखें कैसे वह विधवा औरत की बेटी को दुल्हन बनाकर अपने साथ ले गया। ऐसी रूह को ढंडोर देने वाली कहानी जो आपको हिला देगी। एक छोटे से गांव में एक बीवा बूढ़ी अम्मा रहती थी। उनकी एक ही जवान बेटी थी जिसका नाम फातिमा था। दोनों मां-ब अपने पुराने मगर प्यार भरे छोटे से घर में जिंदगी बसर कर रही थी। बूढ़ी अम्मा जड़ी बूटियां जमा करके उनसे दवाएं बनाती और यही उनका गुजर बसर था। गांव के लोग उनकी दवाइयों को शिफा समझते और उनकी इज्जत करते थे। एक रोज फातिमा घड़े में पानी भरने के लिए कुएं पर गई। गांव की औरतें अक्सर वहां जमा होती। मगर उस दिन कुआं बिल्कुल सुनसान था। फातिमा ने घड़ा नीचे डाला और पानी खींचने लगी। अभी उसने घड़ा भर ही लिया था कि अचानक करीब की झाड़ियों से कोई सरसराहट सुनाई दी। फातिमा ने चौंक कर पीछे पलट कर देखा तो एक खौफनाक मंजर उसके सामने था। एक बहुत बड़ा सांप आहिस्ता-आहिस्ता उसकी तरफ रेंग रहा था। उसकी लालाल आंखें शोलों की तरह दहक रही थी। फातिमा के हाथ से घड़ा छूट गया और वो घबराकर उल्टे कदमों भागी। सांप ने एक लम्हे को उसकी तरफ देखा और फिर अचानक घनी झाड़ियों में गायब हो गया। फातिमा हाफती कांपती घर पहुंची। बूढ़ी अम्मा ने अपनी बेटी को इस हाल में देखा तो घबरा कर पूछने लगी, क्या हुआ बेटी? क्यों इस कदर परेशान हो? फातिमा हिचकिचाते हुए बोली, अम्मी, मैं कुएं पर पानी भर रही थी कि अचानक एक बहुत बड़ा सांप मेरे सामने आ गया। वो मुझे अपनी लाल आंखों से घूर रहा था। बूढ़ी अम्मा ने उसे करीब बैठाकर तसल्ली दी। फिक्र मत कर बेटी। शायद कहीं झाड़ियों से निकल कर कुएं की तरफ आ गया हो। ऐसा कभी-कभी हो जाता है। अगले रोज बूढ़ी अम्मा ने फातिमा को जड़ी बूटियां चुनने के लिए खेतों की तरफ भेजा। फातिमा सब्ज घास और पौधों के दरमियान झुक-झुक कर जड़ी बूटियां तोड़ रही थी कि अचानक फिर वही सरसराने की आवाज उसके कानों में पड़ी। उसने पलट कर देखा, तो सामने वही सांप खड़ा था। वही दहकती लाल आंखें और इस बार जैसे वह मुस्कुरा रहा हो। फातिमा के हाथ से जड़ी बूटियों की टोकरी गिर गई। और वह बदहवासी में उल्टे कदमों भाग खड़ी हुई। घर पहुंचते ही उसने बूढ़ी अम्मा को सारी बात बताई। अम्मा की आंखों में फिक्र की परछाइयां तैर गई। वो बेटी को दिलासा देती रही। मगर अंदर ही अंदर वो भी बेचैन थी। उन्होंने सोचा यह कोई आम सांप नहीं हो सकता। अगले चंद दिनों में बूढ़ी अम्मा ने गांव के कई लोगों से बात की। मगर सब ने कहा, "हमने तो गांव में कभी कोई ऐसा सांप नहीं देखा। यह जवाब अम्मा के दिल को और ज्यादा डुबोने लगा।" दूसरी तरफ फातिमा का हाल बुरा था। वो जहां भी जाती वही सांप किसी ना किसी तरह उसके सामने आ जाता। वो खौफजदा रहने लगी। नींद और चैन उसकी जिंदगी से जैसे रूठ गए थे। एक रात का वक्त था। फातिमा अपने कमरे में मिट्टी की चारपाई पर सो रही थी। बाहर हवा की साए साएं थी। अचानक उसने महसूस किया कि जैसे कोई उसके कान के करीब सरसरा रहा हो। वो चौंक कर जाग गई। आहिस्ता-आहिस्ता उसने आंखें खोली और कमरे में इधर-उधर देखा और फिर एक लम्हे में उसकी रूह कांप उठी। सामने वही सांप रेंगता हुआ खड़ा था। उसकी लाल आंखें अंधेरे में चमक रही थी। फातिमा के हलक से चीख निकल गई। वो जोर-जोर से चिल्लाने लगी। कुछ ही देर में बूढ़ी अम्मा उसके कमरे में दौड़ती हुई आई। क्या हुआ बेटी? क्यों चीख रही हो? फातिमा ने कांपते हुए हाथ कमरे की तरफ बढ़ाया। अम्मा वो वो सांप वो फिर मेरे कमरे में आ गया था। अम्मा ने हैरानी से इधर-उधर देखा मगर कमरे में कुछ नहीं था। खामोशी और अंधेरा बस अपना रंग जमाए हुए थे। अम्मा ने फातिमा को गले से लगाया और कहा फिक्र मत करो बेटी। यह कोई ख्वाब था। तुम बस डर गई हो। मगर फातिमा जानती थी कि यह ख्वाब नहीं हकीकत थी। वो सांप हर जगह उसका पीछा कर रहा था। और अब तो उसके कमरे तक पहुंच चुका था। अगले रोज जब फातिमा और उसकी मां सहन में बैठी थी तो अचानक गांव की तरफ से जोरदार शोर की आवाजें आने लगी। दोनों घबरा कर बाहर निकली तो आंखें हैरत से फटी की फटी रह गई। एक बहुत बड़ा सांप गांव में दाखिल हो चुका था। लोग जान बचाकर इधर-उधर भाग रहे थे। औरतों और बच्चों की चीख पुकार सुनाई दे रही थी। मगर हैरतंगेज बात यह थी कि सांप ने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। वो सीधा फातिमा के घर की तरफ आया और उसके गर्द रेंगने लगा। यह मंजर देखकर गांव वाले दम बख रह गए। अब उन्हें यकीन हो गया कि वाकई यह सांप फातिमा के पीछे ही पड़ा है। जैसा कि अम्मा और फातिमा पहले से कहती आई थी। मगर अब जब कि अपनी आंखों से सबने यह हकीकत देख ली तो उनके दिलों में खौफ और भी बढ़ गया। फातिमा अपने कमरे में दुबकी बैठी थी। उसका चेहरा जर्द पड़ चुका था। दिल खौफ से कांप रहा था। उधर गांव वाले चुपके-चुपके अपनी झोपड़ियों और घरों में छुप गए। लेकिन फिर यह मामला रोज का मामूल बन गया। हर रोज सांप आता फातिमा के घर के गर्द चक्कर लगाता जैसे सिर्फ उसे देखने आया हो और फिर चला जाता। यह कैफियत गांव वालों के लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी। आखिरकार गांव के बड़े बुजुर्गों और मुअजजीन ने झिरगा बिठाया। सारी बस्ती एक जगह जमा हुई। बूढ़ी अम्मा भी वहां बैठी थी। उनके चेहरे पर गहरी परेशानी और आंखों में बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। एक शख्स खड़ा होकर बोला अगर यह सांप इसी तरह आता रहा तो ना जाने कब हमारा नुकसान कर दे। खुदा ना खावास्ता हमारे बच्चों को दस ले तो हमें इसका कोई हल निकालना होगा। दूसरे आदमी ने कहा यह सांप सिर्फ फातिमा के पीछे है। हमें चाहिए कि उसे फातिमा के हवाले कर दिया जाए। कमज कम एक की वजह से सारा गांव तो बच जाए। यह सुनते ही बूढ़ी अम्मा के आंसू बहने लगे। वो रोते हुए कहने लगी, खुदारा मेरी मासूम बेटी पर ऐसा जुल्म मत ढाई। उसने किसी का क्या बिगाड़ा है? मगर गांव वाले अपनी जान के खौफ में सब कुछ भूल बैठे थे। झिरगे ने फैसला कर दिया कि फातिमा को दुल्हन बनाकर सांप के हवाले कर दिया जाए। जब अम्मा घर लौटी और यह फैसला फातिमा को सुनाया तो बेचारी लड़की फूट-फूट कर रोने लगी। अम्मा मेरे साथ ऐसा ना होने दें। मैंने तो कुछ भी नहीं किया मगर मां बेबस थी। वह जानती थी कि झिड़गे के फैसले के आगे कोई कुछ नहीं कर सकता। अगले रोज फातिमा को दुल्हन बनाकर गांव के खुले मैदान में बिठा दिया गया। गांव वाले दूर-दूर छुप कर यह मंजर देखने लगे। हर कोई अपने दिल में डरा सहमा था। कुछ ही देर बाद जमीन हिलने लगी। दरख्तों के पत्ते सरसरा उठे और वहीं देव हैकल सांप नमूदार हुआ। वो फन फैलाए रेंगता हुआ सीधा फातिमा के पास आया। फातिमा ने खौफ से आंखें बंद कर ली। मगर हैरतंगेज तौर पर सांप ने उसे डसा नहीं। वो आहिस्ता-आहिस्ता रुख मोड़कर जंगल की तरफ बढ़ने लगा। जैसे इशारा कर रहा हो कि फातिमा उसके साथ आए और फिर सबके सामने फातिमा उठ खड़ी हुई। उसने किसी मुजाहमत के बगैर खामोशी से सांप का पीछा करना शुरू कर दिया। गांव वाले यह मंजर देखकर मुतमिन हो गए। वह कहने लगे अब हमारी मुसीबत टल गई लेकिन बूढ़ी अम्मा के दिल पर कयामत टूट रही थी। उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उनकी आंखों में मांझी की परछाइयां उभर रही थी। जैसे कोई भेद उनके दिल में छुपा हो। मगर वो बार-बार अपने ज़हन को झटक देती और सोचती, नहीं इस मसले का हल मुझे खुद निकालना होगा। अगले रोज बूढ़ी अम्मा अपनी लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलती हुई उस सनसान जगह की तरफ गई जहां एक बुजुर्ग पीर बाबा रहते थे। गांव में उनके बारे में बहुत सुना गया था कि वह सांपों और परासरार मखलूकात के बारे में बड़े-बड़े राज जानते हैं। आखिर वह बाबा जी के छोटे से कच्चे मकान तक पहुंची। थके कदमों और लरजते हाथों से उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी। कुछ लम्हे बाद दरवाजा चरचराता हुआ खुला और सामने एक नूरानी बुजुर्ग खड़े थे। बूढ़ी अम्मा ने कांपती आवाज में कहा, बाबा जी मुझे अंदर आने की इजाजत दीजिए। मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गई हूं। बाबा जी ने खामोशी से सिर हिलाया और उन्हें अंदर बुला लिया। फिर दोनों बाहर एक घने बरगद के पेड़ के नीचे आकर बैठ गए। पेड़ की ठंडी छांह में अम्मा के आंसू थम ना सके। बाबा ने गहरी नजर से अम्मा को देखते हुए कहा, "क्यों आई हो अम्मा? दिल का बोझ हल्का करो।" बूढ़ी अम्मा फूट-फूट कर रोने लगी और हिचकियों के बीच बोली, बाबा जी, एक खौफनाक सांप मेरी बेटी फातिमा के पीछे पड़ गया है। वह जहां भी जाती है, यह उसका पीछा करता है। यहां तक कि गांव वालों ने उसे दुल्हन बनाकर उसी सांप के हवाले कर दिया। मेरी बेटी, मेरी इकलौती बेटी। वह उसके साथ जंगल में चली गई है। बाबा जी कुछ लम्हे चुपचाप उन्हें देखते रहे। फिर भारी आवाज में बोले, बेटी के पीछे सांप ऐसे ही नहीं लगता। कोई ना कोई मांझी है। कोई ना कोई भेद छिपा है। अम्मा सोचो क्या तुमने कभी ऐसा कुछ किया है जिसकी सजा आज तुम्हारी बेटी भुगत रही हो? यह सुनकर अम्मा के दिल पर घड़ों पानी पड़ गया। आंखों से आंसू बहने लगे और कांपती हुई आवाज में वह अपने दिल का राज खोलने लगी। बाबा जी मैं जड़ी बूटियां चुनती हूं और दवाइयां बनाती हूं। एक रोज मैं गांव के करीब घने दरख्तों के पास जड़ी बूटियां चुन रही थी। तभी अचानक मेरी नजर एक बहुत बड़े सांप पर पड़ी। मैं सख्त खौफजदा हो गई। दिल में यह भी आया कि कहीं यह मेरी जड़ी बूटियों को नुकसान ना पहुंचा दे। मैंने जल्दी में एक बड़ा डंडा उठाया और उस सांप पर वार कर दिया। लम्हों में वह तड़प-तड़प कर मर गया। लेकिन जैसे ही मेरी नजर पास के दरख्त पर पड़ी तो वहां एक और सांप मौजूद था। उसकी आंखें लाल अंगारे की तरह दहक रही थी और वह मुझे घूर रहा था। मेरा दिल दहल गया। मैं डरी-डरी अपनी टोकरी उठाकर वहां से भाग निकली। मैंने सोचा कि बस एक सांप मार दिया। इसमें कौन सी बड़ी बात है? लेकिन बाबा जी उसके कुछ ही दिनों बाद यह सब शुरू हो गया। पहले फातिमा को कुएं पर सांप दिखाई दिया। फिर खेतों में, फिर हमारे घर के आसपास और अब तो वह उसे अपने साथ जंगल में भी ले गया है। यह कहते-कहते बूढ़ी अम्मा झारो कतार रोने लगी। बाबा जी मैं नहीं जानती अब मेरी बेटी के साथ क्या होगा। यह सब मेरी गलती का नतीजा है। बुजुर्ग ने संजीदगी से आंखें घुमाकर कहा। यह सांप कोई आम सांप नहीं। यह एक अच्छाधारी सांप है। इसका दिल और एहसास होता है। तुमने इसकी बीवी को मारा है। उसी की तरफ से इंतकलाम है। इसीलिए वह तुम्हारी बेटी को ले गया। बूढ़ी अम्मा के हाथ कांप उठे। या अल्लाह वह दहाई देने लगी। मेरी बेटी वापस लौटा दें। हुजूर, बुजुर्ग ने नरम अंदाज में कहा, फिक्र मत करो। मैं इसका हल जानता हूं। मेरे पास सांपों के झरों से लेकर उनके माजी तक जाने वाली किताबें हैं। ऐसी बातें जो आम आंखें ना देख सकें। मैं तुम्हारी बेटी को बचा कर लाऊंगा। मगर इसके लिए गांव वालों को सच जानना होगा और हमारा साथ देना होगा। वह सांप फातिमा को लेकर जंगल की कच्ची राहों से गुजरता हुआ एक टूटी-फूटी झोपड़ी के करीब आया। झोपड़ी के अंदर घड़ियाल की तरह की खामोशी थी। फातिमा ने जब सांप को देखा तो उसका दिल धड़कने लगा। आंखों में जर्दी छा गई और वह बेख्तियार रोने लगी। सांप उसके सामने रेंग कर रुका। फिर अचानक उसकी शक्ल में अजीब सी लौ चमक उठी। फिर वह लम्हा आया जब सांप का वह बदन सिमटा। खाल खुलकर उतरने लगी और सामने एक नौजवान खड़ा हो गया। उसकी आंखें अंगारों की तरह जल रही थी। वह हंसा एक उदास कुठहरी मुस्कुराहट और सर्द लहजे में बोला। अब मेरा बदला पूरा होगा। अब तुम लोगों को मैं सबक सिखाऊंगा। फातिमा चौंक कर पीछे हटी। लरते लहजे में पुकार उठी। खुदा के लिए मुझे छोड़ दो। मुझे जाने दो। नौजवान ने बेरहमी से उसका हाथ पकड़ा और झोपड़ी के अंदर घसीट लिया। वहां आकर उसने रस्सियों से फातिमा के हाथ-पांव बांध दिए। रस्सियों की खटखट ने फातिमा के दिल को मजीद कुचल दिया। उसकी आवाज कांप रही थी। आंखों से बेरहम आंसू टपक रहे थे। मगर वह फिर भी पुकारती रही। मैं बेकसूर हूं। मैंने कुछ भी बुरा नहीं किया। नौजवान की हंसी में तल्खी थी। वह झुंझुला कर बोला। तुम्हारी मां ने मेरी नागिन को मारा। मेरी बीवी को छीना गया। मेरे साथ जो हुआ उसकी सजा मिलनी चाहिए। तुम्हारी मां ने वह महबूबा छीन ली और मैं तुम्हारी बेटी को यही दुख देना चाहता हूं। फातिमा बेगिनी में थी। वह समझ ना पा रही थी कि इस जुल्म का निशाना बनकर वह क्यों रो रही है। रस्सियों में जकड़ी हुई। उसने आसमान की तरफ हाथ बढ़ाए और आंखें बंद करके दुआ मांगी। या अल्लाह मेरी मदद फरमा। मुझे यहां से निकाल दे। रात गुजर गई। सुबह की रोशनी दरख्तों के पत्तों पर उतर आई। परिंदे चहकने लगे। लेकिन झोपड़ी के अंदर अंधेरा और खामोशी ही बसी हुई थी। फातिमा अब भी रस्सियों में जकड़ी बेहाल बैठी थी। उसके चेहरे की जर्दी और आंखों के गर्द गहरे साए उसकी अज़यत की गवाही दे रहे थे। भूख और प्यास ने उसका बुरा हाल कर रखा था। होंठ सूख गए थे। आवाज बैठ चुकी थी। वह बार-बार अपनी मां को याद करके रोने लगती। अचानक झोपड़ी का बोसीदा दरवाजा चरचराते हुए खुला। वही नौजवान अंदर आया। उसकी आंखों में सफाखी और होठों पर मुस्कुराहट थी। वह ठंडी आवाज में बोला। तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा। देखो अब तुम्हारे साथ क्या होता है। फातिमा ने कांपती हुई आवाज में कहा। खुदा के लिए मुझ पर रहम करो। मुझे कुछ खाने के लिए दे दो। मुझे बहुत भूख लगी है। मगर नौजवान की मुस्कुराहट और सख्त हो गई। उसने बेरहमी से कहा, यही तो तुम्हारी सजा है। जिस तरह मेरी जिंदगी मुझसे छीनी गई, उसी तरह तुम्हें यह अज़ाब सहना होगा। यह कहकर वह मुड़ गया और झोपड़ी का दरवाजा जोर से बंद करके चला गया। फातिमा रस्सियों में जकड़ी बेबसी से तड़पती रही। भूख और प्यास की शिद्दत ने उसके जिस्म को निढाल कर दिया। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और अगले ही लम्हे वह जमीन पर बेसुध गिर गई। झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। और फातिमा बेहोश होकर दुनिया से बेखबर हो गई। दूसरी तरफ बुजुर्ग वही औरत के साथ गांव आए और पूरे गांव वालों को सारा सच बताया कि किस तरह सांप बदला लेने आया है और किस तरह बूढ़ी औरत से गलती हुई थी और उसकी सजा फातिमा भुगत रही है। यह सुनकर अक्सर लोग हैरतजदा रह गए। बुजुर्ग ने बताया कि जब भी किसी अच्छाधारी सांप का साथी मारा जाता है तो उसका गम 14वीं की रात को उरूज पर पहुंचता है और 14वीं के बाद आने वाला दिन वह होता है जब वह सांप किसी ऐसी जगह पर पहुंचकर अपनी यादें ताजा करता है जहां उसका प्यार आखिरी बार रहा हो। अक्सर वही कुआं जहां सबका पानी आता था। उसी कुएं के पास हमें मौजूद रहना होगा। और उस दिन उस सांप का मुकाबला करना होगा। गांव वालों ने बहस की। कुछ तो कौहत महसूस करते हुए बोले कि यह सब बड़ी अम्माओं की गलती है और सजा होनी चाहिए। मगर दीगर लोग जो बूढ़ी अम्माओं को जानते और उसकी खिदमत को समझते थे सीना ठोस कर खड़े हुए और कहा कि हम साथ देंगे। आखिरकार अक्सरियत ने बुजुर्ग की बात मान ली और अहद किया कि चौवी की रात और उसके बाद वाले दिन वह कुएं के पास जमा होंगे। घर वापस आकर बूढ़ी अम्माओं ने चुपके-चुपके अपने दरवाजे बंद किए। उस रात उसकी नींद उड़ गई। किस्मत की सारी लाशें उसके दिल पर एक-एक करके टपक रही थी। उसने एक घोसे में जाकर खुदा से दुआ की और अपने माजी का जुर्म दोहराते हुए अपने अमल की सजा सोच कर कांप उठी। मगर उसके अंदर एक नई हिम्मत भी पैदा हो रही थी। वह अब अपनी बेटी को खुद नहीं छोड़ सकती थी। चाहे कुछ भी हो जाए। बुजुर्ग ने अगले दिन गांव में कुछ खास तैयारियां शुरू करवाई। उन्होंने चंद अहल ए ईमान मर्दों को चुनकर उन्हें सांपों के रवय खामोशी से बैठने और जराती हथियारों से कैसे बचाव करना है यह समझाया। साथ ही बुजुर्ग ने एक छोटी सी ठोकर बनाई। एक लोहे की छोटी छड़ी जिसके ऊपर मखसूस जड़ी बूटियों का बंधन बांधा गया था। गांव में बहुत सी औरतें रात भर जल अंधेरों में बैठकर नमाज़ें पढ़ी। कुछ लोग शबे एहतियात के लिए नमक, अदरक और हल्दी के थैले लेकर कुएं के पास जमा होने का इंतजाम करने। बुजुर्ग ने आखिर में समझाया, हम जंग नहीं लड़ेंगे। हमारा मकसद है दिल जीतना और रिश्तों को समझाना। अगर यह सांप रंजीदा है, तो हमें उसकी तकलीफ सुनने की कोशिश करनी होगी। जो कदम हम उठाएंगे, वह बहादुरी और हिकमत दोनों का मरकब होगा। आखिर वह दिन आ ही गया। गांव वाले बुजुर्ग के साथ उस पुराने कुएं की तरफ रवाना हुए। रात गहरी थी। चांदनी मध्यम और फजा में अजीब सा बोझिल सुकूत तारी था। कुएं के गर्द सब जमा हो गए। बुजुर्ग ने अपनी पुरानी किताब निकाली। उसके ओराका हवा में हिल कोरे ले रहे थे। बाबा ने आंखें बंद करके मंत्र पढ़ना शुरू किया। गांव वाले हाथों में डंडे और मशाल लिए पहरे की सूरत खड़े थे। अचानक कुएं का पानी हिलने लगा। पहले हल्की सी लहर उठी फिर भारी बुलबुले उठने लगे। लम्हों में पानी से धुआं सा निकलने लगा और फिर एक भयानक चीख के साथ वही सांप सामने जाहिर हुआ। उसकी आंखों में दहकते शोले थे और उसके फन की सरसराहट से जमीन हिल रही थी। सांप गिराया। बंद करो यह सब। तुम्हें मालूम भी है कि तुम क्या कर रहे हो? बुजुर्ग ने डंडा जमीन पर मारते हुए कहा। हमें फातिमा को वापस चाहिए। बताओ वो कहां है? वरना हम तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे। सांप तड़पने लगा। उसके फन से चिंगारियां निकल रही थी। वो दहाड़ते हुए बोला, वो जंगल में है। वो मेरी दुनिया में है। तुम उसे कभी नहीं पा सकोगे। यह कहकर सांप गुस्से से चीखने लगा। बाबा ने फौरन अपनी किताब से एक कागज का टुकड़ा फाड़ा। उस पर मंत्र पढ़ा और कुएं में फेंक दिया। लम्हों में कुएं के अंदर आग भड़क उठी। धुएं के गहरे बादल उठे। शोले लपके और देखते ही देखते वह सांप झुलस कर राख बन गया। गांव वाले पीछे हट गए। उनके चेहरों पर खौफ भी था और हैरत भी। हवा में बारूद और जलने की तेज बू फैली हुई थी। बुजुर्ग ने गहरी सांस ली और कहा हमने यह कर दिखाया। वो सांप अब हमेशा के लिए खत्म हो गया है। लेकिन असल काम अभी बाकी है। हमें फातिमा को तलाश करना है। यह सुनकर अम्मा की रगों में उम्मीद की हल्की सी लहर दौड़ गई। वो बार-बार आसमान की तरफ देखकर दुआएं मांगती रही। बुजुर्ग, बूढ़ी अम्मा और गांव के चंद बहादुर लोग जंगल की तरफ निकल खड़े हुए। दो दिन तक वो लगातार जंगल की घनी झाड़ियों, नदियों और सुनसान रास्तों में फातिमा को तलाश करते रहे। हर पत्ते की खड़खड़ाहट पर अममान चौंक कर सोचती, शायद यह मेरी बेटी हो मगर कोई निशान नहीं मिलता। आखिरकार दो दिन की लगातार तगोद के बाद भी फातिमा का कोई अता-पता ना मिला। अम्माओं की आंखें रोते-रोते सूझ गई। वो हर दरख्त और हर झाड़ी के पास फातिमा का नाम पुकारती। मगर जवाब में सिर्फ सन्नाटा होता। वो दहाड़े मार कर रोने लगी। मेरी बच्ची कहां चली गई? या अल्लाह मुझे मेरी फातिमा वापस दे दे। और यूं उम्मीद और मायूसी के दरमियान वो काफिला जंगल के बीच भटकता रहा। मगर फातिमा का सुराग अब तक एक राज ही था। फिर एक रोज बुजुर्ग और गांव वाले जंगल की तलाश में एक पुरानी झोपड़ी तक जा पहुंचे। दरवाजा धकेला तो अंदर का मंजर देखकर सबके होश उड़ गए। जमीन पर फातिमा रस्सियों में जकड़ी बेहोश पड़ी थी। बूढ़ी अम्मा तड़प कर आगे बढ़ी। अपनी बेटी का सर गोद में रखा और कांपते हाथों से चेहरा सहलाने लगी। बुजुर्ग ने करीब रखे बर्तन से पानी के छींटे मारे। लम्हों में फातिमा ने आंखें खोल दी। सामने मां को देखते ही वह जोर-जोर से रोने लगी। अम्मा आप आ गई। आपने मुझे बचा लिया। मगर वो सांप मुझे नहीं छोड़ेगा। वो कहता है कि मुझे मार डालेगा। बूढ़ी अम्मा ने उसे सीने से लगाकर आंसू साफ किए और कांपती आवाज में कहा, बेटी डर मत। वो अब कभी वापस नहीं आएगा। हमने उसका खात्मा कर दिया है। बुजुर्ग ने अपने गले से एक ताबीज निकाला। फातिमा के हाथ पर बांधते हुए कहा, यह तुम्हारी हिफाजत करेगा। अगर कभी कोई और सांप करीब आने की कोशिश करे, तो यह तुम्हें बचा लेगा। अब तुम बेफिक्र हो जाओ। यूं अम्मा अपनी बेटी को साथ लेकर गांव वापस लौट आई। गांव के कुछ लोग शर्मिंदा थे जिन्होंने झिड़े में फातिमा को कुर्बान करने का फैसला दिया था। मगर फातिमा के दिल में कीना नहीं था। उसने सबको माफ कर दिया और अपनी मां का हाथ थामे अपने छोटे से घर आ गई। जब उसे सारी हकीकत मालूम हुई तो दिल में दुख जरूर हुआ कि यह सब उस वक्त शुरू हुआ जब उस सांप की नागिन को मार दिया गया था। लेकिन शुक्र था कि अल्लाह ने उसे उस खौफनाक मुसीबत से निकाल लिया और एक नई जिंदगी दी। अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो चैनल को सब्सक्राइब करें और कमेंट में अपनी राय जरूर दें कि कहानी कैसी लगी। और